Monday, June 30, 2008

34 साल पहले टाटा मोटर्स में पहली महिला टेक्निकल ऑफिसर सुधा मूर्ति के संस्मरण

सुधा कुलकर्णी मूर्ति देश की सबसे बड़ी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनी इनफोसिस के चेयरमैन नारायण मूर्ति की पत्नी हैं। इनफोसिस फाउंडेशन की चेयरपरसन के तौर पर समाज सेविका के अलावा सुधा मूर्ति स्थापित लेखिका भी हैं। 29 जुलाई 2004 को जे आर डी टाटा की जन्मशती पर कंपनी की पत्रिका के विशेषांक में उन्होंने टाटा में नौकरी और जेआरडी से मुलाकातों पर संस्मरण लिखा। उसका एक प्रेरक अंश यहां दे रही हूं जो उन्हें एक जुझारू, हिम्मती और टाटा मोटर्स में काम करने वाली पहली महिला टेक्निकल ऑफिसर के रूप में दिखाता है।

It was probably the April of 1974. Bangalore was getting warm and gulmohars were blooming at the IISc campus. I was the only girl in my postgraduate department and was staying at the ladies' hostel. Other girls were pursuing research in different departments of Science.

Rohini Nilekani and Sudha Kulkarni (Murthy)

I was looking forward to going abroad to complete a doctorate in computer science. I had been offered scholarships from Universities in the US ... I had not thought of taking up a job in India .

One day, while on the way to my hostel from our lecture-hall complex, I saw an advertisement on the notice board. It was a standard job-requirement notice from the famous automobile company Telco (now Tata Motors)... It stated that the company required young, bright engineers, hardworking and with an excellent academic background, etc.

At the bottom was a small line: 'Lady Candidates need not apply.'

I read it and was very upset. For the first time in my life I was up against gender discrimination. Though I was not keen on taking up the job, I saw it as a challenge. I had done extremely well in academics, better than most of my male peers...
Little did I know then that in real life academic excellence is not enough to be successful? After reading the notice I went fuming to my room. I decided to inform the topmost person in Telco's management about the injustice the company was perpetrating. I got a postcard and started to write, but there was a problem: I did not know who headed Telco.

I thought it must be one of the Tatas. I knew JRD Tata was the head of the Tata Group; I had seen his pictures in newspapers (actually, Sumant Moolgaokar was the company's chairman then) I took the card, addressed it to JRD and started writing. To this day I remember clearly what I wrote.

'The great Tatas have always been pioneers. They are the people who started the basic infrastructure industries in India , such as iron and steel, chemicals, textiles and locomotives they have cared for higher education in India since 1900 and they were responsible for the establishment of the Indian Institute of Science. Fortunately, I study there. But I am surprised how a company such as Telco is discriminating on the basis of gender.'

I posted the letter and forgot about it. Less than 10 days later, I received a telegram stating that I had to appear for an interview at Telco's Pune facility at the company's expense. I was taken aback by the telegram. My hostel mate told me I should use the opportunity to go to Pune free of cost and buy them the famous Pune saris for cheap! I collected Rs30 each from everyone who wanted a sari when I look back, I feel like laughing at the reasons for my going, but back then they seemed good enough to make the trip.

It was my first visit to Pune and I immediately fell in love with the city. To this day it remains dear to me. I feel as much at home in Pune as I do in Hubli, my hometown. The place changed my life in so many ways. As directed, I went to Telco's Pimpri office for the interview.

There were six people on the panel and I realized then that this was serious business. 'This is the girl who wrote to JRD,' I heard somebody whisper as soon as I entered the room. By then I knew for sure that I would not get the job. The realization abolished all fear from my mind, so I was rather cool while the interview was being conducted.

Even before the interview started, I reckoned the panel was biased, so I told them, rather impolitely, 'I hope this is only a technical interview.'

They were taken aback by my rudeness, and even today I am ashamed about my attitude. The panel asked me technical questions and I answered all of them.

Then an elderly gentleman with an affectionate voice told me, 'Do you know why we said lady candidates need not apply? The reason is that we have never employed any ladies on the shop floor. This is not a co-ed college; this is a factory. When it comes to academics, you are a first ranker throughout. We appreciate that, but people like you should work in research laboratories.

I was a young girl from small-town Hubli. My world had been a limited place. I did not know the ways of large corporate houses and their difficulties, so I answered, 'But you must start somewhere, otherwise no woman will ever be able to work in your factories.'

Finally, after a long interview, I was told I had been successful. So this was what the future had in store for me. Never had I thought I would take up a job in Pune. I met a shy young man from Karnataka there, we became good friends and we got married.

It was only after joining Telco that I realized who JRD was: the uncrowned king of Indian industry. Now I was scared, but I did not get to meet him till I was transferred to Bombay. One day I had to show some reports to Mr Moolgaokar, our chairman, who we all knew as SM.. I was in his office on the first floor of Bombay House (the Tata headquarters) when, suddenly JRD walked in. That was the first time I saw 'appro JRD'. Appro means 'our' in Gujarati. This was the affectionate term by which people at Bombay House called him.

I was feeling very nervous, remembering my postcard episode. SM introduced me nicely, 'Jeh (that's what his close associates called him), this young woman is an engineer and that too a postgraduate. She is the first woman to work on the Telco shop floor.'

Tuesday, June 24, 2008

गृहिणी को गृहकार्य का वेतन मिलना चाहिए।

पल्लवी त्रिवेदी द्वारा लिखा लेख क्या गृहिणी को गृहकार्य का वेतन मिलना चाहिए। पढ़ा।
मैंने इस विषय पर बहुत वर्षों से बहुत बार विचार किया है। प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहिए। यदि स्त्री नौकरी करती है तो यह स्वाभाविक रूप से हो जाता है। परन्तु यहाँ भी यदि वह ही घर संभालती है तो निश्चय ही उसका कार्य दोहरा हो जाता है और यदि पति भी बराबर का सहयोग दे तो गृहकार्य व वेतन का प्रश्न नहीं उठेगा।

जब स्त्री गृहिणी होती है तो उसके कई कारण हो सकते हैं,सदियों से चलती आ रही परम्परा,पति का कार्य ऐसा होना कि यदि पत्नी भी नौकरी करेगी तो घर का चलना असंभव होना(यह एक तथ्य है,चाहे यह स्त्री व पुरुष दोनों के प्रति अन्याय है,क्योंकि स्त्री आत्मनिर्भर होने से वंचित रह जाती है व पुरुष अति व्यस्तता के कारण आराम, मनोरंजन व परिवार के साथ समय बिताने से वंचित रह जाता है। एक और बात है,यदि ऐसी ही नौकरी स्त्री भी करे तो घर का क्या होगा? सो किसी के लिए भी केवल कार्य क्षेत्र के प्रति पूर्ण समर्पण व परिवार की ओर समय न देने वाली नौकरी किसी भी तरह सही नहीं है।),ऐसी जगह रहना जहाँ स्त्री के रोजगार के साधन ही न हों(हाँ,आज भी बहुत से संस्थान ऐसे हैं जो केवल पुरुषों को ही काम पर रखते हैं,जैसे बहुत से कारखाने) आदि। निश्चित रूप से गृहिणी के काम की कीमत किसी नौकर द्वारा घर के काम किये जाने से अधिक ही होती है। नौकर रखने की स्थिति में भी उससे सही ढंग से काम गृहिणी ही करवाती है। बच्चों का लालन पालन भी वही करती है। यह भी सच है कि यदि वह बाहर काम पर नहीं जाती तो आमतौर पर घर के बजट पर अधिक ध्यान देती है व किसी ना किसी प्रकार से पैसे बचाने के चक्कर में पड़ी रहती है। चाहे वह सस्ता सामान लाने के लिए अधिक मेहनत व सिरखपाई करनी हो,चाहे अधिक से अधिक चीजें घर में ही बनानी हो,चाहे बहुत सोच समझकर खर्चा करना हो। उसे लगता है कि बचत करना भी कमाई करने के बराबर है,या फिर बचत ही उसकी कमाई का एकमात्र साधन है। यदि वह घर में अचार डाल,पापड़ बना,स्वैटर बुन,कपड़े सिलकर,पुराने कपड़ों का नया उपयोग कर,घर में ही केक,मिठाई आइसक्रीम,नमकीन व घर की साजसज्जा का सामान आदि बनाकर,बच्चों को ट्यूशन के लिए ना भेज स्वयं उनको पढ़ाकर कुछ पैसे बचाती हूँ तो बस वही उसकी कमाई है,यह सोचती है। जब एक महिला घर से बाहर काम करती है तो स्वाभाविक है कि उससे इस प्रकार के कामों की आशा नहीं रखी जा सकती। उसका समय अमूल्य हो जाता है।

माना कि संसार में बच्चों को लाना,उनका लालन पालन करना,अच्छे व स्वस्थ मन व शरीर वाले बच्चे व परिवार किसी भी समाज के लिए आवश्यक हैं,परन्तु बहुत कम राष्ट्र इस कार्य के लिए घर चलाने वाले या वाली को पैसे देने को तैयार होंगे। अतः एक ही रास्ता बचता है कि यदि किसी परिवार में दंपत्ति में से केवल एक ही नौकरी करता हो या धन अर्जन करता हो तो घर की देखभाल करने वाले को आय का एक भाग दिया जा सकता है। यह भाग या तो आय का २० प्रतिशत हो सकता है या फिर घर के सारे खर्चे के बाद बचने वाली राशि का आधा हो सकता है। इस तरह से स्त्री भी महसूस करेगी कि उसकी भी कुछ जमा पूँजी है। यह एक तरह से परिवार के लाभ के लिए ही होगा। स्त्री का सशक्त होना परिवार के लिए ही लाभकारी होगा। दोनों बचत की पूँजी मिलाकर दोनों के नाम से मकान बनाने के लिए भी उपयोग कर सकते हैं। यदि दुर्भाग्य से विवाह टूटे तो भी स्त्री सड़क पर या मायके नहीं पहुँच जाएगी। यदि पति पत्नी दोनों नौकरी करें तब भी यदि वे अपनी आय का १० प्रतिशत भाग एक दूसरे के नाम जमा करें तो किसकी आय कम या अधिक है यह भावना नहीं पनपेगी।

जानती हूँ कि बहुत से लोग कहेंगे कि विवाह व प्रेम के बीच पैसा कहाँ से आ गया। समस्या यह है कि पैसे को कितनी भी हेय दृष्टि से देंखें तो भी उसके बिना काम नहीं चलता। कभी भी विपदा आ सकती है(रोग,नौकरी जाना,मनमुटाव,तलाक)। ऐसे में यदि दोनों अपने को आर्थिक रूप से समर्थ महसूस करें तो वे ऐसी कठिनाइयों का अधिक आसानी से सामना कर सकते हैं। अपनी आय को वे स्वतंत्रता से निवेश कर सकते हैं। आर्थिक रूप से निर्भर किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसी माँगें रखना कठिन है परन्तु समाज में यदि यह सोच एक बार चल निकले तो सबका ही लाभ होगा। यह माँग करना कुछ उतना ही कठिन है जितना निर्भर व्यक्ति के लिए कमाने वाले से यह कहना कि अपना जीवन बीमा करवा लो। यदि कमाने वाला स्वयं ही सूझबूझ रखकर अपने पर निर्भर लोगों के नाम बीमा करवाए तो सभी को सुविधा होती है।

विषय सोचने का है और समय गया है कि इस पर गम्भीरता से विचार किया जाए।

घुघूती बासूती

Monday, June 23, 2008

बराबरी क्या सचमुच इतनी दूर है?

'घर पर किए जाने वाले कार्य का भी मूल्य है'- विषय पर पिछले पोस्ट पर अपना विचार टिप्पणी के तौर पर लिखना शुरू किया तो वह काफी लंबा हो गया। इसलिए एक पोस्ट के तौर पर डालने की गुस्ताखी कर रही हूं। उम्मीद है, इसमें से भी कुछ सोचने लायक निकलेगा।

समाज अर्थव्यवस्था से और लोग अर्थ से संचालित होते हैं, माना। यह भी सच है कि अर्थोपार्जन की मात्रा ही आम तौर पर किसी व्यक्ति को मिलने वाले सम्मान का तराजू है। फिर भी - कृपया इसे सैद्धांतिक बात कह कर खारिज न कर दें - मुझे लगता है कि हम सब किसी न किसी स्तर पर एक इंसान हैं और कुछ इंसानी विशेषताओं के मालिक हैं। विवेक के अलावा हमारी विशेषताएं हैं, भावना और उसे अभिव्यक्त करने की और हाथ के हुनर की। परिवार स्त्री को कहीं बांधता है तो समृद्ध भी करता है। स्त्री भी परिवार को बांधती और समृद्ध करती है। ऐसे में उसके घर-परिवार से जुड़े विशेष काम को विशेषज्ञता के तौर पर ही देखा जाए और उसकी कीमत पैसे में नहीं बल्कि परिवार में उसके समान दर्जे के रूप में अदा की जाए।

स्त्री-पुरुष में शारीरिक फर्क के साथ दिमागी क्षमता का फर्क भी है जिसे नकारा नहीं जा सकता। मैं अगर बटन टांकने का काम सहजता से कर सकती हूं तो करूंगी। लेकिन साथ में यह काम कभी अपने पति से करने को कहूंगी और बेटे को भी सिखाऊंगी। लेकिन अगर मुझे घर में गुलदान कमरे के कोने में रखा रहना पसंद है तो मैं यह अपने बेटे को यही सिखाऊँ कि गुलदान इस जगह रखा जाता है, यह तो कोई बात नहीं। और अगर कभी बेटे का भीगा शरीर पोंछने के लिए तौलिया लेकर दौड़ जाती हूं तो कोई यह उम्मीद न करे कि हर दिन पति के नहाने के लिए भी तौलिया-कमीज तैयार कर दूंगी।

औरतें अपने सहज स्वभाव से घर में जोड़-तोड़ (ज्यादातर जोड़-जोड़) करती और उसे बांधती रहती हैं। दिक्कत तब आती है जब कोई इस जोड़ने को अपने जीवन का चरम लक्ष्य और दूसरों को इस काम के लिए नाकाबिल मान लेती है। दरअसल यह मानना भी एक तो, उनको बचपन से दी जा रही सीख का हिस्सा होती है, दूसरे, गृहणी को लगता है कि अपना महत्व साबित करने के लिए इस स्थिति को बनाए रखने की जरूरत है।

मेरी चाची 'सुघड़' और 'सुरुचिपूर्ण' कहलाती थीं क्योंकि वे घऱ पूरी तरह खुद संभालती थीं। महरी रोज सफाई करती लेकिन उन्हें 'अपने हाथ की सफाई' और कपड़ा धुलाई ही पसंद था। चाचा को पालक पसंद नहीं, तो घर में महीनों चाची का मनपसंद पालक-पनीर नहीं बनता। जबकि अरबी से उन्हें नफरत है पर हर हफ्ते वो खुद सब्जी बाजार से अरबी उठा लातीं क्योंकि 'उन्हें' पसंद है। खास बात यह है कि इसके लिए चाचा का कभी कोई दबाव उन पर नहीं था। पर चाची को लगता है कि इस तरह वे पति और परिवार के लिए अपरिहार्य हो जाएं तो उनका जीना सार्थक होगा।

पर एक दिन जब वे बिस्तर पर पड़ गईं (इन्हीं बेवजह के कामों में अपनी सेहत को भुलाए रखने के कारण) तो घर अस्त-व्यस्त हो गया और उन्हें संतोष हुआ कि उन्होंने जो चाहा वही हुआ, उनकी कीमत सब समझ रहे हैं। लेकिन कहानी और आगे जाती है और स्थितियां बदलती हैं। उनकी बीमारी के अगले चार दिन पति के घरेलू कामों से जूझने के रहे और उसके बाद चाची की अपरिहार्यता का अंत करने के। चाची के इस भयानक भ्रम के टूटने के बाद भी परिवार में उनकी वही कद्र रही जो पहले थी। उनके किए बिना भी कपड़े धुले और फर्श ठीक-ठाक ही साफ रहा। खाने में मसाले कम पड़े लेकिन सब्जी और दाल के स्वाद में कोई खास फर्क नहीं आया। और इस नए स्वाद में भी किसी को बुरा नहीं लगा। अब चाची सारा दिन घर सफाई और खाना पकाने की बजाए कुछ पढ़ती हैं और उन्हें घर के बाहर चीजों का भी होश आया है। यही है शायद महिलाओं के जागने का पहला कदम।

दरअसल हमेशा, हर मामले को स्त्री बनाम पुरुष के तौर पर देखना बहुत बोझिल होता है। जहां तक महिला के काम की कीमत लगाने की बात है तो उस पर भी अर्थोपार्जन के वही नियम लागू हों जो पुरुषों के लिए हैं, न कम न ज्यादा। और परिवार का साझा काम साझा ही रहे, बंटवारा आपसी सुविधा से, सहमति से हो। यह आदर्श स्थिति लगती है, लेकिन अगर कुछ परिवारों में यह हो सकता है तो ज्यादा परिवारों में क्यों नहीं?

घर पर किये जाने वाले कार्य का भी मूल्य है!

पल्लवी की पिछली पोस्ट कहती है ....एक गृहणी सुबह से रात तक जो जो काम करती है वो किसी एक दायरे में नहीं रखे जा सकते!सारा गृहकार्य, बच्चों की देखभाल,पढाना, घर का प्रबंधन,बजट में घर चलाना,परिवार के सभी सदस्यों को मानसिक सपोर्ट देना....ये सारे काम बदस्तूर जिंदगी भर चलते रहते हैं...लेकिन इसके एवज़ में उसे कोई तनख्वाह नहीं मिलती है!इतना कार्य करने के बाद भी वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है!क्यों उसके कार्य का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कोई योगदान नहीं है? (GDP is defined as the total market value of all final goods and services produced within the country in a given period of time .)

इस पोस्ट पर आये सभी कमेंट्स यह हैं -

DR.ANURAG said...
बस तो फ़िर घर दफ्तर बन गया समझो........

June 21, 2008 1:31 PM
सुजाता said...
पल्लवी एक अच्छा मुद्दा उठाया है । घरेलू कार्यों को जैसे ही नौकर से करवाने की बात आये तो समझ आता है कि घर पर बैठने वाली स्त्री दर असल कितना श्रम और समय होम मैनेजमेंट मे लगा रही है । उसके काम और श्रम और समय की लागत को सम्मान नही मिलता । वेतन देने की बजाय उसे इस सम्मान का हकदार होना चाहिये डॉ अनुराग की बात से यह भी प्रश्न भी दिमाग मे आया कि-- वेतन कौन देगा ? पति ?
।कुछ स्पष्टता इसे लेकर मुझे भी नही हो पायी । पर आस पास देखा है कि घरेलू स्त्रियाँ जब पति से धन मांगती हैं तो उन्हें कई तरह के स्पष्टीकरण और हिसाब देने होते हैं या झिड़की खानी होती है ।मेरी एक मित्र की माँ आज भी घर खर्च के गिने गिनाए पैसे ही पाती है । बेटी बहू को कुछ देना हो तो उसे कहीं घर के रेग्युलर खर्च में कुछ महीने तक घपला करना होता है क्योंकि पति से धन की मांग की लिमिटेशन्स हैं ।
एक तरह से गृहणी का अर्थ पर तो कोई नियंत्रण होती ही नही । नौकरी करने वाली स्त्रियों का भी किस हद तक होता है यह एक नया सवाल है । पर निश्चित रूप से वे घर पर रहने वाली स्त्री से इस मायने मे अधिक आज़ाद हैं कि पूंजी उनके हाथ में आती तो है ।
कुछ अपवाद ऐसे भी हैं जहाँ पति की जेब साफ हो जाती है और पति उफ भी नही कर सकता , या जहाँ हर उत्सव पर गहनों की डिमांड आती है । पर सच कहें तो यह सब मध्यवर्गीय स्त्रियों की समस्याओं के ही दायरे हैं । निम्नवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय स्त्री जो घर पर रहती है या कोई छोटी मोटी नौकरी भी करती है अर्थ उसके नियंत्रण से बहुत दूर है अभी ।
ऐसे में मुझे सूर्यबाला की एक कहानी याद आ रही है , जल्द ही सभी से बांटती हूँ ।
इस विषय पर विस्तार से बात होनी चाहिये ।

June 22, 2008 9:13 AM
Suresh Chandra Gupta said...
क्या हो गया है चोखेरवालिओं को, कैसे मुद्दे उठा रही हैं बहस के लिए? एक मजदूर, एक क्लर्क, एक टीचर से तुलना कर रही हैं गृहणी की. मजदूर, क्लर्क, टीचर काम करते हैं और मेहनताना पाते हैं. आज वह यहाँ हैं, कल वह कहीं और होते हैं. कार्यस्थल से उनका बस इतना ही रिश्ता होता है कि काम किया, मेहनताना लिया और नमस्ते. क्या घर में गृहणी का यही रोल है?

क्या यह जरूरी है कि हर बात को नकारात्मक रूप में देखा जाए? घर को चलाने में पुरूष और नारी का बराबर अधिकार और जिम्मेदारी होती है. अगर नारी को लगता है कि उसे उसका अधिकार नहीं मिल रहा तब उसे उस अधिकार की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना चाहिए. यहाँ तो उल्टा हो रहा है. ख़ुद को घर में मजदूर के रूप में देखा जा रहा है. यह कैसा संघर्ष है अपने अधिकार के लिए?

June 22, 2008 12:16 PM
Rachna Singh said...
पल्लवी आप एक अविवाहित , सक्षम महिला ३० वर्ष के अंदर हैं , मै एक अविवाहित , सक्षम महिला 48 वर्ष की हूँ , सुजाता एक विवाहित , सक्षम महिला ३० -३५ वर्ष के अंदर हैं पर वोह इस ब्लॉग की सूत्रधार हैं यानी उनका कमेन्ट एक summerization होता हैं . कल जब आप की ये पोस्ट आई तो स्मित के रेखा मुख पर आगई और मैने कमेन्ट करने से अपने को रोका पर जानती थी की कोई भी विवाहिता स्त्री इस पर कमेन्ट नहीं करेगी { सुजाता का कमेन्ट अपवाद होगा कोई उन्हे तो करना ही है !!!!! } . जिस समस्या का सीधा प्रभाव जिस पर पड़ना हैं अगर वो ही नहीं बोलेगा तो आप के मेरे या सुजाता के बोलने से क्या होगा . हिन्दी ब्लॉग्गिंग में विवाहित महिला ब्लॉगर बहुत हैं और आप के इस ब्लॉग को पढ़ती भी हैं , फिर ये चुप्पी क्यों { क्या इसलिये की पोस्ट शनिवार को आयी !!! } . बार बार विवाहित स्त्रियाँ ब्लॉग पर ही नहीं जगह जगह प्रिंट मीडिया , साक्षात्कार , टीवी , आत्म कथा लिखती हैं और ५० % से ज्यादा अपने आप एक घुटन का खुलासा करती हैं . और फिर कहा जाता हैं सामाजिक व्यवस्था को एसा करो की सबको स्वयं आज़ादी मिल जाये . क्यों समय रहते विवाहित स्त्री अपने अधिकारों के लिये नहीं बोलना चाहती हैं . और अगर इन सब बातो को जो प्रश्न आप उठा रही हैं वोह गैर जरुरी समझती हैं तो क्यों फिर बाद में सबसे ज्यादा सिस्टम के खिलाफ एक विवाहित स्त्री ही बोलती हैं लकिन तब बोलती हैं जब वो उस सिस्टम में पुरी तरह रम चुकी होती हैं और उसके बेस्ट का फायदा ले चुकी होती हैं . ब्लॉग्गिंग में सब पढ़ी लिखी महिला हैं फिर भी किसी विवाहित स्त्री को इस पोस्ट पर कमेन्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई ?? ये लिखने में कितना समय लगता हें की हाउस वाइफ को वेतन मिलना या नहीं मिलना चाहिये . अगर कोई बोलना ही नहीं चाहता तो क्या फायदा हैं विमर्श का . चाहे वोह चोखेर बाली ब्लॉग पर हो या नारी ब्लॉग पर .
व्यक्तिगत तोर पर मै विवाहित स्त्री के वेतन के ख़िलाफ़ हूँ और स्त्री की आर्थिक रूप से सक्षम होने के पक्ष में हूँ . पर जिनको फर्क पढ़ना चाहिये वहाँ सिर्फ़ मौन हैं सन्नाटा हैं

June 22, 2008 1:23 PM
pallavi trivedi said...
mera vyaktigat taur par maanna hai hai ki har vyakti ke kaam ka moolya hona hi chaahiye!sabke apne vichaar hain....main to is vyavastha ka samarthan karti hoon.jis din koi bhi country aisa karna shuru kar degi sabhi deshon mein is vishay par bahas hone lagegi.

June 22, 2008 1:47 PM

masijeevi said...
मूल मुद्दा कुछ भटका (स्‍त्री विमर्श के मुद्दे अक्‍सर भटकते हैं- भटकाए भी जाते हैं) तनख्‍वाह मिले या नहीं से ज्‍यादा अहम है कि स्‍वीकारा जाए कि इस काम का 'मूल्‍य' है। परिवार की 'महानता' स्‍त्री के 'त्‍याग' आदि के महिमामंडन में इस घरेलू काम को आर्थिक तौर पर निरर्थक क्रिया न मान लिया जाए।
2002 में एक स्‍त्री समूह में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में यह आंकलन किया और पाश कि मध्‍यम वर्ग में जब पति की आय औसतन 8000 थी तब पत्‍नी के घरेलू कार्य की बाजार कीमत 12000/- के लगभग थी। बहुत ही कच्‍चा आंकलन था जो पति के घर में किए गए कामों को नजरअंदाज करता था पर फिर भी कम से कम ये तो पता चलता है कि यदि घरेलू काम का आर्थिक मूल्‍य नजर में रखा जाए तो घरेलू भी वर्किंग माना जाएगा।

June 22, 2008 3:47 PM

Rachna Singh said...
नहीं पल्लवी कि पोस्ट का मुद्दा बिल्कुल " crystal clear " हैं और उनका कमेन्ट भी इसी और हैं हर व्यक्ति के क्षम का मूल्य होना चाहिये और आज कल के दौर मे मूल्य का अर्थ बिल्कुल सीधा हैं कि काम का पैसा मिले । घरेलू काम के लिये गृहिणी को गृहकार्य का वेतन मिलना चाहिए , या नहीं । जहाँ तक मेरी अल्प जानकारी हैं शायद नोर्वे सरकार ये करती हैं पर मुझे doubt हैं कि वोह इसे house wife allowance कि तरह देती हैं या unemployed कि तरह . मसिजीवी जी commercialization का ज़माना हैं इस लिये मूल्य का मतलब आर्थिक मूल्य हैं ।

June 22, 2008 6:21 PM
pallavi trivedi said...
हर व्यक्ति के क्षम का मूल्य होना चाहिये और आज कल के दौर मे मूल्य का अर्थ बिल्कुल सीधा हैं कि काम का पैसा मिले

rachna se poori tarah sahmat....

June 23, 2008 12:11 AM

अनूप भार्गव said...
अज़ीब सी बहस हो रही है । समझ नहीं आता कि यह श्रम का मूल्य सरकार से दिया जाने को कहा जा रहा है या पति से ?

यदि सरकार से इस की अपेक्षा की जा रही है तो उसका क्या औचित्य है ? सरकार निजी क्षेत्र में काम करने वाले किसी पुरुष को पैसा नहीं देती । सरकार सिर्फ़ उन पुरुषों को वेतन देती है जो सरकारी नौकरी करते हैं और सरकार के काम को आगे बढाने मे योगदान देते हैं । घर में काम करना महत्वपूर्ण तो है लेकिन सरकार के काम में किस तरह सहायता कर रहा है ? फ़िर वेतन कार्य की कुशलता और योग्यता पर निर्भर करता है, क्या सरकार आप के घर में उसे आंकने के लिये आयेगी ?

पति से घर मे किये गये कार्य के लिये वेतन की अपेक्षा सैद्धांतिक रूप से अच्छी लगती है लेकिन व्यव‌हारिक नही । क्या घर में किये गये हर काम का आप आर्थिक मूल्य लगाने लगेंगे ? आज मैं बाज़ार से सामान ले कर आया , उस का मूल्य इतना हुआ , आज खाना बनाने का मूल्य इतना हुआ , अच्छा आज घर की सफ़ाई नहीं हुई , इसालिये उसका पैसा काट लिया जायेगा । स्थिति हास्यास्पद सी नहीं हो जायेगी ? फ़िर यदि स्त्री के श्रम की कीमत लग रही है तो पुरुष जो परिवार के लिये कर रहा है , उस की कीमत क्यों नहीं ? परिवार को यदि इकाई की तरह ही लिया जाये तो बेहतर होगा

हां स्त्री के काम का महत्व है और उसे स्वीकार किया जाना चाहिये , घर की हर चीज़ में उस का बराबर का हिस्सा होना चाहिये, कानून मे बदलाव हो कि ’सेपरेशन’ की स्थिति में स्त्री को उस का पूरा हक मिले लेकिन श्रम की कीमत की तरह ’वेतन’ की बात व्यवहारिक नहीं लगती ।

June 23, 2008 5:35 AM

सुजाता said...

मेरा हर कमेंट एक पाठक के तौर पर होता है न कि किसी की पोस्ट को कनक्लूड करता हुआ ।

इस मुद्दे पर अनूप जी से सहमति है ।

घरेलू श्रम के मूल्य की बात महत्वपूर्ण है लेकिन वह मूल्य क्या हो और उसे किससे प्राप्त किया जाएगा यह बड़े सवाल हैं । पत्नी बनने का वेतन समझ नही आता । घरेलू कार्य स्त्री अपने बसाए घर के प्रति स्नेह और प्यार से करती है , इसे किसी की ज़िम्मेदारी या कमज़ोरी नही मानना चाहिये , न ही इस कारण किसी को हीन समझना चाहिये ।यदि वह कामकाजी भी है तो यह श्रम कई गुना हो जाता है । इसका उपाय आपसी सामंजस्य से घरेलू कामों को निबटाकर किया जा सकता है ।जो कि आमतौर पर नही होता ।
दूसरी बात वही ,
कि घर मे रहने वाली पत्नियाँ कुछ नही करतीं यह मत गलत सिद्ध करने के लिए ही इस प्रकार के शोध होते हैं जो साबित करते हैं कि आप वास्तव में घर की स्त्री के किये काम का बाज़ार मूल्य लगाने चलेन्गे तो पायेंगे कि उसका किया काम कितना महत्वपूर्ण है ।
तीसरी बात ,
यदि सहमत हुआ जाए तो जब पति कार चलाकर परिवार को कहीं ले जाता है तो उसे अपनी ड्राइवरी की कीमत वसूल करनी चाहिये । तो इस तरह बच्चे भी घर का एकाध काम करने , बाज़ार से दूध-दही ले आने के बदले पैसा वसूल करेंगे ।
चौथी बात ,
इस तरह से आप पुरुष के वर्चस्व को और अहमियत दे रही हैं और साबित कर रही हैं कि वास्तव में पुरुष मालिक है । वह पत्नी से मनचाहे ढंग से काम करायेगा और सहानुभूते भी नही रखेगा क्योंकि वह उसके श्रम का सारा बाज़ार मूल्य अदा कर रहा होगा ।इसमें क्या क्या और किस तरह का श्रम शामिल होगा यह भी विचारणीय है ।

बहुत सम्भव है कि मसिजीवी जी ने जैसा कहा कि - बहस कहीं और ही भटक रही है ।

साधारणत: घरेलू पत्नी का घर के आर्थिक ढांचे पर कोई नियंत्रण नही होता और उसका घर में दिया जाने वाला श्रम महत्वहीन समझा जाता है । मेरे खयाल से हमें इसके आस पास रहकर बात करने की ज़रूरत है ।

June 23, 2008 11:51 AM

अनाम द्वारा इस पोस्ट पर दिया गया बी बी सी न्यूज़ का महत्वपूर्ण लिंक जो इस बाबत एक वेबसाइट द्वारा किये गये सर्वे का नतीजा बताता है ।

Saturday, June 21, 2008

क्या गृहिणी को गृहकार्य का वेतन मिलना चाहिए?

एक मजदूर आठ घंटे काम करता है और दिन के अंत में वो १०० रुपये पाता है ,शायद थोड़े कम या ज्यादा भी हो सकते हैं!एक क्लर्क शायद महीने के ५००० रुपये ,टीचर भी लगभग इतने...यानी हर व्यक्ति अपने काम का मेहनताना पा रहा है और सच भी है...कार्य का मूल्य तो होना ही चाहिए!

अब एक और द्रश्य....एक गृहणी सुबह से रात तक जो जो काम करती है वो किसी एक दायरे में नहीं रखे जा सकते!सारा गृहकार्य, बच्चों की देखभाल,पढाना, घर का प्रबंधन,बजट में घर चलाना,परिवार के सभी सदस्यों को मानसिक सपोर्ट देना....ये सारे काम बदस्तूर जिंदगी भर चलते रहते हैं...लेकिन इसके एवज़ में उसे कोई तनख्वाह नहीं मिलती है!इतना कार्य करने के बाद भी वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है!क्यों उसके कार्य का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कोई योगदान नहीं है? (GDP is defined as the total market value of all final goods and services produced within the country in a given period of time .)

आजकल कई देशों में इस पर विमर्श चल रहा है की किस प्रकार एक हाउस वाइफ द्वारा किये जाने वाले कार्य के बदले वेतन या मानदेय दिया जा सकता है और जनसँख्या का एक बड़ा प्रतिशत इससे सहमत है! कुछ लोगों का मानना है कि ये सब निजी कार्य की श्रेणी में आता है और इससे किसी अन्य को या सरकार को कोई लाभ नहीं है इसलिए वेतन की मांग करना तर्कसंगत नहीं है!
किन्तु वहीं इसके पक्ष में लोगों का कहना है कि घर चलाना ,बच्चों की परवरिश करना प्रत्यक्ष रूप से निजी कार्य भले ही दिखाई देता हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक परिवार का सुचारू रूप से चलना ही किसी भी राष्ट्र की उन्नति और खुशहाली का आधार है! मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ! क्या हो यदि...गृहणी इन सभी कार्यों को करने से इनकार कर दे! दो बातें हो सकती हैं...सभी कार्यों को करने के लिए कोई नौकर रखा जा सकता है...लेकिन वो भी बिना वेतन के कार्य नहीं करेगा..यानी घर पर किये जाने वाले कार्य का भी मूल्य है! दूसरा काम ये हो सकता है कि पति और बच्चे अपना अपना सारा काम स्वयं करें! काम तो चल जायेगा किन्तु कहीं न कहीं परिवार में असंतोष जन्म लेगा और इसका असर बच्चों की पढाई और पति की प्रोफेशनल लाइफ पर पड़ेगा!
यहाँ एक प्रश्न ये उठता है कि जो महिलायें नौकरी करती हैं वो उतना घर का काम नहीं करती हैं जितना एक गृहणी करती है फिर भी घर सुचारू रूप से चलता है! बिलकुल सही बात है...उन घरों में स्तिथि दूसरी होती है वहाँ अपेक्षा की जाती है कि पति भी नौकरी के अलावा घर के कार्यों में बराबरी से हाथ बंटाए और पढ़े लिखे परिवारों में ऐसा होता भी है! एवं उन घरों की आर्थिक स्तिथि ठीक होने से वहाँ वेतन देकर नौकर भी रखा जा सकता है!

किसी ने मुझे बताया था कि शायद किसी देश ने हाउस वाइफ के लिए वेतन देना शुरू कर दिया है..मैंने नेट पर सर्च किया लेकिन मुझे पता नहीं चल सका कि क्या सचमुच कहीं पर ये व्यवस्था शुरू हो चुकी है और अगर हाँ तो किस देश में! यदि आप में से किसी को पता हो तो कृपया जरूर हमें भी बताएं!
ये अलग मुद्दा हो सकता है कि इसके लिए बजट कहाँ से आएगा और सरकार किस प्रकार से इसे कार्यान्वित कर सकेगी....मगर ये बात निश्चित है कि यदि कभी ऐसा संभव हो सका तो ये प्रश्न हमेशा के लिए ख़तम हो जायेगा कि " are u housewife or working?" विडंबना ही तो है कि इतना काम करने के बाद भी उसे वर्किंग की श्रेणी में नहीं माना जाता क्योंकि उसे इन कामों का पैसा नहीं मिलता है! यदि एक महिला को उसके गृहकार्यों के लिए वेतन मिलेगा तो निश्चित रूप से उसके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी और साथ ही वह आर्थिक रूप से भी किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहेगी...आप सभी के इस मुद्दे पर विचार आमंत्रित हैं...ये बहस का नहीं बल्कि संयुक्त रूप से सोचने का विषय है!

Monday, June 16, 2008

वर्जिनिटी ऑन सेल या रीवर्जिनेशन या कहें कौमार्य बिकता है ,खरीदोगे ?

जब भी मैने कहा कि {जिसे कहने वाली मैं पहली नही हूँ , जिसे पुस्तकों मे दर्ज किया जा चुका है } कि ज्ञान ,ज्ञानोत्पादन , शोध, अनुसन्धान , प्रणालियाँ , राजनीति ,सार्वजनिक कार्य , संस्थान सभी पर पुरुष का कब्ज़ा रहा है तभी एकाध उदाहरण जो अब भी अपवाद ही हैं प्रस्तुत कर दिये जाते हैं । फ्रॉयड का मनोविश्लेषण हो या मार्क्स का चिंतन स्त्री की छवि को या तो उलझाया ही है या तटस्थ ही रहे हैं ।
मेडिकल साइंस ने गर्भनिरोधक तरीकों की इजाद से जहाँ स्त्री को आधुनिक समय में अपेक्षाकृत मुक्त किया है वहीं अपने कईं उपक्रमों और अनुसन्धानों के समाज पर दूरगामी प्रभावों का अनुमान लगाने में असफल रही है ।परमाणु बमों का अविष्कार मैं ऐसी ही नासमझ साइंस का परिणाम मानती हूँ । विज्ञान के छात्रों और शोधकर्ताओं को दर्शन और ह्यूमैनिटी की वैचारिकियों की कितनी ज़रूरत है इस पर विचार होना चाहिये | अपने आप में यह भी विचार का एक अलग विषय हो जाता है ।
फिलहाल मेरी चिंता का विषय है -
Revirgination कहिये या hymenoplasty
यानि कौमार्य की पुन: प्राप्ति या क्षतिग्रस्त कौमार्य की रिपेयरिंग ।जनसत्ता के मुताबिक “हाइमेनोप्लास्टी एक ऑपरेशन होता है जो कौमार्य के बारे मे जानकारी देने वाली झिल्ली {हाइमेन} की मरम्मत कर उसे यथास्थान पर पूर्ववत करने के लिए किया जाता है ।‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित एक खबर में कहा गया है निजी क्लीनिक में हाइमेनोप्लास्टी पर 2900 डॉलर से अधिक राशि खर्च हो सकती है । इसके बावजूद मुसलिम महिलाएँ यूरोप में यह ऑपरेशन करा रही हैं। उन्हें आशंका होती है कि हाइमेनोप्लास्टी न कराने पर उनके पति उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे’”

खबर है कि यूरोप की मुस्लिम महिलाएँ डॉक्टर से अपनी कौमार्यता का प्रमाण् पत्र सबूत के तौर पर मांगा करती थीं । अस्पताल में आयी एक नवयौवना ने इस ऑप्रेशन से पहले कहा कि – उसके लिए ज़िन्दगी से भी ज़रूरी उसकी वर्जिनिटी है । उसके धर्म में कुमारी न होना बुरा माना जाता है ।

क्या मुझे यह मानना चाहिये कि मेडिकल साइंस सारे स्त्री विमर्श और स्त्री मुक्ति का तेल कर रही है ? क्योंकि हाइमेन की रिपेयरिंग कर उसे पूर्ववत कर् देना दरअस्ल धीरे धीरे वर्जिनिटी के महत्व को और अधिक मज़बूत करेगा । वर्जिनिटी या कौमार्यता वह धारणा है या कहूँ अनिवार्यता है जिसके चलते अब तक हमारा समाज लड़की के सर अपनी इज़्ज़त का टोकरा रखता आया है ।जब कौमार्यता पुन: हासिल करने के उपाय सामने होंगे तो कौमार्यता का महत्व और उसके अभाव की ग्लानि की मानसिकता से कैसे निकलेगा समाज ?यह कौमार्यत के मिथों को तोड़ने का समय है या उसे मज़बूत करने का ?और यह स्थिति तब है जब कि विज्ञान ही साबित कर चुका है कि हाइमेन का भंग होना प्रथम सम्भोग से ही नही होता इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे कि साइकलिंग करना ,जिमनास्टिक्स , तैराकी जैसी शारीरिक मशक्कत वगैरह ।

अगर सकारात्मक सोचूँ ... जो कि होगा नही इस बात में कि कौमार्यता हासिल की जा सकती है यह सोच कर , शायद ,अपमान से लड़की बलात्कार या विवाह पूर्व सम्बन्ध की शर्म के बोझ से आत्महत्या नही करेगी । और शायद परिवार वाले भी ऐसी स्थिति मे उसे गला घोंट कर मार नही डालेंगे ।
लेकिन कुल मिलाकर क्या ? इससे समाज को हासिल क्या ? स्त्री को हासिल क्या ? एक और भ्रम ? खुद को लेकर ? अपनी वर्जिनिटी को लेकर ? जो क्षतिग्रस्त थी ? और जिसके इलाज के सबूत अस्पताल में मौजूद हैं ? यानि कुल मिलाकर अपमान और संत्रास और पीड़ा ?
मानसिक रूप से विकसित , लिंग-भेद रहित समाज को इससे हासिल क्या ? कुछ नही ! !
कुछ समय पहले एक अखबार में एक सर्वे में पढा था कि शहरी नौजवानों में धीरे धीरे पत्नी की वर्जिनिटी की अनिवार्यता की धारनाएँ बदल रहीं हैं । प्रतिशत कम है लेकिन बदलाव है ।
वर्जिनिटी ऑन सेल से इन बदलावों को सीधा सीधा धक्का पहुँचने वाला है । शायद बात का अंत फिर वहीं हुआ कि स्त्री अपनी समस्या की जड़ खुद ही है और उससे उबरेगी भी वह अपने ही प्रयासों से । चाहे वह प्रयास हाइमेन रिपेयर ही क्यो न हो ! बाकी सब बैठ कर तमाशा देखें कि आगे क्या होता है ? फिलहाल तो हाइमेनोप्लास्टी या री वरजिनेशन मार्केट का एक नया उत्पाद है और दिल्ली की कुछ लड़्कियों ने इसके बारे में मैक्स जैसे अस्पतालों में पूछताछ शुरु कर दी है ।

यू ट्यूब पर मिले इस सम्वाद में हाइमेन रिपेयर के नये मुद्दे पर प्रतिक्रिया देखिये -

Saturday, June 14, 2008

आज भी 'अकेली' होती हैं लड़कियां

सुजाता की छह शब्दों वाली छह टन की पोस्ट पर एक टिप्पणी है कि यह बात लड़कियों के बारे में यकीनन सच नहीं है। 1987 में मैंने जबलपुर जैसे छोटे शहर में अपनी सहेली के साथ हुई घटना को बयान किया था। आज 21 साल बाद भी, दिल्ली जैसे महानगर, राजधानी में भी स्थितियां उतनी ही सच हैं।

दृष्य एक: " नीलू बेटे, आज तुम्हारा नतीजा निकला है। अपना रोल नंबर तो लाना अखबार से मिलान कर लूं। फर्स्ट, सैकेंड, थर्ड- तीनों लड़कियां। भई वाह! लड़कियां तो लड़कों को हर मोर्चे पर मात दे रही हैं।"

" पापा मैं पत्रकारिता में प्रवेश लेना चाहती हूं।"

"अरे भई, एम एस सी करो, पी एच डी करो और ठाठ से कॉलेज में पढ़ाओ। पत्रकारों को बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ती है। यह तुम्हारे बस की बात नहीं। इसे तो लड़कों के लिए ही रहने दो।"

दृष्य दो: " नीलू, जरा दुकान से मेरी दवाएं तो ला दे। "

" भैया को भेज दो न मां, मैं नहीं जाना चाहती"

"आजकल तो औरतें मर्दों के सारे काम करती हैं, और तुझे अकेले बाजार तक जाने में हिचक हो रही है। चल उठ फटाफट। बहानों की जरूरत नहीं है। "

दृष्य तीन: "कहां जा रही हो? "

"यहीं, सरिता के घर तक। "

" भैया को साथ ले जाना, जमाना बहुत खराब है आजकल।"

Friday, June 13, 2008

इससे अधिक क्या लिखूँ ...

चार औरतें अकेली जा रही थीं ।

इससे अधिक क्या लिखूँ ....सब छिपा है इसमें...समझें ,ऐसा क्यूँ कहते हैं ?

Wednesday, June 11, 2008

आइए इस आवरग्लास का विश्लेषण करें

पिछले दिनों इसी वेब पृष्ठ पर गुलाबी रंग पर एक पोस्ट पढ़ी थी। उसकी याद अभी ताज़ा ही थी कि अंतरजाल की लहरों में बहते हुए एक दिन यह चित्र दिखाई पड़ गया और इसका गुलाबी रंग एक नजर से ज्यादा देर तक मुझे वहां रोके रह गया। इस पर कई तरह के विरोधाभासी ख्याल मेरे मन में एकसाथ ही आए। वैसे चित्र दिलचस्प है न? एक आवरग्लास की कमर से बंधा एक पालतू कुत्ता।

चित्र ब्यूटी-ब्रेन से संबंधित एक लेख के साथ था। लेख की पहली लाइन थी कि महिलाएं महज अपनी चाल में बदलाव लाकर पुरुषों के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकती हैं और यह वैज्ञानिक अनुसंधानों से साबित हो चुका है।

मुझे उत्सुकता है जानने की कि आप इस बारे में क्या सोच रहे हैं। इस चित्र को किस तरफ से देखते हैं, किस पृष्ठभूमि में विश्लेषित करते हैं। मुझे लगता है कि यह चित्र विश्लेषण का अच्छा टार्गेट हो सकता है। इसे एक खेल समझिए और शामिल हो जाइए इस गैर-नुकसानदेह खेल में!

Sunday, June 8, 2008

खाने की थाली से शुरु हुई आपकी भूख ने दुनिया को किस कगार पर ला दिया

ज़िन्दगी का अनुवाद

सपना चमड़िया
छठा भाग

बचपन से हम लोग एक कहानी सुना करते थे जिसमें एक राक्षस हुआ करता था जिसे हर वक़्त भूख लगी रहती थी। हर वक़्त वह यही कहता था -क्या खाऊँ , क्या खाऊँ? और उस पर स्थिति यह थी कि हर वक़्त उसे खाने को कुछ अच्छा चाहिये होता था;कभी खरगोश का मुलायम माँस ,कभी हिरण का लज़्ज़तदार माँस और सबसे बढकर सबसे स्वादिष्ट इनसान का माँस । माने उसकी भूख एक ईमानदार और सच्ची भूख नही थी बल्कि वह खाली समय की एक अय्याश किस्म की भूख थी जो कुछ भी मिल जाने पर संतुष्ट नही होती थी मिटती नही थी । मालिको मुझे माफ करना ,पर क्या इसी तरह की एक राच्छसी भूख आपके भीतर नही है जो मुझे , मुझ सी घर की सारी औरतों को दीवानावार घर में भटकाती रहती है और हम अपना बेहतरीन समय गैस में , कढाई में ,चिमटे में , आलू में , परवल में , भिण्डी में काटते-झोंकते फिर रहे हैं।
बात इतने पर खत्म नही होती । बरसों से मैं खाना बना रही हूँ-चाय , नाश्ता ,तीन टाइम का भोजन ,तरह-तरह के नये -पुराने व्यंजन, अचार-पापड़-मंगौड़ी और न जाने क्या क्या ।अपना पूरा श्रम ,दिलचस्पी,दिमाग और दिल लगाकर कई सालों से खाना बना रही हूँ और हाँ बहुत अच्छा खाना बना लेती हूँ ।फिर बड़े मन से पूछ पूछ कर मालिकों और उनके बच्चों को , उनके मेहमानों को खाना खिलाती हूँ । पर इतना कुछ करने के बावजूद सिर्फ एक टाइम का खाना अगर खराब बन जाए या सिर्फ एक बार की चाय खराब बन जाए तो मालिक लोग खाना छोड़ देते हैं , मुँह बनाते हैं , दोबारा चाय बनवाते हैं और उस पर से चार बात भी सुनाते हैं ।
यूँ हँसकर मुझे झूठा साबित करने की कोशिश मत कीजिये यह आप ही की तस्वीर है जो सालों माँ और पत्नी के हाथों का बेहतरीन खाना खाने के बावजूद एक वक़्त के खाने से ,एक वक़्त की भूख से समझौता नही कर सकती ।मालिको , इतना अच्छा और इतना ज़्यादा खाना खाने के बावजूद आप हमेशा भुखमरों जैसा व्यवहार क्यूँ करते हैं ?एक चीज़ से आपका पेट क्यूँ नही भरता ?थाली में आपको पचास चीज़ें क्यूँ चाहिये?
कभी आपने सोचा कि खाने की थाली से शुरु हुई आपकी भूख ने दुनिया को किस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है?
पता नही क्यूँ यह सब लिखते समय मुझे रोमा भाभी की बहुत याद क्यों आ रही है !उन्होने एक दिन मुझे बड़े सादे और सपाट तरीके से बताया कि अगर एक रात भी वे अपने पति को सम्भोग के लिए मना कर दें तो वे कमर पर लात जमा कर कहते हैं - कुतिया कमीनी तेरी जैसी औरतों के पति ही दूसरी जगह जाने को मजबूर होते हैं !
या खुदा! सिर्फ एक रात और सिर्फ एक वक़्त के खाने का यह हाल है और पूरी ज़िन्दगी उन्हें काटनी है !!

सपना की डायरी के पिछले पाँच भाग यहाँ पढें ।

Friday, June 6, 2008

pink is new blue- एक प्रदर्शनी

"पिंक या गुलाबी रंग लड़कियों का होता है बुद्धू !!" - मुझे मेरी एक मित्र ने कहा जब मैं अपने बेटे के लिए कपड़े खरीद रही थी और मुझे गुलाबी रंग बेहद पसन्द आ रहा था । यह और बात है कि गुलाबी रंग कभी मैने खुद के लिए पसन्द नही किया । यह पहला अवसर था जब मुझ जैसी अल्पज्ञानी को रंगों के इस लैंगिक विभाजन का पता चला । ब्लॉगजगत में भी ये फेमिनिन पिंक और मस्क्यूलिन नीला विभाजन ब्लॉगिंग प्रवृत्तियों के रूप में पिछले डेढ साल मे कई बार देखा । तकनीक , एच टी एम एल , टूल्स, फिलॉसफी , अर्थशास्त्र , एग्रीगेटर , प्रतिबन्ध , विवाद ,गाली गलौच ....ये सभी ब्लू ब्लॉगिंग के विषय रहे और ....कविता , रेसिपीज़ , घर-गृहस्थी , बेटे-बेटियाँ ,फूल ,सजावट , भावनात्मक विषय ये सब पिंक ब्लॉगिंग के हिस्से में थे । इनमें संक्रमण जब भी कभी थोड़ा बहुत हुआ उसे असहज ही लिया गया ।

खैर इस पर बात कभी विस्तार में करूंगी , कुछ आंकड़ों के साथ ।

फिलहाल ये विचार फिर य़ाद आये यह शीर्षक देखकर "pink is new blue" जो भारतीय महिलाओं की पेंटिंगस की प्रदर्शनी है । आप यह प्रदर्शनी 30 जून 2008 तक देख सकते हैं , सुरुचि आर्ट गैलेरी , नॉएडा में सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक ।
पूरा पता है -
सुरुचि आर्ट गैलेरी
सी- 16 , सेक्टर -26 ,
नॉएडा -201301
फोन -91-120-4248008
मैं भी कोशिश करती हूँ कि देख कर बता पाऊँ कैसे पिंक अब नया नीला हो रहा है .........

Tuesday, June 3, 2008


बहुत दिनों से कुछ लिखने का मन कर रहा था क्योंकि कभी-कभी भावनाएं इंसान पर इतनी बलवती हो जाती हैं कि वो लिखने पर मजबूर हो जाता है। इन दिनों ब्लॉग जगत के माहौल में काफी सरगर्मी देखी गयी। लेकिन निष्कर्श कुछ भी नहीं निकला। ये इस बात से हमें बावस्ता कराता है कि ब्लॉग भी आज सेन्सेशन क्रीयेट करने का एक ज़रिया बन गया है। लेकिन शर्मनाक ये है कि ख़ुद को विद्वान साबित करने की इस होड़ में प्रकाण्ड विद्वत जन महिलाओं के लिए जिस शब्दावली का प्रयोग करते हैं वो उनके छिछले स्तर की परिचायक है। ब्लॉग पर आजकल जिस तरह की बहसबाज़ी छिड़ी रहती है दरअसल उसमें विचारों को उद्भासित होने का अवसर कम मिलता है और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति ज़्यादा। हम कहते तो खुद को बौद्धिक हैं लेकिन दरअसल उसका अभिप्राय निष्कर्ष विहीन आरोप-प्रत्यारोप का संवाद मात्र नहीं होता। दूसरों को गालियॉ देकर दिल को तसल्ली देने वालों कीभी जमात कम नहीं है। ब्लॉग जगत में ऐसे लोगों की भरमार है जिनसे बचना ज़ाहिर तौर पर आसान नहीं है।
प्रश्न जटिल है क्या अब स्त्री ब्लॉग जगत में भी सुरक्षित रह गयी है ? यहां शब्दों से उसकी अस्मिता को ख़ाक करने वाले भी मौज़ूद हैं लेकिन उनको कठघरे में खड़ा करनेवाला कोई नहीं.......
ये त्रासद सत्य है।

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...