Tuesday, June 3, 2008

ब्लॉगबाज़ी

बहुत दिनों से कुछ लिखने का मन कर रहा था क्योंकि कभी-कभी भावनाएं इंसान पर इतनी बलवती हो जाती हैं कि वो लिखने पर मजबूर हो जाता है। इन दिनों ब्लॉग जगत के माहौल में काफी सरगर्मी देखी गयी। लेकिन निष्कर्श कुछ भी नहीं निकला। ये इस बात से हमें बावस्ता कराता है कि ब्लॉग भी आज सेन्सेशन क्रीयेट करने का एक ज़रिया बन गया है। लेकिन शर्मनाक ये है कि ख़ुद को विद्वान साबित करने की इस होड़ में प्रकाण्ड विद्वत जन महिलाओं के लिए जिस शब्दावली का प्रयोग करते हैं वो उनके छिछले स्तर की परिचायक है। ब्लॉग पर आजकल जिस तरह की बहसबाज़ी छिड़ी रहती है दरअसल उसमें विचारों को उद्भासित होने का अवसर कम मिलता है और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति ज़्यादा। हम कहते तो खुद को बौद्धिक हैं लेकिन दरअसल उसका अभिप्राय निष्कर्ष विहीन आरोप-प्रत्यारोप का संवाद मात्र नहीं होता। दूसरों को गालियॉ देकर दिल को तसल्ली देने वालों कीभी जमात कम नहीं है। ब्लॉग जगत में ऐसे लोगों की भरमार है जिनसे बचना ज़ाहिर तौर पर आसान नहीं है।
प्रश्न जटिल है क्या अब स्त्री ब्लॉग जगत में भी सुरक्षित रह गयी है ? यहां शब्दों से उसकी अस्मिता को ख़ाक करने वाले भी मौज़ूद हैं लेकिन उनको कठघरे में खड़ा करनेवाला कोई नहीं.......
ये त्रासद सत्य है।

4 comments:

अजय कुमार झा said...

kaun kehtaa hai ki mahilaayein blogjagat par surakshit nahin hain, aapko bata doon ki blogging kee jahan bhee charchaa hai unmein mahila bloggers aur unkee lekhanee kee charchaa hee jayaada hai . aap apna karm karein , sab theek hai.

सतीश पंचम said...

लोगों को खुद ही समझना पडेगा, कि क्या अच्छा है क्या बुरा , लेकिन लगता है लोग समझना ही नहीं चाहते। वैसे कुछ हद तक नारी भी जिम्मेदार है, सारी बुराईयां मर्दों में ही हैं ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।

अनूप भार्गव said...

ब्लौगजगत में भी स्त्री को अपनी जगह बनाने के लिये लड़ाई ठीक वैसे ही लड़नी होगी जैसे कि वास्तविक या बाहरी दुनिया में - न अधिक सरल , न अधिक कठिन । ब्लौगजगत , वास्तविक दुनिया का ही छोटा प्रतिरूप है । यह समझना कि वह बाहरी दुनिया से अधिक सभ्य या उदार होगा , गलत अपेक्षा है और निराशा ही देगी ।

Suresh Gupta said...

ब्लॉग जगत के माहौल में सरगर्मी तो होनी ही चाहिए. पर यह सरगर्मी गाली-गलौज तक नहीं पहुँचनी चाहिए.
सब अपनी बात कहें, सब सबकी बात सुनें, परस्पर आदर के साथ.
मुद्दे पर चर्चा करें, मुद्दे से संबंधित लोगों पर दोषारोपण न करें.
गुटबंदी काफ़ी हो रही है हिन्दी ब्लाग जगत में, यह नहीं होनी चाहिए.

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