Sunday, June 8, 2008

खाने की थाली से शुरु हुई आपकी भूख ने दुनिया को किस कगार पर ला दिया

ज़िन्दगी का अनुवाद

सपना चमड़िया
छठा भाग


बचपन से हम लोग एक कहानी सुना करते थे जिसमें एक राक्षस हुआ करता था जिसे हर वक़्त भूख लगी रहती थी। हर वक़्त वह यही कहता था -क्या खाऊँ , क्या खाऊँ? और उस पर स्थिति यह थी कि हर वक़्त उसे खाने को कुछ अच्छा चाहिये होता था;कभी खरगोश का मुलायम माँस ,कभी हिरण का लज़्ज़तदार माँस और सबसे बढकर सबसे स्वादिष्ट इनसान का माँस । माने उसकी भूख एक ईमानदार और सच्ची भूख नही थी बल्कि वह खाली समय की एक अय्याश किस्म की भूख थी जो कुछ भी मिल जाने पर संतुष्ट नही होती थी मिटती नही थी । मालिको मुझे माफ करना ,पर क्या इसी तरह की एक राच्छसी भूख आपके भीतर नही है जो मुझे , मुझ सी घर की सारी औरतों को दीवानावार घर में भटकाती रहती है और हम अपना बेहतरीन समय गैस में , कढाई में ,चिमटे में , आलू में , परवल में , भिण्डी में काटते-झोंकते फिर रहे हैं।
बात इतने पर खत्म नही होती । बरसों से मैं खाना बना रही हूँ-चाय , नाश्ता ,तीन टाइम का भोजन ,तरह-तरह के नये -पुराने व्यंजन, अचार-पापड़-मंगौड़ी और न जाने क्या क्या ।अपना पूरा श्रम ,दिलचस्पी,दिमाग और दिल लगाकर कई सालों से खाना बना रही हूँ और हाँ बहुत अच्छा खाना बना लेती हूँ ।फिर बड़े मन से पूछ पूछ कर मालिकों और उनके बच्चों को , उनके मेहमानों को खाना खिलाती हूँ । पर इतना कुछ करने के बावजूद सिर्फ एक टाइम का खाना अगर खराब बन जाए या सिर्फ एक बार की चाय खराब बन जाए तो मालिक लोग खाना छोड़ देते हैं , मुँह बनाते हैं , दोबारा चाय बनवाते हैं और उस पर से चार बात भी सुनाते हैं ।
यूँ हँसकर मुझे झूठा साबित करने की कोशिश मत कीजिये यह आप ही की तस्वीर है जो सालों माँ और पत्नी के हाथों का बेहतरीन खाना खाने के बावजूद एक वक़्त के खाने से ,एक वक़्त की भूख से समझौता नही कर सकती ।मालिको , इतना अच्छा और इतना ज़्यादा खाना खाने के बावजूद आप हमेशा भुखमरों जैसा व्यवहार क्यूँ करते हैं ?एक चीज़ से आपका पेट क्यूँ नही भरता ?थाली में आपको पचास चीज़ें क्यूँ चाहिये?
कभी आपने सोचा कि खाने की थाली से शुरु हुई आपकी भूख ने दुनिया को किस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है?
पता नही क्यूँ यह सब लिखते समय मुझे रोमा भाभी की बहुत याद क्यों आ रही है !उन्होने एक दिन मुझे बड़े सादे और सपाट तरीके से बताया कि अगर एक रात भी वे अपने पति को सम्भोग के लिए मना कर दें तो वे कमर पर लात जमा कर कहते हैं - कुतिया कमीनी तेरी जैसी औरतों के पति ही दूसरी जगह जाने को मजबूर होते हैं !
या खुदा! सिर्फ एक रात और सिर्फ एक वक़्त के खाने का यह हाल है और पूरी ज़िन्दगी उन्हें काटनी है !!


सपना की डायरी के पिछले पाँच भाग यहाँ पढें ।

19 comments:

मुंहफट said...

इस संग्रहणीय पोस्ट पर सपना चमड़िया जी को बधाई।
बहुत अच्छा लिखा है आपने। कल आप की अन्य बाकी पोस्ट ...सपना की डायरी...का आद्योपांत अवगाहन करूंगा।

आर. अनुराधा said...

सपना जी, में तो थक गई, परेशान हो गई। आप ये परेशान करने वाले सच्चे खुलासे इतनी सहजता से, सरलता से करना कब रोकेंगी। कम से कम एक झीने से पर्दे के लिए शब्दाडंबर का इस्तेमाल तो कर लिया कीजिए।

Asha Joglekar said...

सच कडवा ही नही खुल्ला भी होता है ।

Anonymous said...

आपके आलेख से ऐसा लग रहा है की जैसे थाली में पचास चीज़ें खाने के शौकीन 'मालिक लोग' ही होते हैं, और मालकिनों के तो ज़बान ही नहीं होती, उनको जो कुछ भी रूखा-सूखा दो जिंदगी भर उसी से काम चला लेंगी. सारे आदमी चटोरे होते हैं, और सारी औरतें संयमी. और फ़िर अगर आपको इस बात से शिकायत है की housewives की जिंदगी चूल्हे-चौके में ही फुंक जाती है तो आजकल महानगरीय डबल इन्कम परिवारों के लिए रेडिमेड इंडियन फ़ूड/ टिफिन सिस्टम भी बाज़ार में है. पर ख़ुद महिलाएं इसे पसंद नहीं करतीं, कुछ किचन से हक न छोड़ने के नाम पर, तो कुछ परिवार के सही पोषण के नाम पर.
माना आज़ादी खरीदी नहीं जा सकती पर, चूल्हे चौके से आज़ादी आप वर्किंग वूमन होकर और फ्रोज़न/पेकेज्ड प्री-कुक्ड फ़ूड पर कुछ पैसे खर्च कर पा सकतीं हैं.
And if, in a marriage, one of the spouses has any problem with his/her mate's sexuality/domestic violence, (s)he can always resort to legal remedies. and while women are generally percieved as sexually prudish (sometimes evan passive), most males ARE high on testastorone-- sexually agressive, they DO need sex much more often then females. for almost all women, sex is culmination of romance, emotion and a passionate affiar, but men think otherwise, for them sex is primary, emotional bonding often takes backseat to sex(it litrally drives his mind).

Anonymous said...

few woman always feel deprived of something or other . inspite of having best of all the world they feel they are being "cheated " because they are woman . sapna looks to be a skilled writer but it seems she is frustrated with the life she has got . she may end becoming famous by writing a "open " true biographical fiction , may get an award or two for the same . yet i agree with "vichar " .

अनूप भार्गव said...

सपना जी:

आप को पढना अच्छा लगता है , एक कड़वा सच प्रस्तुत कर रही हैं लेकिन आप से आग्रह है कि जिस सच को बयान कर रही हैं उसे पूरे सन्दर्भ के साथ लिखें । यदि मैं गलत नहीं समझ रहा हूँ तो ये ’आप का सच’ तो नहीं है । ये नहीं कि ’अपना सच’ होना ज़रूरी है लेकिन उसे समझने और ऐप्रीशिएट करने के लिये ’पूरा सन्दर्भ’ जानना ज़रूरी है । हाँ अगर आप इसे पूरे समाज का ’सच’ कह रही हैं तो मेरे सवाल अलग होंगे ।

मालिक की जो बात आप ने कही , उस व्यवहार को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन कल्पना कीजिये कि उन में कुछ मालिक भी एक ’वास्तविक नौकर’ की तरह सुबह ६ बजे उठते हैं , सात बजे तैयार हो कर बस/लोकल ट्रेन में धक्के खाते हुए दफ़्तर/कारखाने पहुँचते हैं , वहां आठ घंटे काम में जुटने के बाद (जहां कौन सा कम कब और कैसे करना है उन्हें बताये अनुसार ही करना होता है), शाम को घर लौटते हैं । यह क्रम महिनो-सालों तक चलता है । वहां भी दिन-प्रतिदिन काम करने के बाद अगर एक दिन काम पर न जाये तो ’मालिक’ की डाँट और नौकरी छूटने का डर रहता है । तो आपका मालिक भी ’नौकरी’ कर रहा है किसी की । कभी उस के बारे में भी लिखें ।

रोमा भाभी के बारे में जान कर अफ़सोस हुआ, सहानुभूति भी लेकिन अधिक कहने से पहले उन की पूरी कहानी जानना चाहूँगा और यह भी कि उन्होनें अपने लिये किन विकल्पों को तलाश किया और कितनी हिम्मत और इमानदारी के साथ ?

सादर-स्नेह के साथ ...

Anonymous said...
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Unknown said...

"सिर्फ एक रात और सिर्फ एक वक़्त के खाने का यह हाल है", आपकी पीड़ा मैं समझ रहा हूँ पर माफ़ कीजिएगा यह पूरा यथार्थ नहीं है, और न ही यह पूरे पुरूष समाज पर लागू किया जाना चाहिए. 'मालिकों और उनके बच्चों', जैसी शब्दावली का प्रयोग करके आप उन पुरुषों को कष्ट पहुँचा रही हैं जो इस सामंतवादी सोच से कोई सम्बन्ध नहीं रखते.

आर. अनुराधा said...

"वो इस घुटन से निकालने के लिये क्या करती है ? क्या लेख लिख लिख कर आप " चेतना " जागृत कर रही हैं ? क्या आप को लगता है एसे लेखो को पढ़ कर " औरतो का अफसाना " इंसान की कहानी बन सकेगा ?"

रचना जी, लेखों का असर निश्चित रूप से होता है, और एकदम सही जगह होता है। देखते रहिए, इसी लेख पर कैसी-कैसी टिप्पियां आ रही हैं और आगे आती हैं।

Rachna Singh said...
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अनिल said...

एक समाज है जहाँ महिलाएं दोयम दर्जे की मानी जाती हैं, एक सामजिक संरचना है जहां महिलाओं की जीवन स्थिति, अपने संपूर्ण मेहनत के बावजूद , परिवार संस्था के ग्लैमर को सहजने की शर्त के साथ बद से बदतर है. इन्हीं सत्ता संबंधों की अचूक शिनाख्त
सपना जी की डायरी करती है और बताती है कि मर्दवादी, पितृसत्ता ने महिलाओं की पूरी जमात को, शहरी परिदृश्य में मामूली बदलावों के साथ, अपना गुलाम बनाया हुआ है.

अब इसमें जो लोग संदर्भो का आख्यान चाहते हैं उनसे एक निवेदन है कि अपने समाज में व्याप्त सदियों की परंपराओं, सांस्कृतिक रुढि़यों और भाषा के बिंबों पर जरा गौर करें. उन्हें आसानी से इस अमानवीय सत्ता संरचना, जिसकी प्रमुख और पहली इकाई परिवार नामक संस्था है, के संदर्भ मिल जाएंगे.

आर. अनुराधा said...

आज के समाज में अगर कोई सोचता है कि महिलाएं आजाद हैं अपनी दुनिया बनाने, अपने रास्ते चलने, अपनी पसंद-नापसंद, यहां तक कि अपनी थकान को भी जाहिर करने के लिए तो वह कृपया अपने घर के अकेलेपन से, समाज से कटे टापू से निकल कर देखें, सोचें। किसी भी आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक तबके को ले लीजिए और उसकी औरतों को बस observe करते रहिए। उनका सिर्फ बाहरी जीवन नहीं, भीतर का भी। उनके घरों के भीतर परिवार के बीच, उनके कपड़ों और बातचीत की भीतरी तहों से भी नीचे उनके स्वत्व (या आत्म?) के रूबरू। मुझे शक है कि कोई आजाद हो गई या सदा से आजाद रही महिला आपको इतनी आसानी से मिल पाएगी जितनी आसानी से ये टिप्पणियां आती हैं कि औरत आजाद होना ही नहीं चाहती या कि कौन रोकता है उन्हें या फिर यह मासूमियत कि औरतें तो आजाद हैं ही भई, ये कलमघिसाई महज पुरस्कार बटोरने के लिए है।!!!

Rachna Singh said...
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आर. अनुराधा said...

आप इस वक्त इस ब्लॉग पर जो कर रही हैं, उसे क्या कहते है? शायद इसे आप कलम घिसाई नहीं, कीबोर्ड घिसाई कहें। फिर भी, अगर मानें कि आप किसी न किसी रूप में आखिर कलम घिसाई ही कर रही हैं, तो क्या आप आजाद नहीं हैं? वैसे, इस...(जो भी नाम दीजिए)से अगर किसी को पुरस्कार ही मिल जाए तो क्या बुराई है? अपनी तो हसरत ही रही, किसी और की पूरी हो तो कम से कम मिठाई का हक तो जमा सकेंगे। अपनी तो बस इतनी सी आशा है, इतना सा ख्वाब है।

Rachna Singh said...
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Rachna Singh said...
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Unknown said...

आजादी से महिलायें क्या समझती हैं, और जब वह महिलाओं की आजादी की बात करती हैं तब वह क्या परिभाषा करती हैं आजादी की? क्या चोखेरवाली इस पर प्रकाश डालेंगी?

स्वप्नदर्शी said...

सपना जी, आपने जो विम्ब पकडे है, वो निसन्देह आपकी सम्वेदंशीलता को झलकाते है. बाकी मित्रो से यही कहना चाहती हूँ कि ज़रूरी नही कि डायरी लेखन का मतलब, रोज़नामचा हो. वो बाहरी-भीतरी दुनिया से व्यक्ति का सम्वाद भी हो सकता है. सपना की डायरी को भी, उनके व्यक्तिगत जीवन से आगे देखा जाना चाहिये.
वैसे ये डायरी सपना की नही एक खास काल खंड मे रहने वाली किसी भी औरत की डायरी है.

मेरी पसन्दीदा डायरी अभी तक सिर्फ मुक्तिबोध की "एक साहित्यिक की डायरी रही है" जो एक बडे समाजिक व्यवस्था और उसमे रहने वालो की छ्ट्पटाहट दिखाती है, और लेखक उसे भोगता हुआ भी उससे दूर बैठा दर्शक है.
वैसे ही सपना की डायरी, और उनका जीवन वो समेट लेता है, एक बडे फलक के सामाजिक सच. और यही उनकी कामयाबी है.
आगे इंतज़ार रहेगा.

आर. अनुराधा said...

स्वप्नदर्शी से सहमत।

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