Wednesday, June 11, 2008

आइए इस आवरग्लास का विश्लेषण करें

पिछले दिनों इसी वेब पृष्ठ पर गुलाबी रंग पर एक पोस्ट पढ़ी थी। उसकी याद अभी ताज़ा ही थी कि अंतरजाल की लहरों में बहते हुए एक दिन यह चित्र दिखाई पड़ गया और इसका गुलाबी रंग एक नजर से ज्यादा देर तक मुझे वहां रोके रह गया। इस पर कई तरह के विरोधाभासी ख्याल मेरे मन में एकसाथ ही आए। वैसे चित्र दिलचस्प है न? एक आवरग्लास की कमर से बंधा एक पालतू कुत्ता।



चित्र ब्यूटी-ब्रेन से संबंधित एक लेख के साथ था। लेख की पहली लाइन थी कि महिलाएं महज अपनी चाल में बदलाव लाकर पुरुषों के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकती हैं और यह वैज्ञानिक अनुसंधानों से साबित हो चुका है।

मुझे उत्सुकता है जानने की कि आप इस बारे में क्या सोच रहे हैं। इस चित्र को किस तरफ से देखते हैं, किस पृष्ठभूमि में विश्लेषित करते हैं। मुझे लगता है कि यह चित्र विश्लेषण का अच्छा टार्गेट हो सकता है। इसे एक खेल समझिए और शामिल हो जाइए इस गैर-नुकसानदेह खेल में!

10 comments:

संजय शर्मा said...

आवरग्लास मे बगैर बांधे ही दुम हिलाता कुता दिखाना चाहिए था . सशक्तिकरण के बदले सख्तीकरण तो नही ?

Suresh Gupta said...

"महिलाएं महज अपनी चाल में बदलाव लाकर पुरुषों के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकती हैं और यह वैज्ञानिक अनुसंधानों से साबित हो चुका है", यह सशक्तिकरण में मदद करेगा क्या?

आर. अनुराधा said...

एक आवरग्लास (मुझे उम्मीद है, इसका स्थापित अर्थ सब समझते हैं- सुडौल, सांचे में ढली काया वाली महिला) की पतली कमर से बंधा है एक कुत्ता, पट्टे के सहारे। सोचें- आवरग्लास, आवरग्लास क्यों है, कुत्ता उसकी कमर से बंधा क्यों है, क्या होता अगर आवरग्लास ऐसा न होता, उसकी कमर पतली न होती, अगर पालतू कुत्ते का पट्टा ऐसा न होता जैसा है, या होता ही नहीं,या.... संभावनाएं अनंत हैं। कुछ आप भी सोचिए और सबके साथ बांटिए अपने बेबाक विचार।

अनूप भार्गव said...

पहले तो ये तय किया जाये कि यह बंधा हुआ ’प्राणी’ कुत्ता है या कुत्ते की पत्नी (न जाने क्यों ’कुत्ते का स्त्रीलिंग शब्द’ ’पोलिटिकली करेक्ट’ नहीं माना जाता । :-).
आगे होने वाला चिन्तन इस सवाल के जवाब पर निर्भर करेगा ।

आर. अनुराधा said...

आप आजाद हैं तय करने के लिए कि वह कुत्ता नर है या मादा।

Asha Joglekar said...

sorry muze ye roman script me likhana pad rha hai. mere hisab se hour glass to purush ki soch hai, usake hisabse jo mahila ka shareer hona chahiye usaki. aur u aise shareer wali mahilaon ke peeche purush kutte ki tarah bhagte hain.

Anonymous said...

अगर " घंटा ग्लास " किसी स्त्री को दर्शाता हैं तो यकीनन स्त्री एक सुदर काया की मालकिन हैं और ये कहना सर्वथा अनुचित हैं की जिन स्त्रियों की काया सुंदर हैं पुरूष उनके पीछे कुत्ते की तरह घुमते हैं क्योकि ये कह कर आप उस स्त्री पर लांछन लगा रही हैं जो जागरूक हैं अपनी काया और स्वास्थ्य के लिये । कोई कैसे रहे ये उसका निजी मामला हैं । और अगर ये " घंटा ग्लास " किसी स्त्री को दर्शाता हैं तो उसकी कमर से बंधा हैं उसकी रक्षा करने वाला /वाली जानवर क्योकि "स्वामी भक्ति " कुकुर जाति के जानवर के लिये ही प्रयोग होती हैं ।
सधन्यवाद इस खेल को यहाँ दिखाने के लिये

Smriti Dubey said...

ये आवरग्लास निश्चित रूप से स्त्री शरीर का ही प्रतीक है,एक ऐसी स्त्री जिसकी उम्र अभी ढली नहीं है। किसी भी पुरुष के लिए नारी का शरीर ही प्राथमिकता रखता है यह एक शाश्वत सत्य है। वह तभी तक उससे बंधा रहता है जब तक उसके पास मादक काया हो ।
यहां कुत्ता आदमी उपमान के रूप में प्रयोग किया गया है। क्योंकि ये सच है कि आज कुत्ते और आदमी में ज़्यादा फर्क नहीं रह गया है। एक महीन सी रेखा दोनों को अलहदा करती है, और वो ये कि.... कुत्ता आज भी विश्वास पात्र है लेकिन आदमी???....
इस आवरग्लास काभी अर्थ नारी के शरीर और उसकी उम्र से ही है।

अनूप भार्गव said...

-इस ब्लौग को पढने वालों में कोई ऐसा है जो ’सुन्दर काया न चाहता हो ,अपने लिये और अपने साथी के लिये’ ?

-सुन्दर काया की चाह क्या पुरुषों तक सीमित है ?
अपनी काया के प्रति सजगता और सुन्दर काया की कोशिश यदि आप के साथी का आपके प्रति आकर्षण बनाये रखती है तो क्या यह गलत है ?

-स्मृति, आशा जी और ’चोखेर बाली’ से एक बार फ़िर आग्रह है कि ’स्टीरिओटाइप’, जनरलाइजेशन और ’प्लेन सिम्पल मेल बैशिंग’ से बचें

Anonymous said...

height of stupidity!

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