Friday, June 13, 2008

इससे अधिक क्या लिखूँ ...

चार औरतें अकेली जा रही थीं ।














इससे अधिक क्या लिखूँ ....सब छिपा है इसमें...समझें ,ऐसा क्यूँ कहते हैं ?

13 comments:

अजय कुमार झा said...

baap re baap itnee gahree baat wo bhee chand lafjon mein ye baat yakeenan aap ladkiyon ke baare mein nahin keh saktee.

Unknown said...

क्या यह कोई पहेली है?

Udan Tashtari said...

बस!!!!! अब आगे कुछ मत कहना-ऐसा एकाकीपन!! आह निकल गई.

विनीत कुमार said...

असंभव बात, अपने अधिकारों के लिए भले ही साथ न हो लेकिन इतना तो जरुर पूछतू होगी कि बहन आज तुमने किस दाल में छौंक लगायी, तो अकेले कैसे हुई।

Ghost Buster said...

हमने तो नहीं सुना ऐसा कभी. जरा कोट कीजिये किसी को जो ऐसा कहता या लिखता है.

समीर जी की आह निकलवा ली है आपने. मामला गंभीर है. वैसे वो जोक तो सुना ही होगा. पाँच महिलाओं को नियाग्रा फाल्स के दर्शन करवाने निकले गाइड ने जानकारी दी, "इस फाल्स की आवाज इतनी तेज है की अगर पाँच सुपर सोनिक प्लेन्स एक साथ उडान भरते हुए निकलें तो फाल्स की आवाज में उनकी आवाज भी दब जायेगी." कुछ देर बाद गाइड फिर चीखा, "अब भगवान के लिए अगर आप लोग बातचीत बंद करें तो हम फाल्स की आवाज भी सुन लें."

बहुत डरते हुए कमेन्ट कर रहे हैं. कृपया कभी कुछ हल्का फुल्का भी चलने दीजिये.

सुजाता said...

जब चार हैं ,तो औरतें अकेली कैसे हो जाती हैं ? साफ कारण है - कोई पुरुष नही है न साथ में !

सुजाता said...

@घोस्ट बस्टर जी और विनीत जी ,
हमने तो बहुत बार बड़ों को कहते सुना है - लड़्कियों !अकेली मत जाना ! भाई को साथ ले जाना ।
कईं बार बड़ी बूढियाँ कहतीं - इस बार तो हम पाँचों अकेली ही वैष्णो देवी हो आयीं ! जैसे कोई शेर मार आयीं ।
पुरुष के बिना ,भाई, पिता पति के बिना कितनी ही लड़कियाँ हों अकेली ही कही जाती हैं ।
@ विवाहिता लड़की का किसी पारिवारिक आयोजन में बिना पति के जाना अपमानजनक है ,सौ सवाल उठते हैं -अकेली क्यों आयी है !पति बिना पत्नी के आये तो सहज लिया जाता है । हर जगह बीवी बच्चों को ढो कर चलना आसान नही है न !

घोस्ट बस्टर जी ,हलका फुलका ही है इस बार ।पर ध्यान दें हमारे समाज की बनावट में स्त्री के लिए जो बायस है वह कैसे हलकी फुलकी भाषिक अभिव्यक्तियों में भी दिखाई दे जाता है ।

pallavi trivedi said...

sujata...bahut badhiya mudda uthaya ek hi sentance mein tumne. kai aurten to khud hi purush ka saath chaahti hain kahi jaate hue. warna das mahilaaon ke saath rahkar bhi akela hi mahsoos karti hain..

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत पुरानी कथा है ...
दक्ष के यहाँ यज्ञ हुआ
तब सारे देवोँ को बुलाया था परँतु शिव जी को नहीँ -
वहाँ भी "सती" अकेली ही चली गयँ थीँ फिर उन्हेँ पार्वती बनकर जन्म लेना पडा अपने शिवजी के लिये कठोर तपस्या कर वे अपर्णा कहलायीँ --
वैसे हर "जीव " अकेला ही आता और जाता है ०
स्नेह,
-- लावण्या

अनूप भार्गव said...

अच्छी लघु कथा है ।

Unknown said...

तो यह कोई पहेली नहीं थी. एक सही और सार्थक व्यंग किया आपने पुरूष प्रधानता से जुड़े सोच पर. वधाई हो सुजाता जी. यह तो अक्सर ही सुनने को मिलता है. बिना पुरूष के चाहे एक स्त्री हो या एक से अधिक, 'अकेली' शब्द प्रयोग किया जाता है. शायद इस का कारण यह है, कि हमारे समाज में परिवार को इकाई माना जाता है.

विवाहिता लड़की का किसी पारिवारिक आयोजन में बिना पति के जाने पर यदि सवाल उठते हैं तो विवाहित पुरूष से भी पूछा जाता है कि पत्नी और बच्चों को साथ क्यों नहीं लाये. इस में अपमान जैसी कोई बात नहीं है.

सुजाता said...

सुरेश जी ,
किसी पारिवारिक समारोह में जब पुरुष से पूछा जाता है कि बीवी बच्चों को साथ नही आले तो चेहरों के हाक भाव और टोन सामान्य होती है लेकिन लड़की के अकेले जाने पर पूछने के साथ चेहरों पर आने जाने वाले अजीब से उतार चढाव और फिर पीठ पीछे की बातें - लगता है खुश नही है ससुराल में या कैसा घरवाले हैं अकेली भेज दिया ...और लड़की असामान्य हुई जाती है यह सब देख कर । शायद यही कारण है कि आपने मायके वालों के यहाँ पति को साथ ले जाने के लिए लड़ते हुए महिलाओं को देखा होगा ।
माना कि यह सब कहने करने वाली भी परिवार की औरतें ही होती हैं , तो वे भी उन पुरुषों से कम नही हैं जो छूटते ही स्त्री के चरित्र पर उंगली उठाते हैं । इस मानसिकता से हमें आगे की पीडःइयों को मुक्त करना है ।

Unknown said...

सुजाता जी, लेकिन चेहरों के हाव, भाव और टोन तो महिलायें ही देखती हैं न. यह सारी कहानी महिलाओं द्वारा महिलाओं के उत्पीणन की है.

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