Saturday, June 14, 2008

आज भी 'अकेली' होती हैं लड़कियां

सुजाता की छह शब्दों वाली छह टन की पोस्ट पर एक टिप्पणी है कि यह बात लड़कियों के बारे में यकीनन सच नहीं है। 1987 में मैंने जबलपुर जैसे छोटे शहर में अपनी सहेली के साथ हुई घटना को बयान किया था। आज 21 साल बाद भी, दिल्ली जैसे महानगर, राजधानी में भी स्थितियां उतनी ही सच हैं।

दृष्य एक: " नीलू बेटे, आज तुम्हारा नतीजा निकला है। अपना रोल नंबर तो लाना अखबार से मिलान कर लूं। फर्स्ट, सैकेंड, थर्ड- तीनों लड़कियां। भई वाह! लड़कियां तो लड़कों को हर मोर्चे पर मात दे रही हैं।"

" पापा मैं पत्रकारिता में प्रवेश लेना चाहती हूं।"

"अरे भई, एम एस सी करो, पी एच डी करो और ठाठ से कॉलेज में पढ़ाओ। पत्रकारों को बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ती है। यह तुम्हारे बस की बात नहीं। इसे तो लड़कों के लिए ही रहने दो।"

दृष्य दो: " नीलू, जरा दुकान से मेरी दवाएं तो ला दे। "

" भैया को भेज दो न मां, मैं नहीं जाना चाहती"

"आजकल तो औरतें मर्दों के सारे काम करती हैं, और तुझे अकेले बाजार तक जाने में हिचक हो रही है। चल उठ फटाफट। बहानों की जरूरत नहीं है। "

दृष्य तीन: "कहां जा रही हो? "

"यहीं, सरिता के घर तक। "

" भैया को साथ ले जाना, जमाना बहुत खराब है आजकल।"

11 comments:

Unknown said...

ऐसा भी होता हे अनुराधा जी जैसा आप कह रही है, और बैसा भी होता है जैसा सुजाता जी ने कहा. हमारा समाज
बहुत विशाल है. सिर्फ़ एक बात सारे समाज पर लागू नहीं होती. अलग अलग परिवेशों में इस बात का रूप अलग होता है.

अनूप भार्गव said...

माना कि स्त्री आज भी अपने प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्ति नहीं पा सकी है और उस का रास्ता पुरुष से कुछ अधिक कठिन है लेकिन यह कहना कि १९८७ के जबलपुर और २००८ के दिल्ली में ’स्थिति उतनी ही सच है" कुछ अतिशयोक्ति और आंकड़ो को झुठलाना होगा । प्रगति की रफ़्तार से असंतोष हो सकता है लेकिन प्रगति से इंकार नहीं ।

मैं अपनी बेटी का पूरा विकास चाहता हूँ और उसे अपनी हर प्रतिभा को खोजने का अवसर देना चाह्ता हूँ लेकिन यदि मैं ऐसी जगह रह रहा हूँ जहां उस का रात में अकेले जाना सुरक्षित नहीं है और मैं उसे जाने से रोकता हूँ तो यह मेरा पूर्वाग्रह नहीं बल्कि मेरा पुत्री प्रेम है जो समाज की सच्चाई को जानता है ।

आर. अनुराधा said...

समाज क्या होता है- हम सब। और समाज की सच्चाई क्या है- हम सब की मानसिकता में निहित समान प्रवृत्तियां। हमारा समाज बहुत विशाल है, माना। लेकिन यह एक बात सारे समाज पर लागू होती है। अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर स्थितियों में लागू होती हैं। मैं नहीं जानती, छोटे शहर से महानगर में आकर बस गए पुरुषों को अपने छोटे शहर की स्थितियां, घटनाएं याद रहती हैं या नहीं, या वे तब, वहां इन मुद्दों के प्रति संवेदनशील रहते हैं या नहीं। पर सच्चाई यह है कि महिलाओं को, चाहे दिल्ली की हों या दरभंगा की, हर जगह के समाज में पुरुषों के एक से रवैये को सहना पड़ता है। वे सुरक्षित नहीं हैं। और किसी भी स्वस्थ समाज में अगर एक इंसान किसी अनजान व्यक्ति से डरता है, बिना किसी आपसी दुश्मनी या किसी ज्ञात कारण के रहते तो क्या यह सामान्य बात है? क्या किसी पुरुष ने कभी इस तरह के डर को महसूस किया है? बीच शहर, बीच समाज में चलते हुए जंगल में चलने का अहसास, भेड़ियों, शेरों के अचानक हमले का लगातार डर। दरअसल हम इन स्थितियों के इतने आदी हो चुके हैं कि इसमें कुछ भी अजीब नहीं देखते। "सब ठीक ही तो है"।
तभी कोई इतनी सहजता से कह जाता है- "मैं अपनी बेटी का पूरा विकास चाहता हूँ और उसे अपनी हर प्रतिभा को खोजने का अवसर देना चाह्ता हूँ लेकिन यदि मैं ऐसी जगह रह रहा हूँ जहां उस का रात में अकेले जाना सुरक्षित नहीं है और मैं उसे जाने से रोकता हूँ तो यह मेरा पूर्वाग्रह नहीं बल्कि मेरा पुत्री प्रेम है जो समाज की सच्चाई को जानता है।" कभी सोच देखे कि आपको क्यों लगता है कि किसी जगह आपकी बेटी का जाना सुरक्षित नहीं है। क्या ऐसा ही डर कभी बेटे के लिए भी महसूस होता है?
क्या पढ़े-लिखे संवेदनशील लोगों की भी आंखें खोल कर, तेलुगु में एक कहावत की तर्ज पर कहें तो 'पलकों के बीच तीली फंसा कर' दिखाने की जरूरत है कि सामने यह नजारा है, कृपया गौर फरमाएं?!!!

अजय कुमार झा said...

ajee aapne to meri tippnni par ek post hee likh daalee. magar main is baar fir wahee shikaayat karne waalaa hoon jo main pehle bhee aur isee tarah kee poston aur blogs par kartaa rahaa hoon aap log un mahilaaon ko kyon kuchh nahin kehtee jo aapkee ya khud kee naaree samaaj kee sabse badee dushman hotee hain. sujaataa jee kyaa aap apne blog par likhne ke liye mujhe aamantrit kar saktee hain. waise is vishay par jaldee hee main ek post likhne waalaa hoon.

अनूप भार्गव said...

अनुराधा जी:

किसी सच्चाई को समझना और फ़िर उसे ध्यान में रखते हुए अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार निर्णय लेना ’सच्चाई को सही ठहराना नहीं है’ ।

रात के ११ बजे मेरे बेटे का अकेले जाना सुरक्षित और बेटी का जाना ’सुरक्षित न होना’ अगर एक सच्चाई है तो मुझे ’आज की तारीख में’ उस के अनुरूप ही निर्णय लेना होगा और इस में यदि आप को पूर्वाग्रह लगता है तो ये आप का फ़ैसला है । अब अगर आप ये कहें कि ’बेटी सुरक्षित क्यों नहीं है’, तो ये अलग प्रश्न है लेकिन इस प्रश्न के ज़वाब का ’जो निर्णय मुझे आज लेना है’ - इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा । खुशी की बात है कि मेरी बेटी इस बात को समझती है ।

एक बार फ़िर से दोहराऊँगा कि "प्रगति की रफ़्तार पर असंतोष व्यक्त करते हुए प्रगति को नकारना भी स्वस्थ सोच नहीं है" । आज हज़ारों लड़कियों को रात के समय ’कौल सेन्टर’ में काम करते हुए देख कर खुशी ही होती है । आज से सिर्फ़ पाँच बरस पहले, इस की कल्पना कठिन थी ।

आर. अनुराधा said...

इसी ब्लॉग पर 25 अप्रैल को एक सुंदर पोस्ट थी- 'आजादी व्यक्तिगत से ज्यादा सामाजिक क्वेस्ट है' (http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/04/blog-post_25.html)

और चालू विषय के संदर्भ में भी यह अवधारणा सही बैठती है कि सिर्फ अपनी दुनिया या बाहरी दुनिया के भी कुछेक लोगों के सुरक्षित महसूस करने भर से संतोष कर लेने का वक्त आ गया, यह नहीं समझा जा सकता। इस पोस्ट के कुछ अंश-

"अपने घर और आफिस से बाहर अगर आप सडक पर निकलती है, और असुरक्षा का भय अगर 24 घंटे मे से एक घंटे भी आपके सर पर है, तो आप सडक पर चलने के लिये आज़ाद नही है।"
शायद अजय कुमार के सवाल का कुछ हद तक जवाब नीचे के कोट में मिल जाए-
"अकसर महिला आज़ादी का प्रश्न एक व्यक्तिगत सवाल मे तब्दील होता हुआ दिखता है। जैसे अगर महिला ने ठान ली तो मुक्त हो जायेगी। जैसे की स्वतंत्रता का समाज से, क़ानून से, सभ्यता से कोई लेना देना ही न हो।
एक बंद कमरे मे बैठा व्यक्ति स्वतंत्र है, अपनी मर्जी से खाने, पहनने, और अपना आचरण करने के लिए ? पर एक सामाजिक स्पेस मे ये स्वतंत्रता व्यक्ति नही समाज तय करता है, धर्म से, क़ानून से, रिवाज़ से, संसाधन मे साझेदारी से।

ये सोचने की बात है की बंद कमरे मे कोई इंसान समाज से कितना स्वतंत्र है? अपनी सुविधा के साधन जो इस कमरे मे है, वों समाज से ही आते है। चोरी का डर भी समाज से ही आता है। और विनिमय शक्ति भी एक सामाजिक शक्ति है। बंद कमरे वाला इंसान भी कितना सामाजिक है ?, इस मायने मे स्त्री की समस्या भी क्या केवल स्त्री की ही है? क्या सिर्फ़ इसका निपटारा व्यक्तिगत स्तर पर हो सकता है?

ब्‍लॉग... ब्‍ला... ब्‍ला... ब्‍ला... said...

वन टू का टेन इस हफ़्ते का नंबर वन ब्‍लॉग है। कृपया देखें http://onetwokaten.blogspot.com/2008/06/blog-post.html

Rajesh said...

"स्त्री-मुक्ति" ने मुझे भ्रमित ही किया है। कभी-कभी लगता है जैसे ये आम का लीची बन जाने की जिद्द है। व्यक्तिगत, आर्थिक और सामाजिक स्वंत्रता की जद्दोजहद विकास करते समाज की पहचान हैं। लैंगिक भेदभाव के अनेक उदाहरण (आपने भी लिखा है) हमारे घर से शुरू होकर सभी जगह फैले मिलते हैं। मन से ये भेद मिटाने की जरूरत है।
यदि परिवार का सहयोग न भी मिले तो स्त्री को माँ के रूप में अपनी अगली पीढ़ी को वो देना है जिसके लिए उसने संघर्ष किया है।
रही बात सुरक्षित होने न होने की, ये समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है।

सुजाता said...

राजेश कमल जी ,
आपके अनुसार लड़की का सुरक्षित होना परिस्थिति और समय पर निर्भर करता है तो कृपया यह बताएँ कि जहाँ 6 साल की लड़की का स्कूल जाना आना भी सुरक्षित नही है वहाँ कौन सी स्थिति परिस्थिति का हवाला देंगे ? खबर आई है अभी अभी कि हैदराबाद में 6 साल की लड़की का स्कूल बस के ड्राइवर ने रेप किया क्योंकि वह आखिरी स्टॉप पर उतरती थी और अकेली होती थी ।
परिवार का सहयोग न भी मिले ----
से आप क्या यह कहना चाहते हैं कि अपनी अस्मिता और अपनी गरिमा की पहली और आखिरी लड़ाई स्त्री अकेली लड़े , अकेली रहे , क्योंकि वह इन हालातों के लिए खुद ही ज़िम्मेदार भी है ।क्या आप यह कहकर बाकी समाज के बिहाफ पे अपनी ज़िम्मेदारी का पल्ला झाड़ रहे हैं ? पिता किस लिए है ? वह क्या करेगा ? उसे समझने की ज़रूरत नहीं है ?
वह 6 साल की लड़की न तड़क भड़क वाले कपड़े पहने थी , न ही उसने किसी पुरुष को उकसाया होगा अपनी भाषा या व्यवहार से , और न ही उसे खुद को सम्भालने की समझ रही होगी । ऐसे मे किसे समझाएँ ?
माता-पिता को ? कि जब जानते थे कि स्कूल बस में लड़की सुरक्षित नही है तो समझदारी इसी में है कि स्कूल बस से लड़्कियों को स्कूल न भेजा करें या ज़्यादा अच्छा है कि स्कूल ही न भेजा करें ?
मुझे यह भी जवाब मिले कि इस घटना के बाद वह बच्ची पुरुष की किस इमेज को मन मे लेकर बड़ी होगी ? क्या तब आप उसे समझा पायेंगे उसे कि स्त्री की हालत की ज़िम्मेदार सिर्फ स्त्री है पुरुष का कोई दोष नहीं ?

Rajesh said...

सुजाता जी,
आपने जिस घटना का जिक्र किया है, वह वाकई शर्मनाक है। किंतु मैंने जो बातें कही, वो एक अलग परिपेक्ष्य में हैं।
१) रही बात सुरक्षित होने न होने की, ये समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है।
सुरक्षित होना सभी के लिए ज़रूरी है, बिना किसी लिंग-भेद, रंग-भेद या उम्र की सीमा के। आपराधिक मानसिकता वाला कभी भी, किसी को भी, कैसे भी अपना शिकार बना सकता है। तो समय और परिस्थिति का ध्यान रखते हुए सुरक्षित होने के लिए जो भी हो सके, करना चाहिए।
२) यदि परिवार का सहयोग न भी मिले तो स्त्री को माँ के रूप में अपनी अगली पीढ़ी को वो देना है जिसके लिए उसने संघर्ष किया है।
आम स्त्री अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती है। जिस के लिए उसे संघर्ष करना पड़ा, क्या वो संस्कार उसने अपनी संतान (बेटा और बेटी) को दिए? बेटी को बताया कि उसकी भी अहमियत है और बेटे को हुक्म चलाने से रोका? बेटी को पढने दिया और बेटे से एक कप चाय बनवाया? अगर परिवार नही भी सहयोग करे तो भी बेटी को पढने दो। उसे बीच से उठाने वाले को रोको। बेटी को बाज़ार तक जाने दो। छुट्टी वाले दिन उसे भी ९ बजे तक सोने दो.... चाहे परिवार में कोई चाहे या नही। बेटे से चाय बनवाओ। अपनी प्लेट ख़ुद उठाकर रखने बोलो।

बेटे पैदा करने के लिया अबोर्शन्स मत करवाओ। बेटी पैदा होने पर मत कहो, " कोई बात नही... अगली बार बेटा ही होगा"।
माफ़ करें, मैं ज़रा कड़वा हो गया। किंतु कई बार ये दोहरी मानसिकता मुझसे बर्दास्त नही होती। कई स्त्रियाँ मुक्ती की बात तो करती हैं किंतु अपनी अगली पीढी को दोहरी मानसिकता से मुक्त माता-पिता बनने की शिक्षा नही देती।

Fighter Jet said...

such hai..aurat ka pahla dusman wo khud hai...mard to fir hai hi.....lekin is such ko jane bina kisi ka koi bhala nahi ho sakta....

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...