Monday, June 16, 2008

वर्जिनिटी ऑन सेल या रीवर्जिनेशन या कहें कौमार्य बिकता है ,खरीदोगे ?

जब भी मैने कहा कि {जिसे कहने वाली मैं पहली नही हूँ , जिसे पुस्तकों मे दर्ज किया जा चुका है } कि ज्ञान ,ज्ञानोत्पादन , शोध, अनुसन्धान , प्रणालियाँ , राजनीति ,सार्वजनिक कार्य , संस्थान सभी पर पुरुष का कब्ज़ा रहा है तभी एकाध उदाहरण जो अब भी अपवाद ही हैं प्रस्तुत कर दिये जाते हैं । फ्रॉयड का मनोविश्लेषण हो या मार्क्स का चिंतन स्त्री की छवि को या तो उलझाया ही है या तटस्थ ही रहे हैं ।
मेडिकल साइंस ने गर्भनिरोधक तरीकों की इजाद से जहाँ स्त्री को आधुनिक समय में अपेक्षाकृत मुक्त किया है वहीं अपने कईं उपक्रमों और अनुसन्धानों के समाज पर दूरगामी प्रभावों का अनुमान लगाने में असफल रही है ।परमाणु बमों का अविष्कार मैं ऐसी ही नासमझ साइंस का परिणाम मानती हूँ । विज्ञान के छात्रों और शोधकर्ताओं को दर्शन और ह्यूमैनिटी की वैचारिकियों की कितनी ज़रूरत है इस पर विचार होना चाहिये | अपने आप में यह भी विचार का एक अलग विषय हो जाता है ।
फिलहाल मेरी चिंता का विषय है -
Revirgination कहिये या hymenoplasty
यानि कौमार्य की पुन: प्राप्ति या क्षतिग्रस्त कौमार्य की रिपेयरिंग ।जनसत्ता के मुताबिक “हाइमेनोप्लास्टी एक ऑपरेशन होता है जो कौमार्य के बारे मे जानकारी देने वाली झिल्ली {हाइमेन} की मरम्मत कर उसे यथास्थान पर पूर्ववत करने के लिए किया जाता है ।‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित एक खबर में कहा गया है निजी क्लीनिक में हाइमेनोप्लास्टी पर 2900 डॉलर से अधिक राशि खर्च हो सकती है । इसके बावजूद मुसलिम महिलाएँ यूरोप में यह ऑपरेशन करा रही हैं। उन्हें आशंका होती है कि हाइमेनोप्लास्टी न कराने पर उनके पति उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे’”

खबर है कि यूरोप की मुस्लिम महिलाएँ डॉक्टर से अपनी कौमार्यता का प्रमाण् पत्र सबूत के तौर पर मांगा करती थीं । अस्पताल में आयी एक नवयौवना ने इस ऑप्रेशन से पहले कहा कि – उसके लिए ज़िन्दगी से भी ज़रूरी उसकी वर्जिनिटी है । उसके धर्म में कुमारी न होना बुरा माना जाता है ।

क्या मुझे यह मानना चाहिये कि मेडिकल साइंस सारे स्त्री विमर्श और स्त्री मुक्ति का तेल कर रही है ? क्योंकि हाइमेन की रिपेयरिंग कर उसे पूर्ववत कर् देना दरअस्ल धीरे धीरे वर्जिनिटी के महत्व को और अधिक मज़बूत करेगा । वर्जिनिटी या कौमार्यता वह धारणा है या कहूँ अनिवार्यता है जिसके चलते अब तक हमारा समाज लड़की के सर अपनी इज़्ज़त का टोकरा रखता आया है ।जब कौमार्यता पुन: हासिल करने के उपाय सामने होंगे तो कौमार्यता का महत्व और उसके अभाव की ग्लानि की मानसिकता से कैसे निकलेगा समाज ?यह कौमार्यत के मिथों को तोड़ने का समय है या उसे मज़बूत करने का ?और यह स्थिति तब है जब कि विज्ञान ही साबित कर चुका है कि हाइमेन का भंग होना प्रथम सम्भोग से ही नही होता इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे कि साइकलिंग करना ,जिमनास्टिक्स , तैराकी जैसी शारीरिक मशक्कत वगैरह ।

अगर सकारात्मक सोचूँ ... जो कि होगा नही इस बात में कि कौमार्यता हासिल की जा सकती है यह सोच कर , शायद ,अपमान से लड़की बलात्कार या विवाह पूर्व सम्बन्ध की शर्म के बोझ से आत्महत्या नही करेगी । और शायद परिवार वाले भी ऐसी स्थिति मे उसे गला घोंट कर मार नही डालेंगे ।
लेकिन कुल मिलाकर क्या ? इससे समाज को हासिल क्या ? स्त्री को हासिल क्या ? एक और भ्रम ? खुद को लेकर ? अपनी वर्जिनिटी को लेकर ? जो क्षतिग्रस्त थी ? और जिसके इलाज के सबूत अस्पताल में मौजूद हैं ? यानि कुल मिलाकर अपमान और संत्रास और पीड़ा ?
मानसिक रूप से विकसित , लिंग-भेद रहित समाज को इससे हासिल क्या ? कुछ नही ! !
कुछ समय पहले एक अखबार में एक सर्वे में पढा था कि शहरी नौजवानों में धीरे धीरे पत्नी की वर्जिनिटी की अनिवार्यता की धारनाएँ बदल रहीं हैं । प्रतिशत कम है लेकिन बदलाव है ।
वर्जिनिटी ऑन सेल से इन बदलावों को सीधा सीधा धक्का पहुँचने वाला है । शायद बात का अंत फिर वहीं हुआ कि स्त्री अपनी समस्या की जड़ खुद ही है और उससे उबरेगी भी वह अपने ही प्रयासों से । चाहे वह प्रयास हाइमेन रिपेयर ही क्यो न हो ! बाकी सब बैठ कर तमाशा देखें कि आगे क्या होता है ? फिलहाल तो हाइमेनोप्लास्टी या री वरजिनेशन मार्केट का एक नया उत्पाद है और दिल्ली की कुछ लड़्कियों ने इसके बारे में मैक्स जैसे अस्पतालों में पूछताछ शुरु कर दी है ।

यू ट्यूब पर मिले इस सम्वाद में हाइमेन रिपेयर के नये मुद्दे पर प्रतिक्रिया देखिये -

22 comments:

Suresh Gupta said...

जब विज्ञान यह साबित कर चुका है कि हाइमेन का भंग होना प्रथम सम्भोग से ही नही होता इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे कि साइकलिंग करना ,जिमनास्टिक्स , तैराकी जैसी शारीरिक मशक्कत इत्यादि, तब इस की चिंता क्यों करना? रेनुका चौधरी तो यह खुले शब्दों में कह चुकी हैं कि भारतीय पुरुषों को अब पत्नी कुंवारी होगी ऐसी उम्मीद करना बंद कर देना चाहिए. नारी तरक्की कर रही है. पुरूष के बराबर क्या, पुरूष से आगे निकल रही है. फ़िर हाइमेनोप्लास्टी या रीवरजिनेशन की जरूरत क्यों महसूस करती है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि मेडिकल साइंस ने एक और प्रोडक्ट बाज़ार में निकाला है, यानी आमदनी का एक और जरिया, और टारगेट बनाया है प्रगतिशील नारी को?

एक बात और कहनी है, कौमार्यता अगर पुरूष के साथ, मर्जी से या जबरदस्ती, भंग होती है तो क्या हाइमेनोप्लास्टी से मन का दर्द ख़त्म हो जायेगा. शारीरिक तौर पर नारी भले ही अच्छा महसूस करे पर मन से क्या वह अच्छा महसूस कर पाएगी?

Anonymous said...

मेरे विचार से यदि कोई लड़की कहती है कि वह कुमारी है तो उसे किसी और प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। क्योंकि यह बात सही है कि कुमारी लड़कियों का भी हाइमेन भंग हो सकता है। उसके भंग रहने का अर्थ नहीं है कि वह लड़की कुमारी नहीं है।

मेरे विचार से यह ऑपरेशन करवाने की जरूरत नहीं। यदि पुरुष को मालुम चले कि यह ऑपरेशन करवाया गया है तो उसे गलतफहमी हो सकती है।

जहां तक यह कहने की बात है कि 'परमाणु बमों का अविष्कार मैं ऐसी ही नासमझ साइंस का परिणाम मानती हूँ।' मुझे यह बात ठीक नहीं लगती है।

मेरे विचार में परमाणु बम का आविष्कार नासमझ साइंस का परिणाम नहीं है पर उसका प्रयोग करना अवश्य गलत है।

जर्मनी में भी इस दिशा में काम चल रहा था। सोचिये यदि हिटलर नें परमाणु बम पहले बना लिया होता तो क्या होता - शायद विश्व का नकशा फर्क होता।

अजय कुमार झा said...

sirf itnaa ki vishay aisaa chun kar aapne sachmuch hee saabit kiya hai ki aap aank kee kirkiri hain. likhtee rahein. is vishay par main sirf ye kahungaa ki apnaa apnaa najariyaa hai.

Pooja Prasad said...

पहली बात, एक िझल्ली भर हासिल कर लेना ``कौमार्यता`` कैसे हो गया, समझ नहीं आता। दूसरी बात, वैज्ञानिक प्रयोगों के अनेक ऊल जलूल उपयोगों में से ही एक है यह हाइमेनोप्लास्टी। तीसरी बात, जो स्त्रियां भी यह समझती हैंं कि यह िझल्ली फिर से बनवा लेने से उनके भावी शादीशुदा जीवन पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, उनके प्रति मेरी सहाुभूति है। वे एक भयंकर छलावे में जी रही हैं। क्योंकि, संतोषजनक वैवाहिक जीवन की कोई गारंटी वर्जिनिटी का सार्टिफिकेट नहीं दे सकता। साथ ही, मेरी सहानुभूति अब उन पुरूषों से भी है जो अपनी भावी पित्नयों के कौमार्य को ले कर काफी सजग रहते हैं। उन पुरूषों को अब ये पता भी नहीं चलेगा कि उनकी पत्नी कभी कुंवारेपन का त्याग कर अपने हिसाब से जी चुकी है। और, उसके (पति के) दिमाग के एक बड़े कोने के दिवालिएपन से निपटने को गैर जरूरी मानते हुए यह सर्जरी करवा उसे वेवकूफ (?)बना रही है।

आप सही कह रही हैं कि हाइमेनोप्लास्टी नारी विमर्श और नारी मुक्ति के तहत हो रहे प्रयासों को एक बड़ा धक्का है। यह `लौटने` का साधन है, `बढ़ने` का नहीं। अब यह स्त्री पर निर्भर करता है कि वह कौन से साधन को स्वीकारती है। महिलाओं के प्रति सामाजिक बदलाव की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद हाइमेनोप्लास्टी को अपनाना अपने ही पदचिन्हों को मिटाना होगा। ऐसा करना हमारी ही राह को रोकेगा।

Anonymous said...

personal choice is a private affair

सुजाता said...

personal is political .

अनामदास said...

http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2006/04/060404_hymenoplast_gujrat.shtml

भारत में क़ानूनी-गैरकानूनी तरीक़े से ऑपरेशनों का सिलसिला पिछले पाँच साल से चल रहा है. ऊपर वाले लिंक पर क्लिक करके देखें.

स्वप्नदर्शी said...

क़ोमार्य की चाह, और उसको रिपयर करने के टूल्स, बाज़ार और सर्वे मेरी नज़र मे महत्व्पूर्ण नही है. महत्त्व इस बात का है, कि ये चाह क्यो है? और क्यो अलग अलग धर्म और संस्क्रिति को मानने वाले समाज इस एक मामले मे एक सी नज़र रखते है? क्या सिर्फ औरते व्यक्तिगत स्तर पर इस समस्या से निपट सकती है, एक ऐसे समाज मे जहाँ व्यभिचार की सज़ा पत्थर मार कर मौत की सज़ा हो. अमीना का केस अभी पुराना नही है. और दुनिया के एक बडे हिस्से मे औरत की सेक्सुअल आज़ादी को चुनना, मौत को, सर्वज़निक अपमान को चुनना है. ऐसे मे इस तरह के समाज् मे अगर मुस्लिम समुदाय की औरते अपना कोमार्य सुनिश्चित करना चाहती है, तो ये समझा जाना चाहिये कि उनका दोष नही है. उनके पास यही एक विकल्प है, खासकर जब जनतंत्र भी न हो, धर्म और कानून मे फर्क न हो.


कोमार्य केवल मुस्लिम समाज की चाह नही है. माताओ और बहनो, किस शान से आप सब नवरात्री का वर्त रखती है? कुमारी कन्याओ को जीमाती है, जो रजस्वला न हो? वो भी कोमार्य पूजन ही है. नारी का शक्ति पूजन नही है. नही तो औरतो को जीमाया जाता?
अगर नारी का शक्तिपूजन होता, माता का शक्तिपूजन होता, तो कोई भी संतान नज़ायज नही होती. स्त्री के शरीर और सेक्सुलिटी से जुडी गालिया न होती. संताने माता के नाम से जानी जाती. य फिर माता-पिता दोनो के नाम से.
औरतो के नाम भी, मिसेज जोशी, पान्डे,सिंह, गुप्ता से आगे होते. परम पूज्य बह्मा जी की जगह स्रिस्टी की रचना का भार किसी देवी को दिया जाता.

आदिम समाज की मात्रशक्ति पूजा, जो स्त्री के प्रजनन शक्ति की पूजा थी, वो पित्र् सत्ता ने कोमार्य पूजन मे बदल डाली है. क्योंकि पुरुश को सम्पत्ति का वारिस उसी का हो, इस गारंटी के लिये स्त्री के कोमार्य की ज़रूरत है. हिन्दु धर्म मे पिता को कन्यादान का फल भी कुमारी कन्या, खासकर जो रजस्वला न हो के दान के बाद मिलता है.
जननी का महज कोख बन जाना, और औरत के शरीर पर, उसकी सेकसुअलिटी पर, प्रजनन पर, पुरुष का और समाज का नियंत्रण, सब सम्पति के उदय के साथ ही शुरु हुया है. और दूसरी तरफ, औरत के कोमार्य का, उसके मातारूप का, उसकी दासता का महिमा मंडन भी.

सुजाता said...

सही कहा स्वप्नदर्शी जी । इन बारीकियों को समझने की ज़रूरत है ।

pallavi trivedi said...

मुझे तो इसी बात पर आपत्ति होती है की वर्जिनिटी को स्त्रियों से जोड़कर क्यों देखा जाता है...बहुत ही घिसी पिटी सी बकवास से ज्यादा मेरी नज़रों में ये कुछ नहीं है....शायद मुस्लिम देशों में वर्जिन न होने पर महिलाओं को यातना सहनी पड़ती होगी तो ये एक मजबूरी मानी जा सकती है!लेकिन आज की लडकियां...अभी कुछ समय पहले एम.टी.वी. रोडीज़ देख रही थी..उसमे तीन लड़के,तीन लडकियां थे! एक लड़की से सवाल पूछा जाता है "are u verjin?" लड़की जवाब देने से साफ इनकार कर देती है...इस पर तुरंत बाकी पाँचों लड़के लड़कियों में कानाफूसी शुरू हो जाती है..बाद में पूछे जाने पर दूसरी लड़की बताती है की ज़रूर वो वर्जिन नहीं है इसलिए जवाब नहीं दिया!सोचने योग्य बात है ...और जहाँ तक हाइमेनोप्लास्टी की बात है..इससे स्त्रियों को वर्जिनिटी की धारणा से मुक्ति मिलने की बजाय इस बात को और बल मिलेगा..

अनूप भार्गव said...

एक अच्छे मुद्दे को उठाने के लिये बधाई ।

निश्चित रूप से पुरुष और समाज की सोच को बदलने की ज़रूरत है लेकिन जब तक यह नहीं होता तब तक स्त्री को फ़ैसला अपने निज़ी हालातों को देख कर ही करना होगा । इन हालातों में उस के खुद के विचार, उस का आत्म विश्वास, समाज की मान्यताएं और उस की उन मान्यताओं के खिलाफ़ लड़ने की क्षमता शामिल है ।
It is her body and it should be her decision.

सुजाता said...

पर्सनल क्या है ? क्या आत्महत्या को भी आप पर्सनल चॉयस मानेंगे ? किसी दूरदराज़ गाँव में जहाँ स्त्री को शिक्षा दूर जीने के समान अधिकार भी मयस्सर नहीं वहाँ उस पत्नी का पति से पीटे जाना भी उनका पर्सनल अफेयर है ? भले ही वह पत्नी खुद कहे कि -मेरा पति मुझे पीटता है तो तुम्हे क्या ? तो भी यह समाज का विषय है क्योंकि एक एक व्यक्ति और एक एक परिवार से ही समाज बनता है ।
आपने वो कहानी पढी होगी या सुनी होगी कि एक राजा अपनी प्रजा को शिव मन्दिर् में एक एक लोटा दूध चढाने को कहता है ताकि वह दूध से भर जाए । लेकिन सुबह वहाँ सिर्फ पानी ही पानी मिलता है ।
आत्महत्या को तो सम्विधान तक पर्सनल चॉयस नही मानता । लेकिन आप की सोच से चला जाए तो बुरे हालातों में कोई उपाय न देखकर जब कोई लड़की आत्महत्या कर लेती है तो वही खुद बेवकूफ है , उस ही का फैसला था , किसने कहा था आत्महत्या कर लो !
एक एक व्यक्ति कर् के समाज का मानस तैयार करते हैं ...कौन सा साबुन इस्तेमाल करना, कौन सी गाड़ी खरीदना ,कौन से स्कूल में बच्चे को पढाना ...आप ध्यान से देखें तो आप इन फैसलों को भी व्यक्तिगत चॉयस नही पायेंगे ।
चोखेर बाली की इन पोस्ट को पढा जाना फिर से बहुत ज़रूरी हो उठा है- http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/02/blog-post_7441.html

http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/04/blog-post_25.html

सुजाता said...

@ उन्मुक्त जी ,
नासमझ विज्ञान को लेकर मेरे विचार से आपकी असहमति सर आँखों पर , लेकिन एक सम्स्या आपके पहले वाक्य मे दिखी -

मेरे विचार से यदि कोई लड़की कहती है कि वह कुमारी है तो उसे किसी और प्रमाण देने की जरूरत नहीं है।-

बेशक आपकी मंशा काबिले तारीफ है । लेकिन हमार लक्षय वह समाज होना चाहिये जहाँ यह कहने की बात ही न रह जाए । न ही यह पूछ्ने का पड़ताल करनी की बात रह जाए । 'हम दो हमारे दो' जैसे नारे तभी बनते हैं जब ऐसे हालात नही होते । जब ये वास्तविकता बन जाते हैं तो नारे का अर्थ खत्म हो जाता है ।जैसे आजकल सुनने को मिलता है न 'हम दो हमारा एक्' ।

कहने का मतलब यह कि कौमार्य शब्द ही जब हमारे शब्द कोश से मिट जाएगा तभी लिंग भेद का अंत मानना होगा । और हाइमेनोप्लास्टी इसे नये तरीके से , रीइम्फेसाइज़ करते हुए हमारे शब्दकोश में जगह दिला रही है ।

Anonymous said...

ik achchi bahas hai...is mamle mein tamil abhinetri khushboo bhi ik baar lapeta gaya tha....yahan par deh mukti ka concept bhi jura hua yani emancipation of body...tamam aazaad khyalon ke bawzud larkiyan bhi bazzaarwad ke changul mein jakri jaa rahi hai....isi tarah agar women condom ke baat karte hai to uske peech stri ki sexual freedom ko support karne ka koi nek irada to katai nahi raha hoga

अनूप भार्गव said...

शायद मेरे शब्दों ने वह नहीं कहा जो मैं कहना चाह रहा था ।
It is her body and it should be her decision.
इस के आगे जो मुझे स्पष्ट करने के लिये जोड़ना चाहिये था वह यह कि :
that decision should be taken by just her alone, not influenced or pressured by any one and "not to prove anything".

Just like abortion, the choice should be strictly her.

I am against abortion (personally) but I strongly protect the right of woman for choice. Similarly , I am against this but do not want to take away the right of woman to go for it. I am also against any one forcing a woman to do it.

are we advocating banning this operation and making it illegal ?

डॉ .अनुराग said...

मेडिकल faternity जब कोई technique लाती है या कोई मेडीसिन तब उसके सामने धर्म ,नारीवाद या ऐसी कोई चीज़ नही सोचते जैसे की हाल फिलहाल मे emergengy pill आयी है unwanted pregnency को रोकने के लिये ,जाहिर है इसके दोरुयुपोग भी होगे पर हमे इसका प्राईमरी पक्ष पहले देखना होगा .....ऐसे ही इस मुद्दे को देख सकते है जैसे की botox या filler द्वारा facial rejuvenation करना .यानि की किसी दंपत्ति द्वारा अगर वापस अपनी सेक्सुअल लाइफ को ओर ओर बेहतर बनाने का एक प्रयास ..कुछ execrcise भी आती है .जिनका आम लोगो को ज्ञान नही है....... प्रकाश कोठारी जी ने इस पर कई किताबे लिखी है....

Rachna Singh said...

personal choice is a private affair
simple means to her , her own
woman of today are taking such operations as cosmetic operations . legality , need and after effects are not their crieteria for this . for them , they have started earning at a young age , which gives them the freedom to decide what to spend and where .
18 years is the age decided by court
so if personal choice is a private affair i say i mean that its my body let me decide what to do with it . i want to undergo the operation to please my self fine , to please the society { i have my doubts } but to avoide any problems { yes its true its like lets enjoy and then forget the past and also close all doors to our past }
concept of virginty is not just in india but also in other countires . Lady Diana went thru the test before marriage .
The question whether virginity is mandatory for girls before marriage again matter of personal choice . Woman has the power to decide and because now she is financially independent she is using that power without inhibitions . और हाइमेनोप्लास्टी इसे नये तरीके से , रीइम्फेसाइज़ करते हुए हमारे शब्दकोश में जगह दिला रही है ।
perfectly true

Unknown said...

इधर उधर की बातें छोड़कर यदि हम नारी और पुरूष के बीच के संबंधों पर बात करें, तब एक कुवांरी पत्नी की चाह रखने वाले पुरूष को भी कुंवारा होना चाहिए. इस में दोनों अगर ईमानदारी बरतें तो कोई समस्या नहीं होगी. मेडिकल साइंस कुछ भी नए उत्पाद निकालती रहे.

आर. अनुराधा said...

"Just like abortion, the choice should be strictly her."???!!!

Anupji,
-"...The Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 does not permit induced abortions on demand. The responsibility rests with the medical practitioner to opine in good faith regarding the presence of a valid legal indication. These indications are also mandatory with medical methods."

-The Indian Medical Association says that five million girls are aborted annually.!!!

Which personal choice of her you are talking about??!!!

अनूप भार्गव said...

अनुराधा जी:
माफ़ी चाहूँगा , अपनी अधूरी जानकारी के लिये । मुझे गर्भपात के विषय में भारत के कानून पता नहीं थे । यहां अमेरिका में करीब ३५ वर्ष पहले काफ़ी चर्चित Roe v/s Wade केस में गर्भपात को पूर्णत: कानूनी माना गया था ।
The Supreme Court ruled that the relationship between a woman and her doctor was a private affair, not subject to governmental interference. Written by Justice Harry A. Blackmun, the ruling declared that the guarantee of liberty in the 14th Amendment to the U.S. Constitution extends a right to privacy "broad enough to encompass a woman’s decision whether or not to terminate her pregnancy."
The ruling meant that from then on, the decision whether to have an abortion would be a matter for a woman and her health provider to decide. The procedure was made legal in all states,
उस के बाद से यहां इस निर्णय को बदलने के लिये काफ़ी जंग चल रही है (Pro-Choice v/s Pro-Life) लेकिन अभी तक यह निर्णय बदला नहीं जा सका है । भारत में कानूनी स्थिति को जान कर विस्मय और थोड़ा सा अफ़सोस हुआ । जैसा कि आप अनुमान लगा सकती है , मै पूरी तरह से Pro-Choice हूँ , यानि को स्त्री को पूरा अधिकार होना चाहिये ............। अब यह सही है या नहीं ये एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है , सुजाता या आप यदि इसे ’चोखेर बाली’ पर शुरु करना चाहें तो ?
लड़की होने के कारण गर्भपात जिस का ज़िक्र आपने किया , वह सर्वथा गलत है लेकिन क्यों कि ऐसा हो रहा है इसके लिये गर्भपात को ’गैर कानूनी’ बना देना भी ठीक नहीं है और जैसा कि आप जानती ही हैं कि सिर्फ़ ’गैर कानूनी’ बना देने से ’गर्भपात’ रुक नहीं जाते , हाँ unsafe ज़रूर हो जाते हैं ।
ठीक इसी तरह hymenotomy भी किसी दबाव, ज़बरदस्ती, सामाजिक दबाव या कौमार्य सिद्ध करने के लिये की जाये तो गलत है but you can not take away the right of woman to do it , if she wishes ......... Making it illegal is not a solution as long as it is medically safe.

आर. अनुराधा said...

अनूप जी, मुझे अच्छा लगा कि आप इन मुद्दों पर साफ राय रखते हैं। और अच्छी बात है कि अमरीका में महिलाओं को समाज में काफी आजादी है। लेकिन भारत में तो औरतों पर जंजीरों की इतनी तहें हैं कि वो उनमें कहीं गुम हो जाती हैं। कोई कहां से शुरू करे उनको ढूंढना, समझ नहीं आता। इसीलिए, कुछ महिलाएं जो थोड़ा-बहुत मौका पाती हैं तो बहुत कुछ कहना चाहती हैं, करना चाहती हैं। लेकिन उतना किसी भी स्तर पर काफी तो क्या कहें, थोड़ा असर डालने लायक ही होता है और उसके सुखद परिणाम की तो उम्मीद ही बेकार है। फिर भी कोशिशें जारी हैं। इस बारे में जो भी कानून औरतों के हक में होते हैं, उनका फायदा दरअसल औरतों को कम, उनके बहाने पुरुषों को अपने मकसद पूरे करने के लिए ज्यादा मिल जाता है। समाज ऐसा ही है। लेकिन हां, कुछ नहीं से कुछ तो हमेशा बेहतर है और ज्यादा बेहतर की उम्मीद भी रहती ही है।
वैसे, इजाजत हो तो आपको थोड़ा सुधारूं - 'tomy' means 'act of cutting' and 'plasty' means 'molding or forming surgically'. इस तरह hymenotomy नहीं hymenoplasty सही शब्द है।

अनूप भार्गव said...

अनुराधा:

सही शब्द बतलाने के लिये धन्यवाद । मैनें तो सीधा सुजाता की पोस्ट से 'cut and paste' कर के लिये लगा दिया था । Not my 'cup of tea' anyway :-):-)

निश्चित रूप से महिलाओं के लिये odds भारत में अधिक खिलाफ़ हैं लेकिन इतना भी निराश होने की बात नहीं है । प्रगति के positive aspect को भी देखें । प्रगति यहां भी रातों रात नहीं हुई । विश्वास करना कठिन है कि अमेरिका के २०० वर्ष के इतिहास में स्त्री को ’चुनाव में मत देने जैसी मूलभूत स्वतंत्रता सिर्फ़ ८८ बरस पहले मिली’ थी । http://www.infoplease.com/spot/womenstimeline1.html

ज़रूरत है सतत प्रयास की, जो इस चंगुल से निकल गई हैं उन के द्वारा अधिक सक्रियता और जागरुकता की और समाज के उन सब तबकों को साथ ले कर चलने की ज़ो इस मुहिम में योगदान दे सकते हैं ।

अभी कुछ दिन पहले हिन्दी के सुकवि डा. कुँवर बेचैन जी के साथ कुछ समय गुजारने का मौका मिला था , उन की दो पक्तियां याद आ रही हैं :

एक ही ठांव पे ठहरोगे तो रुक जाओगे
धीरे धीरे ही सही राह पे चलते रहिये ।

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...