Monday, June 23, 2008

घर पर किये जाने वाले कार्य का भी मूल्य है!

पल्लवी की पिछली पोस्ट कहती है ....एक गृहणी सुबह से रात तक जो जो काम करती है वो किसी एक दायरे में नहीं रखे जा सकते!सारा गृहकार्य, बच्चों की देखभाल,पढाना, घर का प्रबंधन,बजट में घर चलाना,परिवार के सभी सदस्यों को मानसिक सपोर्ट देना....ये सारे काम बदस्तूर जिंदगी भर चलते रहते हैं...लेकिन इसके एवज़ में उसे कोई तनख्वाह नहीं मिलती है!इतना कार्य करने के बाद भी वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है!क्यों उसके कार्य का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कोई योगदान नहीं है? (GDP is defined as the total market value of all final goods and services produced within the country in a given period of time .)


इस पोस्ट पर आये सभी कमेंट्स यह हैं -

DR.ANURAG said...
बस तो फ़िर घर दफ्तर बन गया समझो........

June 21, 2008 1:31 PM
सुजाता said...
पल्लवी एक अच्छा मुद्दा उठाया है । घरेलू कार्यों को जैसे ही नौकर से करवाने की बात आये तो समझ आता है कि घर पर बैठने वाली स्त्री दर असल कितना श्रम और समय होम मैनेजमेंट मे लगा रही है । उसके काम और श्रम और समय की लागत को सम्मान नही मिलता । वेतन देने की बजाय उसे इस सम्मान का हकदार होना चाहिये डॉ अनुराग की बात से यह भी प्रश्न भी दिमाग मे आया कि-- वेतन कौन देगा ? पति ?
।कुछ स्पष्टता इसे लेकर मुझे भी नही हो पायी । पर आस पास देखा है कि घरेलू स्त्रियाँ जब पति से धन मांगती हैं तो उन्हें कई तरह के स्पष्टीकरण और हिसाब देने होते हैं या झिड़की खानी होती है ।मेरी एक मित्र की माँ आज भी घर खर्च के गिने गिनाए पैसे ही पाती है । बेटी बहू को कुछ देना हो तो उसे कहीं घर के रेग्युलर खर्च में कुछ महीने तक घपला करना होता है क्योंकि पति से धन की मांग की लिमिटेशन्स हैं ।
एक तरह से गृहणी का अर्थ पर तो कोई नियंत्रण होती ही नही । नौकरी करने वाली स्त्रियों का भी किस हद तक होता है यह एक नया सवाल है । पर निश्चित रूप से वे घर पर रहने वाली स्त्री से इस मायने मे अधिक आज़ाद हैं कि पूंजी उनके हाथ में आती तो है ।
कुछ अपवाद ऐसे भी हैं जहाँ पति की जेब साफ हो जाती है और पति उफ भी नही कर सकता , या जहाँ हर उत्सव पर गहनों की डिमांड आती है । पर सच कहें तो यह सब मध्यवर्गीय स्त्रियों की समस्याओं के ही दायरे हैं । निम्नवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय स्त्री जो घर पर रहती है या कोई छोटी मोटी नौकरी भी करती है अर्थ उसके नियंत्रण से बहुत दूर है अभी ।
ऐसे में मुझे सूर्यबाला की एक कहानी याद आ रही है , जल्द ही सभी से बांटती हूँ ।
इस विषय पर विस्तार से बात होनी चाहिये ।

June 22, 2008 9:13 AM
Suresh Chandra Gupta said...
क्या हो गया है चोखेरवालिओं को, कैसे मुद्दे उठा रही हैं बहस के लिए? एक मजदूर, एक क्लर्क, एक टीचर से तुलना कर रही हैं गृहणी की. मजदूर, क्लर्क, टीचर काम करते हैं और मेहनताना पाते हैं. आज वह यहाँ हैं, कल वह कहीं और होते हैं. कार्यस्थल से उनका बस इतना ही रिश्ता होता है कि काम किया, मेहनताना लिया और नमस्ते. क्या घर में गृहणी का यही रोल है?

क्या यह जरूरी है कि हर बात को नकारात्मक रूप में देखा जाए? घर को चलाने में पुरूष और नारी का बराबर अधिकार और जिम्मेदारी होती है. अगर नारी को लगता है कि उसे उसका अधिकार नहीं मिल रहा तब उसे उस अधिकार की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना चाहिए. यहाँ तो उल्टा हो रहा है. ख़ुद को घर में मजदूर के रूप में देखा जा रहा है. यह कैसा संघर्ष है अपने अधिकार के लिए?

June 22, 2008 12:16 PM
Rachna Singh said...
पल्लवी आप एक अविवाहित , सक्षम महिला ३० वर्ष के अंदर हैं , मै एक अविवाहित , सक्षम महिला 48 वर्ष की हूँ , सुजाता एक विवाहित , सक्षम महिला ३० -३५ वर्ष के अंदर हैं पर वोह इस ब्लॉग की सूत्रधार हैं यानी उनका कमेन्ट एक summerization होता हैं . कल जब आप की ये पोस्ट आई तो स्मित के रेखा मुख पर आगई और मैने कमेन्ट करने से अपने को रोका पर जानती थी की कोई भी विवाहिता स्त्री इस पर कमेन्ट नहीं करेगी { सुजाता का कमेन्ट अपवाद होगा कोई उन्हे तो करना ही है !!!!! } . जिस समस्या का सीधा प्रभाव जिस पर पड़ना हैं अगर वो ही नहीं बोलेगा तो आप के मेरे या सुजाता के बोलने से क्या होगा . हिन्दी ब्लॉग्गिंग में विवाहित महिला ब्लॉगर बहुत हैं और आप के इस ब्लॉग को पढ़ती भी हैं , फिर ये चुप्पी क्यों { क्या इसलिये की पोस्ट शनिवार को आयी !!! } . बार बार विवाहित स्त्रियाँ ब्लॉग पर ही नहीं जगह जगह प्रिंट मीडिया , साक्षात्कार , टीवी , आत्म कथा लिखती हैं और ५० % से ज्यादा अपने आप एक घुटन का खुलासा करती हैं . और फिर कहा जाता हैं सामाजिक व्यवस्था को एसा करो की सबको स्वयं आज़ादी मिल जाये . क्यों समय रहते विवाहित स्त्री अपने अधिकारों के लिये नहीं बोलना चाहती हैं . और अगर इन सब बातो को जो प्रश्न आप उठा रही हैं वोह गैर जरुरी समझती हैं तो क्यों फिर बाद में सबसे ज्यादा सिस्टम के खिलाफ एक विवाहित स्त्री ही बोलती हैं लकिन तब बोलती हैं जब वो उस सिस्टम में पुरी तरह रम चुकी होती हैं और उसके बेस्ट का फायदा ले चुकी होती हैं . ब्लॉग्गिंग में सब पढ़ी लिखी महिला हैं फिर भी किसी विवाहित स्त्री को इस पोस्ट पर कमेन्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई ?? ये लिखने में कितना समय लगता हें की हाउस वाइफ को वेतन मिलना या नहीं मिलना चाहिये . अगर कोई बोलना ही नहीं चाहता तो क्या फायदा हैं विमर्श का . चाहे वोह चोखेर बाली ब्लॉग पर हो या नारी ब्लॉग पर .
व्यक्तिगत तोर पर मै विवाहित स्त्री के वेतन के ख़िलाफ़ हूँ और स्त्री की आर्थिक रूप से सक्षम होने के पक्ष में हूँ . पर जिनको फर्क पढ़ना चाहिये वहाँ सिर्फ़ मौन हैं सन्नाटा हैं

June 22, 2008 1:23 PM
pallavi trivedi said...
mera vyaktigat taur par maanna hai hai ki har vyakti ke kaam ka moolya hona hi chaahiye!sabke apne vichaar hain....main to is vyavastha ka samarthan karti hoon.jis din koi bhi country aisa karna shuru kar degi sabhi deshon mein is vishay par bahas hone lagegi.

June 22, 2008 1:47 PM


masijeevi said...
मूल मुद्दा कुछ भटका (स्‍त्री विमर्श के मुद्दे अक्‍सर भटकते हैं- भटकाए भी जाते हैं) तनख्‍वाह मिले या नहीं से ज्‍यादा अहम है कि स्‍वीकारा जाए कि इस काम का 'मूल्‍य' है। परिवार की 'महानता' स्‍त्री के 'त्‍याग' आदि के महिमामंडन में इस घरेलू काम को आर्थिक तौर पर निरर्थक क्रिया न मान लिया जाए।
2002 में एक स्‍त्री समूह में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में यह आंकलन किया और पाश कि मध्‍यम वर्ग में जब पति की आय औसतन 8000 थी तब पत्‍नी के घरेलू कार्य की बाजार कीमत 12000/- के लगभग थी। बहुत ही कच्‍चा आंकलन था जो पति के घर में किए गए कामों को नजरअंदाज करता था पर फिर भी कम से कम ये तो पता चलता है कि यदि घरेलू काम का आर्थिक मूल्‍य नजर में रखा जाए तो घरेलू भी वर्किंग माना जाएगा।

June 22, 2008 3:47 PM


Rachna Singh said...
नहीं पल्लवी कि पोस्ट का मुद्दा बिल्कुल " crystal clear " हैं और उनका कमेन्ट भी इसी और हैं हर व्यक्ति के क्षम का मूल्य होना चाहिये और आज कल के दौर मे मूल्य का अर्थ बिल्कुल सीधा हैं कि काम का पैसा मिले । घरेलू काम के लिये गृहिणी को गृहकार्य का वेतन मिलना चाहिए , या नहीं । जहाँ तक मेरी अल्प जानकारी हैं शायद नोर्वे सरकार ये करती हैं पर मुझे doubt हैं कि वोह इसे house wife allowance कि तरह देती हैं या unemployed कि तरह . मसिजीवी जी commercialization का ज़माना हैं इस लिये मूल्य का मतलब आर्थिक मूल्य हैं ।

June 22, 2008 6:21 PM
pallavi trivedi said...
हर व्यक्ति के क्षम का मूल्य होना चाहिये और आज कल के दौर मे मूल्य का अर्थ बिल्कुल सीधा हैं कि काम का पैसा मिले

rachna se poori tarah sahmat....

June 23, 2008 12:11 AM

अनूप भार्गव said...
अज़ीब सी बहस हो रही है । समझ नहीं आता कि यह श्रम का मूल्य सरकार से दिया जाने को कहा जा रहा है या पति से ?

यदि सरकार से इस की अपेक्षा की जा रही है तो उसका क्या औचित्य है ? सरकार निजी क्षेत्र में काम करने वाले किसी पुरुष को पैसा नहीं देती । सरकार सिर्फ़ उन पुरुषों को वेतन देती है जो सरकारी नौकरी करते हैं और सरकार के काम को आगे बढाने मे योगदान देते हैं । घर में काम करना महत्वपूर्ण तो है लेकिन सरकार के काम में किस तरह सहायता कर रहा है ? फ़िर वेतन कार्य की कुशलता और योग्यता पर निर्भर करता है, क्या सरकार आप के घर में उसे आंकने के लिये आयेगी ?

पति से घर मे किये गये कार्य के लिये वेतन की अपेक्षा सैद्धांतिक रूप से अच्छी लगती है लेकिन व्यव‌हारिक नही । क्या घर में किये गये हर काम का आप आर्थिक मूल्य लगाने लगेंगे ? आज मैं बाज़ार से सामान ले कर आया , उस का मूल्य इतना हुआ , आज खाना बनाने का मूल्य इतना हुआ , अच्छा आज घर की सफ़ाई नहीं हुई , इसालिये उसका पैसा काट लिया जायेगा । स्थिति हास्यास्पद सी नहीं हो जायेगी ? फ़िर यदि स्त्री के श्रम की कीमत लग रही है तो पुरुष जो परिवार के लिये कर रहा है , उस की कीमत क्यों नहीं ? परिवार को यदि इकाई की तरह ही लिया जाये तो बेहतर होगा

हां स्त्री के काम का महत्व है और उसे स्वीकार किया जाना चाहिये , घर की हर चीज़ में उस का बराबर का हिस्सा होना चाहिये, कानून मे बदलाव हो कि ’सेपरेशन’ की स्थिति में स्त्री को उस का पूरा हक मिले लेकिन श्रम की कीमत की तरह ’वेतन’ की बात व्यवहारिक नहीं लगती ।

June 23, 2008 5:35 AM

सुजाता said...

मेरा हर कमेंट एक पाठक के तौर पर होता है न कि किसी की पोस्ट को कनक्लूड करता हुआ ।

इस मुद्दे पर अनूप जी से सहमति है ।

घरेलू श्रम के मूल्य की बात महत्वपूर्ण है लेकिन वह मूल्य क्या हो और उसे किससे प्राप्त किया जाएगा यह बड़े सवाल हैं । पत्नी बनने का वेतन समझ नही आता । घरेलू कार्य स्त्री अपने बसाए घर के प्रति स्नेह और प्यार से करती है , इसे किसी की ज़िम्मेदारी या कमज़ोरी नही मानना चाहिये , न ही इस कारण किसी को हीन समझना चाहिये ।यदि वह कामकाजी भी है तो यह श्रम कई गुना हो जाता है । इसका उपाय आपसी सामंजस्य से घरेलू कामों को निबटाकर किया जा सकता है ।जो कि आमतौर पर नही होता ।
दूसरी बात वही ,
कि घर मे रहने वाली पत्नियाँ कुछ नही करतीं यह मत गलत सिद्ध करने के लिए ही इस प्रकार के शोध होते हैं जो साबित करते हैं कि आप वास्तव में घर की स्त्री के किये काम का बाज़ार मूल्य लगाने चलेन्गे तो पायेंगे कि उसका किया काम कितना महत्वपूर्ण है ।
तीसरी बात ,
यदि सहमत हुआ जाए तो जब पति कार चलाकर परिवार को कहीं ले जाता है तो उसे अपनी ड्राइवरी की कीमत वसूल करनी चाहिये । तो इस तरह बच्चे भी घर का एकाध काम करने , बाज़ार से दूध-दही ले आने के बदले पैसा वसूल करेंगे ।
चौथी बात ,
इस तरह से आप पुरुष के वर्चस्व को और अहमियत दे रही हैं और साबित कर रही हैं कि वास्तव में पुरुष मालिक है । वह पत्नी से मनचाहे ढंग से काम करायेगा और सहानुभूते भी नही रखेगा क्योंकि वह उसके श्रम का सारा बाज़ार मूल्य अदा कर रहा होगा ।इसमें क्या क्या और किस तरह का श्रम शामिल होगा यह भी विचारणीय है ।

बहुत सम्भव है कि मसिजीवी जी ने जैसा कहा कि - बहस कहीं और ही भटक रही है ।

साधारणत: घरेलू पत्नी का घर के आर्थिक ढांचे पर कोई नियंत्रण नही होता और उसका घर में दिया जाने वाला श्रम महत्वहीन समझा जाता है । मेरे खयाल से हमें इसके आस पास रहकर बात करने की ज़रूरत है ।

June 23, 2008 11:51 AM

अनाम द्वारा इस पोस्ट पर दिया गया बी बी सी न्यूज़ का महत्वपूर्ण लिंक जो इस बाबत एक वेबसाइट द्वारा किये गये सर्वे का नतीजा बताता है ।

11 comments:

Rachna Singh said...
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Rachna Singh said...

सुजाता जी
मैने बिल्कुल साफ़ कहा हैं की " व्यक्तिगत तोर पर मै विवाहित स्त्री गृहणी के वेतन के ख़िलाफ़ हूँ और स्त्री की आर्थिक रूप से सक्षम होने के पक्ष में हूँ ।" मेरा पहला कमेन्ट देखे ।
मसिजीवी जी ने जब मुद्दा भटकने की बात की तो मैने कहा हैं "नहीं पल्लवी कि पोस्ट का मुद्दा बिल्कुल " crystal clear " हैं"
मेरी और पल्लवी की बस यही सहमति हैं की पल्लवी की पोस्ट का मुद्दा आर्थिक मूल्य से जुदा है ना की नैतिक मूल्य से ।
बाकी प्रश्न का जवाब मेरा पहला कमेन्ट हैं की महिला के आर्थिक रूप से सक्षम होने के favour मै हूँ ना की किसी वेतन या सरकारी अनुदान के ।

दिनेशराय द्विवेदी said...

एक विवाहित स्त्री घर-परिवार के लिए जो कुछ करती है वह अमूल्य है। कौन उस का मूल्य आँक सकता है?

आर. अनुराधा said...

वाकई दिलचस्प है सोचना- क्या मां का दूध भी मोल मिलेगा- पसेरी, सेर या किलो या लीटर के भाव? इसे कोई तीखी टिप्पणी नहीं, बल्कि मेरा सवाल समझें। अपने विचार विस्तार से भी मैं जल्द ही दूंगी।

सुजाता said...

दिनेश जी आपकी मंशा समझ सकती हूँ । लेकिन अमूल्य कहकर हम स्त्री के घर में खटने और खटते रहने का महिमामंडन ही कर रहे हैं । क्या वाकई एक स्त्री जो कुछ घर परिवार के लिए करती है उसका मूल्य हम समझ्ते हैं ? अमूल्य तो बड़ी बात है । अगर ऐसा मानते तो शायद ये सवाल ही पैदा न होता।

Rachna Singh said...

anuradha
in norway there is such a norm . there the government wants someone to stay at home and take care so they pay the housewifes a very good some of money for the services she is rendering . i read this on the net . the link which is from bbc is also given by me and if you will search "house wife allownce" on google many links come up about norway. what pallive is talking is a commercial view which wiil gain more importance as woman empowerment will shape up

Anonymous said...

Try not to generalize for working/house-making women only. In present times there are many males as well that fall in the same category, though women doing the house-making jobs are more in number. The cost of contribution can be determined based on the market rates, but again think it in this way that your partner is also contributing to the household work outside of the non-household job that provides earning. Some of your partners jobs outside of regular employment jobs include, taking kids to school, doing all the banking business, filing bills, doing grocery shopping and may be tutoring kids after school. So please, do not take it in a negative way but whatever the person doing home-making job earns contributes to the savings a particular household does in a year. It is only that money that contributes or makes possible to go on vacations, shopping sprees, extra-curricular activities of the kids and any unforseen incidentals a household experiences almost everyday. Think positive and not just in terms of negative outcome of not being paid.

For those being single (not-single parents) they may or may not be able to understand the dynamics of a family (spouse and kids only. Do not include extensions) and the contribution a couple makes. As long as the couple appreciates the contribution from each other, and stays thankful that is all one expects. In an Indian society which is very negative, provoking and that never developed a sense of appreciation, recognition and thankfulness, its quite obvious to generate the dialogs presented here.

Unknown said...
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Unknown said...

मै इस बात से सहमत हू की महिलाओ को आर्थिक रूप से स्वतंत्र जरुर होना चाहिए आर्थिक रूप से सक्षमता आने पर ही महिलाये अपने सम्बन्ध मे निर्णय तो ले सकती है,और जाहीर है आर्थिक स्वतन्त्रता के लिए कार्यशील तो होना पड़ेगा ही, हा यह बात जरुर है की घर मे कार्य करने वाली महिलाओ को उसके एवज मे आर्थिक प्रतिफल प्राप्त नहीं होता, लेकिन काम की महत्ता उनकी भी कम नहीं होती,लेकिन चूँकि घरेलु महिला को परिवार मे वेतन या मंदी तो नहीं दिया जाता और यह उचित या अव्यवहारिक भी लगेगा लेकिन आपने जो मुद्दा उठाया है वह सोचनीय है,क्योकि भविष्य मे यदि घरुलू महिला के साथ उस परिवार मे ज्यादती या कोई अनहोनी होती है तब उस परिवार मे इतने दिनों तक किये गए श्रम का कोई मूल्य उसे नहीं मिलेगा बल्कि वह आर्थिक कठिनाई मे आ जाती है इसलिए घरेलु महिला को सीधे कोई वेतन मंदी भुगतान के बजाय पत्येक परिवार मे जो घरेलु महिलाये है उनके लिए एक पेंशन योजना बनी जा सकती है जिसमे सरकारी और उस परिवार की आधी आधी भागीदारी हो जैसा की निजी संस्थानों मे काम कर रहे कर्मचारियो लिए होता है.

neelima garg said...

Well, today,s homemakers are getting much more and sometimes don't understand the value of hard-earned money.Once u go out working ,lot many difficulties are there. At home u have to deal with only one man (husband) ,while outside u have to deal with so many .So what else they want........

Suresh Gupta said...

दिनेश जी ने कहा - "एक विवाहित स्त्री घर-परिवार के लिए जो कुछ करती है वह अमूल्य है। कौन उस का मूल्य आँक सकता है?"
इस के जवाब में सुजाता जी ने कहा कि दिनेश जी अमूल्य कहकर हम स्त्री के घर में खटने और खटते रहने का महिमामंडन ही कर रहे हैं.
किन स्त्रियों की बात कर रही हैं सुजाता जी और पुरुषों द्बारा जो बात भी स्त्रियों के पक्ष में कही जाती है उसे वह महिमामंडन क्यों कह देती हैं?

क्या घर में किए जा रहे काम का मूल्य लगाना उचित है? क्या बच्चे को दूध पिलाना भी इस श्रेणी में आएगा? और अगर आएगा तब एक अभी जन्मा बच्चा कैसे इस काम का मूल्य चुकायेगा? परिवार में जो सदस्य कमाते नहीं हैं, वह बेचारे कैसे अपने लिए किए जा रहे काम का मूल्य चुकायेंगे? कमाऊ बेटा माँ द्बारा किए गए काम का मूल्य चुकाकर क्या फ़िर उस की इज्ज़त कर पायेगा? गृहणी और कामवाली में क्या अन्तर रहेगा?

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...