Tuesday, June 24, 2008

गृहिणी को गृहकार्य का वेतन मिलना चाहिए।

पल्लवी त्रिवेदी द्वारा लिखा लेख क्या गृहिणी को गृहकार्य का वेतन मिलना चाहिए। पढ़ा।
मैंने इस विषय पर बहुत वर्षों से बहुत बार विचार किया है। प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहिए। यदि स्त्री नौकरी करती है तो यह स्वाभाविक रूप से हो जाता है। परन्तु यहाँ भी यदि वह ही घर संभालती है तो निश्चय ही उसका कार्य दोहरा हो जाता है और यदि पति भी बराबर का सहयोग दे तो गृहकार्य व वेतन का प्रश्न नहीं उठेगा।


जब स्त्री गृहिणी होती है तो उसके कई कारण हो सकते हैं,सदियों से चलती आ रही परम्परा,पति का कार्य ऐसा होना कि यदि पत्नी भी नौकरी करेगी तो घर का चलना असंभव होना(यह एक तथ्य है,चाहे यह स्त्री व पुरुष दोनों के प्रति अन्याय है,क्योंकि स्त्री आत्मनिर्भर होने से वंचित रह जाती है व पुरुष अति व्यस्तता के कारण आराम, मनोरंजन व परिवार के साथ समय बिताने से वंचित रह जाता है। एक और बात है,यदि ऐसी ही नौकरी स्त्री भी करे तो घर का क्या होगा? सो किसी के लिए भी केवल कार्य क्षेत्र के प्रति पूर्ण समर्पण व परिवार की ओर समय न देने वाली नौकरी किसी भी तरह सही नहीं है।),ऐसी जगह रहना जहाँ स्त्री के रोजगार के साधन ही न हों(हाँ,आज भी बहुत से संस्थान ऐसे हैं जो केवल पुरुषों को ही काम पर रखते हैं,जैसे बहुत से कारखाने) आदि। निश्चित रूप से गृहिणी के काम की कीमत किसी नौकर द्वारा घर के काम किये जाने से अधिक ही होती है। नौकर रखने की स्थिति में भी उससे सही ढंग से काम गृहिणी ही करवाती है। बच्चों का लालन पालन भी वही करती है। यह भी सच है कि यदि वह बाहर काम पर नहीं जाती तो आमतौर पर घर के बजट पर अधिक ध्यान देती है व किसी ना किसी प्रकार से पैसे बचाने के चक्कर में पड़ी रहती है। चाहे वह सस्ता सामान लाने के लिए अधिक मेहनत व सिरखपाई करनी हो,चाहे अधिक से अधिक चीजें घर में ही बनानी हो,चाहे बहुत सोच समझकर खर्चा करना हो। उसे लगता है कि बचत करना भी कमाई करने के बराबर है,या फिर बचत ही उसकी कमाई का एकमात्र साधन है। यदि वह घर में अचार डाल,पापड़ बना,स्वैटर बुन,कपड़े सिलकर,पुराने कपड़ों का नया उपयोग कर,घर में ही केक,मिठाई आइसक्रीम,नमकीन व घर की साजसज्जा का सामान आदि बनाकर,बच्चों को ट्यूशन के लिए ना भेज स्वयं उनको पढ़ाकर कुछ पैसे बचाती हूँ तो बस वही उसकी कमाई है,यह सोचती है। जब एक महिला घर से बाहर काम करती है तो स्वाभाविक है कि उससे इस प्रकार के कामों की आशा नहीं रखी जा सकती। उसका समय अमूल्य हो जाता है।


माना कि संसार में बच्चों को लाना,उनका लालन पालन करना,अच्छे व स्वस्थ मन व शरीर वाले बच्चे व परिवार किसी भी समाज के लिए आवश्यक हैं,परन्तु बहुत कम राष्ट्र इस कार्य के लिए घर चलाने वाले या वाली को पैसे देने को तैयार होंगे। अतः एक ही रास्ता बचता है कि यदि किसी परिवार में दंपत्ति में से केवल एक ही नौकरी करता हो या धन अर्जन करता हो तो घर की देखभाल करने वाले को आय का एक भाग दिया जा सकता है। यह भाग या तो आय का २० प्रतिशत हो सकता है या फिर घर के सारे खर्चे के बाद बचने वाली राशि का आधा हो सकता है। इस तरह से स्त्री भी महसूस करेगी कि उसकी भी कुछ जमा पूँजी है। यह एक तरह से परिवार के लाभ के लिए ही होगा। स्त्री का सशक्त होना परिवार के लिए ही लाभकारी होगा। दोनों बचत की पूँजी मिलाकर दोनों के नाम से मकान बनाने के लिए भी उपयोग कर सकते हैं। यदि दुर्भाग्य से विवाह टूटे तो भी स्त्री सड़क पर या मायके नहीं पहुँच जाएगी। यदि पति पत्नी दोनों नौकरी करें तब भी यदि वे अपनी आय का १० प्रतिशत भाग एक दूसरे के नाम जमा करें तो किसकी आय कम या अधिक है यह भावना नहीं पनपेगी।


जानती हूँ कि बहुत से लोग कहेंगे कि विवाह व प्रेम के बीच पैसा कहाँ से आ गया। समस्या यह है कि पैसे को कितनी भी हेय दृष्टि से देंखें तो भी उसके बिना काम नहीं चलता। कभी भी विपदा आ सकती है(रोग,नौकरी जाना,मनमुटाव,तलाक)। ऐसे में यदि दोनों अपने को आर्थिक रूप से समर्थ महसूस करें तो वे ऐसी कठिनाइयों का अधिक आसानी से सामना कर सकते हैं। अपनी आय को वे स्वतंत्रता से निवेश कर सकते हैं। आर्थिक रूप से निर्भर किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसी माँगें रखना कठिन है परन्तु समाज में यदि यह सोच एक बार चल निकले तो सबका ही लाभ होगा। यह माँग करना कुछ उतना ही कठिन है जितना निर्भर व्यक्ति के लिए कमाने वाले से यह कहना कि अपना जीवन बीमा करवा लो। यदि कमाने वाला स्वयं ही सूझबूझ रखकर अपने पर निर्भर लोगों के नाम बीमा करवाए तो सभी को सुविधा होती है।


विषय सोचने का है और समय गया है कि इस पर गम्भीरता से विचार किया जाए।


घुघूती बासूती

13 comments:

Anonymous said...

राष्ट्रीय आय में अदृश्य योगदान पर बहस नतीजे पर पहुँचे। मैंने सर्वप्रथम डॉ. देवकी जैन के लेख में इस विचार को पढ़ा था,अस्सी के दशक के शुरुआत में। घरेलू श्रम साध्य काम पुरुष भी करें।

डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी said...

uttam vichar hai.

pallavi trivedi said...

बहुत अच्छी बात कही आपने...दरअसल यह बिलकुल सही है की मैंने जो वेतन वाली बात कही वो अज के समय में मात्र एक कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं है, क्योकी इस पर बहस अभी प्रारम्भिक चरण में है और इसका क्रियान्वयन हमारे यहाँ तो असंभव ही है..इसलिए व्यवहारिक तौर पर जो काम किया जा सकता है उस पर विचार करना ज्यादा तर्कसंगत है! इस बात से मैं सहमत हूँ की गृहणी को भी आर्थिक रूप से स्वतंत्रता होनी चाहिए...इसके लिए रास्ते ढूंढें जा सकते हैं!मैंने कई ऐसी स्त्रियाँ देखि हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व अपने घर के लिए लगा दिया लेकिन जब पति ने यातना दी तो न मायके वालों ने और न ससुराल वालों ने साथ दिया!कुटुंब न्यायलय में भरण पोषण भत्ते के लिए चक्कर लगाते लगाते परेशान होती रही और अंत में कई तो मेरे पास यह फरियाद लेकर आई की मैं उन्हें कहीं किसी घर में काम पर लगवा दूं. इसलिए सम्मान तो अपनी जगह है ही लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता के बिना कोई सुरक्षा नहीं है!इसलिए इस मुद्दे पर गौर करना अत्यंत आवश्यक है...

सुजाता said...

. इसलिए सम्मान तो अपनी जगह है ही लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता के बिना कोई सुरक्षा नहीं है!

पल्लवी से सहमत !!

अनूप भार्गव said...

मैं घुघूति जी की बात से सहमत हूँ , आय का एक प्रतिशत नियत करने के बजाय घर में जो भी बचत हो , उस का आधा आधा करना अधिक उपयुक्त लगता है । इस में साझेदारी की भावना लगती है , श्रम के लिये वेतन की नहीं ।
यहां अमेरिका में ऐसे कुछ नियम/कानून हैं जो seperation के समय स्त्री (या non-working partner) के द्वारा किये गये श्रम या sacrifice को ध्यान में रखते हैं ।

Anonymous said...

"वृन्दावन और मथुरा मे ८ गौशाला हैं मन्दिर की आय से जिन्हे चलाया जाता है और जहाँ तक़रीबन ५००० गाय रहती हैं । ये गाय वो हैं जिनको उनके "मालिको " ने घरो से इसलिये निकल दिया क्योकि या तो इन गायो का दूध सुख गया था या फिर किसी वजह से ये अपंग हो गयी थी । इन्हे कसाई को नहीं बेचा जाता हैं और मरने का बाद इनको जमीन मे १ किलो नमक के साथ गाढ़ दिया जाता हैं । वृन्दावन और मथुरा मे जहाँ तक़रीबन ५००० विधवा और अपंग स्त्रियाँ मंदिरो मे रहती हैं । मन्दिर की आय से इनको १० रुपए रोज और आधा किलो चावल मिलते हैं । "

ये कथन हैं एक गाइड का जो हमे मथुरा वृन्दावन मे मिला था । इसके आगे क्या ........... ? वो लोग जीवन के आर्थिक पक्ष को भूलकर भावनात्मक सोच को अपनाना चाहते हैं एक फिर से सोचे और अपनी विचारो को यहाँ दे , मै , जो उस दिन जब ये वार्तालाप गाइड और मेरी माता जी के बीच चल रहा था मूक सुन रही थी आज तक बिल्कुल स्तब्ध और मूक हूँ । क्यों नहीं गृहणी को आर्थिक रूप से स्वतंत्र और संपन्न होना चाहिये , और होम मेकर का ये हश्र है तो अपनी संवेदनाओ को भूल कर अपनी आर्थिक क्षमताओं को बढ़ना ही नारी का मूल मंत्र हो , मेरी तो यही कामना हैं ।


ये बात २००८ , २५ जून की हैं , कोई सालो पुरानी कहानी नहीं हैं ।

अनूप भार्गव said...

रचना:

स्त्री को आर्थिक रूप से संपन्न होना चाहिये लेकिन ’घर के काम के लिये वेतन’ उस का सही तरीका नहीं है ।

यदि स्त्री को उस के काम का वेतन मिलना चाहिये तो फ़िर पुरुष को भी हर उस खर्च का मुआवज़ा मिले जो वह अपने ऊपर नहीं कर रहा है । बच्चे को बड़ा करने पर पर किया गया खर्च भी पारिवारिक जिम्मेवारी नहीं बल्कि एक loan की तरह लिया जाये जिसे बच्चा बड़ा होने पर चुकाये। पूरे परिवार में एक Legal Contract हो जिस से सब बाध्य हों और जो सब की सहमति से किया जाये । ये शायद संभव हो लेकिन क्या desirable है ?

परिवार को या तो आप एक इकाई की तरह देख सकते हैं या एक legal contract की तरह , दोनो को मिलाया नहीं जा सकता ।

मैं जब परिवार को इकाई की तरह लेता हूँ तब उस में परिवार की liabilities और assets दोनों में हर सदस्य का पूरा योगदान और पूरी ज़िम्मेदारी होगी ।

मेरी इस टिप्पणी को स्त्री के अधिकार को टालने की कोशिश न समझा जाय, यह सिर्फ़ ’पारिवारिक इकाई’ को बनाये रखने का प्रयास है । ’परिवार’ अपनी सम्पूर्ण खामियों के बावज़ूद आज भी सब से प्रभावशाली institution है और उसे बचाये रखने की हर कोशिश की जानी चाहिये ।

joint ownership of all major assets in the house is one way of alleviating fear of 'home maker' who do not work outside the home.
कोशिश इस बात की हो कि इस तरह का कानून बन सके जो स्त्री को यह अधिकार दे । विश्व में कई देश ऐसे हैं जहां इस तरह के कानून मौज़ूद हैं ।

Rachna Singh said...

anup bhargav

in india we all talk about "family values " "parivar" etc but in more than 50 % of indian homes old parents are on road literally , old woman who life long worked slogged as home makers are pushed arround at the fag end of life . they are forced to sell their property so that kids can buy new homes suitable for their needs . where are the family values we all keep ranting about no where . money is needed to survive and i dont advocarte salary for the house wife but i strongly advocate that all woman should work and earn money instead of merely running homes and feel cheated at the fag end of the life . if the lady is not working its should be mandatory to deposite a certain amount of money in her account which only she can withdraw something like PF . thse issues should be thought over as paalive said . AND i dont want a salary for the house wife I rather want woman to work outside the homes also and earn to meet the expenses because still the money belongs to the one who earns . if that would not have been true then the "woman " would not be told by the parents " apney ghar jaana to jo chaye karna " and by the inlaws " itna shauk haen to maayekae sae lae aatee "

अनूप भार्गव said...

हम शायद एक ही बात को अलग अलग शब्दों मे कह रहे हैं ।
अपनी सिर्फ़ एक बात को दोहराना चाह्ता हूँ :
’परिवार’ अपनी सम्पूर्ण खामियों के बावज़ूद आज भी सब से प्रभावशाली institution है और उसे बचाये रखने की हर कोशिश की जानी चाहिये ।’

rakhshanda said...

मैं आप से पोरी तरह सहमत हूँ,ये बिल्कुल सच है की पैसे को चाहे कितनी भी हेय दृष्टि से देखा जाए लेकिन ये सबको पता है की इसके बिना काम नही चलने वाला, पति या पत्नी कितना भी एक दूसरे को प्रेम करते हों, कभी कभी उनके बीच में पैसा ज़रूर आजाता है, चाहे वो हालात से मजबूर हो कर या किसी दूसरे कारन ,तब अहसास होता है की जज़्बात से आगे भी कोई चीज़ है . इसका सब से बेहतरीन हल यही है जो आपने सुझाया है.

Suresh Gupta said...

'पति और पत्नी दोनों को आर्थिक रूप से स्वतन्त्र होना चाहिए', इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. पर यह आर्थिक स्वतंत्रता किस प्रकार आएगी इस पर विचार होना चाहिए. यह विचार उन स्त्रियों के केस में जरूरी हो जाता है जिनकी अपनी कोई आय नहीं होती. लेकिन 'घर के काम के लिए वेतन' एक सही समाधान नहीं है. घर में तो सभी काम करते हैं. कुछ ज्यादा तो कुछ कम. पत्नी सबकी अपेक्षा ज्यादा काम करती है. सबको ही अपने काम का वेतन मिलना चाहिए. पर यह वेतन देगा कौन? अगर यह कहा जाता है कि पति वेतन देगा तब तो घर केवल उस का हो गया. घर में जो और सदस्य रहते हैं क्या वह घर का हिस्सा नहीं हैं? जो काम पत्नी करती है उस काम का वेतन पति देगा. चलिए सुबह की चाय की बात करें. जिस दिन पत्नी ने चाय बनाई उसका वेतन उसे पति ने दे दिया. जिस दिन किसी कारण वश उसने चाय नहीं बनाई उस दिन का वेतन उस सदस्य को मिलना चाहिए जो उस दिन चाय बनाएगा. वह पति हो सकता है, बेटा-बेटी हो सकते हैं, या कोई और. पत्नी क्या अपने लिए बनी चाय का वेतन देगी? यह मसला इतना आसान नहीं है.

अनामिका said...

यदि ऒरत को उसके घरेलू कामों के बदले वेतन दिया जायेगा तो घर के सदस्यों के काम करने से जो स्वाभाविक खुशी मिलती हॆ वह उससे छिन जायेगी। ऒर परिवार का सहज स्नेह व एक-दूसरे से भावनात्मक तॊर पर जुडे होने का अहसास कहीं खो जायग। क्या ऒरत के समर्पण का कोई मूल्य या वेतन हो सकता हॆ?ऒरत को निश्चित तॊर पर आत्मनिर्भर होना चाहिये पर उसका यह तरीका सही नहीं। हरेक ऒरत में कोई न कोई टॆलेंट जरूर होता हॆ अगर ध्यान दिया जाये तो उसे धन कमाने ऒर अपनी पहचान बनाने का जरिया बनाया जा सकता हॆ।

समयचक्र said...

sahamat hun. uttam vichar hai.

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