Friday, July 25, 2008

मौसियाँ / अनामिका

वे बारिश में धूप की तरह आती हैं–

थोड़े समय के लिए और अचानक हाथ के बुने स्वेटर,


इंद्रधनुष, तिल के लड्डू और सधोर की साड़ी लेकर वे आती हैं


झूला झुलाने पहली मितली की ख़बर पाकर और

गर्भ सहलाकर लेती हैं अन्तरिम रपट
गृहचक्र,

बिस्तर और खुदरा उदासियों की।
झाड़ती हैं जाले, संभालती हैं बक्से मेहनत से

सुलझाती हैं


भीतर तक उलझे बाल

कर देती हैं चोटी-पाटी और

डाँटती भी जाती हैं कि,


री पगली तूकिस धुन में रहती है
कि बालों की गाँठें भी तुझसे
ठीक से निकलती नहीं।

बालों के बहाने वे गाँठें सुलझाती हैं जीवन की

करती हैं परिहास,


सुनाती हैं किस्से और फिर हँसती-हँसाती
दबी-सधी आवाज़ में बताती जाती हैं–


चटनी-अचार-मूंगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध
चटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्खे

–सारी उन तकलीफ़ों के जिन पर

ध्यान भी नहीं जाता औरों का।

आँखों के नीचे धीरे-धीरे जिसके

पसर जाते हैं साये

और गर्भ से रिसते हैं


महीनों चुपचाप–
ख़ून के आँसू-से ,

चालीस के आसपास के अकेलेपन के उन

काले-कत्थई चकत्तों का

मौसियों के वैद्यक में एक ही इलाज है–



हँसी और काली पूजा और पूरे मोहल्ले की अम्मागिरी।


बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी
लेती गई खेत से कोड़कर
अपने जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें
–जैसे मौसीपन,
बुआपन, चाचीपंथी,अम्मागिरी
मग्न सारे भुवन की।



रचनाकार - अनामिका

मुजफ्फरपुर (बिहार), भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ :
गलत पते की चिट्ठी (कविता), बीजाक्षर (कविता), अनुष्टुप (कविता), वसंत को तुम्हारी जरूरत है(कविता)(२००४ ); दूब-धान / अनामिका

शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी में एम.ए., पी.एचडी.। अध्यापन- अँग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।

संपर्क : डी–।।/83, किदवई नगर वेस्ट, नई दिल्ली। दूरभाष : 011–24105588

ई मेल : anamika1961@yahoo.co.in

{कविता कोष से से साभार }

10 comments:

Ashok Pande said...

बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी
लेती गई खेत से कोड़कर
अपने जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें
–जैसे मौसीपन,
बुआपन, चाचीपंथी,अम्मागिरी
मग्न सारे भुवन की।

अजब विकट सत्य ...

मैं अवाक ...

बस इतना ही!

आभा said...

बालों के बहाने वे गाठें सुलझाती खुद जीवन से करती परिहास कितनी कितनी परते खोलतीहै कविता .... अनामिका जी जितनी सहज दिखती हैं उसी सहजता से अपनी बातें भी कहती हैं ..
डेड बरस हुए मिले देंखे कब भेट होती है .

seema gupta said...

"so nicely composed that i dont have words to appreciate, well done"

seema gupta said...

"so nicely composed that i dont have words to appreciate, well done"

डॉ .अनुराग said...

पगली तूकिस धुन में रहती है
कि बालों की गाँठें भी तुझसे
ठीक से निकलती नहीं।

बालों के बहाने वे गाँठें सुलझाती हैं जीवन की

करती हैं परिहास,

सुनाती हैं किस्से और फिर हँसती-हँसाती
दबी-सधी आवाज़ में बताती जाती हैं–

चटनी-अचार-मूंगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध
चटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्खे

–सारी उन तकलीफ़ों के जिन पर




मन मोह लिया है.....अनामिका जी ढेरो ढेरो साधुवाद.....उनकी लिखी कविताएं पहले भी पढ़ी है पर ये मुझे बहुत भायी है

शोभा said...

बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी
लेती गई खेत से कोड़कर
अपने जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें
–जैसे मौसीपन,
बुआपन, चाचीपंथी,अम्मागिरी
मग्न सारे भुवन की।
बहुत ही सुन्दर। वर्तमान समय में ये रिश्ते अपनी पहचान खो रहे हैं।

Suresh Gupta said...

एक आडिट की तैयारी के बीच पढ़ी आपकी की यह सुंदर रचना. मन कुछ देर के लिए अवाक रह गया. मौसी, बुआ, चाची, ताई भी बन सकती हैं किसी कविता की नायिकाएं. कितने सुंदर तरीके से आपने छू लिया है भारतीय परिवार के इस अनछुए पात्र को. वधाई और धन्यवाद हम्मरे साथ बांटने के लिए.

rakhshanda said...

महीनों चुपचाप–
ख़ून के आँसू-से ,

चालीस के आसपास के अकेलेपन के उन

काले-कत्थई चकत्तों का

मौसियों के वैद्यक में एक ही इलाज है–



हँसी और काली पूजा और पूरे मोहल्ले की अम्मागिरी।


बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी
लेती गई खेत से कोड़कर
अपने जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें
–जैसे मौसीपन,
बुआपन, चाचीपंथी,अम्मागिरी
मग्न सारे भुवन की।
दिल को बड़ी ही गहराई से छू लिया अनामिका जी आपने...कितनी देर बस सोचते रहने पर मजबूर कर दिया इस कविता ने...बड़ी ही सादगी से दिल के तारों को छेड़ती हुयी बेहद सुंदर कविता....बहुत बहुत शुक्रिया....

अनूप भार्गव said...

लावण्या जी:
एक बेहद सुन्दर कविता पढवाने के लिये धन्यवाद । अनमिका जी की कुछ कविताएं पहले पढी थी । अब एक बार फ़िर से उन्हें पढना होगा ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आप सभी का शुक्रिया !
अनामिका जी की कविता,
पसँद करने के लिये ..
जिसे पढते ही ये मुझे भी बहुत प्रभावित कर गयी थी !
- लावण्या

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