Tuesday, July 1, 2008

वैधव्य : यह भी संघर्ष ......

दीपा मेहता की फिल्म वॉटर जो आने से पहले ही विवादों मे घिर गयी थी , वारानसी के आश्रम मे रहने वाली विधवाओं के जीवन की कहानी कहती है । फिल्म का देश -काल ब्रिटिशकालीन भारत है । कईं दशाब्दियाँ बीत चुकी हैं । लेकिन मेट्रो शहरों को अपवाद मान लिया जाए तो अब भी कमोबेश हालात ऐसे ही हैं ।मेट्रो शहरों में भी अकेली रहने वाली महिलाओं के लिए कितनी सुविधा और आज़ादी छोड़िये कितना सम्मान है , यह भी शोध करने लायक विषय है ।और दरअसल बात शहर और गाँव की भी नही है , उस मानसिकता की है जिसके चलते विधवा होने पर स्त्री दुनिया का वह क्रूर चेहरा देखती है जो शायद ही उसने पहले कभी देखा हो । सम्पत्ति , घर , ज़मीन उससे छिनने को होते हैं । अशिक्षित हो तो उसकी लड़ाई और भी ज़्यादा कष्टपूर्ण हो जाती है ।


मन्जुला सुद लेसीस्टर शहेर की लोर्ड मेयर हैँ - उन्होने पहल करते हुए ऐलान किया है कि भारत मेँ और अन्य उभरते देशोँ मेँ, विधवाओँ को सँरक्षण और सहायता शीघ्रातीत मिलना जरुरी है - डी मोन्टफर्ट युनिवर्सिटी के प्राँगण में , कयी रँगबिरँगी गुब्बारे , आशा के प्रतीक जैसे, खुले आसमान मैं छोडते हुए, लुम्बा ट्रस्ट के प्रवधान मेँ इस घोषणा को जारी किया गया ।


ये घोषणा अन्तराष्ट्रीय विधवा दिवस को की गयी ! क्या आप जानते थे , ऐसा भी कोई दिवस होता है ? लन्दन के त्रफालगर स्क्वायर में , इसे समारोह का दर्जा हासिल हुआ है -


मंजुला जी सन १९९६ से विधवा जीवन जी रही हैं। उनका कहना था के, " आज का दिन , मेरे लिए भावुकता से भरा भरा है ! मैं जानती हूँ, अपने स्वयं के अनुभवों से , किन, मुश्किलों से जीकर , आगे बढ़ना पङता है ! लन्दन जैसे देशों में, विधवाओं को, सहायता मिल भी जाती है - परन्तु कई विकासशील देशों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है - आज ये समय आ गया है जब हम आगे बढ़कर, ऐसी जरूरतमंद महिलाओं की सहायता करें " -


लुम्बा ट्रस्ट, ऐसी ही कई विधवाओं की संतानों की सहायता करता है। उन्हें किस तरह शिक्षा प्राप्ति के लिए मार्ग और दिशा का चुनाव करना चाहीये के जिससे आगे का भविष्य सुगम बने ऐसी बातों को सीखालाया जाता है - १९९७ से इस ट्रस्ट की स्थापना हुई और सन २००५ को इसी के सौजन्य से " अन्तराष्ट्रीय विधवा दिवस " का आयोजन ग्रेट ब्रिटेन के प्रधान मंत्री की पत्नी श्रीमती चेरी ब्लेयर ने इसका बाकायदा विमोचन किया था।


श्रीमान राज लुम्बा इसके संयोजक और निर्माता हैं। उनहोंने कहा के, " ये लन्दन के बाहर आयोजित पहला समारोह है जिसे अंतराष्टीय ख्याति प्राप्त हो रही है ! खुशी है , लोग जुड़ रहे हैं, सहायता कर रहे हैं और हम आगे दूसरों को मदद कराने में सफल हो रहे हैं ! लाखों विधवा समूह जिनके परिवार शिक्षा और अन्य सहायता से वंचित थे, आज उनको सहाय करने में हमारी पहल कामयाब हो रही है - कई दुखों को हम भूला रहे हैं ! "


भारत के कई सारे युवाओं को लुम्बा ट्रस्ट के तहत, मोंत्फार्ट यूनिवर्सिटी में कालिज की शिक्षा प्राप्ति मिले इसकी भी योजनाएं बन रहीं हैं ।


डेविड ऐस्च , जो उप कुलपति हैं उन्होंने कहा , " जिन्हें आज से पहले , ऐसी , सहायता नहीं मिलीं वैसे बच्चों को लुम्बा ट्रस्ट सहायता कर रहा है ! शिक्षण मिलने पे यही बच्चे अपने परिवारों का भविष्य संवारने में सफल होंगें ..जिस से , गरीबी की चक्रवाती प्रथा का नाश और स्तम्भन होगा !"

राजस्थान में भी एकल नारी संगठन इस दिशा मे पहल कर रहा है । और सही भी है कि समाजिक पहल , शिक्षा और स्वावलम्बन ही इन स्थितियों मे सुधार हो सकेगा ।



-- लावण्या






11 comments:

Sajeev said...

सही प्रयास

Satyendra PS said...

ढेर सारी समस्याएं हैं और संकटों का अंबार है। लोग अपना दुख झेल लेते हैं और उस सार्वजनिक समस्या को वहीं का वहीं छोड़ देते हैं। लेकिन यह तो एक सकारात्मक कोशिश है, जिसके लिए वह साधुवाद की पात्र हैं।
सत्येन्द्र

डॉ .अनुराग said...

saahmat hun aapse .dhero sadhuvaad....

Ashok Pande said...

राज लुम्बा साहब को इस कार्य के लिये और आपको उनके इस कार्य को यहां दर्शाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

ghughutibasuti said...

एक महत्वपूर्ण विषय पर किया गया अच्छा प्रयास । परन्तु सबसे अधिक आवश्यकता वैधव्य को एक अभिशाप मानने की मानसिकता को दूर करने की है।
घुघूती बासूती

अनूप भार्गव said...

घुघूती जी के बात से सहमत हूँ , "वैधव्य को एक अभिशाप मानने की मानसिकता को दूर करने की है" | वैधय्व सिर्फ़ एक दुर्घटना है , अपराध नहीं है । इस मानसिकता को दूर करने में स्त्री को भी अपनी
लड़ाई लड़नी होगी, सिर्फ़ समाज के बदलने का इंतज़ार काफ़ी नहीं है । शिक्षा, स्वावलंबन और आत्मविश्वास (जो कि तीनो आपस में जुड़े हुए हैं) इस में सहायक होंगे।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आप सभी की बातोँ के लिये,
आपके विचारोँ के लिये,
आपका बहुत बहुत धन्यवाद !
वैधव्य को श्राप गिनने
जानेवाली मानसिकता ,
पितृसतात्मक, पुरुषवादी समाज के फैले विस्तार से उपजी सच्चाई है !-
जिससे २१ वीँ सदी मेँ,
इस तरह लडने की ,
ये एक पहल है.
भारत मेँ इस मानसिकता को ,
बदलना ,
बहुत जुरुरी है --
जहाँ एक सुहागिन स्त्री के शृँगार को २४ घँटे हर दूरसँचार के माध्यम से दर्शाया जाता है
- आवश्यकता है, हर विधवा, अशिक्षित, शोषित, पीडीत तबक्के के इन्सानोँ की और खास करके अनाथ, अपँग, बच्चोँ और विधवाओँ और स्त्रीयोँ की सहायता करने की...
जिन्हेँ,
सबसे ज्यादा जरुरत है -
हम, पहल वहीँ से करे !
हमारे रीश्तेदार
और परिवार
या आसपास की,
ऐसी स्त्रीयोँ को,
सम्मान देँ और सामाजिक और धार्मिक उत्सवोँ मेँ उन्हेँ भी साथ रखेँ - उनकी स्थिती के लिये वे दोषी नहीँ हैँ -
कमसेकम ये शुरुआत होगी, सँघर्ष कठिन है और सफर लम्बा है ये तो हम सभी जानते हैँ --
- लावण्या

pallavi trivedi said...

bahut achcha mudda hai lekin doosron se sahayta ki aasha kab tak karenge...iska ek hi upaay hai ki har ladki ko bachpan se hi bataya jaaye ki use aatmnirbhar banna hi hai...tab jaakar kam se kam aarthik roop se to kisi par nirbhar nahi rahna padega.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Pallavi ji,
aapka sujhav sahee hai -
atma nirbhata ke sath sath , mata aur pita ka ye bhee uttardayitva banta hai ki, apni kanya ko ye bhee seekhlaye ki, badee hoker , aatma nirbhar banne ke sath use ek achchee patnee, achchee maa bhee nanna jaroori hai - all round personality development ke liye -
kaam karnewalee her stree ke liye ek bahut badee challange hotee hai, Ghar aur bahar apne kaam ko bhee samhalne ki - kyunki, aksar GHAR per , Ladke ya Pati kaam karein ye , dekhna , sahaj najee bana ab tak -
Isliye Ladkon ko bhee Raj Kumar ki tarah nahee, Ghar ke karya mei madad karna sahaj ye baat sikhna jaroori hai --
Shayad, GHAR se hee ye sare sudhar shuru hote hain -
Government , ya samaj = Socirty aur Kanoon to baad ki baatein hain !
- lavanya

Suresh Gupta said...

आप की बात बिल्कुल सही है - आवश्यकता है, हर विधवा, अशिक्षित, शोषित, पीड़ित तबके के इन्सानोँ की और खास करके अनाथ, अपँग, बच्चोँ और विधवाओँ और स्त्रीयोँ की सहायता करने की. इस दिशा में जो भी प्रयत्नरत है उन सबको वधाई और धन्यवाद.

बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा said...

वैधय्व सिर्फ़ एक दुर्घटना है , अपराध नहीं है. आप की बात बिल्कुल सही है.

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