Wednesday, July 2, 2008

परिन्दे का चहचहाना ही मेरा जनमदिन है

सारा शगुफ़्ता एक पाकिस्तानी शायरा थीं जिन्होंने १९८० के दशक के शुरू के सालों में बहुत कम आयु में आत्महत्या कर ली थी. कविता की ऊष्मा को एक स्त्री के नितान्त निजी अनुभवों में गूंथ कर उन्होंने तत्कालीन उर्दू कविता की सारी पारम्परिक नियमावलियों को नज़र अन्दाज़ कर दिया. सदियों से औरत को दबाती आई सामाजिक रूढ़ियों के प्रति उनके भीतर जो गुस्सा था, उसे उन्होंने अपनी कविता का हिस्सा बनाया. 'आंखें' शीर्षक उनका एक संग्रह प्रकाशित हुआ. इस किताब में उन्होंने एक पत्रनुमा कविता में इस गुस्से को यूं व्यक्त किया था

मुझे १०५ डिग्री बुख़ार था
मैंने बस पकड़ी और घर चली आई
मेरी छातियां बस उमड़ने को ही थीं
मैंने दूध का एक गिलास भरा और मेज़ पर रख दिया
फिर कवि और बाक़ी के लेखक आए
मैंने कवि से कहा: मैंने एक बेटा जना लेकिन वह मर गया है"
उसने बेपरवाही से मेरी बात सुनी और बाक़ी लोगों को बताया.
कमरे में दो मिनट ख़ामोशी रही
फ़्रायड के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?
रिम्बॉ क्या कहता है?
क्या कह गया है सादी?
वारिस शाह था सबसे महान.
मुझे ये अलफ़ाज़ रोज़ सुनने को मिलते थे
लेकिन आज सब साफ़ हो गया.
मानो ये सारे महान लोग एक पल को थम गए थे मेरे ख़ून में.
मानो फ़्रायड और रिम्बॉ मेरे गर्भ से छीन रहे थे मेरे बच्चे को.
उस दिन ज्ञान पहली बार मेरे घर घुसा था
और चिल्लाता हुआ हंस रहा था मेरे ख़ून में
ज़रा देखो तो मेरे बच्चे का जनम !

यहां यह बताना भी मौजूं होगा कि एक और शानदार पाकिस्तानी कवयित्री परवीन शाकिर ने सारा शगुफ़्ता की मौत पर एक कविता 'टोमैटो कैचप' लिखी थी.इन्हीं सारा शगुफ़्ता की एक नज़्मपढ़िये:

परिन्दे की आंख खुल जाती है

किसी परिन्दे की रात पेड़ पर फड़फड़ाती है
रात, पेड़ और परिन्दा
अंधेरे के ये तीनों राही
एक सीध में आकर खड़े होते हैं
रात अंधेरे में फ़ंस जाती है
रात तूने मेरी छांव क्या की!
जंगल छोटा है
इसलिये तुम्हें गहरी लग रही हूं
गहरी तो मैं परिन्दे के सो जाने से हुई थी
मैं रोज़ परिन्दे को दिलासा देने के बाद
अपनी कमान की तरफ़ लौट जाती हूं
तेरी कमान क्या सुबह है
मैं जब मरी तो मेरा नाम रात रख दिया गया
अब मेरा नाम फ़ासला है
तेरा दूसरा जनम कब होगा
जब ये परिन्दा बेदार होगा
परिन्दे का चहचहाना ही मेरा जनमदिन है
फ़ासला और पेड़ हाथ मिलाते हैं
और परिन्दे की आंख खुल जाती है


सारा के जीवन पर लिखे गए एक नाटक के बारे में यहां देखें:दानिश इक़बाल का ताज़ा नाटक सारा शगुफ़्ता की ज़िंदगी पर

5 comments:

Neelima said...

कविताऎ दिल को छूती हैं ! पढवाने के लिए धन्यवाद !

Neelima said...

कविताऎ दिल को छूती हैं ! पढवाने के लिए धन्यवाद !

Suresh Gupta said...

"परिन्दे का चहचहाना ही मेरा जनमदिन है", वाह क्या बात कही है. दोनों रचनाएं बहुत ही प्यारी हैं.

Satyendra PS said...

सुजाता जी,
मेरे ब्लाग पर आने के लिए आभार। सामान्यतया मैं उन्हीं के ब्लॉग पर जाता हूं जो मेरे ब्लॉग पर आते हैं। संभव है कि आपके किसी सदस्य ने मेरे ब्लॉग पर कमेंट दिया हो।
हां, इतना जरूर है कि मैं उसके ब्लॉग पर जाता हूं तो जो कुछ भी कू़ड़ा कबाड़ या बेहतर लिखा हो, उसे पढ़ता हूं और प्रतिक्रिया देता हूं। उसमें मेरा कोई स्वार्थ भी नहीं होता कि कोई हाई प्रोफाइल है या लो प्रोफाइल। केवल आभार जताने के लिए टिप्पणी नहीं करता।
शुभकामनाओं सहित,
सत्येन्द्र

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

achi kavita padhvane ke liye shukriya

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