Friday, July 4, 2008

यूँ हुआ घरेलू श्रम का अवमूल्यन : मार्क्सवाद और उससे आगे

जब पल्लवी ने घरेलू कामों के मूल्य की बात उठाई तो बहुतों को अटपटा लगा । चोखेर बालियों को क्या हो गया है ? हर बात को नकारात्मक ढंग से क्यों देखा जा रहा है ? बच्चे को दूध पिलाने की भी कीमत होगी अब ? घर में पुरुष भी काम करते हैं ! पत्नी और कामवाली मे क्या फर्क है ? वगैरह - वगैरह !
अनुराधा जी ने कहा - परिवार के सभी साझा काम साझे तरीके से हों और आपसी सहमति से निर्णय लिये जाएँ
{बशर्ते कि सहमति दबाव तहत न बनवाई गयी हो }।
कमोबेश इसी तरह की सहभागिता की बात घुघुती जी ने भी कही ।
ये वाकई आदर्श स्थितियाँ हैं ।
ज़्यादतर टिप्पणियाँ करने वाले भी इस से सहमत हैं । वेतन की बात से किसी की सहमति नही है । लेकिन घरेलू कार्यों का भी मूल्य है यह स्वीकार करते ही हमें घर के कामों की व्यर्थता और घर के काम करने वाला व्यर्थ दिखाई देना बन्द हो जाएगा।
अब तक हुई चर्चा के निष्कर्ष देने का मेरा इरादा इरादा नही है । जो निष्कर्ष पहले ही दिये जा चुके उसमें मेरी सहमति भी है । पर मुझे लगता है कि कारणों तक पहुँचना बहुत ज़रूरी है ।


मेरे सामने प्रश्न उठ रहे हैं कि घरेलू कार्यों का अवमूल्यन कैसे हुआ और स्त्री के द्वारा घर में किये कामों का कही कोई खाता क्यों नही है ?

अगर मैं मार्क्सवादी दृष्टि से सोचना शुरु करूँ तो समग्र मानव समाज की व्यवस्था को उत्पादन और श्रम की शब्दावलियों में सबसे पहले समझना होगा ।एंगेल्स के अनुसार पितृसत्ता का जन्म उत्पादन व उत्पादन के साधनों पर पुरुष के नियंत्रण के साथ शुरु होता है ।

मानव समाज की शुरुआत एक साम्यवादी समाजिक व्यव्स्था से हुई ।और इस साम्यवादी व्यवस्था में स्त्री-पुरुष के रिश्ते “प्राकृति के स्वाभाविक विकास के रूप में पवित्र और सरल थे ”।पुरुष शिकार करते , भोजन के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते और इन कामों के लिए ज़रूरी उपकरण तैयार करते । स्त्री के साथ स्थिति दूसरी थी । प्रकृति ने उसे मातृत्व का भार दिया था । शिशु के जन्म से पहले और बाद के काफी समय वह निष्क्रिय हो जाती । इसलिए शिशु की देखभाल और घर का दायित्व उसके पास आ गया ।पर सब कुछ साझा था ।काम भी और उत्पादन भी । आप कहेंगे कि फिर दिक्कत क्या है ? अगर हम इसे स्वाभाविक् , और प्राकृतिक श्रम -विभाजन मान रहे हैं व स्त्री-पुरुष के रिश्ते का पवित्र विकास कह रहे हैं तो फिर किस बात की बहस ?लेकिन इस रिश्ते का एक पहलू और था ।यह वह समय था जब स्त्री घर में नियंता थी ।यौन सम्बन्ध अपेक्षाकृत अधिक उन्मुक्त थे । पुरुष निर्भरता नही थी बल्कि पुरुष केवल अतिथि के रूप में घर में रहते थे और अवांछित होने पर उन्हें घर से जाना होता था ।

तो समस्या वहाँ शुरु होती है जब मानव समुदाय एक ही स्थान पर दीर्घ समय के लिए रहने लगे खेती करने लगे और पशुपालन करने लगे और सरप्लस पैदा हुआ । यहाँ से शुरुआत होती है निजी सम्पत्ति की अवधारणा की ।और समाज की संरचना बदल गयी । उत्पादन और उत्पादन के साधनों पर लड़ाइयाँ होने लगी ।और लड़ाई में हारने वालों को विजेता के अधीन हो जाना पड़ा ।यह वह विभाजन था जिसे एंगेल्स ने समाज का सबसे पहला और बड़ा वर्ग -विभाजन कहा है । प्रजनन भी उत्पादन ही था , रीप्रोडक्शन , सो उस पर भी पुरुष ने नियंत्रण कायम किया ।
सम्पत्ति बढी , जो उत्पादन का नतीजा थी , और उत्पादन पूरी तरह से पुरुष के अधिकार में था सो समाज के केन्द्र में उत्पादन एक महत्वपूर्ण कार्य हो गया और घरेलू कार्य क्षेत्र जहाँ स्त्रियों का महत्व था , उसने अपना महत्व खो दिया । उसे एक निजी श्रम मान लिया गया और पत्नियाँ सबसे पहली घरेलू श्रमिक बना दी गयीं जिन्हे सामाजिक जीवन में भागीदारिता से वंचित कर दिया गया ।यह फीमेल सेक्स की ऐतिहासिक हार थी । सो घरेलू श्रम का अवमूल्यन हो गया । निजी सम्पत्ति में पशु, ज़मीन और नौकर तो थे ही जल्द ही स्त्रियाँ भी इसमें शामिल कर लीं गयीं ।

तो एंगेल्स की दृष्टि से देखें तो स्त्री की मुक्ति तभी सम्भव है जब वह बड़े स्तर पर समाजिक उत्पादन का हिस्सा बनें और घरेलू काम की ज़िम्मेदारी न्यूनतम हो ।
लेकिन स्त्री की मुक्ति सिर्फ इतने भर से नही हो जाती और स्त्री की मातहती सिर्फ यहीं तक सीमित नही रहती । बाद की फेमिनिस्ट आलोचनाओं में कहा गया कि पितृसता का आरम्भ उत्पादन पर नियंत्रण से नही बल्कि संतानोत्पादन पर , या कहें स्त्री की कोख और उसकी यौनिकता पर नियंत्रण से होता है । यह निजी सम्पत्ति की अवधारणा से भी पूर्व हो गया था ।
लेकिन उत्पादन या प्रजनन को स्त्री के मातहतीकरण के लिए अलग अलग ज़िम्मेदार नही ठहराया जा सकता । उत्पादन और प्रजनन साथ साथ पुरुष वर्चस्व को सुनिश्चित करते रहे ।
जूलियेट मिशेल इसे चार स्तरों पर घटित होता हुआ देखती हैं –उत्पादन , प्रजनन , सामाजीकरण ,यौनिकता ।समाजीकरण में वे सभी बातें आती हैं जिन्हें अपनी संतान को दुनिया की ज़रूरतों के लिए उपयुक्त बनाने के लिए ध्यान में रखा जाता है । इसे ही मैं जेंडरिंग कहना चाहूंगी । जेंडर रोल्स के मुताबिक बच्चों को पाला-पोसा जाने लगा । स्त्री की यौनिकता और उसकी कोख पर पुरुष नियंत्रण के लिए तरह तरह के मिथक और समाजिक परम्पराएँ गढी गयीं । विवाह ऐसी ही संस्था थी । कौमार्य ऐसी ही अवधारणा है । जो एंश्योर करती हैं कि पुरुष की सम्पत्ति का वारिस उसी की अपनी संतान हो ।पुरुष निर्भरता बढती गयी । सम्पत्ति , दास , उत्पादन , परिवार और पत्नी पुरुष के लिए थी और पत्नी के लिए केवल प्रजनन और संतान पालन ।
इन्हीं चारों स्तरों पर एकजुट रूप में स्त्री की मातहती सुनिश्चित होती है । अत: मिशेल का मानना है कि स्त्री की मुक्ति तभी सम्भव है जब इन चारों स्तरों पर एक साथ बदलाव आए । किसी एक स्तर पर बदलाव आने से बात नही बनेगी ।इससे केवल किसी दूसरे स्तर पर शोषण को बल मिलेगा ।
इस पर आगे कभी और विस्तार से बात होगी । फिलहाल यह महत्वपूर्ण है कि घरेलू श्रम के "मूल्य " का प्रश्न व्यर्थ का प्रशन नही है न ही यह बात इतनी सरल है जितनी की समझी जा रही है ।इस बहस को हम उपरोक्त सन्दर्भ में देखने लगें तो पायेंगे कि स्त्री के घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्य क्या है यह मानना और उसे प्रोडक्टिव काम की मान्यता देना कितना ज़रूरी है ।यहीं समाजीकरण , जेन्डरिंग और देह मुक्ति के और सवाल भी जुड़ते हैं ।

सुजाता

14 comments:

अनुराग अन्वेषी said...

बेशक, अधिकतर मर्द की निगाह में घर के काम की कोई कीमत नहीं (यहां कीमत का संबंध पैसे से नहीं, बल्कि महत्व देने से है)। दरअसल, पुरुष प्रधान भारतीय समाज की निगाह में अब उसी काम की कोई कीमत होती है, जिसके किये जाने से आर्थिक लाभ हो। यह समाज मानता है कि जहां प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं, वैसे किसी भी काम की कोई कीमत नहीं हो सकती। इस समाज को अपनी यह दृष्टि बदलनी चाहिए।

पर एक और स्थिति भी दिखती है। इस समाज के कई पुरुष ऐसे कई काम करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप में आर्थिक लाभ नहीं पहुंचाते। बल्कि वह सामाजिक संबंधों को मजबूत करते हैं। अपने इर्द-गिर्द एक समाज बुनते हैं, जो 'उनके (पुरुष के) घर-परिवार' को सुरक्षा देता है। ऐसे कामों में पुरुष जब ज्यादा उलझता है, तो उसे अपने घर से ही नसीहत मिलती है - क्या बेकार के कामों में उलझे रहते हो।

ऐसी स्थिति में पुरुष अपने पक्ष में हजार तर्क गढ़ता है, जैसे घरेलू कामों के संदर्भ में महिलाएं। पर दुखद यह है कि दोनों मिलकर एक-दूसरे के लिए न तर्क गढ़ते हैं, न तर्क तलाशते हैं। ऐसी ही स्थितियों के कारण 'नर्क' बनता है। जिसे भोगते हुए हम बिलबिलाते हैं, छटपटाते हैं।

सचमुच, जब तक हम एक-दूसरे के प्रति और एक-दूसरे के काम के प्रति सम्मान की निगाह नहीं रखेंगे, नर्क की आग हमें झुलसाती रहेगी।

स्वप्नदर्शी said...

I agree that this is a serious bussiness and wanted to write my own experiences in light of my predecessors. But we are in a process to relocating and winding up "our Grihasthi" from a settlement of 10 years. So lets see when I get some time.

I think this is a good start of this issue but needs to go long way.
Also in the primitive societies the role of father in reproduction remained unkown for a long time.
and father was not considered as blood relative and kin.

Suyash Suprabh said...

आपने घरेलू श्रम का बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सदियों से होते आए भेदभाव को नारी की नियति मान लिया जाता है। हजारों वर्ष पहले हालात कुछ और थे। अब नारी उत्पादन की तमाम गतिविधियों में अपनी उपस्थिति दिखा चुकी है। घर का श्रम जब जंजीर बनने लगे तब नारी के लिए यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि वो ऐसे विकल्पों की तलाश करे जो उसके विकास में सहायक हों। उन विकल्पों की तलाश करना आसान नहीं है। पुरुषों को अपनी आदतें बदलने पर मजबूर करना भी एक विकल्प हो सकता है। अगर कोई पुरुष यह कहे कि सुबह दो घंटे बिस्तर पर अखबार पढ़े उसे चैन नहीं मिलता है, तो इसे उसकी "मासूम" आदत मान लेना बेवकूफी होगी। ऐसी कई आदतें हैं जिनकी जड़ें निजी संपत्ति के अस्तित्व में आने के बाद के पुरुषवादी समाज में मिलेंगीं। नारियों को भी यह समझना होगा कि उनकी "घरेलू" आदतों और रुचियों में मानव इतिहास अपनी भूमिका निभा रहा होता है। क्या नारियों को "घरेलू" और पुरुषों को "कामकाजी" कहना स्वाभाविक है?

अनूप भार्गव said...

सुजाता :
अच्छा विश्लेषण है लेकिन कुछ बाते समझ नहीं आईं जैसे :
"प्रजनन भी उत्पादन ही था , रीप्रोडक्शन , सो उस पर भी पुरुष ने नियंत्रण कायम किया । "
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"पितृसता का आरम्भ उत्पादन पर नियंत्रण से नही बल्कि संतानोत्पादन पर , या कहें स्त्री की कोख और उसकी यौनिकता पर नियंत्रण से होता है"
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"स्त्री की यौनिकता और उसकी कोख पर पुरुष नियंत्रण के लिए तरह तरह के मिथक और समाजिक परम्पराएँ गढी गयीं । विवाह ऐसी ही संस्था थी"
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इन सब मुद्दो के अलावा इस बात पर भी चर्चा हो कि पुरुष और नारी में ऐसा क्या अन्तर है कि उस ने ’पुरुष’ को ’नारी’ को exploit करने का अवसर दिया और इस विषय में क्या किया जा सकता था और क्या होना चाहिये ?

Unknown said...

घरेलू काम का अपना मूल्य है. उसका अपना महत्त्व है. इस काम को पैसों पर नापना, उसके पीछे जो भावना है उसे और उसके महत्त्व को कम करना है. घर और फेक्ट्री में अन्तर होता है. फेक्ट्री में श्रम का मूल्य जिस प्रकार आँका जाता है और जिस प्रकार दिया जाता है, वह मापदंड अगर घर के कामों पर भी लगा दिए गए तो घर फेक्ट्री बन जायेंगे. इससे किसी को फायदा नहीं होगा? मार्क्सवाद को घर से दूर रखा जाय तो ही अच्छा होगा.

जितेन्द़ भगत said...

Anup Bhargav ji ke sawaloon ka jawab ANGLES ki kitaab-" pariwaar, niji sampatti aur rajya ki utpatti " mein hai. must read.

सुजाता said...

अनूप जी , देरी से उत्तर के लिए क्षमा । ज़रा व्य्सत थी ।
आपकी पूछी गयीं बातें पोस्ट को दोबारा पढने पर अधिक स्पष्ट हो जायेंगी ।
फिर भी , तीनों बातों का स्पष्टीकरण एक साथ , क्योंकि सभी परस्पर सम्बद्ध्ह हैं -
एंगेल्स की दृष्टि से देखें तो पुरुष ने हर प्रकार के उत्पादन और उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा किया ।सरप्लस पैदा होने पर वह अपनी सम्पत्ति को संग्रहित करने लगा और इस सम्पत्ति के लिए लड़ाइयाँ भी होने लगीं ।सम्पत्ति बाद में किसे मिलेगी ,ज़ाहिर है वह अपनी संतान को देना चाहेगा । ऐसे में बहुत ज़रूरी था कि पुरुष अपने ही खून को अपनी सम्पत्ति का वारिस बनाए ।लेकिन अपेक्षाकृत उन्मुक्त यौन सम्बन्धों से इसमें शंका थी कि वारिस अपना ही खून हो ।संतान पर नियंत्रण के लिए उसके उत्पादन के साधन यानी स्त्री को कब्ज़े मे लिया गया । सो स्त्री की यौनिकता यानी उसके सवतंत्र यौनाचरण पर पुरुष ने अंकुश लगाया जिससे सुनिश्चित हो जाए कि संतान उसी अकेले पुरुष की है ।इसमें शादी कारगर उपाय साबित हुई ।
लेकिन मिशेल इस सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहती हैं कि यह सिर्फ उत्पादन और प्रजनन पर पुरुष के नियंत्रण से पितृसत्ता काम नही करती । वह चार स्तरों पर एक साथ काम करती है । उत्पादन और उत्पादन के साधनों पर अधिकार करना , फिर इन्हीं बातों की पुष्टि के लिए तरह तरह के मिथक और परम्पराएँ बनाई गयीं । विवाह , स्त्री का एक पतिव्रता होना , कौमार्य की अवधारणा से भी अपनी सम्पत्ति के वारिस के बारे में आश्वासन मिलता है साथ ही स्त्री की आज़ादी नियंत्रित होती है । समाजीकरण के तहत ही जेंडरिंग आती है । जो बच्चों को बचपन से सिखाती है कि स्त्री को कैसे रहना है और उससे समाज की क्या अपेक्षाएँ हैं , और पुरुष को कैसे रहना है उससे समाज की क्या अपेक्षाएँ हैं ?
यानी कि जेंडरिंग और स्माजीकरण और हमारी परम्पराएँ ...इतनी निर्दोष नहीं जितनी हम समझ्ते रहे हैं ........यह सब स्त्री को सदैव के लिए पुरुष के अधीन रखने के लिए बनाए गये कुचक्र थे । कुल मिलाकर यह कि -स्त्री के लिए विवाह अनिवार्यता है , स्त्री विवाह से पहले कुंवारी हो , विवाह के बाद अन्य से संसर्ग न करे , अपनी यौन इच्छाओं का इज़हार न करे ,समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप ढले , परम्पराओं का पालन करे .......यह सभी कुछ केवल उस प्राणी पर कब्ज़े के लिए है जिसके बल पर पुरुष समाज का केन्द्रीय पात्र बनता है ।
प्रश्न करने वाले यह भी करते हैं कि ये सब दलीलें इस लिए दी जा रही हैं किस स्त्री अंतत: यौन स्वतंत्रता चाहती है ? यही उसकी मुक्ति है !!देह की मुक्ति !! मन की मुक्ति ! आत्मा की मुक्ति ! बेशक !! सब कुछ देह से ही तो जुडा है ! यहीं से तो शुरुआत होती है ।
ये सभी प्रश्न आज उठाए जा रहे हैं । जवाब ढूंढे जा रहे हैं । फिलहाल इस पोस्ट के मायने ये कि
{1}घरेलू श्रम भी उत्पादन की श्रेणी में आता है ।
{2}उसकी भी कीमत होती है ।
{3}घर में काम करना किसी स्त्री की नियति नही है ।
{4}कीमत रिकगनीशन के अर्थ में दी जानी चाहिये।
{5}स्त्री को अपने सामाजिक महत्व की पुन: प्राप्ति के लिए घर से बाहर निकल सामाजिक उत्पादन में अपनी भागीदारिता निभानी चाहिये ।
{6}स्त्री को स्वावलम्बी होना होगा ।अनिवार्य रूप से लड़कियों को रोज़गारोन्मुखी नज़रिये से पालना -पोसना होगा ।
{7}स्थितियाँ बदलनी हैं तो चारों स्तरों पर एक साथ करना होगा । सिर्फ आर्थिक स्वतंत्रता से कुछ भी हल नही निकलेगा । एक स्तर को अलग से सुलझाने से दूसरे स्तरों पर अन्याय बढेगा । छोटा सा उदाहरण - ऑफिस जाने वाली महिला एक साथ कई मोर्चों पर लड़ती है ...चरित्र को लेकर शक व सन्देह क्ले दायरे मे आती है , या कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न क शिकार होती है । मानसिकता और सोशलैज़ेशन की प्रक्रिया नही बदलेगी , तब तक आर्थिक आज़ादी का कोई खास फायदा नही होगा ।
जारी .............

आनंद said...

समाज के विकास के साथ पुरुष वर्चस्‍व बढ़ने और महिला श्रम के अवमूल्‍यन के कारणों का बहुत ही तर्कसंगत विश्‍लेषण किया है। इस संबंध में बस्‍तर के आदिवासी समाज में कई परंपराएँ बहुत दिलचस्‍प मिलेंगी। उनमें औरतों के श्रम को पूरा महत्‍व दिया जाता है। कार्यक्षेत्र (खेती, मज़दूरी, वनोपज एकत्र करने) में औरतें पुरुषों की तुलना में बेहतर कार्य करती हैं। 'लमसेना' विवाह विधि में संभावित दूल्‍हा अपनी होने वाली दुल्‍हन के घर रहकर दो-तीन साल तक काम करता है, ताकि जब विवाह के बाद दुल्‍हन को ससुराल में लाने पर होने वाली कमी की भरपाई पहले से कर सके। इस दौरान वह अपनी मेहनत और विनयशीलता से दुल्‍हन और उसके परिवार का दिल भी जीतता है। यदि इस लमसेना की 'प्रोबेशन अवधि' ठीक तरह से पूरी नहीं हुई तो विवाह कैंसल होने की पूरी संभावना होती है। स्‍पष्‍ट है कि यहाँ स्त्रियों की सामाजिक स्थिति बेहतर है।

अब सवाल यह उठता है कि इस समाज का विकास भी आपकी थ्‍यौरी के अनुरूप ही हुआ होगा, जिसमें शिकार, कच्‍चा माल इत्‍यादि पुरुष के और मातृत्‍व महिला के जिम्‍मे आता है। समय के साथ-साथ खेती, धन संचय की प्रवृ‍त्ति इत्‍यादि प्रारंभ हुए काफी अरसा हो गया। तो वह कौन-कौन से कारण हैं कि इस समाज में महिलाओं की स्थिति अच्‍छी बनी है, जबकि यहाँ भी संतानोत्‍पत्ति, विवाह, घरेलू कार्य और साथ ही बाहर के कार्य भी स्त्रियों के जिम्‍मे ही आते हैं। क्‍या चारों स्‍तरों (उत्पादन, प्रजनन, सामाजीकरण, यौनिकता) के बजाए आर्थिक आत्‍मनिर्भरता जैसे किसी एक स्‍तर पर विकास करना पर्याप्‍त नहीं होगा?
- आनंद

सुजाता said...

आनंद जी ,आपने सही उदाहरण दिया । स्त्री की आज़ादी के मायने में आदिवासी समाज हम तथाकथित सभ्य सामाजिकों से कई गुना आधुनिक हैं ।
दूसरी बात ,
केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता से समस्या हल नही होने वाली । जैसा कि मिशेल कहती हैं -चारों स्तर एक साथ हैं स्त्री की स्थिति के उत्तरदायी हैं ।आपने कहा - "तो वह कौन-कौन से कारण हैं कि इस समाज में महिलाओं की स्थिति अच्‍छी बनी है" स्थिति कहाँ अच्छी बनी है ? जो भी बदलाव हैं वे पदमूलक हैं , संरचना तो नही बदली ? मैं कार मे बैठ कर घूमूंगी तो आज़ादी है ही , सम्मान है , जिस दिन ब्लू लाइन बस में निकलूंगी उसी दिन समाज बदलने की हकीकत नज़र आ जाएगी ।मैं अपने घर में हुक्म चला सकती हूँ बाहर सड़क पर मेरे लिए अपेक्षित व्यवहार सरणियाँ हैं जिनका पालन करना होगा ।मैं सार्वजनिक बेंच पर नही लेट सकती । सर्दी की खिली धूप में बिछी घास पर पसर नही सकती । सड़कें नही बदली हैं !! ऑफिस नही बदले हैं !!समाज में जितनी सफल करियर वूमेन हैं , बिज़नेस वूमेन हैं वे समाज के बदलने का संकेत कतई नही हैं ; जैसे आप टाटा या बिरला के नाम लेकर यह नही कह सकते कि अब भारत के हालात बदल गये हैं अब हर आदमी के तन पर कपड़ा और पेट में रोटी है ।
समाज के आरम्भ से बात शुरु करने का मकसद ही यह बताना था कि हालात एकाध दिन में ही नही बिगड़े । इसे बदलना भी एकाध दिन में और एकाध व्यक्ति के बस की बात नही ।लर्निंग मे सदियाँ लगी हैं तो डीलर्निंग मे कम से कम एक सदी तो जाएगी ही ।

अनूप भार्गव said...

सुजाता:
तुम्हारी इस बात से सहमत हूँ कि आर्थिक आत्मनिर्भरता सिर्फ़ एक पहलु है और इस समस्या पर कई स्तरों पर काम करना ज़रूरी है । घरेलु काम को किस तरह से देखा जाये और आंका जाये , उस के लिये टिप्पणी में दिये गये तुम्हारे सात बिंदुओं से भी सहमति है ।

मेरी अज्ञानता ही कहूँगा कि मैनें Angles ओर/या मिशेल को नही पढा है (जानकारी चाहूँगा ) लेकिन परिचार की संरचना के पीछे ’मेल कौन्स्पिरेसी’ की ’थ्योरी’ गले से नहीं उतरती । परिवार का उद्देश्य "उत्पादन और उत्पादन के साधनों पर अधिकार करना था’ - appears to be a far fetched idea. मैनें समाज शास्त्र नहीं पढा है but I am sure there are many other logical/social/economical/practical reasons behind the instutution of marriage/family. अगर यह मान भी लिया जाये कि ऐसा हुआ था , तब भी while challanging these institutions, we also need to consider the benefits of these. माना कि इस व्यवस्था में खामियां हैं लेकिन क्या वह व्यवस्था का दोष है या समय के साथ उन में आई हुई विकृतियों का ? परिवार और विवाह संस्था में खामियाँ हैं लेकिन दूसरा विकल्प क्या है , इस पर भी चर्चा होनी चाहिये ।
तुम्हारी इस बात से भी सहमत नहीं हूँ कि
"कुल मिलाकर यह कि -स्त्री के लिए विवाह अनिवार्यता है , स्त्री विवाह से पहले कुंवारी हो , विवाह के बाद अन्य से संसर्ग न करे , अपनी यौन इच्छाओं का इज़हार न करे ,समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप ढले , परम्पराओं का पालन करे .......यह सभी कुछ केवल उस प्राणी पर कब्ज़े के लिए है जिसके बल पर पुरुष समाज का केन्द्रीय पात्र बनता है ।"
क्या यही सब बातें ’पुरुष’ के लिये लागु नहीं होती ? हाँ यह बात अलग है कि समय के साथ ’पुरुष के लिये यह अपेक्षाएं उतनीं महत्वपूर्ण नहीं रह गई हैं" लेकिन अपने मूल रूप में ’समाज’ को पुरुष से भी उतनी ही अपेक्षाएं हैं जितनी कि नारी से’ ।
When we question the validity and existance of an institution, we need to look at 'in the purest form' (the way it was meant to be) and not in the distorted form it may exist today. There are ways to fix the problem in the current system , throwing it away or questioning the very motive behind it is not the only way.

Suresh Gupta said...

चोखेरवालिओं जरा रुको, सोचो कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही. मेरी बात सुनो. हो सकता है तुम्हें तुंरत मेरी बात अच्छी न लगे, पर इस पर सोचो. और ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना. वृक्ष से टूट कर पत्ता अपना आधार खो देता है और हवा उसे यहाँ-वहां उड़ाती रहती है.

"घर में काम करना किसी स्त्री की नियति नही है", यह कहना एक नकारात्मक मानसिकता का परिणाम है. घर है तो घर का काम कोई तो करेगा. स्त्री घर में है तो घर का काम करेगी. दफ्तर में है तो दफ्तर का काम करेगी. इसमें नियति कहाँ से आ गई? मैं एक बात नहीं समझ पाता हूँ कि कुछ लोग हर बात को उलझाने की कोशिश क्यों करते हैं? घर का काम स्त्री क्यों करे? घर के काम की मजदूरी मिलनी चाहिए. अरे भई घर में रहते हो तो घर का मतलब समझो, घर के लिए अपनी जिम्मेदारी समझो, घर तो हर हालत में होता है, चाहे एक ही व्यक्ति क्यों न हो घर में तब भी वह घर ही होता है. ऐसे घर में भी काम होता है. जहाँ एक से ज्यादा व्यक्ति होते हैं उस घर में जिम्मेदारियों बंट जाती हैं. अगर कोई परेशानी है तो उसे घर के अन्य सदस्यों के साथ बात करके सुलझाओ. जरूरी लगे तो जिम्मेदारियों का फ़िर से बंटवारा कर लो. घर से बाहर निकल कर घर की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता. बचपन में एक कहानी पढ़ी थी एक बूढ़ी औरत की, जिसकी सुईं उसकी झोपड़ी में खो गई पर वह उसे चौराहे पर तलाश कर रही थी. लगता है आज कि प्रगतिशील नारी उसी औरत की कहानी दोहरा रही है. घर की समस्याओं का हल घर के बाहर तलाश रही है.

Anonymous said...

सुरेशजी यहां कहना क्या चाह रहे हैं? और ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना. वृक्ष से टूट कर पत्ता अपना आधार खो देता है और हवा उसे यहाँ-वहां उड़ाती रहती है. ये तो समूची नारी जाति के लिये एक धमकी से कम नही है?

स्वप्नदर्शी said...

achhi bahas chal rahee hai,

chalatee rahe, aur kuch nikal kar aaye.....

thanks sujata

Unknown said...

बेनाम जी, जो मैं कह रहा हूँ वह न तो धमकी है और न ही कोंई चेतावनी. यह जो कुछ मैंने अपने जीवन में देखा है वही कह रहा हूँ. इसे नकारने से बेहतर होगा इस पर सोचा जाए.

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