Wednesday, July 9, 2008

ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना.

Suresh Gupta has left a new comment on your post "यूँ हुआ घरेलू श्रम का अवमूल्यन : मार्क्सवाद और उसस...":

चोखेरवालिओं जरा रुको, सोचो कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही. मेरी बात सुनो. हो सकता है तुम्हें तुंरत मेरी बात अच्छी न लगे, पर इस पर सोचो. और ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना. वृक्ष से टूट कर पत्ता अपना आधार खो देता है और हवा उसे यहाँ-वहां उड़ाती रहती है.

"घर में काम करना किसी स्त्री की नियति नही है", यह कहना एक नकारात्मक मानसिकता का परिणाम है. घर है तो घर का काम कोई तो करेगा. स्त्री घर में है तो घर का काम करेगी. दफ्तर में है तो दफ्तर का काम करेगी. इसमें नियति कहाँ से आ गई? मैं एक बात नहीं समझ पाता हूँ कि कुछ लोग हर बात को उलझाने की कोशिश क्यों करते हैं? घर का काम स्त्री क्यों करे? घर के काम की मजदूरी मिलनी चाहिए. अरे भई घर में रहते हो तो घर का मतलब समझो, घर के लिए अपनी जिम्मेदारी समझो, घर तो हर हालत में होता है, चाहे एक ही व्यक्ति क्यों न हो घर में तब भी वह घर ही होता है. ऐसे घर में भी काम होता है. जहाँ एक से ज्यादा व्यक्ति होते हैं उस घर में जिम्मेदारियों बंट जाती हैं. अगर कोई परेशानी है तो उसे घर के अन्य सदस्यों के साथ बात करके सुलझाओ. जरूरी लगे तो जिम्मेदारियों का फ़िर से बंटवारा कर लो. घर से बाहर निकल कर घर की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता.
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी एक बूढ़ी औरत की, जिसकी सुईं उसकी झोपड़ी में खो गई पर वह उसे चौराहे पर तलाश कर रही थी. लगता है आज कि प्रगतिशील नारी उसी औरत की कहानी दोहरा रही है. घर की समस्याओं का हल घर के बाहर तलाश रही है.

33 comments:

seema gupta said...

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी एक बूढ़ी औरत की, जिसकी सुईं उसकी झोपड़ी में खो गई पर वह उसे चौराहे पर तलाश कर रही थी. लगता है आज कि प्रगतिशील नारी उसी औरत की कहानी दोहरा रही है. घर की समस्याओं का हल घर के बाहर तलाश रही है.

" very sensitive topic u have selected, really liked reading it, as it is very near to life'

Regards

PD said...

अच्छा लगा पढना..

गौरव सोलंकी said...

सुजाता जी, घरेलू श्रम और मार्क्सवाद वाली पोस्ट भी आज ही पढ़ी..और उसके बाद की चर्चा भी|
ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना...जाने क्यों यह पंक्ति मुझे सलाह से ज्यादा चेतावनी जैसी लगी| खैर, अपना अपना दृष्टिकोण|
वैसे फिलहाल ये कहना है कि घरेलू श्रम के अवमूल्यन की चर्चा जहाँ से शुरू हुई थी, वहां यह मुझे भी उतनी गंभीर बात नहीं लगी थी, लेकिन आपके समाजशास्त्र के हवालों के बाद एक नए नजरिए से देख रहा हूँ तो इस चर्चा की महत्ता समझ में आ रही है|
घर का काम करने में कोई बुराई नहीं है और न ही चोखेरबालियाँ उसके बदले में कोई मेहनताना देने को कह रही हैं, इस बिंदु पर शायद सभी सहमत हैं| शिकायत तो यही है कि उस घरेलू श्रम को कहीं विचारणीय ही नहीं माना जा रहा| सुरेश जी घर में बात करके समस्या का हल ढूँढने को कह रहे हैं तो उनसे कहना चाहूंगा कि समस्या शुरू ही तभी हुई है, जब बात करके हल नहीं निकाल पा रहे हैं|
बाकी और भी बातें हैं| चर्चा आगे बढे तो कहूंगा|

admin said...

घर की समस्याओं का हल घर में ही खोजा जाए, तो ही अच्छा है।

Unknown said...

गौरव जी, जिस समस्या की चर्चा यहाँ हो रही है उस समस्या का जन्म हो सकता है घर में हुआ हो पर वह विकराल बनी है बाहर के प्रभाव में. जब हम घर की समस्या को बाहर से और अपने-अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को ध्यान में रख कर देखते हैं तो समस्या सुलझती नहीं उलझती है. घर एक संस्था है. घर की हर समस्या को एक ग्रुप की समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए. घर को अगर एक फेक्ट्री के रूप में देखा जायेगा, घर में काम करने की तनखाह मांगी जायेगी, और हर व्यक्ति घर को अपने ही अंदाज़ में चलाना चाहेगा तब तो समस्या बढ़ती जायेगी. समस्याएँ मिल जुल कर सुलझती हैं. वाकआउट करने से काम नहीं चलेगा. यह बात घर के हर सदस्य को समझनी होगी. घर में संघर्ष की कोई जगह नहीं है. अगर संघर्ष होगा तो घर टूट जायेगा, और इस से किसी को फायदा नहीं होगा.

Anonymous said...

घर की समस्याओं का हल घर में ही खोजा जाए, तो ही अच्छा है।
---------
sahi to hai , likh likh ke blog spece bekaar karne se to achcha hai . aur ghar ka mamla ghar me rahna chahiye na !!!! use public sphere me mat uchhalo bhaii .ghar toot jaaegaa to sab khatma ho jayega . ghar tabhi tootega jab aurat zid karegi aur pati ahankari hoga . aurat ko hi jhukna hoga , agar ghar bachana hai .ye marxvad kaise beech me aayaa ?

Dr. Chandra Kumar Jain said...

दूसरे पहलू पर सार्थक चर्चा.
सच है घर की समस्या का
निदान घर में ही ढूंढ़ना होगा.
...... लेकिन एक तरफा समझ को
नज़रंदाज़ करने की नासमझी भी
न हो तो कोई बात बने.
=========================
शुक्रिया
डा.चन्द्रकुमार जैन

Anonymous said...

बेनाम जी ने सिर्फ़ औरत को ही झुकने की सलाह दे डाली है,उसे जिद्दी करार दे दिया है, सुरेश जी ने औरत को धमका ही डाला है कि ज्यादा अधिकारों की मांग करोगी तो पहले के मिले अधिकार छीन लिये जाएंगे.क्षमा करें यदि इस प्रकार के पुरुष/महापुरुष स्त्री विमर्श की चर्चा में शामिल होंगे तो स्त्री का भला होने से रहा.हां ये सही बात है कि घर मे ही इस समस्या का समाधान ढूंढा जा सकता है किन्तु ये नौबत आई ही घर से है जहां स्त्री द्वारा किये गये कार्यों का कोई मूल्य नही आंका जाता.

Anonymous said...

"ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना."


Jalne ki badboo bahut jodon se aa rahi hai....thoda pani dala jaye aur aag bujhaya jaye!

waise jo aisa kahkar darane ki koshish kar rahe hein unhe apna shashan khone ka dar lagne laga hai.

"उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक"

Asha Joglekar said...

Such hai ki ghar ki samasya ghar me hi sulazana chahiye par samasya ka hal ghr me nahi nikalata tabhi to wo bahr aati hai. sochana hai sabhee ko ki hum pane ghar mein ghar ka kam karane wale ko saman adhikar de rahen hain ya nahi. Suresh ji aap ke kathan se wakai lagata hai ki aap chetawani jyada de rahen hain aur samaza kaum rahe hain.

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

घर और शादी की संस्था का निर्माण ही महिला पर अधिकार जताने के लिए किया गया था। जमीन, जानवर की तरह ही उसका स्वामित्व पुरुष के हाथ में रहे इसके लिए जोरू (महिला) को भी इसमें जोडा गया।
घर की बात घर में रहे से मैं भी सहमत हूं, लेकिन इसके लिए बात बराबरी की होनी चाहिए, किसी के छोटे बड़े या झुकने की नहीं हो।

Anonymous said...

Quite right. So take a different turn and ask a mom (Often) but dads as well, ask the kids to pick up the toys, clean their room, carry the bags from car, help babysit the younger sibling and so and so forth. These all fall into the same category of household work and its compensation. I am sure all of us as kids have gone through this situation in addition to those that have taken on the job of housemaking. Do we really compensate the kid with anything? Most of the time parents ignore or consider it a routine responsibility of the kid. Sometimes the kid(s) are rewarded with candy/games/something_to_their_liking. Is this enough as per the compensation issue being argued here. I know many kids even get some leftover pennies and coins for their piggy bank, but arguably that is not enough. However, even though they feel proud in getting that compensation, it is often used by the parents in case there is an urgency. Kids also get to use them. So for the home-making spouse/partner, put yourself in the shoes of a kid and think, do you have access to the income earned by your spouse/partner, do you have freedom to expend it, is your health and life insurance covered. If so much of your worries on getting compensated are over. Because this is what an earning spouse/parter gets from his/her employer as well. If you don't get this then fight to get it. Also remember, many of the house making spouses/partners of whom we are talking in this discussion actually have access to full/part of the income to run the household to their fullest ability. They do an excellent job of doing this work and even though the working spouse may/may not appreciate/compensate the household work (the it is being discussed here), the house making (ghar ke kam ke liye) spouse/partners do have a tendency to save something either in banks/cash_hiding_in_a_suitcase_or_cupboard/buy_jewellery. Therefor they do have a tendency to save something even with/without the knowledge of the other person for an eventuality or as their save reward. I am sure many of you know your moms/female_relatives/sisters/etc. doing these things. So think about the practical scenarios and discuss/raise the issues there upon. Quoting somebody from the book is easy Vs the practical world. I would love to hear the voices of spouses/partners that work as household managers (ghar ka kam karne wale).

Anonymous said...

"घर की समस्याओं का हल घर के बाहर तलाश रही है. " कूप मंडूक क्यों नहीं बनी रहती ???

ghughutibasuti said...

हम रुके, हमने सोचा और फिर जो है उसे दाँव पर लगा दिया। अब जो है उसे भी छीन सकते हो तो छीनिये। पेड़ से पत्ता तो तोड़कर ही किसी और पेड़ पर सदियों से चिपकाया जाता रहा है़, बतौर रोप के। स्त्री वह पौधा/रोप है जो किसी और के आँगन में ही खिलता बड़ा होता है,यह सदा से सुनते आ रहे हैं। अब हम नए आँगन, खेत का चुनाव स्वयं कर रहे हैं।
घुघूती बासूती

Unknown said...

चोखेरवालिओं, मेने पहले ही कहा था, "हो सकता है तुम्हें तुंरत मेरी बात अच्छी न लगे, पर इस पर सोचो".

फ़िर कहता हूँ 'सोचो, मेरी बातों को ऐसे ही नकारो मत, मैं जो कुछ कह रहा हूँ वह मेरे व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है. मैंने अपने घर में और पड़ोस में जो होते देखा है वही कह रहा हूँ".

Anonymous said...

सुरेश गुप्ता जी
आप को ऐसा क्यों लगता हैं की आप की बातो पर कोई सोच नहीं रहा हैं . जमाने से औरते यही सब बाते तो सुनती आ रही हैं . और फिर उन सब ने सोचना शुरू किया और सोच ने के बाद ही ये सोचा गया की आप की सोच और आप जैसे सब की सोच से अपनी सोच को स्वंत्र किया जाए और फिर सोचा जाए की हमारे लिये क्या सही हैं . किसी को समझाना जितना आसन होता हैं ख़ुद को समझाना उतना ही मुस्किल होता हैं . कब तक औरतो को समझाना जरुरी रहेगा कभी सुजाता को फुर्सत होगी तो एक बढिया धांसू पोस्ट पढ़ने को मिलगी

Unknown said...

रचना जी, मैं घर जोड़ने की बात करता हूँ. तोड़ना बहुत आसान होता है. जोड़ना मुश्किल होता है. मेरा और आपका सोच बस यहीं अलग है. आज कल घर टूट रहे हैं. और इस टूटन के पीछे एक सोच है जो नकारात्मक है. आज की प्रगतिशील स्त्री घर को अपना मान कर नहीं सोचती. मैं कहता हूँ घर को अपना मानो, घर पर अपना अधिकार मत छोड़ो. घर में अगर कोई कमी है तो उसे सुधारो. घर से अलग होने की बात मत सोचो. घर समाज का केन्द्र्विन्दू है. घर टूटेगा तो समाज टूट जायेगा. इससे किसे फायदा होगा?

इला जी ने लिखा है, "सुरेश जी ने औरत को धमका ही डाला है कि ज्यादा अधिकारों की मांग करोगी तो पहले के मिले अधिकार छीन लिये जाएंगे.क्षमा करें यदि इस प्रकार के पुरुष/महापुरुष स्त्री विमर्श की चर्चा में शामिल होंगे तो स्त्री का भला होने से रहा". अपनी राय से अलग बात पर खफा होकर कुछ भी कह देना ही सारी समस्या की जड़ है. यह जरूरी नही है कि आप दूसरों की राय से सहमत हों. पर दूसरा क्या कह रहा है उसे समझने की चेष्टा करने से परहेज क्यों?

रीवा जी ने कहा, "Jalne ki badboo bahut jodon se aa rahi है", यह किस तरह की चर्चा है?

मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि सोच में लचीलापन होना चाहिए, तभी समस्या का समाधान निकल सकता है. चोखेरवालियां समस्या का समाधान तलाश रही हैं या वाक् युद्ध में जीत हासिल करने का प्रयास कर रही हैं?

आनंद said...

सुरेश जी, इस बात पर पहले भी चर्चाएँ हो चुकी हैं। आपके कथन 'आज कल घर टूट रहे हैं. और इस टूटन के पीछे एक सोच है जो नकारात्मक है. आज की प्रगतिशील स्त्री घर को अपना मान कर नहीं सोचती.' से मिलती जुलती पोस्‍ट भड़ास पर आई थी। उस पर दी गई राय बहादुर राजेश्‍वर प्रताप सिंह की टिप्‍पणी प्रासंगिक है। इसे अवश्‍य देख लें।

- आनंद

Anonymous said...

anand thanks for giving link of this comment it sayseverything that needs to be said in response to suresh gupta

Suresh Gupta said...

आनंद जी और रचना जी, मैंने वह टिपण्णी पढ़ी जिस की और आप लोगों ने संकेत किया है. छमा करें आप ने मेरा समय नष्ट किया. वह टिपण्णी नहीं गालिओं का पुराण है. हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन किसी को इस तरह गालियाँ देने का अधिकार नहीं. रचना जी इन गालिओं को प्रासंगिक मानती हैं. बहुत दुःख हुआ यह जानकर. क्या इसी को प्रगतिशीलता कहती हैं चोखेरवालियां? क्या गालियाँ देने का अधिकार प्राप्त करना चाहती हैं चोखेरवालियां?

Anonymous said...

suresh gupta ji
link ki taarif kareny ka matlab yae haen ki woh is post sae sambandhit aur prassangik haen aur maene aap sae ilkul nahin kehaa haen kii aap wahaan jaaye aur apna vaqt barbaad karey . mae kyaa chahtee hun , kyaa sahii samjhtee hun iska faislaa aap yaa samaj nahin karega mae khud karugee ?? aur baar baar yae likh kar चोखेरवालियां kyaa chahtee haen ?? aap unko kathaey mae khadaa kartey haen ?? kyaa bataa sakegaey aap ko kisi ko bhi kadharey mae kadhaa karnaey kaa adhikar kisney diya haen ? kaun kyaa chahtaa , pragatee sheeltaa kaa matlab kyaa haen ? nakaratmk soch haen . yae sab keh kar aap kyaa prove karna chahtey haen .

अनूप भार्गव said...

मेरे अनुसार इस बातचीत में कोई प्रगति नही हो रही है , हर वाक्य के दोहरे अर्थ लगाये जा रहे हैं । सुरेश जी की सब बातों से सहमत नहीं हूँ उन की एक बात को दूसरे शब्दो में कहना चाहता हूँ (जिस की ओर मैने पहले भी इशारा किया था)

परिवर्तन ज़रूरी है लेकिन यह परिवर्तन ’परिवार से शुरु हो कर बाहर तक जायेगा , बाहर से शुरु हो कर परिवार में नहीं आयेगा ।

बाहर जो कानूनी परिवर्तन समानता के लिये होने थे , वह हो चुके हैं । अब ज़रूरत है सोच को बदलने की और सोच ’बेहद निजी होती है" । उसे अन्दर से ही , परिस्थितियों के अनुरूप बदलना होगा । हर परिवार के लिये एक Common Recipe नही हो सकती ।

Anonymous said...

अनूप भार्गव जी आपने सही कहा हैं और मेने भी यही कहा हैं की सोच को स्वतंत्र करे , कल क्या था उस पर अटके रहेगे और कल क्या होगा उस से डरते रहेगे तो आज को आप खो देगे . परिवर्तन घर से ही शुरू हो कर ही आज समाज मे आया हैं . क्योकि औरत पहले घर मे ही थी . सबकी अपनी सोच हैं और ये सोच उसकी परस्थितियों से बनी हैं और समाज मे पुरूष और नारी का समान अधिकार हैं हर चीज़ पर और आज एक बहुत ही अच्छी पोस्ट आयी हैं परिवार के बाहर महिलाओं का अस्तित्व स्वीकार्य क्यों नहीं ?

Unknown said...

रचना जी, मैं कुछ साबित करना नहीं चाहता. मैं बस अपने अनुभव और विचार आप सबके साथ बांटना चाहता हूँ. मैंने अपने जीवन के ६२ वर्ष पूरे किए हैं. अपने परिवार मैं और अपने पड़ोस मैं जो देखा है उसके आधार पर मैं अपनी बात कहता हूँ. उसे सब मानें जैसी कोई शर्त नहीं है. सब समझदार हैं, सब अपना भला बुरा समझते हैं, सब को अधिकार है यह तय करने का कि वह क्या करें और क्या न करें. मैंने मिल जुल कर समस्याओं से निपटने का अभूतपूर्व फायदा होते देखा है. मेरा अपना घर इस का एक उदाहरण है. इस लिए जहाँ मुझे मौका मिलता है अपनी बात कह देता हूँ.

सब अपने अनुभवों से सीखते हैं. मैंने जो सीखा वह आप सबके साथ बांटा है और बांटता रहूँगा. किसी का मन दुखाने का मेरा कोई ईरादा नहीं है. मैंने यह जाना है कि सबसे प्रेम करना, किसी से नफरत न करना और जीवन के प्रति एक सकारात्मक सोच रखना बड़ी फायदे की चीज है. इस से हमेशा फायदा ही होता है, नुक्सान नहीं होता. बस यह विचार मैं इधर उधर बांटता रहता हूँ. जो बीत गया उस से केवल सबक लिया जा सकता है. उस को कारण बनाकर वर्तमान में दुखी होने से कोई फायदा नहीं होता. जीवन तो समय के साथ बहता है. उसे बहने देना चाहिए, मिल जुल कर, प्रेम से. तभी जीवन का पूरा आनंद मिलेगा.

अनूप जी, कोई किसी की हर बात से सहमत हो यह किसी चर्चा की शर्त नहीं होती. आपने जो बात अपने शब्दों में कही है वह ही बात मैं भी कहता रहा हूँ. अगर कहीं कोई शंका है तो शायद वह इस से दूर हो जाए.

Anonymous said...

सुरेश जी
आप की पत्नी क्या नौकरी करती थी , अगर हाँ तो क्या आप एक टाइम खाना बनाते थे और एक टाइम वो बनाती थी . अगर नहीं नौकरी करती थी तो क्या आप इतवार के दिन उनको फ्रीदोम देते थे घर के काम से . क्या आप ने कोई बैंक खाता उनके नाम से खोला हैं . क्या आप के पुत्र और पुत्री दोनों हैं ? अगर हैं तो क्या आपने अपनी पुत्र और पुत्री दोनों को हर चीज़ सामान रूप से दी हैं यानी अगर आप का पुत्र रात को दस बजे घर आता हैं तो आप उसे भी उसी तरह प्रश्न करते हैं जैसे पुत्री से . क्या आपकी पुत्री या पुत्र वधु नौकरी करती हैं , अगर हाँ तो जब वो घर आती हैं क्या आप उसे एक गिलास पानी दे कर सुख महसूस करते हैं . इन प्रश्नों का जवाब दे दे तो आगे पुछु
एक अनाम चोखेरबाली

Unknown said...

प्रिय अनाम चोखेरबाली,

मेरी पत्नी नौकरी नहीं करती थी और न ही अब करती हैं, वर्ष १९७० में हमारा विवाह हुआ था. में उस समय देहरादून में नौकरी करता था. तभी से यह व्यबस्था हमारे घर में चली आ रही है, में पैसा कमाता हूँ और वह घर चलाती हैं.

विवाह के बाद मेरी पत्नी को एक बीमारी हो गई थी. अक्सर सुबह उन का जी घबराता था और अगर उन्हें उठ कर काम करना पड़े तो उल्टियां शुरू हो जाती थीं. इस लिए उस सुबह का नाश्ता और आफिस ले जाने के लिए खाना में ही बनाता था. बीच में कभी मां और कभी बहन आ जाती थीं. उस से मेरी पत्नी को काफ़ी सुविधा और आराम हो जाता था. एक वर्ष बाद मेरा तबादला हैदराबाद हो गया. पत्नी की बीमारी चलती रही. वहां वह गर्भवती हुईं. देखभाल के लिए मां आ गई थीं. फ़िर मां उन्हें अपने साथ घर ले गईं. वहां बेटे का जन्म हुआ.

हैदराबाद से मेरा तबादला दिल्ली हो गया. मेरी पत्नी और बेटा दिल्ली आ गए. बीमारी पूरी तरह दूर नहीं हुई थी. फ़िर दूसरे बेटे का जन्म हुआ. इस के बाद पत्नी की बीमारी काफ़ी हद तक ठीक हो गई थी. हमारी कोई बेटी नहीं थी. यह कमी हमेशा अखरती रही. बेटी की कमी जब कुछ पूरी हुई जब बड़े बेटे की शादी हुई. फ़िर उन्हें एक बेटी हुई. फ़िर छोटे बेटे की शादी हुई. फ़िर बड़े बेटे को एक और बेटी हुई. घर में चार बेटियाँ हो गईं, दो बड़ी और दो छोटी. घर का और मन का हर कौना भर गया. देवी मां की हम पर बड़ी कृपा रही.

हमारे दोनों बेटे काम करते हैं. हमारी बेटियाँ (पुत्र वधु) काम नहीं करती. वह घर के काम में मां का हाथ बटाती हैं. मेरी पत्नी के नाम बैंक खाता शुरू से ही है. उनके फिक्स्ड डिपोसिट में मुझ से ज्यादा पैसा है. दोनों बेटिओं के अपने बेंक एकाउंट्स हैं. दोनों पोतियों के नाम से भी एकाउंट्स हैं.

हमारे परिवार में स्त्रियों से कभी ऊंचे स्वर में बात नहीं की जाती. घर के सारे निर्णय तो वही करती हैं सबसे राय ले कर. बाहर के निर्णय भी सबकी राय से होते हैं. मैं अब रिटायर्ड हूँ. हमारी एक ट्रेनिंग और कंसल्टेंसी फर्म है जिसकी प्रोप्राइटर मेरी पत्नी हैं. मैं फर्म का काम करता हूँ. मुझे पेंशन मिलती है, इस लिए मैं इस फर्म से कोई तनख्वाह नहीं लेता. फर्म की आय मेरी पत्नी और दोनों बेटिओं के एकाउंट्स में जमा होती है.

आशा करता हूँ आपके प्रश्नों के उत्तर मिले होंगे. एक बात कहूं, मैंने अपनी पत्नी और बेटिओं को घर के काम की तनख्वाह मिलने की बात कही. तीनों हंसने लगीं. मेरी पत्नी ने कहा, "आपको और बेटों को खर्चे के लिए पैसे तो हम देते हैं. आप हमें हमारे काम की तनख्वाह कहाँ से देंगे? और घर की मालकिन क्या घर के काम की तनख्वाह लेगी? आप अच्छा मजाक कर लेते हैं."

Anonymous said...

सुरेश जी आप का ह्रदय से धन्यवाद अपनी परिवार के बारे मे बताने के लिये . अच्छा लागा जानकर की आप के घर की महिलाए मालकिन हैं . बस एक ही प्रश्न हैं की वो जो कर रही हैं वो एक सड़क हैं जिस पर औरत बरसो से चल रही हैं और बार बार उसे उसी सड़क पर चलाया जा रहा हैं ये कह कर की इसी मे सब की भलाई और तुम्हारा सुख हैं . क्या इस सड़क पर चलने का निर्णय आप की घर की महिला का अपना हैं ? या क्योकि महिला को यही करना होता हैं इस लिये वह कर रही हैं ?? सब से अहेम हैं अधिकार { एक आयु यानी जब सोच परिपक्व हो जाए के बाद }अपनी पसंद के फैसले ख़ुद करना क्या आप को लगता हैं की आप की घर की महिला को कभी भी ये अधिकार दिया गया हैं की वो चुन सके उसके लिये क्या अच्छा हैं क्या बुरा हैं ?? वह ख़ुद सोच सके अपनी भलाई , अपनी पसंद के बारे मे .
एक अनाम चोखेरबाली

Suresh Gupta said...

प्रिय अनाम चोखेरबाली,

अगर जीवन को एक सड़क कहा जाए तो उस पर औरत ही नहीं पुरूष भी बरसों से चल रहे हैं, साथ-साथ एक दूसरे से कदम मिला कर चल रहे हैं. वह दोनों अलग नहीं हैं. मैं यह कहूँगा कि एक परिवार चल रहा है. किसी को उस सड़क पर जबरन नहीं चलाया जा रहा. जीवन तो चलने का नाम है. हम चलें न चलें, जीवन तो चलता रहेगा. सिर्फ़ किसी के यह कह देने से कि 'इसी मे सब की भलाई है' से काम नहीं चलता. उस रास्ते पर चलने में विश्वास होना चाहिए. और ऐसा विश्वास मेरे परिवार की महिलाओं और पुरुषों दोनों में है. किसी को उस रास्ते पर चलाया नहीं जा रहा. सब अच्छी तरह सोच समझ कर उस रास्ते पर चल रहे हैं.

अगर रास्ता सही है और उस से जीवन सुखी है तब उसे बदलने की आवश्यकता नहीं होती. जहाँ कहीं जरूरी हो उस में सुधार करना चाहिए. लगातार सुधार जीवन का एक अभिन्न अंग है. अगर परिवार का कोई सदस्य यह रास्ता छोड़ कर एक अनजान रास्ते पर चलना चाहता है तब परिवार का यह दायित्व बनता है कि उसे समझाया जाए. उस को परिवार में अगर कोई परेशानी है तो उस का समाधान तलाश करके उस परेशानी को दूर किया जाए. परिवार एक टीम है. उसे सही रूप में चलाने के लिए सब का योगदान चाहिए. हर सदस्य के काम का अपना महत्त्व है. कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता.

अधिकार की अगर बात करें तो परिवार के सब सदस्यों के अधिकार बराबर होते है. लेकिन यह अधिकार पारिवारिक व्यवस्था के अंतर्गत देखे और इस्तेमाल किए जाने चाहिए. अधिकार जिम्मेदारिओं को सही तरीके से निबाहने में मदद करते हैं. बिना अधिकार के जिम्मेदारिओं की बात करना बेमानी है. किस जिम्मेदारी के लिए क्या अधिकार चाहिए, यह तय किया जाना चाहिए, फ़िर जिम्मेदारी दी जानी चाहिए. लेकिन एक बात का ध्यान रखना जरूरी है. जैसे अधिकार के बिना जिम्मेदारी बेमानी है, उसी प्रकार जिम्मेदारी के बिना अधिकार बेमानी है. दूसरी बात जो ध्यान रखना जरूरी है, वह यह है कि अधिकार दूसरों पर शाशन करने के लिए नहीं होते. अधिकार जिम्मेदारिओं को सही तरह से निभाने के लिए होते हैं. अगर दूसरों को किसी के किसी अधिकार से परेशानी होती है तो वह अधिकार सही नहीं है.

हमारी छोटी बेटी जिस परिवार से आई है, वहां परदे का रिवाज है. बड़ों के सामने बिना सर ढकें आना सही नहीं माना जाता. यह लड़की इस व्यवस्था को पसंद नहीं करती थी. उस के माता पिता इस बात से चिंतित रहते थे. बहुत से परिवारों में उस की शादी इस कारण से नहीं तय हो पाई. हमें उस की इस बात पर कोई ऐतराज नहीं था. आज वह हमारी बेटी है. मेरे विचार में सर ढंकना उतना जरूरी नहीं है जितना अपने बड़ों का आदर करना. मेरी एक भाभी अपने ससुर के सामने लंबा घूंघट रखती थी, पर जब कभी किसी बात पर बहस हो जाती तो ससुर जी को ऐसी खरी खोटी सुनाती थीं कि बस. मैं कहता था कि ऐसे घूंघट का क्या फायदा. आप घूंघट ख़त्म करो. वह कहती थीं कि इस से मोहल्ले और रिश्तेदारी में इज्जत बनी रहती है. घूंघट लिए रहो और सब को जम कर खरी खोटी सुनाओ. एक अच्छी बहू के रूप में उनकी बहुत तारीफ़ करती थीं दूसरी स्त्रियाँ.

हमारे घर की स्त्रियाँ पूरी तरह से स्वतंत्र हैं अपने बारे में निर्णय करने के लिए. उन के लिये क्या अच्छा हैं क्या बुरा हैं, वह स्वयं तय करने के लिए पूरी तरह योग्य हैं. घर के सब सदस्यों को उन पर पूरा विश्वास है. वह इस विश्वास का सम्मान करती हैं. यही सुखी जीवन का राज है.

Anonymous said...

सुरेश जी आप का परिवार एक परिवार हैं जहाँ स्त्रियों ने वही कार्य करना स्वीकार कर लिया हैं जो स्त्रियों के लिये सामाजिक व्यवस्था मे निर्धारित हैं . उन्हे अपने अधिकारों के विषय मे कोई और बात नहीं करनी क्योकि उनकी जरुरत हैं एक सामाजिक व्यवस्था जहाँ सबकुछ सुरखित रूप से उनको दिया जा रहा हैं . चोखेर बाली मंच बात करना चाहता हैं उन महिला के अधिकारों के बारे मे जो घर से बहार भी काम करती हैं और उन महिला के बारे मे जो घर की इस व्यवस्था मे अपने को सही ना समझ कर नए रास्ते पर चलना चाहती हैं . वह महिला घर से बाहर अपनी लिये नए आयाम पा रही हैं और पाती रहेगी इस लिये बहुत जरुरी नहीं हैं की वो आप के घर की व्यवस्था को सही मान कर उस पर चलना चाहे क्योकि आप के घर मे जो कुछ हो रहा हैं वो सदियों से होता आया है और होता रहेगा . आप के अनुभव उनके लिये बहुमूल्य होगे जो ये मानते हैं की स्त्री को दे दो पर कमाने मत दो और स्वाबलंबी तो बिल्कुल मत बनने दो
अनाम चोखेर बाली

PD said...

इतने दिनों के बहस के बाद आज मुझे एक कहानी याद आ रही है.. एक बुढिया सड़क के किनारे खड़ी थी.. वहीं कुछ बच्चे खेल रहे थे.. जब बच्चे देखे कि बुढिया बहुत देर से वहीं खड़ी है तो बच्चों ने सोचा की शायद सड़क पार करना चाह रही है.. वो उसके पास गये और जब तक बुढिया कुछ बोलती तब-तक सड़क पार करा दिया.. अब बुढिया अपनी छड़ी से बच्चों की पिटाई करने लगी, क्योंकि वो सड़क पार नहीं करना चाह रही थी.. वो उधर बैठ कर किसी का इंतजार कर रही थी..

सच्चाई तो यही है कि जो सच में कुछ चाह रहा हो उसे वही दिजिये.. नहीं तो हालत उन बच्चों जैसी हो जायेगी.. ये सुरेश जी और अनाम चोखेरबाली, दोनों के लिये ही है..

Unknown said...

प्रिय अनाम चोखेरबाली जी,

आपने बिल्कुल सही कहा कि मेरा परिवार एक परिवार है. मेरे परिवार में स्त्री अगर कुछ न भी कमाए तब भी स्वाबलंबी है, स्वतंत्र है, मेरे परिवार में स्त्री न केवल अपने निर्णय अपनी मर्जी से करती है बल्कि दूसरों के निर्णय में सहभागी है. उसे परिवार में बराबर के अधिकार प्राप्त हैं. यह परिवार एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर आधारित है जहाँ स्त्री और पुरूष परिवार की जिम्मेदारियां मिल कर निभाते हैं. यह व्यवस्था स्त्री और पुरूष दोनों ने आपसी सहमति से बनाई है. इस में किसी पर जोर जबरदस्ती नहीं की जाती. इस परिवार में स्त्रियाँ घर के बाहर नौकरी करने नहीं जातीं क्यों कि उन्हें इस की जरूरत महसूस नहीं होती. पर वह काम करती हैं. हमारी छोटी बेटी अपने पति के काम में उस की सहायता करती है. हमारी फर्म का काफ़ी काम दोनों बेटियाँ मिल कर करती हैं. बाहर का काम मैं देखता हूँ और ऐसा इस लिए है कि मैं उस काम को पिछले ४० सालों से कर रहा हूँ. लेकिन उस काम की प्रशाशनिक सपोर्ट मुझे अपनी दोनों बेटिओं से मिलती है. मुझे अपने परिवार पर गर्व है. मुझे इस सामजिक व्यवस्था पर गर्व है. यह व्यवस्था दुनिया की सब से अच्छी व्यवस्था है.

अगर कहीं इस व्यवस्था में कोई कमी आ गई है या किसी के अधिकार का हनन हो रहा है तो उस का विश्लेषण करके कमी को दूर किया जाना चाहिए, अधिकार का हनन बंद करना चाहिए. पूरी व्यवस्था को ही नकार देना कोई समझदारी की बात नहीं है. स्त्रियाँ घर के अन्दर काम करें या घर के बाहर, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. सबको परिवार के लिए बफादार होना चाहिए. आपस में प्रेम होना चाहिए. अधिकार और जिम्मेदारियों का समान बंटवारा होना चाहिए. उन महिलाओं से, जो घर की इस व्यवस्था मे अपने को सही ना समझ कर नए रास्ते पर चलना चाहती हैं, मेरा यही कहना है कि वह इस व्यवस्था में अपने को सही समझें. महिलायें घर के बाहर काम करेंगी तो अपने लिये नए आयाम भी पाएंगी. यह आयाम उन के परिवार के लिए गर्व की बात होगी. लेकिन इस का फायदा परिवार को न देकर अपने अलग रास्ते पर चल देना क्या एक प्रकार का स्वार्थ नहीं होगा? जो सदियों से होता आया है वह केवल ग़लत है यह जरूरी तो नहीं. उस में केवल बुराई ही क्यों देखी जाए? उस की अच्छाइयों को भी देखना चाहिए. अच्छाइयों को बल देना चाहिए और बुराइयों को दूर करना चाहिए.

मैंने अपने अनुभव आपके साथ बांटे. इस में कुछ अच्छा लगे तो लीजिये, न अच्छा लगे तो आपको आपका नया रास्ता मुबारक. ईश्वर आपको इस नए रास्ते पर वह सब कुछ दे जो आपको पुराने रास्ते पर नहीं मिला.

surjeet said...

एक बहस शुरू हुई, रोचक और दिलचस्प घुमावदार मोड़ों से गुजरती हुई अंतिम चौराहे से पहले व्यक्तिगत आक्षेपों में बदल गई। अब कोई इस पर लम्बी-चौड़ी शोध रिपोर्ट तैयार कर सकता है कि आखिर निष्कर्ष क्या निकला???

Suresh Gupta said...

सुरजीत जी, बहस शुरू हुई थी मेरी एक टिपण्णी से, जिसे सुजाता जी ने एक पोस्ट बनाकर इस ब्लाग पर डाला. पर आप सही कहते हैं कि बहस किसी मंजिल तक नहीं पहुँच पाई. इस ब्लाग मंच पर व्यक्तिगत आक्षेप बहुत आसानी से लगा दिए जाते हैं. दूसरे की बात को समझने का शायद किंचित मात्र भी प्रयास नहीं किया जाता. मेरा निष्कर्ष तो यही है कि प्रगति करने के लिए नारी को 'आँख की किरकिरी' बनना जरूरी नहीं है. नारी 'आँख का चैन' बन कर भी प्रगति कर सकती है.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

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