Thursday, July 10, 2008

तिलिस्म तोड़ती औरतें , राज़ ढूंढती औरतें .....



Bhavna Paliwal
Age: 32
Head of: Tejas Detective Agency in Delhi.
First case: Fed up with journalism, she responded to an ad in a daily, seeking a lady detective. She was asked to check out the character of a married woman.
Personality quirks: Loves changing her looks and act to approach different types of people for information.
Job profile: Matrimonial and teen issues, family crimes, character and job verification, corporate surveillance.




यह प्रोफाइल है एक महिला जासूस का । जी हाँ - "जासूसी " साहस , चुनौती , खतरों , रोमांच और थ्रिल्ल भरा एक प्रोफेशन । ज़ाहिर है , इसलिए महिलाओ का इस प्रोफेशन में दखल न के बराबर ही रहा ।लेकिन ये गुज़रे ज़माने की बात हुई । नये ज़माने मे जैसा कि बहुत लोग स्त्री विमर्शकारों को सिखाते और समझाते रहते हैं कि - भई ज़माना बदल गया है , ये मुक्ति , ये उत्पीड़न सब पुरानी बातें हुईं । अब तो स्त्री बराबर क्या पुरुष से भी आगे है कान काटने में


इंडिया टुडे ने भी अपनी एक स्टोरी में साबित कर दिखाया है कि स्त्रियाँ जासूसी के व्यवसाय में भी अब पीछे नहीं रहीं । दिल्ली में 60 डिकेक्टिव एजेंसियाँ हैं जिनमें से 6 के हेड स्त्री है ।




वैसे इंडिया टुडे भी साफ साफ कह रहा है कि खबर अच्छी है पर किसी मुगालते मे मत रहिये क्योंकि ये महिलाएँ अभी तक सिर्फ घरेलू केस जिनमें से ज़्यादातर तलाक से जुड़े हुए - पति-पत्नी की चारित्रिक जासूसी वाले होते हैं । और इनमें स्त्री जासूस किसी भी मर्द जासूस से बेहतर काम कर रही है और कम समय में कर रही है ।






Women check employee credentials for corporates, do under-cover operations,
survey public opinion for political parties, carry out surveillance for fashion
houses.
But most of all, they excel in patrolling the dark alleys of that
holy Indian institution—the family







Not surprisingly, most detective agencies with lady detectives advertise “pre-post matrimonial, family problem, shadowing, evidence in divorce and court proof”.


मंजरी प्रभु , कहती हैं - स्त्री को इस व्यवसाय में आने के बाद ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है समाज में अपनी योग्यता को सिद्ध करने के लिए ।हालांकि ज़्यादातर अपने जेंडर को इस व्यवसाय के लिए एक रुकावट या फायदे की तरह नहीं देखतीं । तो भी स्वामीनाथन का कहना है कि - स्त्रियाँ घरेलू मामलों की बेहतर समझ रखती हैं ।



सो अब हर बात में मेरी नकारात्मक एंगल खोजने वाली बुद्द्धि को दोष न दीजियेगा क्योंकि डिटेक्टिव एजंसियाँ खुद ही कह रही हैं कि जासूसी ही क्यों न हो स्त्री की भूमिका अब भी परिवार के गिर्द ही चक्कर काट रही है ।ऐसा क्यों है ? क्या जासूसी जैसे व्यवसाय में आने का साह्स करने के बाद भी स्त्री को खतरा महसूस होता है ? वह खतरे भरे प्रोफेशन में भी कम खतरे के काम का हिस्सा जुटा रही है ? ताकि उसका खुद का भी परिवार बदस्तूर चलता रहे ?



परिवार को पवित्र संस्था कहकर स्वयम इंडिया टुडे ने सार्कास्टि टोन दे दी है । अपनी शुरुआती स्थिति में भी परिवार या घर जैसी संस्थाएँ कितनी पवित्र थीं इस पर भी खोज बीन की ज़रूरत है ।शायद इस बात पर भी आपत्ति हो बहुतों को , लेकिन सच यही है कि परिवार बचाओ आन्दोलन स्त्री की पितृसता वाली इमेज को खत्म करो आन्दोलन से बड़ा नही होना चाहिये । परिवार बचना है तो उसे स्त्री से ही घर बनता है वाली पूर्वधारणा के बिना बचाना होगा । न कि उसकी कीमत पर । घर बनेगा तो दो से चाअर से या पांच से या .........अकेले के दम पर नहीं ......मेरे मत से तो इस बोझ से अपनी बेटी को पालना भी एक बड़ा अपराध है ।



खैर , यह अवांतर प्रसंग है जो एक अलग पोस्ट की मांग करता है । फिलहाल जासूसी में स्त्री के इन कदमों का स्वागत होना चाहिये और यह जासूसी घर से इतर भी कुछ ज़रूरी कामों में स्त्री को खतरों का सामना करने को और अपनी साख बनाने को तैयार रहना चाहिये ।घरेलू समझ करियर के विस्तार व अन्य पक्षों में रुकावट न बनने पाए ।

8 comments:

समयचक्र said...

जासूसी में स्त्री कदमों का स्वागत है .

Unknown said...

एक नई जानकारी वाली पोस्ट के लिए शुक्रिया.

Anonymous said...

दुनिया के लिए भारत की महिलाओं को इस रूप में देखना हैरत की बात होगी पर हमारे देश में स्त्रियों से जासूसी का काम लेना कोई नई बात नहीं है. संस्कृत ग्रंथों में (खासकर मौर्यकाल के आसपास के; विशेषतः कौटिल्य) वर्णन है की महिला गुप्तचरों को कैसे शत्रु राज्यों में भेद लगाने व राज्य के लिए संभावित खतरों को को पहले ही निबटाने में लगाया जाए. हमारे प्राचीन राज्यों की प्रतिद्वंदिता का इतिहास विषकन्याओं की कहानियो से लबरेज़ है. अभी साल भर पहले ख़बर आई थी की आई एस आई सुंदर महिला जासूसों को भारत के रक्षा अधिकारीयों को लुभा कर रहस्य उगलवाने के लिए भारत भेजने की योजना पर काम शुरू कर चुका है.

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

ये एक अच्छी बात है कि महिलाएं अब जासूसी के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं लेकिन उससे भी ज्यादा दुख की बात ये है कि उनकी जासूसी केवल रिश्तों और घर के आसपास ही केंद्रित कर दी गई है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जासूसी के काम में महिलाओं का पदार्पण अनेक संभावनाओं के द्वार खोलेगा। पारिवारिक मामलों तक सीमित होने की बात से किसी को दुःखी होने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसमें ‘विशेषज्ञता’ हासिल करके अपना सिक्का जमाया जा सकता है। एक बार जम गये तो सेवा का विस्तार अपने आप होने लगेगा… सफलता की शुभकामनाएं।

seema gupta said...

"wah kmal, i salute to them"

मैथिली गुप्त said...

नीलिमा एवं नीलिमा जी;
ये कतई सच नहीं है कि महिलाओं की जासूसी केवल रिश्तों और घर के पास केन्द्रित कर दी गई है.
कोरपोरेट जासूसी के क्षेत्र में महिलायें अधिक मात्रा में सक्रिय हैं एवं सफलतम हैं.

आर. अनुराधा said...

साथियो, पांच दिन की छुट्टी काटकर अभी-अभी लौटी हूं। सुरेश गुप्ता जी की टिप्पणी पर आधारित पिछली पोस्ट पर बहस में शामिल न हो पाने का थोड़ा अफसोस है। लेकिन मौजूदा पोस्ट तो सनसनीखेज न होने के बावजूद बहुत ही उत्साहवर्धक है। चोखेरबालियां और भी नए-नए मुकामों तक पहुंचें, इसी उम्मीद में

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