Tuesday, July 29, 2008

मैं सेंत सेंत कर रखती हूँ चालीस साल पुराने अचार की तरह, वक़्त

एक बड़े कुनबे के बीच अकेले पिसते हुए और अपनी छोटी छोटी चाहतों और ज़रूरी कामों को हमेशा पीछे रखते हुए , स्त्री जो मह्सूस करती है उसे सपना चमड़िया की यह कविता बखूबी बयान करती है ।ब्रह्म मुहूर्त में शुरु हुई स्त्री की भाग दौड़ रात सबके सो जाने के बाद तक जारी रहती है ।ऐसे में वक़्त उसे अपने हाथ से फिसलती रेत सा महसूस होता है जिसे थोड़ा भी बचा पाना और उसे अपने लिए खर्च कर पाना एक संघर्ष बन जाता है ।




मुझसे ज़्यादा कौन जानता है
वक़्त के बारे में
जो है तो मेरे पास
मुकम्मल
पर एक पूरे अभाव की तरह ।
जबकि ठीक मेरी नाक के नीचे
कुछ लोग उसे भोग रहे हैं
रौन्द रहे हैं
चहल कदमी कर रहे हैं
बाँहों में बाँहें डाले
मेहरबान चाँदनी में ।
घने पेड़ों के साँए में ।
वक़्त मेहरबन है उनपर
इतना
कि कभी कभार नही
अक्सर ही लेकर उसे
निकल जाते हैं लम्बी ड्राइव पर
जबकि मैं सेंत सेंत कर रखती हूँउसे
नानी के डाले ,
40 साल पुराने नींबू के अचार की तरह
मर्तबान में कसकर,
जो अब स्वाद से ज़्यादा
अचार से ज़्यादा
दवा बन गया है ।
फिर भी बचता नहीं
खर्च ही हो जाता है
हारी-बीमारी में
कि कुनबा बहुत बड़ा है मेरा ।
इसलिए मुझसे ज़्यादा
कौन जानता है
वक़्त के बारे में ।


सपना चमड़िया

8 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

सच्ची, संवेदनशील कविता।

Neelima said...

भोगे हुए यथार्थ की कविता !

गौरव सोलंकी said...

सच में सुन्दर

आर. अनुराधा said...

वाह!!एक आम विचार/भावना की सुंदर अभिव्यक्ति!

Suresh Gupta said...

सही बात है. ख़ुद से ज्यादा कौन जानता है अपने समय के बारे मैं. समय के साथ यह एक अजीब बात है कि उसे मिलजुल कर बचाया नहीं जा सकता. वह नींबू के अचार की तरह सेंत कर नहीं रखा जा सकता. आप कुछ करो या न करो वह तो खर्च हो ही जायेगा. एक इंसान पहले ख़ुद होता है, फ़िर परिवार का सदस्य, फ़िर समाज का और फ़िर देश का. समय का सही बट्बारा होना चाहिए इन चारों में. ख़ुद पर कुछ समय खर्च करना जरूरी है. कुनबा कितना भी बड़ा क्यों न हो. दूसरे अपना समय खर्च रहे हैं ख़ुद पर. उन पर और अपना समय खर्च करना बेमानी है.

जितेन्द़ भगत said...

वि‍गत वर्षों में वक्‍त को सपना जी ने जि‍स संजीदगी से जीया है, यह कवि‍ता उसी तस्‍वीर को पेश करती है। अनुभव का यह अचार,जो दवा बन गया है,ये दूसरों के काम ही आया है। उनके जीवन में वक्‍त के अभाव का कारण यही प्रति‍बद्धता है, जो मैंने खुद नज़दीक से देखा है।

pallavi trivedi said...

yatharth ko dikhati ek sachchi kavita...

अनूप भार्गव said...

दिल ढूँढता है फ़िर वही फ़ुरसत के रात दिन ....


सुन्दर कविता है ।

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