Thursday, July 17, 2008

उनमें फर्क है , पर वे समान हैं ....

चोखेर बाली के बाद और कोई परिवर्तन हुआ हो या न हुआ हो , इतना ज़रूर है कि हिन्दी ब्लॉग जगत अब जेंडर विमर्श करने लगा है चाहे उसका मंच चोखेर बाली हो या नही हो । और प्रतिक्रियावादी ज़ोरदार तरीके से उसका विरोध भी करने लगे हैं । इस वर्ष के आरम्भ से हिन्दी ब्लॉग जगत में स्त्री लेखन में जो सक्रियता आयी है उसके जवाब में या तो चुप्पी है ,या सहमति है {जो कि बहुत कम है} या सीधा सीधा विरोध है । ab inconvenienti , हों या बलबिन्दर , या सुनील ज़ालिम या सुरेश गुप्ता जी सभी अपने अपने तरीके से अपना विरोध् ज़ाहिर कर रहे हैं । कोई विज्ञान के तर्क के सहारे , कोई खबरों के सहारे , कोई भावुकता से , कोई धूर्तता से ।

पर फिर भी ये चुप्पी से बेहतर हैं !

मैं बहुत विस्तार में न जाकर सीधे जेंडर डिफेरेंस वाले वैज्ञानिक तर्कों को यहँ लेना चाहूंगी ।ab inconvenienti जी ने लिखा -


नारीवादी और समलैंगिक (गे) आलोचक अक्सर इन सवालों का जवाब 'ना' में देते हैं. उनका तर्क यह होता है की, जो भी अन्तर देखने में आता है वह ज्यादातर पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है, और पितृसत्ता के दमन के कारण स्त्रियों को घर गृहस्थी के कामों तक सीमित कर दिया गया. जैविक और प्राकृतिक संरचना क्षमता और भूमिका(लिंग आधारित) का निर्धारण नहीं करती.
{घरेलू श्रम का अवमूल्यन :मार्क्सवाद और उससे आगे में हमने कुछ ऐसे ही तर्कों को खोजा था और नारीवाद की मार्क्सवादी धारा में इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है , पल्लवी , आर अनुराधा , घुघुती जी ने भी इस पर बहुत अच्छा लिखा था}

ab inconvenienti आगे लिखते हैं -

कुछ नारीवादीयों का मानना है की "भिन्न लिंग" (यानि स्त्री और पुरूष) का विचार एक भ्रम या मिथ्या धारणा से अधिक कुछ भी नहीं है.

{साफ होना चाहिये कि हम सेक्स की बात नही कर रहे , हमारा मुद्दा जेंडर है ।सेक्स और जेंडर में अंतर है । और अगर यह जेंडर ही है , तो वाकई यह एक सामाजिक अवधारणा है जिसे हमी लोगों ने बानाया है । सेक्स प्राकृतिक होता है और उससे जुड़ी कुछ प्राकृतिक विशेषताएँ होती हैं। निश्चित रूप से इसमें हम कैसा सोचते हैं यह भी आता है }

वे आगे लिखते हैं -

यह कहना की नर और नारी 'एक जैसे' हैं, सीधे सच को नकारना ही है.


{इसे नकारा जा ही नही सकता । पर जैसा कि मैने उनके यहाँ अपनी टिप्पणी में भी कहा कि - दोनों में फर्क है , पर वे समान हैं - इस बात को समझने मे भूल के कारण ही ज़्यादातर पुरुष और स्त्री भड़क जाते हैं । समानता का मतलब , एक जैसे होने का मतलब , बराबरी का मतलब , साइंस नही दे सकती । ये समाज के प्रश्न हैं । समाज विज्ञान ही इनका उत्तर दे सकता है ।क्योंकि जेंडर समाज ने बनाए हैं न कि विज्ञान ने । शारीरिक रूप से फर्क तो एक वयस्क और बच्चे में भी होता है तो क्या इसलिए हम कहें कि दोनों बराबर नहीं । मानव होने के नाते दोनों को जो गरिमा और सम्मान मिलना चाहिये वह इससे प्रभावित नही हो सकता कि कोई एक अपनी शारीरिक विशेषताओं के कारण किसी काम को करने में समर्थ या असमर्थ है ।


दूसरा ,

बराबरी का मतलब है -


1. एक दूसरे की भिन्नताओं का सम्मान करना ।
2.समान अवसर उबलब्ध होना ।
3. समान सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान मिलना ।
4.समान रूप से सभी सम्वैधानिक अधिकार मिलना ।
5.समान श्रम के लिए समान वेतन मिलना ।}

इसमें सबसे पहला सबसे महत्वपूर्ण है ।

आप जानते हैं कि पुरुष शिशु को जन्म नही दे सकता । फिर भी उसे अगर इस बात के लिए नीचा दिखाया जाए । उसे संतान सुख से वंचित किया जाए । या समाज उसे ताने दे । या उसकी इस इस शरीरिक विशेषता को उसके जीवन और अधिकारों को रेग्युलेट करने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो इसे क्या कहेंगे ?


अब आप जानते हैं कि कोई स्त्री माह के कुछ दिन परेशान रहती है , या वह गर्भवती हो सकती है और आप बस में उसे अपनी सीट ऑफर करते हैं तो इसमें किसी को विशेष सुविधा देना नही कह सकते । वही स्त्री जिसे आपने सीट ऑफर की यदि आप ही की पत्नी या बेटी हो तब आप समझ पायेंगे कि एक पुरुष साथी होने के नाते यह कितना ज़रूरी और सही है ।।

इस सब के लिए स्वयम ही सम्वेदनशील रहना चाहिये । नही रहते हैं इसलिए सीट रिज़र्व करनी पड़ती है । ठीक वैसे ही जैसे आपको अपनी पुत्री या बहन को अपनी सम्पत्ति का समान भागीदार बनाना चाहिये । नही बनाते हैं इसलिए कानून को इस समान अधिकार की रक्षा के लिए कदम उठाना पड़ता है ।

आगे वे लिखते हैं -


लड़के क्यों कार और बंदूकों वाले खिलौने पसंद करते हैं पर क्यों लड़कियां गुड्डे-गुड़िया, डॉल और टेडी जैंसे खिलौने पसंद करतीं हैं? आमतौर पर फेमिनिस्ट्स क दावा होता है की यह सामाजिक कारणों से होता है, पर अब हमारे पास यह कहने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं की लड़कियां और लड़के अपने अपने हारमोन स्तर से प्रभावित होते हैं.



{यह फिर एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसे एक वैज्ञानिक अपने तरीके से देख रहा है ।बच्चे के जन्म के साथ ही यह निर्धारित नही हो जाता कि उसे गुड़िया पसन्द आयेगी या बन्दूक । बच्चे के जन्म के समय मेहमान उपहार लाते हैं । लड़की हुई तो डॉल लाते हैं , लड़का हुआ तो बंदूक ले आते हैं । यहाँ तक कि बच्ची के जन्म के समय उसे गुड़िया नाम तक मिल जाता है , जैसे मुझे मिल गया था ।


बच्चे घर में अपनी माँ को हमेशा रसोई मे देखते हैं और पिता को हमेशा दफ्तर से आते , चाय मंगवाते , सुबह देर से उठते और माँ के लिए फैसले लेते देखते हैं ।

और यह तो मनोविश्लेषक फ्राय़ड ही कहते हैं न कि बेटी की रोल मॉडल माँ होती है और बेटे के लिए पिता । सो एक बड़ी भूमिका समाजीकरण की प्रक्रिया की है , जिसे नकारना और नारीवाद को दोष देना , सरासर गलत है }


आखिर में ---
जिन नामों को ab inconvenienti जी ने अपनी बात के पक्ष में उद्दृत किया वे हैं -
प्रोफेसर स्टीवन गोल्डबर्ग
डॉ. जेम्स डोबसन
एमरम शेंफील्ड
जॉन स्टोशेल
माइकल लेविस
रॉबर्ट नादे
फ्रेंक यार्क

मेरे हिसाब से सभी पुरुष हैं । स्त्री के सम्बन्ध में खुद स्त्री ने कम ही लिखा है । सच यह है कि शोध और अनुसन्धान के क्षेत्र भी तो अब तक पुरुष वर्चस्व के इलाके थे । आगे देखिये शायद स्त्रियाँ अनुसन्धान करें और ये सारे के सारे तर्क उलट जाएँ ।


इस विषय पर आगे भी जारी ................

29 comments:

Anonymous said...

आप बधाई की पात्र हैं

Unknown said...

दूसरी राय को विरोध मत समझिये. विचार विमर्श तो तभी आगे चलता है जब एक से अधिक राय होती हैं. दूसरी राय आपकी राय को या परिष्कृत कर सकती है या और मजबूत बना सकती है. उस से कोई नुक्सान नहीं होता.

बराबरी का मतलब है -
1. एक दूसरे की भिन्नताओं का सम्मान करना ।
2.समान अवसर उबलब्ध होना ।
3. समान सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान मिलना ।
4.समान रूप से सभी सम्वैधानिक अधिकार मिलना ।
5.समान श्रम के लिए समान वेतन मिलना ।

इसे अलग राय किस की होगी?

Pratyaksha said...

बहुत तार्किक और स्पष्ट विचार ! बहुत अच्छा सुजाता ..

annu said...

सुजाता जी,
आपके तर्क प्रशंसनीय ही नहीं, अकाट्य भी हैं। और ये लोग अक्सर तार्किकता के सहारे, सामाजिकता और साइंस के हवाले से गैरबराबरी के सच को गौण कर जाते हैं। यह सिर्फ तार्किक सचाई नहीं, मानसिक ऐय्यासी है।
आप साधुवाद की पात्र हैं, जो स्त्री मुद्दों के लिए एक मंच का काम कर रही हैं।
हमारे जैसी नई ब्लॉगर्स का मार्गदर्शन भी कर रही हैं। विश्वास एवं सहयोग बनाए रखें। आपकी ब्लॉग सूची में हमें भी शामिल कर हौसला अफजाई करने का कष्ट करें। कोई मुद्दा प्रासंगिक और सटीक लगे, तो स्थान भी दें।
आपके सहयोग की आकांक्षा।
अन्नू

Neelima said...

बहुत सही तर्क दिए हैं ! इस संबंध में मेरी टिप्पणी रूपी पोस्ट यहां है -
http://vadsamvad.blogspot.com

सुजाता said...

रचना जी , धन्यवाद !
प्रत्यक्षा जी , नीलिमा जी धन्यवाद !
अन्नू जी ,
आपका स्वागत है , अपना ई मेल आई डी मुझे chokherbali78@gmail.com
पर भेजिये ।

Rachna Singh said...

sujata
all those people who truly believe in equlaity can also write there views on http://pachaaspratishat.blogspot.com/
its a coincedence your post came today and i started it yesterday

सुजाता said...

Suresh Chandra Gupta said...
दूसरी राय को विरोध मत समझिये. विचार विमर्श तो तभी आगे चलता है जब एक से अधिक राय होती हैं. दूसरी राय आपकी राय को या परिष्कृत कर सकती है या और मजबूत बना सकती है. उस से कोई नुक्सान नहीं होता.
*********

सुरेश जी ,
समझने जैसा वहाँ कुछ नही है । मुद्दा है एक खास प्रकार के फ्रेम मे बन्द होकर सोचने का , जिसके चलते ज़्यादातर पुरुष कभी नारीवाद के पक्ष में खड़े नही हो सकते , न ही बराबरी की बात का समर्थन कर सकते हैं । इस चश्में को उतारने की बहुत ज़रूरत है कि स्त्री-पुरुष मे कैसी बराबरी ? यह चश्मा उतरेगा तभी सब मानेंगे कि व्यवस्था में कोई दोष है । जब मान लेंगे तो दूर करने को उद्यत होने ।
जब पता लग जाए आपको कि आपके घर के आगे कूड़े का ढेर है तो आप उसे उठा कर फेंकना चाहेंगे । नही मानेंगे तो उसे अनदेखा करके चलते बनेंगे । है न !
सो न मानने के सौ बहाने , जैसे कि साइंस और हार्मोंस :-)

स्वप्नदर्शी said...

Sujata, thanks for this post.
I see the post and the scientific justification of gender roles posted by these guys.
The very science behind these is flawed. its a personal interpretation of scientific facts and not a scientific hypothesis or theory. bas apane man maafik kuchh kayaas hai.

I can say that as a scientist who is working from past 20 years in the field of genomics research, there is no biological basis for geneder descrimination.
Majority of scientists and the new findings coming from human genome research clearly denounce genetic or biological basis of intelligence, behaviour, or social roles.
These type of flawed scientific arguments are often used to descriminate against geneder, race and nationality.

But have no basis. On a recent subtle remark on the race and intelligence made by Nobel laureate James Watson, have been criticised widely in scientific community. And Watson was removed from prestigious Cold Spring Harbor laboratory, for which he was founder and life time director.

http://www.cnn.com/2007/TECH/science/10/25/watson.resigns/index.html

Suresh Gupta said...

सुजाता जी, आप जैसा मर्जी सोचिये, आप स्वतंत्र हैं अपने तरीके से सोचने के लिए. मुझे लगता है कि आप को एक विशेष प्रकार की भाषा में लिखी राय की अपेक्षा रहती है, और जब वह उस रूप में नहीं मिल पाती तो आप उसे विरोध की संज्ञा दे देती हैं.

नारी प्रगति का समर्थन करने का अधिकार मात्र कुछ महिलाओं का नहीं है. पुरूष भी ऐसा कहने और करने का अधिकार रखते हैं. मैं हमेशा नारी प्रगति का समर्थक रहा हूँ. आफिस में अपने सीनियर साथियों की नाराजी की परवाह किए बिना मैंने कितनी बार महिला कर्मचारियों के योन शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष किया है. कितने केसों में पुरूष कर्मचारियों को सजा भी मिली है. लेकिन आज तक मेरी कोई राय आप को उचित नहीं लगी. लेकिन अच्छी बात यह है कि जिनकी राय आप को उचित लगती है आप उनका धन्य्वाद करती हैं.

मुझे आप के ब्लाग मंच पर नारीवाद के पक्ष में खड़े होने का सबूत देने की और बराबरी की बात का समर्थन करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. मैंने जीवन भर बराबरी का समर्थन किया है और करता रहूँगा. आप के ब्लाग पर तो मैं अभी कुछ ही समय से आया हूँ. मेरे विचार में नारी पर अत्त्याचार करने में पुरूष और नारी दोनों शामिल हैं. नारी अगर नारी पर अत्त्याचार करना बंद कर दे तो पुरुषों की हिम्मत नहीं पड़ेगी किसी नारी पर अत्त्याचार करने की.

pallavi trivedi said...

sujata...
bahut achcha aur taarkik lekh likha hai. bahut study karne ke baad tum likhti ho,achcha lagta hai.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बराबरी का मतलब है -
1. एक दूसरे की भिन्नताओं का सम्मान करना ।
2.समान अवसर उबलब्ध होना ।
3. समान सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान मिलना ।
4.समान रूप से सभी सम्वैधानिक अधिकार मिलना ।
5.समान श्रम के लिए समान वेतन मिलना ।
इन बातों का विरोध तो कोई अहमक ही करेगा। खासकर ब्लॉग की दुनिया के पढ़े-लिखे लोग तो कत्तई इससे इत्तेफ़ाक ही रखते होंगे। सुरेश गुप्ताजी ने भी इससे पूरी सहमति ही जतायी है। फिर ये त्योरियाँ क्यों चढ़ी हुई हैं? आइये इस आदर्श की प्राप्ति के लिए अपने हिस्से का कर्तव्य पहचानें और अपना योगदान सबसे पहले समर्पित करें।

सुजाता said...

इन बातों का विरोध तो कोई अहमक ही करेगा।
----
सिद्धार्थ जी ऐसे बहुत से अहमक हैं ।
सुरेश जी सहमत हैं , अच्छा है । पर साइन्स जैसी बातों से कुतर्क करने का तो कोई मतलब ही नही है न !
विग़्य़ान के आधार पर तो हिजड़ा भी पुरुष स्त्री की तरह शारीरिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ है । बस प्रजनन की दृष्टि से वह अलग है । और इस भिन्नता के कारण ही हम उसे सामाजिक -पारिवारिक जीवन से बाहर कर देते हैं ।
मेरा मात्र कहना यही है कि - समाज के प्रश्नों के उत्तर विज्ञान में खोजना और उन्हें तर्क के रूप में इस्तेमाल करना कुतर्क करना है या मूर्खता है ।

ab inconvenienti said...

'भिन्न लिंग' के आन्दोलनों से तात्पर्य है की नारियों की ही तरह बराबरी के लिए आन्दोलन कर रहे 'लैंगिक रूप से असामान्य' लोग. यह सेक्स से सम्बंधित नहीं है, उनके भी इन्सान होने के हक़ से है. इस हक़ से मुझे भी इंकार नहीं है, और मेरे इंकार करने न करने से कुछ बनता बिगड़ता भी नहीं है.

होरमोन स्तर तो प्रभवित करता ही है, होरमोन की थ्योरी पर मेडिकल साइंस की शाखा 'साइकियेट्री' और 'endocrinology' टिकी हुई है. प्रियदर्शिनी जी, आप किसी डॉक्टर से ऑन रिकॉर्ड यह 'testosterone & estrogen' की थ्योरी नकारने कहें. आप जीनोमिक्स में शोध कार्य करतीं हैं, हारमोन और मष्तिष्क पर उसके प्रभावों के बारे में आप कितनी गहरे से जानती हैं, आप ही जानें. क्योंकि, मेडिकल स्वयं ही इतना विस्तृत विषय है की एक न्यूरोलोजिस्ट भी endocrine system और साइकियाट्री के बारे में सामान्य बातें ही जानता है, और उससे भी कहीं कम बाकी डॉक्टर. और आपका विषय बायोटेक है, मेडिकल से कहीं दूर.
(वॉट्सन की टिप्पणी को ग़लत रूप में लिया गया, उष्ण-कटिबंधीय (ट्रोपिकल) देशों में रहने वाले लोग बहुत अधिक शारीरिक और मानसिक श्रम नहीं कर पाते, जैसे की गर्मी के मौसम में हम सभी दोपहर के समय आलस महसूस करते हैं. यह जेनेटिक्स का नहीं कॉमन सेंस का मामला है की गरम वातावरण हमारी क्षमता का ह्रास करता है. इतिहास और वर्तमान तो यही कहते हैं की शीत-कटिबंधीय इलाकों वाले देशों के पास 'extra edge' है. हममें कितनी ही इन्नेट एबिलिटी हो आज तक शीर्ष पर तो उत्तरी अमेरिका और यूरोप ही रहे हैं. और विज्ञान में भी कितनी पॉलिटिक्स और लेग पुलिंग है आपको भी अच्छी तरह पता होगा--पुरूष अधिक हैं!:)--).

फ्रायड मनोविज्ञान के प्रवर्तकों में से थे, वे हमेशा हमारे लिए सम्माननीय रहेंगे, पर वे उस ज़माने में थे जब बग्घियाँ चला करती थीं, आज एयरोस्पेस का युग है, उनकी कई बातें आउट डेटेड हो चुकी हैं, कुछ वैसे ही जैसे हिप्पोक्रेट की विधि से आज कोई डॉक्टर इलाज नहीं करता.

आपके तर्कों को अकाट्य वे लोग बता रहे हैं जिन्हें मसले के 'क ख ग' में भी कन्फ्यूज़न है ! महिला और पुरूष मानव के रूप में सामान हैं, और रहेंगे. पर उनमें मूलभूत अन्तर हैं, जो मष्तिष्क और शरीर से सम्बन्ध रखते हैं. अगर मैं अंतरों के बारे में बताने क प्रयास कर रहा हूँ, तो मुझे महिला विरोधी बताया जा रहा है. मेरे विचार से तो इन अंतरों को जानने के बाद पुरूष महिलाओं को और महिलाऐं पुरुषों को और अच्छे से समझ पाएँगी. इनसे ग़लतफहमियां ही दूर होंगी. मेरी ब्लॉग सीरीज़ में कई बातें ऐसीं भी आएँगी जो पुरुषों को पोलिटिकली इनकरेक्ट लगे! जैसे की कुछ बातें अभी महिलाओं को लग रहीं है. और यह बातें समझाना (वो भी हिन्दी में, ब्लॉग फोर्मेट में) कोई आसान काम नहीं है. कम से कम साल डेढ़-साल लग जायेंगे नियमित पोस्ट दूँ तब भी. अभी से ही भरपूर लानत-मलामत और गली-गलौच कर दें तो इतनी लम्बी बेगार बच जायेगी. :-)
पहले ही कोई राय न बनायें............

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

बिलकुल, बराबरी का अर्थ ही है, एक दूसरे की भिन्नताओं का सम्मान करना। पर सुजाता मैं यहां पर वैज्ञानिक आधार पर एक बात कहना चाहूंगी, मनुष्यों के अलावा दूसरी ज्यादातर जातियों में मादा नर से ज्यादा स्ट्रांग और महत्वपूर्ण मानी गई है। अंतर वहां भी है लेकिन वहां पर मादाएं नर से ऊपर हैं और सम्मानजनक स्थिति में है। हमारे यहां भी कभी मातृसत्तात्मक समाज था और अब भी कई हिस्सों और जातियों में है। समस्या तब थी, जब समाज पितृसत्तात्मक हो रहा था और उसे रोकने की बजाय, घर को बनाए रखने की शर्त पर स्वयं को सुरक्षा प्रदान करने की शर्त पर स्त्रियों ने स्वयं को कमजोर मानकर इसे स्वीकार कर लिया। फिर इसे नियम बना दिया गया कि स्त्री घर के भीतर रहेगी, पुरुष उसे सुरक्षा प्रदान करेगा कल तक जो इच्छा थी वो उस पर थोप दी गई।
फिर नर और मादा के बीच भिन्नता को सम्मान की बजाय हेय दृष्टि से देखा जाने लगा।

सुजाता said...

ab inconvenienti जी ,

आपके ब्लॉग की अगली कड़ियों का इंतज़ार है ।

मेरा मुद्दा बस यही था कि आपकी पूरी पोस्ट पूर्वाग्रह ग्रस्त थी । अब भी यही कह रही हूँ कि वह पोस्ट पूर्वाग्रह ग्रस्त है ।

तभी बार बार आपने - नारीवादी ऐसा कह्ते हैं , फलां आलोचना करते हैं .....कह कह कर जवाब दिये हैं ।
इसे प्रतिक्रिया कहेंगे :-)

स्त्री-पुरुष के अंतर को नकारने की बेवकूफी कोई नही कर रहा है । पर इन अंतरों के आधार पर यह निष्कर्ष देना कि स्त्री - राजनीति , विज्ञान , अनुसन्धान के इलाकों में नही आतीं तो इसका कारण बायलाजिकल है , मुझे कैसे भी हज़म नही होता ।
बाकी मैं भी मुद्दे का "क,ख,ग " नही समझ पाती ।
पर धीरे धीरे समझ जाऊंगी । आप आगे लिखते रहिये ।
अच्छा काम कर रहे हैं । बस पूर्वाग्रह से बचने की कोशिश करें ।

ab inconvenienti said...

वैसे मेरा रोल लेखों के चयन तक सीमित रहता है, इसके बाद मैं तटस्थ रूप से मात्र अनुवाद का काम करता हूँ. बस आप मेरे ब्लॉग पर नज़र रखिये, और कहीं टोन में पूर्वाग्रह झलक रहा हो तो सावधान करने का भी काम कीजिये. वैसे अब चयन और भी सावधानी से करूंगा.

मैं नेट पर व्यस्त समय निकाल कर आपके सामने तथ्यों को रख रहा हूँ, तो कम से कम गालियों और अनर्गल आरोपों की तो उम्मीद नहीं ही करूंगा. महिलाओं से कुछ प्रश्न पूछने पर पूर्वाग्रह के आरोप लगे, जबकि वह प्रश्न किस पुस्तक से लिए गए पहले ही बता दिया गया था. उन पुस्तकों की लेखक पति-पत्नी की युगल जोड़ी है, जो समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में अथोरिटी मानी जाती है.

अंग्रेज़ी जानने वालों ने भी बिना मूल पुस्तक पर नज़र डाले गालियाँ शुरू कर दीं. जबकि नेट पर पीडीऍफ़ फोर्मेट में पूरी पुस्तक उपलब्ध है. खरीदना नहीं चाहते न सही, नेट पर तो फ्री है न. कम से कम पढने के बाद ग़लत और पूर्वाग्रही चयन के किए उलाहने दें तो भी कोई बात है. बिना पढ़े कुछ भी सोच लेना.................

स्वप्नदर्शी said...

ab inconvenienti जी
aap kahate hai
"वॉट्सन की टिप्पणी को ग़लत रूप में लिया गया, उष्ण-कटिबंधीय (ट्रोपिकल) देशों में रहने वाले लोग बहुत अधिक शारीरिक और मानसिक श्रम नहीं कर पाते, जैसे की गर्मी के मौसम में हम सभी दोपहर के समय आलस महसूस करते हैं. यह जेनेटिक्स का नहीं कॉमन सेंस का मामला है की गरम वातावरण हमारी क्षमता का ह्रास करता है. इतिहास और वर्तमान तो यही कहते हैं की शीत-कटिबंधीय इलाकों वाले देशों के पास 'extra edge' है. हममें कितनी ही इन्नेट एबिलिटी हो आज तक शीर्ष पर तो उत्तरी अमेरिका और यूरोप ही रहे हैं. और विज्ञान में भी कितनी पॉलिटिक्स और लेग पुलिंग है आपको भी अच्छी तरह पता होगा--पुरूष अधिक हैं!:)--)."


Dear friend your logic is standing against you here. No biologists today, from research or medical practice, is standing behind Watson, but you are, I do not know if you are the only one who understand him? think about it!!

Secondly, you think that the cold environment contributed success of europe and America, ....
and European and American people have better mental and physical aptitude than us and rest of the people living in the warm climate...

These are very simplistic interpretations, and are devoid of the historic understanding of human race, and scientific evidence as well. Anyway lets talk about common sense

1. Where are seven wonders of the world?

2. who invented, paper, mettalurgy, the first medicines, the writing, agriculture and animal domestication? these are the pillars of human civilization and none of these happened in the europe and america?

3. prior to 300-400 years ago, america was inhabbitated by the native red Indians for centuries in cold climate of America, why were they not technologically advance like mordern day americans and europeans?

4. There are other places as well on this earth which are more or equally cold like america and europe, what about that? you think somebody living in our laddakh is more productive/intelligent then somebody living in delhi?

my friend, here is the key, this simplistic assumptions, and the kind of writing (in name of science), which have no scientific certainity and credibility, you are using knowingly or simple because of ignorance to justify, descriminations against race, geneder and natinality and so on.

ab inconvenienti said...

Dear Swapndarshi,

This blog space is specifically for women issues, and not for debating personal scientific views and taking sides. If you wish to clarify further, you are most welcome to comment on my blog.


But I feel I should tell why I think so.

My arguments and your reactions provide perfect illustration of incongruity of explaining scientific paradoxes in plain language.

Seven wonders were created by Europeans, Mongoloids(specifically Hans)and Arabs. The first two races are from northern hemisphere. Arabs and Semites are racially very close to Caucasoid. And ever wonder why Caucasoid, Semites and northern Mongoloids (Hans and Japanese) dominate the global intellectual arena.

Science, physiology, philosophy, mathematics and similar serious disciplines originated in Europe and China. China also has credit of developing technologies like paper, metallurgy and some first medicines.

Some anthropologist and historians claim that native Americans (prior to post-Columbian invasions) had quite advanced civilizations. Else, how can one explain the spectacular technological artifacts of Mayans, Incas and Aztecs. It is human nature to not to acknowledge losers' rich past. Irony!

And to your forth question, No. But don't you see A Laddhakhi or Gurkha or Sherpa has infinitely more mental and physical energy then people from their southern Indian counterparts (facing similar rugged challenges of nature.) And mind, by and large climate doesn't effect human nature instantly. Society adapts itself according to the climate and atmospheric surroundings. Its a rather complex process. We change in subtle ways.

And going by my cold-climate argument Siberians and Igloo people should be the smartest guys out there! But see, Europeans and Chinese are living in climatic conditions which may be most conductive for social development. Tough enough to pose all sorts of challenges, but not being too harsh to impair.

The social adaptation gets permeates inside all the way to our genetic code.

For every ancient Indian achievement, we can safely credit to our(semi Aryans) racial proximity to Caucasoid. And up to some extent fairly good climatic conditions of Himalayan region and plains of Ganges. (almost all of the mainstream Hindu civilization flourished there).

My arguments are of my own, and I stand by them. However politically incorrect they may seem. They are true, until proven wrong, through valid counter arguments.

ab inconvenienti said...

सात आश्चर्यों में से कोई अफ्रीका या दक्षिणी-गोलार्ध में भी है क्या? या कोई अत्यन्त विकसित सभ्यता? अफ्रीका को 'डार्क कॉन्टिनेंट' कहा जाता रहा है, इसमे आपको कुछ ग़लत लगता है? मुझे नहीं लगता.

पर इन्सान के रूप में हम बराबर हैं, और नस्ल के आधार पर भेदभाव को मैं भी अनैतिक मानता हूँ. सिर्फ़ पॉलिटिकल करेक्टनेस के नाम पर सच को छिपा जाने का पक्षधर मैं नहीं हूँ. कुछ सामने न आने देना, समस्या से भागना है, भागने से कुछ भी समाधान नहीं निकलता. कुछ वैसे ही जैसे अगर महिलाएं इस बात को नकार दें की 'मासिक पूर्व तनाव' का कोई अस्तित्व है, तो इसके समाधान के लिए होने वाले वैज्ञानिक शोध रुक जायेंगे, और पाँच से दस प्रतिशत महिलाएं जो इससे गंभीर रूप से महसूस करतीं हैं, उनके साथ अन्याय होगा.

सवाल उठेंगे तो जवाब भी मिलेंगे, जवाब नहीं हैं तो खोजे जायेंगे, इनसे भागना कैसा और मुंह क्यों फेरना?

ab inconvenienti said...

link given in the previous comment is not working this is correct link

Suresh Gupta said...

सिद्धार्थ जी की यह बात मुझे बहुत सही लगी - "आइये इस आदर्श की प्राप्ति के लिए अपने हिस्से का कर्तव्य पहचानें और अपना योगदान सबसे पहले समर्पित करें". मैं भी यही कहता रहा हूँ पर न जाने क्यों सुजाता जी की त्योरियां हमेशा चढ़ी रहती हैं. वह किसी पुरूष को कोई क्रेडिट नहीं देना चाहतीं. शायद वह नारी प्रगति पर कुछ कहना अपना एकाधिकार मानती हैं. मैंने अपनी पोस्ट में लिखा था कि सुजाता जी को एक विशेष प्रकार की भाषा में लिखी राय की अपेक्षा रहती है, और जब वह राय उस रूप में नहीं मिल पाती तो वह उसे विरोध की संज्ञा दे देती हैं और यह लिख डालती हैं - "ab inconvenienti , हों या बलबिन्दर , या सुनील ज़ालिम या सुरेश गुप्ता जी सभी अपने अपने तरीके से अपना विरोध् ज़ाहिर कर रहे हैं । कोई विज्ञान के तर्क के सहारे , कोई खबरों के सहारे , कोई भावुकता से , कोई धूर्तता से".

नारी प्रगति करे यह बहुत से लोग चाहते हैं. इसी में समाज की भलाई है, परिवारों की भलाई है. वह इस के लिए कुछ करना भी चाहते हैं. इसके लिए वह इस ब्लाग पर आते हैं. अपने तरीके से वह अपनी बात कहते हैं. मेरा कहना यह है, कि नारी प्रगति के लिए नारी को हर केस में 'आँख की किरकिरी' बनना जरूरी नहीं है. नारी प्रगति 'आँख का चैन' बन कर भी की जा सकती है. इस में समाज के एक बड़े वर्ग का समर्थन उन्हें मिलेगा.

Anonymous said...

मुझे एक दूल्हा चाहिए. मैं एक प्रगतिशील नारी हूँ. मेरा नाम है ........... जाने दीजिये, क्या करेंगे मेरा नाम जानकर. बैसे, नारी प्रगति के विरोधी मुझे 'आंख की किरकिरी' के नाम से जानते हैं. मैं विवाह की संस्था को दकियानूसी और नारी के विरुद्ध एक षड़यंत्र मानती हूँ. आप कहेंगे फ़िर मुझे दूल्हा किसलिए चाहिए? दरअसल मेरी मां ने यह धमकी दे दी है कि अगर मैं विवाह नहीं करूंगी तब वह आत्महत्या कर लेंगी. अब अपनी मां की जान बचाना मेरा कर्तव्य बन जाता है.

दूसरा कारण यह भी है कि जिस पुरूष के साथ मैं लिव-इन-रिलेशनशिप में रहती थी, मैंने पहले उसे ही विवाह करने के लिए कहा था, पर वह साला शादी की बात सुनते ही भाग गया. अब मैंने उस पर मुकदमा ठोक रखा है. अदालत जल्दी ही मुझे मुआबजा दिलवाएगी. इस स्थिति में 'दूल्हा चाहिए' का विज्ञापन देना पड़ा. लेकिन एक बात में साफ़ कर देना चाहती हूँ कि
शादी मेरी मर्जी और शर्तों पर होगी.

मैं शादी कोर्ट में करूंगी. तीन-चार घंटे आग के सामने बैठकर एक बेवकूफ पंडित की वकबास सुनना मेरे बस की बात नहीं है. शादी के बाद पुरूष मेरे घर पर आकर रहेगा. अनाथ पुरूष को प्राथमिकता मिलेगी. अगर किसी सनाथ पुरूष से शादी करनी पड़ी तब वह अनाथ होकर मेरे घर आएगा. मेरा मतलब है, अपने माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों से सारे संबंध तोड़कर वह मेरे घर रहने आएगा. शादी के बाद मेरे रिश्तेदार ही उसके रिश्तेदार होंगे. वह मेरे माता-पिता की सेवा करेगा. घर का सारा काम निपटाकर उनके पैर दबाएगा और उनके सोने के बाद ही सोयेगा. सुबह जल्दी उठ कर सबके लिए चाय बनाएगा. मेरा नाश्ता और लंच तैयार करेगा. मेरे आफिस जाने के बाद घर का सारा काम निपटायेगा. उसके बाद अपने आफिस जायेगा.

मैं एक पोस्ट-ग्रेजुएट कम्पूटर इंजीनियर हूँ. मेरे होने वाले पति को किसी भी हालत में ग्रेजुएट से ज्यादा नहीं होना चाहिए. मेरी लम्बाई ५ फीट ८ इंच है. उस की लम्बाई मुझसे २ इंच कम होनी चाहिए. मेरा रंग गोरा है, इसलिए उसे सांवला होना चाहिए. मैं सुबह जल्दी आफिस जाती हूँ और देर से वापस आती हूँ. इसलिए उसे एक ऐसे दफ्तर में नौकर होना चाहिए जिसमें देर से जाना और जल्दी वापस आना सम्भव हो सके. इस से उसे घर का काम करने में आसानी होगी. वह अपनी सारी तनख्वाह मुझे लाकर देगा. मैं उसे उस के खर्चे के लिए पैसे दूँगी. उस का कोई दोस्त मेरे घर नहीं आएगा. जब मेरे दोस्त घर आयेंगे तो वह उन की सेवा में हाज़िर रहेगा. वह मुझे मेडम के नाम से पुकारेगा. अगर वह मुझे प्राणनाथिनी के नाम से पुकारे तो मुझे ज्यादा अच्छा लगेगा. जैसे जानवरों को नाथ पहना कर काबू में करते हैं बैसे ही मैं भी अपने पति को काबू में रखूँगी.

मैंने अपने बेडरूम में एक स्पेशल बेड बनबा रखा है. उस पर एक व्यक्ति ही सो सकता है. इस लिए मेरा पति जमीन पर चटाई विछाकर सोयेगा. मेरे सामने उस की आँखे हमेशा झुकी रहेंगी. वह तभी बोलेगा जब में उसे बोलने के लिए कहूँगी. मैं ब्लाग पर लिखती हूँ. मेरा पति मेरी पोस्ट पर टिपण्णी पोस्ट करेगा. इस टिपण्णी में उसे मेरी राय की तारीफ़ करनी होगी. वह अपने कुछ दोस्तों से भी तारीफ़ की टिपण्णी पोस्ट करवाएगा.

मांग में सिन्दूर, पैरों में पाजेब और विछुये, हाथों में चूड़ियां जैसी जितनी भी चीजें शादीशुदा नारी को पहनने को कहा जाता है, मैं नहीं पहनूंगी. करवाचौथ का व्रत एक मजाक है. लेकिन अगर मेरा पति यह सारी चीजें पहनना चाहे और व्रत रखना चाहे तो मुझे अच्छा लगेगा.

जो पुरूष इन शर्तों को पूरा करते हों मेरी इस पोस्ट पर टिपण्णी देकर आवेदन करें. यह विज्ञापन देकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. आप सब प्रार्थना करें कि मुझे ऐसा पति जल्दी से मिल जाए.

ab inconvenienti said...

गुप्ता जी के स्तरहीन व्यंग्य से असहमत............ ऐसी बातों पर ध्यान न दें............ उम्र के सांतवे दशक में किसी से विचार बदलने के लिए कहना ठीक नहीं लगता......... न आप बदलेंगे

और गुप्ताजी अगर अगर तथ्यों का प्रतिवाद करना ही है तो स्वस्थ ढंग से कीजिये, इतना नीचे क्यों गिरते है??? वो भी आड़ लेकर, अभी पिछले ही कमेंट्स में आपने सहानुभूति का मुखौटा लगाया हुआ था.

आपका यह कमेन्ट आपकी हताशा को व्यक्त करता है.

Unknown said...

ab inconvenienti जी, भाई काफ़ी मेहनत करके व्यंग लिखा था पर आपने उसे स्तरहीन कह दिया. खेर कोई बात नहीं. अपनी-अपनी पसंद है. बैसे उम्र के सांतवे दशक में जो विचार बनते हैं वह दूसरों के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं. आप इस द्रष्टि से लें तो आपका काफ़ी मार्गदर्शन हो सकता है. मेरी सहानुभूति सबके साथ है, आपके साथ भी. वह एक दो व्यंग लिखने से कम नहीं हो जायेगी. और न ही आपके प्रति मेरी सहानुभूति कम होगी आपके दूसरे विचारों से जो आप ने यहाँ व्यक्त किए हैं. लिखते रहिये.पढ़ते रहिये. हो सके तो सीखते भी रहिये. इस से जीवन में रस आता है.

न जाने किसने यह व्यंग मेरे ब्लाग से उठा लिया और यहाँ पोस्ट कर दिया? कहीं वह आप ही तो नहीं? मेरे ब्लाग्स पर जाइए, आप को काफ़ी कुछ मिलेगा वहां. यहाँ तो मेरा आशीर्वाद स्वीकार कीजिये.

अनूप भार्गव said...

मुझे ab inconvenienti की टिप्पणी से सख्त आपत्ति है । सुरेश गुप्ता जी की बात से आप सहमत हों या न हों लेकिन की बातों में एक कन्सिस्टेन्सी है , ठहराव है , जीवन का अनुभव है । यदि आप उन से सहमत न भी हों तो भी कुछ सीखा जा सकता है । उन की उम्र को ले कर उस पर किया गया व्यंग एक बचकाना हरकत है ।

स्वप्नदर्शी said...

ab inconvenienti जी, कम से कम आप पढने-लिखने के शौकीन लगते है. मेरी आशा है, कि किसी दिन इस पढे लिखे को सही कसौटी पर रखकर मुल्यांकन करना भी सीख जायेंगे.

सुरेश गुप्ता जी के विचारो से मेरी असहमति है, पर मुझे लगता है, कि उनके अन्दर अपनी बात को और सोच को इमान्दारी से रखने की कुव्वत है. अपने आस-पास देखती हू, तो मेरी समझ मे बहुतायत मे उनकी सोच, उनके तर्क, समाज के एक बडे हिस्से के तर्क और सोच है. शायद उनमे बहुत से हमारे अपने करीबी रिस्तेदार, पारिवरिक मित्र भी है.
और सम्वाद की ज़रूरत बहुत ज्यादा है. इसीलिये असह्मति के बावज़ूद मै उनके प्रति आभारी हू, कि वो इतनी गर्मजोशी से इस सम्वाद का हिस्सा है.

सुजाता said...

. अपने आस-पास देखती हूँ, तो मेरी समझ मे बहुतायत मे उनकी सोच, उनके तर्क, समाज के एक बडे हिस्से के तर्क और सोच है. शायद उनमे बहुत से हमारे अपने करीबी रिस्तेदार, पारिवरिक मित्र भी है.
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सही कहा स्वप्नदर्शी जी !पर यह भी देखिये कि ये तर्क और सोच कितनी ढीठ है , अडिग है ।
पर हमें फिर भी उम्मीद है :-)

Unknown said...

सुजाता जी, किसी ने कहा है उम्मीद की चिंगारी कभी बुझने नहीं देनी चाहिए. अगर चिंगारी बाकी है तो वह भविष्य में कभी भी आग का रूप ले सकती है. मैं भारतीय पारिवारिक व्यवस्था का समर्थक हूँ. जो नए रास्तों पर चले गए हैं वापस लौटेंगे, ऐसी मेरी उम्मीद है.

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