Wednesday, July 23, 2008

रोना धोना किसी समस्या का हल नहीं है

कई बार लोगों को कहते सुना है की महिलायें रोकर दूसरों की सुहानुभूति हासिल करने की कोशिश करती हैं ,ज़रा ज़रा सी बात पर आंसू बहाने लगती हैं! रोना बुरा नहीं है बल्कि रोने से दिल का गुबार निकल जाता है और कुछ हद तक स्ट्रेस भी कम होता है लेकिन छोटी छोटी सी बातों पर रोना सिर्फ कमजोरी ही दर्शाता है! आज के ही एक वाकये ने मुझे ये पोस्ट लिखने को प्रेरित किया!

कल शाम को मैंने थाने पर नोट करा दिया था की मैं सुबह ११ बजे थाने आकर सभी कर्मचारियों की मीटिंग लूंगी!तय वक्त पर आज मैं थाने पहुंची लेकिन पाया की पहले से बताने के बावजूद कुछ कर्मचारी गैरहाजिर थे!पूछने पर पता चला की ये सभी अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित हैं!मैंने सभी की अनुपस्थिति रोजनामचे में दर्ज करा दी....करीब दो घंटे बाद जब मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी तब एक महिला कॉन्स्टेबल आई और न आने की माफ़ी मांगने लगी! मैंने उससे मीटिंग में उपस्थित न रहने का कारण पूछा तो उसने बताया की वह अपने बच्चों को स्कूल से घर छोड़ने गयी थी!मैंने पूछा की क्या वह अपने टी.आई. से पूछकर गयी थी तो उसने न में सर हिलाया!मैंने सख्ती से कहा कि उसे सजा मिलेगी..इस तरह की अनुशासन हीनता बर्दाश्त नहीं की जायेगी!इतना कहते ही उसने रोना शुरू कर दिया और सुबक सुबक कर कहने लगी कि ठीक है मैडम अगली बार से बच्चे स्कूल में ही बैठे रहेंगे! मुझे बहुत गुस्सा आया...उसके आंसू मुझ पर बेअसर थे!
मैंने उससे पूछा कि क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुमने अपने बच्चों के लिए आधे घंटे की छुट्टी मांगी हो और तुम्हारे टी.आई. ने अनुमति न दी हो? क्या तुम्हे शोभा देता है कि पुलिस फोर्स में रहते हुए तुम अपनी ड्यूटी से बिना बताये गैर हाज़िर हो जाओ? और जब तुम्हे बच्चों को स्कूल से घर छोड़ने में केवल आधा घंटा लगता है तो दो घंटे बाद आने का क्या औचित्य है? इन सभी सवालों का उसके पास कोई उत्तर नहीं था ...अगर कुछ था तो न रुकने वाले आंसू!
उसके जाने के बाद टी.आई ने बताया कि सभी महिला कर्मचारियों का यही हाल है..ज़रा सा भी टोका जाए तो तुंरत रोना शुरू कर देती हैं...इसके बाद कोई ज्यादा कुछ कह नहीं पता!

अगर व्यथा सच्ची है तो आंसू बहाना जायज़ है लेकिन अपनी गलती को आंसुओं से छुपाना गलत है!कोई भी इन आंसुओं से एक या दो बार ही पिघलेगा इसके बाद ये आंसू केवल खीज ही पैदा करते हैं!और एक बार मान लिया गया कि अरे...ये तो रोने धोने का नाटक है फिर सच्चे आंसुओं का असर भी किसी पर नहीं होगा! मैं मानती हूँ कि महिलायें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा रोती हैं लेकिन अगर ये बात बात पर रोना हमारे व्यक्तित्व को कमज़ोर बना रहा है तो क्या कोशिश नहीं करनी चाहिए कि ये कमजोरी दूर हो सके!यह भी सच है कि किसी भी महिला को चार लागों के बीच अगर डांट दिया जाए तो अपमान के कारण उसके तुंरत आंसू निकल आते हैं , शायद मुझे भी मेरा बॉस भरी मीटिंग में डांट दे तो मुझे भी बुरा लगेगा! इसलिए मैं हमेशा कोशिश करती आई हूँ कि मेरे काम में कोई कमी न निकाल सके! लेकिन हर वक्त ये संभव नहीं हो पता कि काम हमेशा अपडेट ही रहे!गलतियां भी होती ही हैं लेकिन आज मेरे अधिकारी ये जानते हैं कि मैंने मेहनत और कोशिश में कमी नहीं की है!

चूंकि दुसरे dipartments से मेरा ज्यादा वास्ता नहीं रहा इसलिए मैं केवल अपने विभाग की महिलाओं के बारे में ही बात करूंगी! पुलिस फोर्स एक अनुशासित फोर्स है और इसे ज्वाइन करने के पहले सभी को इसकी नौकरी की शर्तें पता होती हैं!एक तरफ आरक्षण की मांग की जाती है जो की दिया भी जा रहा है! लेकिन ज़रा सोचिये आरक्षण से ३३ प्रतिशत महिलायें फोर्स में आयें और कामचोरी करें तो क्या यह बात दिमाग में आना स्वाभाविक नहीं है की इससे अच्छा तो कोई पुरुष कर्मचारी होता कम से कम ड्यूटी तो करता!घर की जिम्मेदारी तो उम्र भर ही रहेगी लेकिन नौकरी और घर में सामंजस्य बैठाना बेहद ज़रूरी है ताकि नौकरी के साथ भी पूरा न्याय हो सके! यदि बच्चे छोटे हैं या अन्य कोई ऐसी समस्या है जिसके कारण घर पर ज्यादा वक्त देना पड़ता हो तो पुलिस विभाग में भी कई ऐसी पोस्टिंग्स हैं जहां दस से पांच बजे तक ही काम करना पड़ता है और सन्डे की छुट्टी भी होती है!और अपनी पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला देने पर पदस्थापना आसानी से मिल जाती है!लेकिन नहीं...पोस्टिंग चाहिए शहर के सबसे बड़े थाने में...जहां ऊपरी आमदनी की गुंजाईश हो और काम करने के नाम पर घर और बच्चों का बहाना! बात कड़वी है लेकिन सच है ! हांलाकि सभी महिलायें ऐसी नहीं हैं लेकिन एक बड़ा प्रतिशत व्यावसायिक रूप से दक्ष नहीं है इसलिए सभी महिलाओं के सन्दर्भ में यही सन्देश जाता है! हांलाकि निचले स्तर पर यह समस्या ज्यादा है!अधिकारी स्तर पर जिम्मेदारी का बोध है!

मैं रोने के खिलाफ नहीं हूँ न ही ऐसा है की मैं नहीं रोती हूँ !लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि अपने आंसू किसी जायज वजह के लिए बहायें न कि हर समस्या का समाधान आंसुओं से करने की कोशिश करें! साहस से परिस्थितियों का सामना करने से ही समस्याओं का निदान निकलेगा!चाहे घर हो या कार्य स्थल...बहादुर बने और याद रखें " रोना धोना किसी समस्या का हल नहीं है"

29 comments:

कुश said...

आपके लेख वाकई हटकर होते है.. बहुत बढ़िया सोच का परिचय

ab inconvenienti said...

औरतों के नकली आंसू आदमी नहीं पकड़ पाते, रोने की चाल उनपर असरदार है. पर औरतों में झूठ पकड़ने का एंटीना इनबिल्ट होता है :)

डॉ .अनुराग said...

इसलिए तो हम कहते है सलाम डी एस पी साहेब.........

मसिजीवी said...

पल्‍लवी,

हॉं इस ऑंसुओं का व्‍यावहारिक पक्ष ऐसा ही है- स्‍त्री के ऑंसू कम से कम वर्क प्लेस पर तो खीज ही उत्‍पन्‍न करते हैं (मेरा तो मानना है कि घर के मामले में भी ऐसा ही माना जाना चाहिए) पर ये ऑंसू कोई जैविक पदार्थ भर नहीं हैं (अब इन्‍कन्‍वेंटिए महोदय कोई 'वैज्ञानिक'शोध ले आएं तो भी) ये ऑंसू सामाजिक निर्मिति ही हैं हँसने की जगह मुस्‍कराने, शर्माने, पेर फैलाकर न बैठने की ही तरह।

दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर किसी पुरुष के सार्वजनिक तौर ऑंसू निकल आएं तब तो मर्दानगी का सारा मिथक ही उसके खिलाफ हो जाता है- यकीन मानिए जिस तरह स्‍त्री का रोना तकलीफदेह है, उसी तरह पुरूष से रोने का अधिकार ही छीन लेना भी अमानवीय है।

seema gupta said...

मैं रोने के खिलाफ नहीं हूँ न ही ऐसा है की मैं नहीं रोती हूँ !लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि अपने आंसू किसी जायज वजह के लिए बहायें न कि हर समस्या का समाधान आंसुओं से करने की कोशिश करें!
"ya very well said, tears should not be shown every where to every one"

Unknown said...

आपकी बात बलकुल सही है. नौकरी और घर में सामंजस्य बैठाना बेहद ज़रूरी है ताकि नौकरी के साथ भी पूरा न्याय हो सके.

रोना भी जरूरी है. रोने से मन का तनाव कम होता है. कहते हैं, रोने से हृदय रोग की संभावना कम हो जाती है. पर जबरदस्ती रोना ठीक नहीं है. उस से तनाव और बढ़ता है.

Rachna Singh said...

I agree with your notion pallavi that " tears " should not be used by woman as a tool to make their life comfortable . "tears " should not be used as "emotional blackmail "

स्वप्नदर्शी said...

आपकी बात ठीक है, अगर समाज मे स्त्री के और पुरुश के पास घर पर भी काम का बंट्वारा बराबर होता तब भी. जिस परिवेश से महिला सिपाही आती है, और उनके पारिवारिक जीवन मे घर और बच्चो की जिम्मेदारी उन्ही के उपर होती है. ऐसी स्थिति भी महिला सिपाही की नही होती, न इतनी पढी-लिखी ही वो होती है, न इतना कमाती है, कि घर के काम के लिये किसी को रख ले, या पति को घर के काम के लिये राज़ी कर सके, कई बार बदली की वज़ह से पति कही और नौकरी करता है, सो बच्चो की ज़िमीदारी औरत पर आती है. इसे महिला पुरुष समस्या की तरह सीधे न देख कर, परिस्थिति के हिसाब से भी देखे. और अगर आप इस सामाजिक समीकरण को एक दिन मे नही बदल सकती तो व्यक्तिगत स्तर पर अपने विभाग के सबसे कम्ज़ोर इकाई को कैसे कह सकती है. नौकरी के साथ-साथ बच्चे पालाना वाकई बहुत मुश्किल है. और भूखे बच्चो को स्कूल से लाकर कोई भी मा ऐसे तो छोड्कर नही आयेगी, कुछ खाने को भी देगी.

रोना, चाहे हथियार की तरह भी इस्तेमाल हो, वो बेबसी की निशानी है.

थोडा एक सपोर्ट सिस्ट्म बनाये ताक़ी ये महिलाये घर और काम के बीच बेलेंस बना सके. भाषण से कुछ नही होता. बच्चो को स्कूल से लाने की सामूहिक व्यवस्था इसका हिस्सा हो सकती है. और बच्चो के स्कूल से आने के बाद पोलिस मैस मे कुछ खाने की व्यव्स्था उन माओ /पिताओ के बच्चो के लिये होनी चाहिये, जो अपनी नौकरी मे तैनात है.

या फिर बाजाय 8 घंटे की लागातार डुटी के बजाय छोटे बच्चो की मा के लिये 4-4 घंटे की दो बार डुटी रखने का प्रस्ताव रखे, बीच मे कुछ घंटे के गैप के बाद.
आपका काम भी पूरा होगा, और एक मा और छोटे बच्चो को भी सुविधा होगी. इस तरह की व्यवस्था बहुत सी अमेरिकी, युरोपी कम्पनीयो मे, और विश्व्विधलयो मे है.
कुछ चीज़ो के सामूहिक हल भी खोजे जाने चाहिये, ताकी आपके कर्मचारी घर की चिंता से खाली हो सके. अमेरिका मे कम आय वाले परिवारो के बच्चो के लिये बहुत कम पैसे मे after school program है, और दूसरी चीज़े जिन्मे फ्री खाना भी है.

आप एक अच्छे पद पर है. अपने विभाग की परेशानी बताये, और उनकी जड तक भी पहुंचे. उनके लिये सकारात्मक कदम भी उठाये.

Anonymous said...

Quite easy to say

हांलाकि निचले स्तर पर यह समस्या ज्यादा है!अधिकारी स्तर पर जिम्मेदारी का बोध है!

If I read between the words, what you said and everyone knows is that often the officer cadre has access to the support staff (lower cadre) who can pick up the kids from schools or take care of them at home or do household jobs like getting grocery and depositing bills etc. This leaves the officers more time to invest/focus on their job. This is not sincerity towards the job, but convenience to dissuade the system from change for good. Which somehow you will agree.

So its not that the situation is bad at the lower level, your organization has not taken steps to overcome the difficulties faced by the lower cadre or rather by any cadre. Any concrete steps such as those suggested by Swapandarshi if implemented, not only benefit the sipahi, but their officers as well. This will make everyone happy and above all the lower cadre won't have to take the ashay support of rona dhna ya fir jhooth boolna. Our very own system's inequalities and inefficiencies compell them to take the support of such emotional qualities of a human being (man/woman). Tehre is no need if the system communicates and appreciates the job as well support s the needs of the employee.

Remember the best organisation is the one where an employee gets the benefits before s/he can even think about it, that also helps him/her professionally and personally. I think Police mehekma is way behind many others. Their own bosses are incapable of getting support for their employees, no matter it be employee benefits, community benefits or the worst ones on legal issues and the weapons support to tackle the crime.

ab inconvenienti said...

भारत में पुलिसवालों को अक्सर (कभी कभार नहीं अक्सर) १६ से १८ घंटे फील्ड ड्यूटी करनी पड़ती है. स्वप्नदर्शी जी अमेरिका के स्वप्न यहाँ मत दिखाइए, कोई फायदा नहीं. पुलिस वालों के लिए मेस की सुविधा भारत में अभी भी (दिवा) स्वप्न है, सिर्फ़ आठ घंटे ड्यूटी क्यों नहीं करना चाहतीं ये पुलिसकर्मी इसका कारण पहले ही बता दिया गया है. यहाँ भारत की पुलिस के पास स्टाफ ड्यूटी वाहनों के पेट्रोल/मेंटेनेंस और स्टेशनरी के लिए भी पैसे नहीं रहते(फंड ही नहीं आता), आप स्कूल बस के इंतजाम की बात कर रहीं हैं. और बहानेबाज़ अपनी आदत से मजबूर, आज यह समस्या दूर कर दी कल दूसरी लेकर हाज़िर.

आप किसी कम्पनी की सीईओ हों, तो क्या आप अपने कर्मचारियों की बहानेबाजी, कमज़ोर परफोर्मेंस उनकी पारिवारिक मजबूरियों को देखते हुए नज़रंदाज़ कर देंगी? खासकर तब जब आप अपने कार्यालय के बहार कोई भी निर्णय न ले सकती हों, और फंड्स की घोर कमी हो?
अगर जिम्मेदारियां सही ढंग से पूरी नहीं कर सकते तो उपरी कमाई के लालच में फील्ड ड्यूटी मत करो. जैसे हजारों पुलिसवाले दस से पांच फिक्स ड्यूटी करते हैं, तुम भी करो. वैसे अमेरिका में भी पारिवारिक मजबूरियों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, सीधे कह दिया जाता है अगर काम करना है तो तरीके से करो वरना नौकरी छोडो. है की नहीं?
और हाँ, भारत में सरकार अपने कर्मचारियों का इतना ही ख्याल रखती तो उपरी कमाने की ज़रूरत ही न पड़ती.

स्वप्नदर्शी said...

किसी भी देश मे जनतंत्र एक लगातार चलने वाली प्रणाली है, जो निरंतर आगे बढती है. ये एक दिन मे हासिल नही होती. अलग-अलग सुमुदायो का प्रतिनिधित्व, उनकी जनतंत्र मे भागीदारी, और सबके लिये मानवीय समाज बनाने का लक्ष्य ही किसी सच्चे जनतंत्र का होना चाहिये, और किसी भी ईमान्दार, देशभक्त कहलाने वाले का भी.

इसीलिये, अलग-अलग नज़रिये से जब समस्या को देखा जायेगा, तभी सम्पूर्ण समझ बनेगी और तभी उसका सही समाधान भी निकलेगा. मौजूदा पुलिस और दूसरे तमाम कार्य स्थलो मे अभी तक सिर्फ पुरुष ही रहे है, महिलाओ का प्रवेश कुछ ही दशको की बात है, इसीलिये कार्य् प्रणाली भी बहुत कुछ मर्दो के नियम से चलती है.

अब महिलाये आयी है, और नौकरी करने लगी है, तो कार्य स्थल मे नयी तरह के समीकरण भी बने है, और नयी तरह की समस्या भी आयेगी, और उसके समाधान भी नये ही निकलने चाहिये. घर की /बच्चो की ज़िम्मेदारी आज भी औरत के ही सर ज्यादा है, मात्रत्व एक विशेष स्थिति है, जिसका पुरुषो से कोई सीधा तुलनात्मक रिश्ता नही है.
माना कि बच्चे पैदा करना और उन्हें पालना किसी का व्यक्तिगत काम है, पर ये एक बडा सामाजिक काम भी है, आपके समाज के लिये एक
workforce भी तो तैयार हो रही है. उसके लिये समाज को कुछ सुविधा औरत को देनी पडेगी. ऐसा नही हो सकता कि औरत को इसके लिये समाजिक स्पेस से बहिस्क्रित किया जाय, सज़ा के बतौर.

इसीलिये, मै कामचोरी की हिमायत नही कर रही हू, पर काम की स्थिति को सबसे निम्न वर्ग के कर्म्चारीयो के लिये मानवीय बनाने की वकालत जरूर करती हू. काम के घंटे तय होने चाहिये, 16-18 घंटे सिपाहियो को काम नही करना चाहिये, और मौजूदा स्थिति मे एक मा को तो बिल्कुल नही. एक आज़ाद इंसान का हक़ है, और बच्चो का भी कि उनके माता-पिता का कुछ समय उन्हें मिले.

सबसे गरीब और निचले दर्ज़े पर की औरते और उनके बच्चे पूलिस विभाग की तमाम खामियो की कीमत क्यो चुकाये? इस पक्ष को समझने, और इसकी, एड्वोकेसी के लिये ही हमें पल्लवी जैसी खुले दिमाग और कुछ करने की चाह रखने वाली महिलाओ की ज़रूरत है.

पल्लवी से मेरा आग्रह है कि वो पूलिस विभाग मे महिलाओ की नौकरी को आसान बनाये, और पुरुष के माडल को अपनाकर नही, महिलाओ के लिये एक मानवीय काम लायक स्थिति बनाने की तरफ पहल करे.
कम से कम एक पूरा दिन किसी महिला सिपाही के साथ 24 घंटे हर जगह बिताये., देखे कैसे स्कूल मे छोटे कर्म्चारियो के बच्चे पढते है? क्या पहनते है? क्या खाते है?

और आखिरी बात, अगर कोई अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराता है, और तथकथित जिम्मेदारी निभाता है, तो सिर्फ इसीलिये, "ज्यादा कमाई " वाले थाने मे पोस्तिग का हक़्दार नही है, और रिश्वत्खोरी, भ्रास्टाचार माफी लायक नही है.

और महिला पूलिस कर्म्चारी, अपनी मर्ज़ी से अपने तबादले नही करते. आपके जैसी ऊंचे पदासीन अफसर रिश्वत लेकर, या सज़ा देकर छोटे लोगों को इधर-उधर पटकते है.

ab inconvenienti said...

???!!!

सुजाता said...

आप स्कूल बस के इंतजाम की बात कर रहीं हैं. और बहानेबाज़ अपनी आदत से मजबूर, आज यह समस्या दूर कर दी कल दूसरी लेकर हाज़िर.
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मुझे कहना ही होगा कि अब इनकंवीनियेंटी जी आप भयंकर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं । और ऊपर की पंक्ति के निहितार्थ ये हैं कि पुलिस में काम करने वाली निचले स्तर की महिलाएँ बहाने बाज़ होती हैं ।
दूसरी बात ,
क्यों न किया जाए समस्या का हल ? अगर आप पश्चिमी देशों का कूड़े मे फेंका हुआ सिस्टम अपना सकते हैं , उनका लाइफ स्टाइल अपनाने को मरते हैं , उनके बेकार पड़े परमणू ऊर्जा प्लांट्स खरीद सकते हैं तो फिर काम की बातें क्यों नही अपना सकते ??

काम करने की जगह पर यदि क्रेच जैसी सुविधाएँ हों तो ऐसी समस्या क्यों आयेगी ?
आंगनवाड़ी जैसी सुविधाएँ क्यों नही दे सकता पुलिस विभाग या कोई भी विभाग ? क्या भारत सरकार गरीब है ? या यह देश गरीब है ? बढ्ते हुए मॉल्स की संख्या और बढ्ते हुए करोड़पतियों की संख्या देख कर तो ऐसा नही लगता !

तीसरी बात ,
निचले स्तर पर यह समस्या ज़्यादा होने की वजह साफ है , जो स्वप्नदर्शी जी ने बताई । आप सी ई ओ हैं तो अपने लिए साधनों , सुविधाओ की व्यवस्था कर सकती हैं , 3 हज़ार या उससे कम तंख्वाह पाने वाली कैसे कर सकती है ?
क्या आपने मजदूरनी के बच्चों को देखा है जो धूप - बारिश में कंस्ट्रक्शन साइट पर ही नंगे लेटे रहते हैं ? उनकी क्या व्यवस्था करेगी वह मजदूरनी जो साइट पर काम भी कर रही है और बीच बीच में आकर बच्चे को दूध भी नही पिला सकती वर्ना मालिक डाँटेगा !
आखिरी सवाल , पल्लवी से -
आपने कहा -
लेकिन ज़रा सोचिये आरक्षण से ३३ प्रतिशत महिलायें फोर्स में आयें और कामचोरी करें तो क्या यह बात दिमाग में आना स्वाभाविक नहीं है की इससे अच्छा तो कोई पुरुष कर्मचारी होता कम से कम ड्यूटी तो करता!
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मुझे लगता है कि हमारे मनों में पुलिस वालों के लिए जो इमेज है आपने उससे विपरीत बात कही है :-)
यह एक खुशखबर है कि कॉंस्टेबल , हेड कॉंस्टेबल अपनी ड्य़ूटी पूरी करते हैं जो कि स्त्रियाँ नही कर पातीं ।स्त्री के पास तो घर बार का बहाना है , पुरुष यों आलसी है ??

सुजाता said...

आखिरी पंक्ति में 'यों ' को 'क्यों' पढा जाए !

सुजाता said...

एक और ज़रूरी बात !
पल्लवी से बिलकुल सहमत हूँ कि - काम की जगह पर रोना बहुत गलत इमेज बनाता है । यह बहुत इरीटेटिंग है । हालांकि कई बार स्त्रियाँ वाकई भयंकर परेशानी मे होती हैं ।
यहाँ तक कि घर की बातों , बहसों और झगड़ों मे भी आँसू बहाना या आँसुओं से लड़ाई लड़ने की कोशिश करना बहुत गलत है ।

ab inconvenienti said...

मुझे कहना ही होगा कि अब इनकंवीनियेंटी जी आप भयंकर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं । और ऊपर की पंक्ति के निहितार्थ ये हैं कि पुलिस में काम करने वाली निचले स्तर की महिलाएँ बहाने बाज़ होती हैं ।
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न, महिलाएं ही नहीं मेरे विचार से तो आधे से ज़्यादा पुरूष और महिलाऐं खानापूर्ति ही करेंगे(करते ही हैं) अगर उनपर कठोर नियंत्रण न रखा जाए. बस महिला होने से शब्द बदल जाते हैं बहानेबाजी और चालाकी वही रहती है.

और मैंने कब कहा की समस्या का हल न किया जाए, हमारा हिंदुस्तान इतना भ्रष्ट है की जिसके हाथ फंड आता है वही बहती गंगा में नहा धो लेता है, टैंकर भर लेता है, कपड़े भी धो लेता है. ये सब योजनाएं पहले से ही चल रहीं हैं, पर लाभ पता नहीं लोगों को क्यों नहीं मिल पा रहा? हम गरीब नहीं हम महालालची और महाभ्रष्ट हैं.

सी ई ओ या व्यापारी होने के नाते मैं कम से कम लागत में काम कराना चाहूँगा, अगर कम कीमत, कम सुविधाओं में काम हो सकता है तो क्यों मैं 'अंडरप्रिविलेज्ड ग्रुप', यानि अधिक उम्र वाले, विकलांग, अवसादग्रस्त, नर्सिंग मॉम जैसे वर्गों के लिए परेशानी मोल लूँ? उनके लायक काम होगा तो मिलेगा वरना हजारों और काम करने तैयार हैं. फ़िर जब तक बच्चे छोटे हैं (कुछ सालों के ही लिए) extra income वाली फील्ड जॉब का मोह त्यागा जा सकता है, जिससे की बच्चों को अच्छी परवरिश मिल सके. पर वे १० से ६ की जॉब लेंगी नहीं, क्योंकी फील्ड की इसी मोटी ऊपरी कमाई से बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा!

सुजाताजी और स्वप्नदर्शीजी, आपका प्रश्न दरअसल यह है :
उन महिला कांस्टेबलों (जो छोटे बच्चों की माँ हैं) को क्यों मलाईदार थानों से वंचित रखा जाए? उन्हें भी हक़ है अपने पुरूष सहकर्मियों की ही तरह 'वसूली' का, यह आपका पूर्वाग्रह है की आप उन्हें इस अतिरिक्त आय से वंचित रखना चाहते हैं.
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जैसा की डीएसपी मैडम ने लिखा,
यदि बच्चे छोटे हैं या अन्य कोई ऐसी समस्या है जिसके कारण घर पर ज्यादा वक्त देना पड़ता हो तो पुलिस विभाग में भी कई ऐसी पोस्टिंग्स हैं जहां दस से पांच बजे तक ही काम करना पड़ता है और सन्डे की छुट्टी भी होती है!और अपनी पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला देने पर पदस्थापना आसानी से मिल जाती है!लेकिन नहीं...
वरना जबतक बच्चे छोटे हैं, ९ से ५ का लो-प्रेशर ऑफिस जॉब जिसमें सन्डे व अन्य छुट्टियाँ मिलतीं है नही की जा सकती? इसमें अपने काम से भी समझौता नहीं करना पड़ेगा, परिवार बच्चों पर भी पूरा ध्यान दिया जा सकेगा.

क्या इससे आपको ऐतराज़ है?


and one more thing, this male dominated police system is not sympathetic towards its male members even, how can you expect it to adapt itself to female needs overnight?See this picture, our police system can't arrange even water in the fields. imagine a female personnel in his place.

स्वप्नदर्शी said...

corruption is not acceptable to me in any circumstances. weather a field job or in the office job.

And is pallavi or mr inconvinient ji, are you saying that in field job corruption is acceptable for anybody?

Secondly, there are many more police station in a city and may be 1/4th or 1/10 offices, where possibility of 9-5 work and sunday off exists in police department. I do not believe that all mothers have that choice to be posted in those cozy posts?


And yes even mothers are capable of field duty, but introducing flexibility at work place in terms of hours, having breaks, but doing the required work, better working conditions, are the rights of any workers. and demands for 8 hours work , lunch break, paid leaves for workers are accepted practices for all over this planet for workers, why can't these can be norm for the people working for Indian police force?

There is a union of IPS and IAS officers, who demand for their right as a workers. But for lower cadre of police department, forming unions, organizing for their rights as a workers are against the law? why is this double standard?

Motherhood is a special condition for women, but old age, and health related problems, including heart patients, can be the criteria for the men who are serving police force. and they should be accomodated when needed.

The people who are investing their whole life, the most productive time of their life and sometimes are aware of loosing life in this quest, for hand to mouth salary, deserve humane working conditions.
Otherwise, the police will do only "vasoolee" in fild and "laathee charge" on innocent people to save interests of goons and corporations.

pallavi trivedi said...

सबसे पहले मैं ये स्पष्ट कर देना चाहती हूँ की मेरा लेख केवल उन महिलाओं को ध्यान में रखकर लिखा गया है जो की काम में ध्यान नहीं देती हैं और रोकर अपनी गलती छुपाती हैं...ये सभी पर लागू नहीं होता है!अब मैं सबके सवालों के उत्तर देती हूँ....
१- मैंने जी द्रष्टान्त दिया उसमे मुझे ऐतराज़ इस बात पर नहीं था की वो महिला अपने बच्चों को स्कूल से लेने क्यों गयी? मुझे उसकी अनुशासन हीनता गवारा नहीं है! यदि वह किसी पॉइंट पर ड्यूटी कर रही है तो उसे अपने टी,आई. से अनुमति लेकर ही अपना स्थान छोड़ना चाहिए!दो घंटे तक उस पॉइंट पर कोई नहीं था अगर वो टी.आई . से कहकर जाती तो उसकी जगह पर उतनी देर के लिए अन्य किसी कर्मचारी को लगाया जा सकता था!अगर आप इसे भी गलत नहीं मानते और चाहते हैं की महिला होने के नाते उसे ये chhoot भी मिलना चाहिए की वह अनुशासन हीनता करे तो माफ़ करिए मैं बिलकुल सहमत नहीं हूँ!
२- यह सोचना गलत है की पुलिस विभाग में महिलाओं की परेशानियों को नहीं सुना जाता है बल्कि अन्य विभागों से कहीं अधिक सपोर्ट किया जाता है! जो बातें सरकार के स्तर पर हल होनी हैं उनका तो कुछ नहीं किया जा सकता है. लेकिन खुद के स्तर पर दूर हो सकने वाली समस्याओं पर पूरा ध्यान दिया जाता है!यहाँ झूलाघर भी है जहां बस द्वारा घर से लेने और घर छोड़ने की सुविधा उपलब्ध है!
३- भ्रष्टाचार किसी के भी द्वारा किया जाए माफ़ी योग्य नहीं है!यदि पुरुष भ्रष्टाचार कर रहे हैं तो क्या महिलाओं के भ्रष्टाचार की भी हिमायत करना चाहिए! मैं ये भी नहीं कहती की सभी पुरुष अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार हैं !जब उनके बारे में कोई लेख लिखूंगी तो इस पर भी लिखूंगी!लेकिन अभी केवल महिलाओं के लिए ये लेख लिखा गया है!हर व्यक्ति चाहता है की वह अच्चे थानों में नौकरी करे लेकिन जब पारिवारिक समस्याए हों तो यह मोह त्यागा जा सकता है!क्योकी बड़ी जगह की जिम्मेदारी भी बड़ी होती है!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

" रोना धोना किसी समस्या का हल नहीं है"

सहमत.
==============
डा. चन्द्रकुमार जैन

Unknown said...

एक अच्छी बहस के लिए वधाई, सिवाए व्यक्तिगत टिप्पणियों के जो सुजाता जी की शायद आदत बन गई है. मैं हर टिप्पणीकार की किसी न किसी बात से सहमत हूँ, पर स्वपनदर्शी जी की राय मुझे सही लगती है. कांस्टेबल स्तर पर कार्य बहुत है पर पगार और अन्य सुविधांए कम या न के बराबर. कांस्टेबल सीनिअर अफसरों के व्यक्तिगत काम करने की ड्यूटी पर भी लगाए जाते हैं. इस स्तर पर पगार और सुविधाओं में सुधार होना जरूरी है. पल्लवी जी की अनुशाशन की बात से में सहमत हूँ, पर एक सीनियर अफसर होने के नाते उन्हें कांस्टेबल स्तर पर सुधार के लिए कुछ करना चाहिए.

pallavi trivedi said...

मैं सुरेश जी की बात से सहमत हूँ...मैं स्वयं मानती हूँ की कॉन्स्टेबल स्तर पर महिला और पुरुषों को बहुत सारी दिक्कतों और असुविधाओं का सामना करना पड़ता है!और काम के हिसाब से वेतन बहुत कम है !और महिला होने के नाते ये परेशानियां निश्चित रूप से थोडा और बढ़ जाती हैं !मैं अपने अगले लेख में इस मुद्दे को उठाऊंगी लेकिन अभी मेरे लेख का मुद्दा ये नहीं था इसलिए विषय से भटककर अन्य मुद्दों को शामिल करना उचित नहीं लगा वरना लेख अपने मूल विषय से हट जाता!इसका मतलब ये न समझा जाये की मैं महिलाओं को बेहतर सुविधाएं देने के पक्ष में नहीं हूँ!

Anonymous said...

Pallavi, in your comments #1 aspect presented is right (not quite correctly explained in the original article which it should have been. Lost in presumptions). The person should have informed and the officer might have found a person to support her for a couple of hrs. Which is great. However, I would look at this situation in a different way. Lets say even if the person do request for a timeout and the officer is either not available or ignores her request or even does not allow it. Them what's the situation for that women. IN that case she needs to find a way to bring her kids from school. Now if the system was there to pick up the kids was there she would not bother, however if a system is not in place, there is no other choice, but the person will take a time out sometimes after tell (because it works) or sometimes without telling (because her request is not entertained). I am not every person is same, but now after the incident has passed, it would be great if you can talk to the person to find out what could be the solutions she has if such an eventuality comes. How many of her colleagues face such a situation and what's the best way forward, so that there could be a nice resolution to the problem. I am sure the organization will accommodate the requests. She will be bold enough to discuss with you. If you ask her in an assertive way why she left the position the other day, the person will go in a negative way and will never be able to confide with you on the reality. Therefore the rona dhona will start again, which is not the solution to the root problem. Its a human resource management problem and not a personal/professional problem.


Now the CEO problem why would s/he invest in providing support to the needy workforce? Remember sometime before working as a CEO you were in the similar situation as your staff is. So at least 10% of the time you invest in the company/organization management try to put your foot in the shoes of your workforce and experience for yourself the harsh realities they face in terms of lack of skills, health care, working in an unsafe environment, lack of safety gears, lack of physical rest, lack of personal support for family by the employees by employers and see how much pressure the workers have. I know everyone is there to make money to support the family, be it a rickshaw or taxi driver, police officer/constable/scientist/doctor/professor/etc. Even though the primary job responsibility is profession, but in the end it does boil down to personal needs. If the job does not provide good support for personal needs, then its hard to find a good professional commitment, which is a fact. However workforce do try their best to provide a commitment to the work assigned to them majority of the time. Be careful when you make a lopsided comments.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पल्लवी जी, आपकी पोस्ट और उसपर गर्मागरम बहस पूरा पढ़ लेने के बाद कुछ कहने को शेष नहीं रह जाता है। बस, एक सफल पोस्ट के लिए बधाई देता हूँ।
और हाँ, सुजाता जी की धार बदस्तूर नुकीली बनी हुई है, इससे पुरुषों को सावधान रहना पड़ेगा।

pallavi trivedi said...

@anonimous...

its impossible that nobody of her senior is unavailable aat police station. if t.i. is not there even then a head constable sits there 24 hours .and he records that who is going and who is coming.according to rules everybody is supposedtell him where and why he\she is going and he will write it in a register.and one more thing........at first i asked her very humbally but her answer could not make me satisfied. think she left her duty without informing anybody, in that case if some crime happens there then who will be responsible? desciplene is the root of any poice,militry or armed forces. we cant compare it with other services.

Anonymous said...

Pallavi you missed the point. I said ask at a later time and not on the spot. People do react when when asked to respond instantaneously on the spot, but they cool down and discuss the problems with you at a later time. I am not questioning indiscipline, instead the reason she took cover for lying and crying. What made her do that. Its not the kids/any other emergency job, but possibly out of compulsion and inadequate support from the family. This may be a particular case of indiscipline, but you can't ignore that in majority of the cases its not indiscipline.

आर. अनुराधा said...

"If the job does not provide good support for personal needs, then its hard to find a good professional commitment"
"How many of her colleagues face such a situation and what's the best way forward, so that there could be a nice solution to the problem."
"Its a human resource management problem and not a personal/professional problem. "


मैं Anonimous से पूरी तरह सहमत हूं, और खुशी है कि महिला बनाम पुरुष के छद्म मंच से मुद्दा मानवीय जरूरतों के वास्तविक मंच पर आ गया है। दरअसल समस्या इतनी जटिल भी नहीं कि इसकी जड़ को कहीं दूर ढूंढने की कोशिश की जाए। पल्लवी और उनकी तरह के और समर्थ लोग अपने से कम समर्थ (व्यवस्था में!) लोगों के साथ बैठ कर सामूहिक सहमति से कोई रास्ता निकालें।
वैसे, इसे उस महिला के रोने-धोने के परे मुद्दे को इस तरह भी तो देखा जा सकता है कि उस शादीशुदा, बाल-बच्चेदार महिला पुलिस को घर में वांछित सहयोग नहीं मिल पा रहा है- बच्चा साझा है तो फिर उसके पिता या फिर घर के और सदस्य उसके पालन की जिम्मेदारी में साझेदारी से भाग तो नहीं रहे हैं, जिसकी वजह से उस महिला को सारी 'अनुसासनहीनता' करनी और फिर उसकी 'सजा' भी भुगतनी पड़ रही है!

सुजाता said...

pallavi trivedi said...

इसका मतलब ये न समझा जाये की मैं महिलाओं को बेहतर सुविधाएं देने के पक्ष में नहीं हूँ!
____
पल्लवी ,आपकी पोस्ट के उद्देश्य को गलत नही समझा गया है । बस उसे विस्तार मिल गया है । इस बात की बधाई भी आपको जाती है कि आप ऐसे मुद्दे उठाती रही हैं जिनपर अच्छी बहसें होती रही हैं । टिप्पणी मे दिए आपके तीनों बिन्दुओं से सहमति है और अनुराधा जी की ही तरह इस बात की खुशी भी कि बहस का मुद्दा महिला बनाम पुरुष के छद्म मंच से मुद्दा मानवीय जरूरतों के वास्तविक मंच पर आ गया है।
अभी और पक्ष देखे जाने बाकी हैं ।

स्वप्नदर्शी said...

"जो बातें सरकार के स्तर पर हल होनी हैं उनका तो कुछ नहीं किया जा सकता है. लेकिन खुद के स्तर पर दूर हो सकने वाली समस्याओं पर पूरा ध्यान दिया जाता है!"


Pallavi this is why I wrote such a long commemnt. The personal solutions are short living and die when officer changes, but problems persist and become worse. In any democracy, to change things at government level, and making policies, we need people or advocacy groups. and people like you, who are in a position to participate or made reccomendation for forming new policies.

Therefore, develope a vision for long term solutions and whatever you can do, try to do that, even a small bit, may be raise a issue in your meetings. the lower cadre do not have this opportunity. We the people, in democracy, have a space to dream for better things for us and our people.

Rajesh said...

पल्लवी जी,
अपने बड़ी मार्के की बात कही है। आज अगर महिलाये चाहती हैं की उन्हें समाज में बराबरी का हक मिले, तो दुश्वारियों का सामना करने का माद्दा भी रखें।

सटीक बात कहने के लिए साधुवाद!

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