Monday, July 28, 2008

अ फेयरी टेल बोले तो दुनिया की सबसे छोटी परी कथा

एक बार एक पुरुष ने महिला से पूछा- "क्या तुम मुझसे शादी करोगी?" उस महिला ने कहा:" नहीं "!

और उसके बाद वह महिला सदा सुख से रहने लगी। वह खरीददारी करती, नाचती, पहाड़ों पर घूमने जाती, ट्रेकिंग और कैंपिंग करती, घर को हमेशा साफ सुथरा पाती, जब मन करता तभी पकाती, कभी बहस में नहीं पड़ती, पैसे नहीं बचाती और सर्दियों में सारा गर्म पानी अपने लिए इस्तेमाल कर पाती।

नाटक देखती, खेल कभी नहीं देखती, अपनी नजर में हमेशा ऊंची रहती, कभी नहीं रोती या झींकती, सज-धज कर, बन ठन कर कभी नहीं रहती, अपने सादे कपड़ों में ही रहती और हमेशा खुश और सहज रहती।

समाप्त

49 comments:

सुजाता said...

बहुत खूब ! शानदार !सटीक !
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एक बार एक पुरुष ने महिला से पूछा- "क्या तुम मुझसे शादी करोगी?" उस महिला ने कहा:" नहीं "!

और उसके बाद वह महिला सदा सुख से रहने लगी।
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अनुराधा जी ,
इसे सोमवार की व्रतकथा होना चाहिये ;-)

आर. अनुराधा said...

क्यूं न ऐसा हो कि व्रत कथाओं की जगह ऐसी (यह मेरी पसंद है। सब अपनी पसंद की परी कथाएं चुनने के लिए आज़ाद हैं) परी कथाएं ही सुनीं-सुनाईं जाएं!!!

Anil Kumar said...

वाह वाह! क्या आपकी शादी हो चुकी है, या होने वाली है? या फिर आप भी एक परी बनना पसंद कर चुकी हैं? :)

पूजा प्रसाद said...

mujhe lagta hai ye duniya kee sabse sundar parikatha hai. Sujata ka khyaal bhi bura nahi hai :)

आशीष कुमार 'अंशु' said...

क्या कहीं पुरुष परी की कथा भी लिखी गई है, मुझे लगता है वह भी शायद इससे भिन्न ना हो. कथा के लिए आभार ...

आशीष कुमार 'अंशु' said...

क्या कहीं पुरुष परी की कथा भी लिखी गई है, मुझे लगता है वह भी शायद इससे भिन्न ना हो. कथा के लिए आभार ...

pallavi trivedi said...

मैं सहमत नहीं हूँ...कई महिलायें शादी करके बहुत खुश हैं,कई बहुत दुखी!अगर पुरुष भी ऐसा ही सोचने लगें तो शादी का अस्तित्व ही ख़तम हो जाये!मेरे विचार से शादी करना चाहिए लेकिन सोच समझ कर ताकि बाद में दुःख न मिले!यदि पार्टनर अच्छा और समझदार हो तो शादी के बाद भी परीकथा बन सकती है!

Rajesh said...

अपना-अपना नज़रिया है! क्या किसी स्त्री के अपने पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त, शिक्षक, रिक्शावाले, सब्जीवाले, दूधवाले इत्यादि से कभी मतभेद नही हुए? फिर पति-पत्नी के मतभेद पर इतनी हाय तौबा क्यों?

मतभेद मनभेद न बने, तभी समाज चलेगा।

आर. अनुराधा said...

-मसला सिर्फ मतभेद का नहीं है बल्कि भेद-भाव का है।
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- लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं कि महिलाओं से जुड़े ये मुद्दे किसी के व्यक्तिगत मुद्दे नहीं बल्कि एक व्यापक समूह, समाज या शायद पूरी दुनिया के औरत समूह के मुद्दे हैं। इस मौके पर व्यक्तिगत सवाल या टिप्पणियां व्यक्ति की संकीर्ण मनःस्थिति को जताते हैं।
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-फिर वही बात जो सुजाता बार-बार इस मंच से ऐलान कर रही हैं- शादी मूलतः महिला को पुरुष की संपत्ति बनाने और उसी संपत्ति का वारिस पैदा करने का जरिया बनाने का सामाजिक मान्यताप्राप्त तरीका है।
-आज से 26 साल पहले वुमन अ जर्नल ऒफ लिबरेशन पत्रिका में महिला विषयों की जानी-मानी विशेषज्ञ लिंडा फेल्प ने अपने एक लेख में लिखा था- ‘हमारा सांस्कृतिक नजरिया पूरी तरह पुरुष के अनुभवों की अभिव्यक्ति है। यहां तक कि महिलाएं अपने शरीर को भी पुरुष की नजर से ही देखती और आत्म मुग्ध होती रहती हैं। उनकी कल्पनाएं और फंतासियां भी पुरुषों द्वारा ही परिभाषित और नियंत्रित होती हैं।‘ अच्छी बात यह है कि औरत अब समझने लगी है कि महिला मुक्ति के विश्व-अभियानों के बाद भी मूलतः कुछ नहीं बदला है। ‘अब सेक्शुअल फ्रीडम का मतलब है, पुरुषों के लिए ज्यादा मौके न कि महिलाओं के लिए किसी नए तरीके का अनुभव।‘
-तो इस पृष्ठभूमि में अगर कोई महिला इस फंदे में फंसने से बचने का रास्ता ढबंढने की कोशिश करे तो क्या बुरा है!

सुजाता said...

‘अब सेक्शुअल फ्रीडम का मतलब है, पुरुषों के लिए ज्यादा मौके न कि महिलाओं के लिए किसी नए तरीके का अनुभव।‘
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सही कहा आपने ।
दर असल बदलाव की बात करना और बदलाव की राजनीति दो अलग चीज़े हैं । ऊपर से जो बातें बहुत क्रांतिकारी लगती हैं वे भी कई बार व्यवस्था का पोषण कर रही होती हैं ।एक बार स्वप्नदर्शी जी ने कुछ इसी तरह की बात कही थी ।इसलिए बदलाव को लेकर हमेशा सावधान रहने की ज़रूरत होती है । औरत की आज़ादी एक पुरुष के बिस्तर से शुरु होकर दूसरे पुरुष के बिस्तर पर खत्म हो जाए तो वह बदलाव नही , उसके पीछे व्यवस्था को पोषित करने की राजनीति है ।यही कारण है कि प्रोग्रेसिव और बहिर्मुखी महिलाओं में घर-बाहर के पुरुष हमेशा स्कोप देखते हैं !
खैर
यह अलग पोस्ट की दरकार रखती है ।और विषय शायद मेरी इस बात से भटक रहा है ।


आशीष कुमार 'अंशु' said...
क्या कहीं पुरुष परी की कथा भी लिखी गई है, मुझे लगता है वह भी शायद इससे भिन्न ना हो. कथा के लिए आभार ...
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आशीष जी , शायद आप जानते ही हों कि हमारे समाज मे इसे बहुत खुलेपन के साथ कहा जाता है कि पत्नी नही पनौती है , या ज्वालामुखी है , या मै फिर से बैचलर होना चाहता हूँ , या पत्नी से पीछा छुड़ाने की कोशिश{इसमें पत्नी की मौत की कामना भी शामिल होती है और मायके भेजने की साजिश भी} करते हुए फिल्मों और टीवी सीरियलों में साइड भूमिका वाले पुरुष पात्र । एक स्त्री के लिए तो यह सोचना ही भयावह माना जाता है । कभी सुना है किसी विवाहित महिला को कहते आपने कि काश मैं फिर से कुँवारी हो जाऊँ ! या काश मेरी इस पति से पिंड छूटे । या पति नही पनौती है । उसे तो हमेशा यही मानना सिखाया जाता है कि- जैसा भी है तेरा आदमी तो है ।

Unknown said...

बहुत अच्छी कहानी है. खुदा करे यह हकीकत बने और सारी नारियां सुख से रहें. इस पीढ़ी के साथ यह स्रष्टि समाप्त हो और ईश्वर दूसरी स्रष्टि की रचना करे.

Vandana Pandey said...

बडी प्यारी परीकथा लिखी है अनुराधा जी, बधाई। कई दिन बाद चोखेर बाली से मिलने आई थी, आते ही मज़ा आ गया।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा said...

पुरुष ने पूछा, महिला ने ना कहा, महिला खुश।
पुरुष का क्या हुआ ?

Udan Tashtari said...

हल्के फुल्के में लो सारी बात- :)

एक और लधु कथा (लधुकथा भी क्या-सूक्ष्म कथा :))

एक पुरुष ने शादी करने से मना कर अपने आपको गधा बनने से बचा लिया.

-समाप्त

(यह मुद्दा भी किसी के व्यक्तिगत मुद्दा नहीं बल्कि एक व्यापक समूह, समाज या शायद पूरी दुनिया के पुरुष समूह के मुद्दा है। :))

Rajesh R. Singh said...
This comment has been removed by the author.
Rajesh R. Singh said...

व्यवहार मे ढृडता लाने का अर्थ यह कत्तई नही है कि आप दुसरो पर चिल्‍लाएं, रोब जमाएँ, गुस्सा करें, दोष लगाएं या उन्हे भयभीत करें । दृढ होने का अर्थ है कि आप अपने पक्ष मे खडे हैं और साथ ही दुसरों के अधिकारो का भी हनन नही कर रहे अर्थात स्पष्‍ट शब्दों मे अपनी बात कहना या सब के सामने रखना। यह आपकी भावनाओं, इच्छाओं, व विचारों का ईमानदार प्रस्तुतिकरण होता है। इसे प्राय: आपके आत्म-सम्मान व आत्म-छवि से भी जोडा जाता है। वैसे "एकला चलो रे" का मार्ग मुक्ति और मोक्ष के कामियों का है जीवसृष्टि के लिए प्रकृति द्वारा दी गयी जिम्मेदारी निभाने वालों का नहीं !

आर. अनुराधा said...

"इस पीढ़ी के साथ यह स्रष्टि समाप्त हो और ईश्वर दूसरी स्रष्टि की रचना करे."
नई सृष्टि की भी भली चलाई। कीड़े-मकौड़े, चिड़िया-कबूतर, शेर-भालू, हाथी-घोड़े... आपने किसी की शादी होते देखी है? क्या इनकी प्रजातियां पीढ़ी के साथ ही नष्ट हो गईं? दिलचस्प तथ्य है कि कॉकरोच और घड़ियाल इस धरती पर जीवित जीवाश्म हैं क्योंकि जाने कितने युग बीत गए पर सब कुछ सहते हुए वे अब भी धरती पर मजे से विचर रहे हैं, बिना शादियां किए।
सृजन एक बहुत सुंदर प्रक्रिया है जो बेहतरीन ढंग से तभी अंजाम दी जा सकती है जबकि सर्जक पूरे मन से, पूरी तन्मयता से, पूरी खुशी से उस प्रक्रिया में डूब जाए।
वैसे, सृष्टि का नष्ट होना क्या क्या इतना सहज है जितना इसके नष्ट होने की कामना करना? और नष्ट करने की बजाए सृजन की कामना क्यों न की जाए। सृष्टि का नष्ट होना और फिर बनना क्या बच्चों का खेल है कि चाहा और हो गया?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यानि कि अब हमें कीड़े-मकौड़े, चिड़िया-कबूतर, शेर-भालू, हाथी-घोड़े...कुत्ते-बिल्ली आदि से सामाजिक जीवन जीने का ढंग सीखना चाहिए? जहाँ पूरे मन से, पूरी तन्मयता से, पूरी खुशी से उस सृजन की प्रक्रिया में डूब जाना दृष्टिगोचर होता है।
एक तरफ परी-कथा दूसरी ओर विवेक से पलायन...
मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आया जी...
दुनिया बनाने वाले काहें को दुनिया बनायी?

अनूप भार्गव said...

-परी कथा वह होती है जिस में सब कुछ अच्छा ही होता है , वह आदर्श स्थिति जिसे हम सब जीना चाह्ते हैं ।
ज़रा सोचिये कि क्या वह ’राजकुमारी’ अपनी पूरी ज़िन्दगी खुशी से गुज़ार लेगी ? यह भी पूछ कर देखिये , हम में से कितनें उस स्थिति में होना चाहेंगे ?

-जब समस्याओं की बात हो तो विकल्प की भी बात होनी चाहिये ।

"शादी (अगर) मूलतः महिला को पुरुष की संपत्ति बनाने और उसी संपत्ति का वारिस पैदा करने का जरिया बनाने का सामाजिक मान्यताप्राप्त तरीका है" तो उसका विकल्प भी सुझायें ?

-यदि शादी नारी के शोषण का माध्यम है तो कल्पना कीजिये उस अराजकता की जो ’शादी’ न होने के कारण उत्पन्न होगी और उस में नारी का शोषण कम होगा या अधिक ?

-चाहे सब के लिये न हो लेकिन ’शादी’ आज भी कम से कम एक वर्ग के लिये ’जबरदस्ती’ नही है बल्कि ’विकल्प’ है | कितनो को आपने इस विकल्प का लाभ उठाते देखा है ?

बात शायद थोड़ी सी कड़वी हो गई लेकिन ....

Life comes in a package , it is not a buffet dinner where you can pick and choose only the good things.

आर. अनुराधा said...

तभी तो यह परी कथा है जनाब, सत्य कथा नहीं। कल्पना की उड़ानें भरने की कोई मनाही थोड़े है।:-))

आर. अनुराधा said...

अगर विवेकी इंसान बिना शादी के अराजक हो सकता है तो उससे भले तो कीट-पतंगे हैं जो शादियां नहीं करते और अराजक भी नहीं पाए जाते।

अनूप भार्गव said...

हाँ कीट पतंगो में अराजकता देखी तो नहीं कभी ! हमेशा कतार बना कर चलते हैं, चींटी को कभी पति की शर्ट आयरन करते नहीं देखा । उन का कोई ’चोखेर बाली’ जैसा ब्लौग भी नही है , लगता है अपनी सामजिक स्थिति से खुश ही हॊगी । :-)

माहौल को ज़रा हल्का करने के लिये दो लघु कविताएं जो हम नें काफ़ी बरस पहले अपने बड़े भाई साहब को उन की शादी के अवसर पर तोहफ़े में दी थी :

१.
शादी के बाद से वे काफ़ी बदल गये हैं
पहले थे महाकाव्य अब क्षणिका रह गये हैं ।

२.
क्यों और सताते हो इस को दुनिया वालों
बेचारा पहले से शादी शुदा है ।
:-) :-) :-)

गौरव सोलंकी said...

यदि सुजाता बार-बार इस मंच से ऐलान कर रही हैं- शादी मूलतः महिला को पुरुष की संपत्ति बनाने और उसी संपत्ति का वारिस पैदा करने का जरिया बनाने का सामाजिक मान्यताप्राप्त तरीका है।
तो मैं चोखेरबाली के उद्देश्यों को लेकर ज़रा सा कनफ्यूज़ हो रहा हूं।

Suresh Gupta said...

अनुराधा जी, मैंने जानवरों की शादियाँ होती नहीं देखीं. किसी ने नहीं देखी होंगी. पर इंसान शादी करते हैं और यह शादी ही अलग करती है इंसान को जानवरों से.

आर. अनुराधा said...

जी। और जो तमाशे, फजीहतें होती हैं शादी में, वह भी तो इंसानों की ही खासियत है!

सुजाता said...

गौरव जी ,
कंफ्यूज़ होने जैसा कुछ नही । दर असल मैने कुछ पोस्ट्स में ज़िक्र किया था कि शादी और , परिवार ऐर निजी सम्पत्ति की अवधारणा की उतपत्ति के साथ ही स्त्री की मातहती और गुलामी की परमपरा का जन्म हुआ ।पर पवित्रतावादी यह मानने में हमेशा हिचकिचाते हैं कि परिवार और विवाह परमपराओं का जन्म एक खास मकसद के तहत हुआ ।
खैर ,
पहले भ्राह्मण भी यही प्रचार करते थे कि स्त्री और निम्न जातियाँ , अछूतों को वेद पढने का अधिकार नही और उनकी उतपत्ति ब्रह्मा के चरणो6 से हुई है और सवर्णो6 की सेवा करना उनका धर्म है , कर्तव्य है , नियति है । आप देखिये कैसे ये सब बातें गलत साबित हो गयीं और इनके पीछे छिपा षड्यंत्र सामने आ गया । हो सकता है सवर्ण आज भी यही सोचते हैं कि एस टी या एस सी है ....पर इससे क्या ? उनका ढोंग उजागर हो चुका ।
अत: बात केवल इतनी ही सी है कि हम किसी संस्था की पवित्रता में विश्वास करने से पहले उसके उद्भव के बारे में अच्छे से जान लें और भ्रमों में न जियेँ । और जब जान जाएँ तो उसमें आज के हिसाब से कुछ सुधार लाने के लिए उद्यत हों ।
विस्तार से आप यह पोस्ट पढें -
http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/07/blog-post_03.html


दूसरा ,
चोखेर बाली यह ऐलान कतई नही कर रहा कि - शादी मत करो ।

यह पोस्ट केवल एक इच्छा की अभिव्यक्ति है वह आरोपित विचार नही है । क्या स्त्री का ऐसी इच्छा जताना रौब जमाना कहेंगे जैसा कि राजेश जी ने भी कहा ? स्त्री के समबन्ध में "स्वाभाविक" शब्द को हमेशा स्त्रियोचित से जोड़कर ही देखा गया है । रोना , शर्माना , दुखी होना , सुन्दर दिखने की होड़ ---- ये सब स्वाभाविक कहा जाता है जबकि यह सब समाजिक ट्रेनिंग के तहत है । दूसरी ओर अपने मन के काम करना - कर पाना ,पेड़ पर चढना , ठहाके लगाना , दोस्त बनाना ,रास्ते में कोई गीत गाते-गुनगुनाते चलना ,सर्दी की धूप में पार्क की हरी घास पर लम्बे लेट सुस्ताना ---- ये सब अस्वाभाविक कहे जाते हैं पर ज़रा सोचिये कि एक मानव के नाते ये सब कितने स्वाभाविक हैं ।
बैचलर होकर जीने की इच्छा तो पुरुष जाने कब से जतता रहा है , इस पर चुट्कुले भी बनते रहे , शादी के समय विवाहित दोस्त कहते हैं - बकरा हलाल होने जा रहा है , जबकि शादी के रिश्ते में ज़्यादातर पुरुष को ही उसकी मर्ज़ी और सुविधा के मुताबिक मिलता है ।
तो खैर एक परिकथा एक स्त्री ने भी कह दी है । इस विषय पर विस्तार से लिखने की ज़रूरत लग रही है । पर मुझे हैरानी इस बात से है कि स्त्री लीक से हटकर बात करे तो तुरंत भयमिश्रित प्रतिक्रियाएँ क्यों आने लगती हैं ।

आर. अनुराधा said...

"बैचलर होकर जीने की इच्छा तो पुरुष जाने कब से जतता रहा है , इस पर चुट्कुले भी बनते रहे , शादी के समय विवाहित दोस्त कहते हैं - बकरा हलाल होने जा रहा है , जबकि शादी के रिश्ते में ज़्यादातर पुरुष को ही उसकी मर्ज़ी और सुविधा के मुताबिक मिलता है ।"
"माहौल को ज़रा हल्का करने के लिये दो लघु कविताएं जो हम नें काफ़ी बरस पहले अपने बड़े भाई साहब को उन की शादी के अवसर पर तोहफ़े में दी थी :

१.
शादी के बाद से वे काफ़ी बदल गये हैं
पहले थे महाकाव्य अब क्षणिका रह गये हैं ।

२.
क्यों और सताते हो इस को दुनिया वालों
बेचारा पहले से शादी शुदा है ।
:-) :-) :-)"

सुजाता और अनूप की ये टिप्पणियां विमर्ष के लिए एक नए लेख का मसाला नहीं बनातीं कि शादी- या बैचलरहुड के मजाकों का भी समाजशास्त्र होता है? किसी लड़की या महिला को इस विषय पर मज़ाक करते सुना है? कभी ऐसा चुटकुला भी आया है कि "क्यों और सताते हो इस को दुनिया वालों
बेचारी पहले से शादी शुदा है ।"

या- "शादी के बाद से वे काफ़ी बदल गई हैं
पहले थीं महाकाव्य अब क्षणिका रह गई हैं ।"

दरअसल किसी आम हिंदुस्तानी महिला के लिए ये मज़ाक नहीं, हकीकत है जिस पर कोई निर्मम ही हंस पाएगा।

Unknown said...

अनुराधा जी, शादियों में तमाशे, फजीहतें होती भी हैं और नहीं भी होती हैं. पर इससे शादी को ही नकार दिया जाए यह तो समझदारी वाली बात नहीं है. और जब इंसान शादी करते हैं तो जाहिर है कि यह तमाशे, फजीहतें भी इंसानों की ही खासियत होंगी. जानवर शादी नहीं करते तो वह यह तमाशे, फजीहतें भी नहीं करते.

दूसरी स्रष्टि की रचना एक समाधान हो सकता है. शायद नई स्रष्टि में ईश्वर नारी और पुरूष की शारीरक संरंचना में फेर बदल कर दे. अगर ऐसा हो गया तो नारी की बहुत सारी समस्यायें सुलझ जायंगी. फ़िर पुरूष 'पराया धन' हो जायेगा. शादी करके पत्नी के घर जाया करेगा. परी कथा है तो ऐसा सोचना भी रोमांचक है.

आनंद said...

सुजाता जी, यदि विवाह का आविष्‍कार वर्चस्‍ववादी मानसिकता के तहत किया गया, तो दूसरा विकल्‍प क्‍या है? क्‍या आपकी नज़र में कोई दूसरा मॉडल है? अथवा अंतिम रास्‍ता यही है कि विवाह न किया जाए, स्‍त्री और पुरुष अपने अपने घरों में सुख से रहें।

- आनंद

अनूप भार्गव said...

अनुराधा:
माफ़ी चाहूँगा कि माहौल को बदलने की कोशिश में विषय परिवर्तन हो गया लेकिन अगर ध्यान दें तो मेरी दूसरी हल्की फ़ुल्की टिप्पणी, पहली टिप्पणी मे उटाये गये गम्भीर प्रश्नों के उत्तर न मिलने का परिणाम थी । एक बार फ़िर से उसे पढिये और बताइये कि पहली टिप्पणी के बारे में पूछे गये प्रश्नो के बारे में क्या कहना चाहेंगे ?

समस्या को उटाना एक अच्छी बात है लेकिन एक समय आता है जब आप से उस के विकल्प पूछे जाना भी लाज़िमी है । विकल्पो को तौलते हुए सिर्फ़ उन की अच्छाइयों को नहीं देखा जाता , उन्हें उन की सम्पूर्णता में (अच्छाइयों और साथ में आने वाली सम्भावित बुराइयों के साथ) जाँचना ज़रूरी है । कीट पतंगो में शादी नहीं होती , वहां नारी का शोषण नहीं होता और वह खुश हैं इसलिये यह विकल्प हमें भी तलाशना चाहिये , माफ़ कीजिये लेकिन यह तर्क थोड़ा हास्यास्पद सा लगता है । मेरा सोचना था कि हमारी सभ्यता नें जानवरों की तरह से जीवन से शुरु हो कर यहां तक आने में चाहे कुछ खोया हो लेकिन कुल मिला कर काफ़ी प्रगति की है | विवाह और परिवार की संस्था उन में से एक है ।

और हाँ जहाँ तक चुटकलों का सवाल है जितने चूटकले आप मुझे पत्नियो पर सुना सकती है , उतने ही मै आप को पतियों पर भी सुना सकता हूँ । मैं दोनो ही तरह के चुटकुलो पर एक समान हँसता हूँ । ज़रूरी नहीं कि हर बात के पीछे किसी की साजिश समझी जाये । Life is too short to be taken tooooooooo seriously .....

सुजाता said...

आनंद said...
सुजाता जी, यदि विवाह का आविष्‍कार वर्चस्‍ववादी मानसिकता के तहत किया गया, तो दूसरा विकल्‍प क्‍या है? क्‍या आपकी नज़र में कोई दूसरा मॉडल है? अथवा अंतिम रास्‍ता यही है कि विवाह न किया जाए, स्‍त्री और पुरुष अपने अपने घरों में सुख से रहें।
आनन्द जी ,
मैने अपने पिछले कमेंट मे6 काफी विस्तार से लिखा और यह भी कहा था कि -


"...अत: बात केवल इतनी ही सी है कि हम किसी संस्था की पवित्रता में विश्वास करने से पहले उसके उद्भव के बारे में अच्छे से जान लें और भ्रमों में न जियेँ । और जब जान जाएँ तो उसमें आज के हिसाब से कुछ सुधार लाने के लिए उद्यत हों । "

आप मानेंगे कि गड़बड़ है तभी सुधर को उद्यत होंगे । अगर आप यही मानते रहेंगे कि इस संस्था में कोई गड़ बड़ नही तो सुधार की सोच आपको विध्वंसक लगेगी ।
सुधार की ज़रूरत महसूस करना पहला कदम है , आप सहमत होंगे इस बात पर ,

Suresh Gupta said...

मेरे विचार में विवाह का आविष्‍कार वर्चस्‍ववादी मानसिकता के तहत नहीं किया गया, यह इंसान की प्रगति करने की उत्कट इच्छा की वजह से हुआ. बाद में इस में कुछ सुधार भी हुए और कुछ खराबियां भी आईं. इन खराबियों को समय-समय पर दूर करने की कोशिशें भी की गईं. आज भी की जा रही हैं. चोखेरवाली मंच भी उस श्रृंख्ला की एक कड़ी हो सकता है.

सुजाता जी की इस बात से सभी सहमत होंगे कि सुधार की ज़रूरत महसूस करना पहला कदम है. शादी की संस्था में कुछ गड़बड़ है यह तो सभी को मानना होगा. इस गड़बड़ में सुधार होना भी जरूरी है. में मानता हूँ कि अभी स्थिति इस हद तक नहीं पहुँची है कि दूसरा विकल्‍प या दूसरा मॉडल तलाशने की बात की जाए. विवाह करना जरूरी है. अगर एक पक्ष को लगता है कि उसे पूरा अधिकार और सम्मान नहीं मिल रहा तो दूसरे पक्ष को इस पर सहमत होकर सुधार की बात करनी चाहिए. लेकिन पहले पक्ष को भी विवाह की हर मर्यादा को ग़लत कहने से बचना होगा. जो ग़लत है उसे सुधारा जाए. जो सही है उसे और मजबूत किया जाए. बात तो तभी बनेगी.

आर. अनुराधा said...

"जब इंसान शादी करते हैं तो जाहिर है कि यह तमाशे, फजीहतें भी इंसानों की ही खासियत होंगी. जानवर शादी नहीं करते तो वह यह तमाशे, फजीहतें भी नहीं करते."

मेरा भी यही विनम्र अनुरोध है कि क्यों हम इन फजीहतों में मजे लेने लगे हैं, क्यों इन्हें अनिवार्य मानने लगे हैं? वैसे, यह जानना दिलचस्प रहा कि शादी ही इंसानों को जानवरों से अलग करती है।

@ अनूप
-शादी के उद्भव के कारणों में जाएंगे तो एक कारण यह भी पाएंगे कि नार को'सुरक्षा देने' के लिए नहीं बल्कि अपनी संपत्ति को 'सुरक्षित रखने' के लिए इसकी शुरुआत हुई।
अराजकता रोकने के लिए अराजक तत्वों पर काबू पाना चाहिए या पीड़ित तत्वों पर? यह तो वही तर्क हुआ कि बलात्कार को रोकने के लिए औरतें घरों से न निकलें।
कई लोगों को लगता है कि शादी पुरुषों पर 'लगाम लगाने' की व्यवस्था है। क्या सचमुच? हम सब इस बारे में थोड़ा-थोड़ा और पढ़ें, समझें, जानें और फिर चर्चा करें तो शायद और सार्थक बातचीत कर पाएं।
-शादी भारत में एक सूक्ष्म वर्ग के लिए शायद जबर्दस्ती नहीं, विकल्प है। लेकिन उनसे कहीं ज्यादा संख्या में लोग हैं जिन्हें पता/ जागरूकता तक नहीं है कि शादी अनिवार्यता नहीं बल्कि विकल्प भी हो सकती है। हमारी ग्रूमिंग में इस विचार की गुंजाइश ही नहीं है। शादी होती है और होनी है। इसके इतर कोई भी विकल्प असामान्य है, विपथन है और अस्वीकार्य है।
लेकिन अब, जबकि लोग इस बारे में सोच रहे हैं तो क्यों न कोई चाहे तो इस विकल्प पर (not by chance but by choice) अमल करके देखे और इस तरह की बहसों को एक नया, अनुभवजन्य आयाम दे!

संगीता मनराल said...

वैसे तो ये एक फेयरी टेल ही थी, लेकिन अब महागाथा बन गई है| ये सच है कि शादी आज भी विक्लप ना होकर अनिवर्यता है, और कई लोग ये भी सोचते है कि शादी ना करना या फिर शादी का विरोध अपनी संस्कृति के खिलाफ जाने जैसा है| मेरे ख्याल से भी शादी करना या ना करना स्वेच्छा पर निर्धारित निर्णय है, लेकिन समाज शादी ना करने वाले को खुशी से स्वीकृत करे इस बात पर अभी बहुत समय और लग सकता है|

Anil Kumar said...

यदि कोई किसी ऐसी महिला को जानता हो जो ४० पार कर चुकी हो लेकिन फिर भी शादी न की हो तो कृपया उनसे पूछकर बताये कि क्या वे वाकई में खुश हैं?

पुरुषों में अब्दुल कलाम ने तो ज़रूर कहा था अपने एक भाषण में कि वे हमेशा खुश रहते हैं। सच में, यह बहुत ही जिज्ञासा का विषय बन रहा है!

संगीता मनराल said...

मेरी समझ से खुश रहना या ना रहना हर हाल में अपने ऊपर निर्धारित होता है, तो अनिल जी आप ये कहना चाहते हैं कि खुश रहने के लिये शादी करना अनिवार्य है :-?

Anil Kumar said...

संगीता जी ने कहा "मेरी समझ से खुश रहना या ना रहना हर हाल में अपने ऊपर निर्धारित होता है, तो अनिल जी आप ये कहना चाहते हैं कि खुश रहने के लिये शादी करना अनिवार्य है :-?"

माफ़ कीजिये संगीता जी, शायद मैं ठीक से समझा नहीं पाया। क्यूंकि मैं स्त्री नहीं पुरुष हूं (पहले ही बता चुका हूं ऊपर), इसलिये इस विषय पर सिर्फ एक जिज्ञासा है, कि जो लघुकथा कही गयी थी शीर्षक में, वह क्या वाकई सही है? क्या वाकई शादी के पचड़े में न पड़ने वाली स्त्रियां ज्यादा खुश रहती हैं? मैंने यह नहीं कहा कि खुश रहने के लिये शादी अनिवार्य है क्योंकि मुझे जवाब मालूम ही नहीं।

जवाब कैसे मालूम किया जाये?

विज्ञान में अनुशोध के लिये एक विधि होती है, जिसमें कि उन लोगों को देखा जाता है जिन्होनें कोई काम किया, तथा उनकी तुलना की जाती है ऐसे लोगों से जिन्होने वही काम न किया हो। दोनों की तुलना के आंकड़े देखकर बात साफ़ हो जाती है कि दोनों वर्गों में कोई भिन्नता थी या दोनों एक ही बराबर परिणाम पा रहे थे।

बस इसी कौतूहलवश पूछा था। क्या है कोई जो किसी ऐसी महिला का वाकया पेश करे जिसने कभी शादी न करने का निर्णय लिया हो, एक वैज्ञानिक की तरह जानने को आतुर हूं कि क्या वे सच में बहुत खुश रहती हैं?

संगीता मनराल said...

अनिल जी, जवाब तलाशने कि जरूरत इस बात पर है कि शादी को पचड़े जैसे शब्द से संबोधित करने कि मानसिकता क्यों है|

सुजाता said...

Anil said...
कि जो लघुकथा कही गयी थी शीर्षक में, वह क्या वाकई सही है? क्या वाकई शादी के पचड़े में न पड़ने वाली स्त्रियां ज्यादा खुश रहती हैं?
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अनिल जी ,
पहली बात - वह लघुकथा नही फेयरी टेल है । और फेयरी टेल का सही -गलत में मूल्यांकन करके आपने उसका तेल कर दिया है :-)

दूसरी बात-यह सोचिये कि लड़कियों को किसी सिंड्रेला की कहानी की तरह राजकुमार का झाँसा देकर ही क्यों बड़ा किया जाए ?आप चाहेंगे तो भी आपकी ट्रेनिंग आपको नही करने देंगी। यह बदनुमा दाग है - कि - लड़की को हमेशा घर में बिठा कर रखना चाहते हो ? उसकी कमाई खाना चाहते हो ? कैसे मा बाप हो ?
है न ! बस इसी के चलते सब बचपन से ही बेटी की शादी का सपना देखते हैं और उसके बाकी सपनों को पलने ही नही देते । इसी ट्रेनिंग या लर्निंग को डीलर्न करने के लिए ऐसी परिकथाओं की ज़रूरत है |
मैने तो कई अभिभावकों को यह कहते भी सुना है -"हमने थोड़े ही मना किया है आगे पढने के लिए । शादी के बाद जो चाहे करे । उसक पति पढाएगा हम घर में कब तक बैठा कर पढाते रहेंगे । "
भई , आपने कहा -

जिसने कभी शादी न करने का निर्णय लिया हो, एक वैज्ञानिक की तरह जानने को आतुर हूं कि क्या वे सच में बहुत खुश रहती हैं?

तो मै भी यह जानने को आतुर हूँ कि शादीशुदा महिलाएँ कितनी खुश रहती हैं ? और 50 साल की तो जाने दीजिये मैं 30- 35 की महिलाओं से ही पूछना चाहती हूँ । और यह भी पता है कि कोई "भारतीय महिला" कभी खुले आम यह नही कहती कि मेरा पति बहुत बुरा है । या मै शादी करके बहुत पछ्ता रही हूँ । काश मैने न की होती । तब तक नही कहती जब तक कि अति नही हो जाती । दहेज के लिए जला दी जाने वाली महिला तक यह बयान नही देती कि उसे पति ने मार डाला , क्योंकि उसके सामने यह प्रश्न होता है कि पति जेल चला गया तो बच्चे बेघर हो जायेंगे । मै तो मर ही रही हूँ !
सो अनिल जी ये बातें इतनी उलझी हुई हैं कि जब तक आप इनकी तह में न जाकर सरलीकरण करते रहेंगे बातों का तो कुछ नही होने वाला । कोई उम्मीद नही है । मैने एक घटना अभी ऐसी सुनी कि एक ग्रामीण ,साधारण आय वाले परिवार की बहू की मृत्यु पर उसके ससुराल वालों को यह कहते सुने गये कि उसे तो मरना ही था , बहुत ज़ुबान चलाती थी न । और उसी समय यह सन्देह हो गया था कि वह मौत नही हत्या थी ।
एक और ज़रूरी बात ,

यह कहिये कि अब तक लड़की यह क्यों नही कह सकती थी कि मैं शादी नही करना चाहती । देखिये , अपने पैरों पर खड़ीं कुछ समर्थ महिलाओं को छोड़ दें तो अब भी अधिकांशत: लड़कियाँ आर्थिक रूप से निर्भर हैं । वे कभी घर देहरी से नही निकली । सो पति जैसे तारनहार के ही सपने देखेंगी न !

वैसे आप बुरा न मानें तो अनुराधा जी से सहमत होते हुए मुझे ऐसा लग रहा है कि "जेंडर स्ट्डीज़ "
को हम सबके स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिये :-)

Kumar Gaurav said...

अति सुन्दर कल्पना ......
संगीता जी ने कहा "मेरी समझ से खुश रहना या ना रहना हर हाल में अपने ऊपर निर्धारित होता है, तो अनिल जी आप ये कहना चाहते हैं कि खुश रहने के लिये शादी करना अनिवार्य है :-?"
अनिल जी, मै यहाँ संगीता जी कि बात से सहमत हूँ, खुशी मिलना और् शादी दोनो एक दुसरे पे आश्रित नही है जैसा कि मेरा मानना है .
उपर ब्लोग मे भी लिखा है कि “उसके बाद वह महिला सदा सुख से रहने लगी” बस मुझे यहाँ सदा शब्द से एतराज है बाकी मुझे इस बात से कोई एतराज नही कि वो महिला खुश नही रह सकती.
क़्युंकि मेरा जहाँ तक मानना है कि खुशी और आनन्द कि जहाँ तक बात है तो खुश होने को तो एक 2 साल का बच्चा भी खुश होता है, और एक नपुंसक भी खुश होता होगा. और जहाँ तक रही ये बात कि कितनी महिलाये एसी है जो कि 40 साल तक शादी ना कर के भी खुश है ये तो मुझे नहि पता परंतु इतना मुझे जरूर् पता है कि कितने एसे दम्पति है जो कि किसी प्रकार के विवाह अर्थात प्रेम विवाह या गन्धर्व विवाह या किसी अन्य ... के वावजूद भी खुश नही है. अगर हम अपने धर्म शास्त्रो की तरफ भी रूख करे तो उसमे भी यही लिखा है कि किसी व्यक्ति को आनन्द ( परंतु क्षणिक, वर्णित*) प्राप्ति के 2-3 माध्यम है --- रति, त्तृप्ति, या संतृप्ति.... किसी को थोडा सम्मान मिले या पैसे के माध्यम से अपने पदार्थ सम्बन्धी इक्षाओँ की पूर्ती करे या रति....क्षणिक हि सही परंतु खुशी तो मिलती है. अतः मैँ प्रश्नो मे ज्यादा उलझना नही चाहता मुझे जहाँ तक अनुमान है कि असली सुख , खुशी , आनन्द तो पूर्णता मे है..... चाहे वो दामपत्य जीवन मे प्राप्त हो या कहीँ और...

गौरव और विज.

PD said...

:)

Suresh Gupta said...

अनुराधा जी ने कहा - "मेरा भी यही विनम्र अनुरोध है कि क्यों हम इन फजीहतों में मजे लेने लगे हैं, क्यों इन्हें अनिवार्य मानने लगे हैं? वैसे, यह जानना दिलचस्प रहा कि शादी ही इंसानों को जानवरों से अलग करती है।".

इन फजीहतों में मजा लेना ग़लत है. इन्हें अनिवार्य मानना भी ग़लत है. ऐसी कोशिश होनी चाहिए कि यह फजीहतें शादी का हिस्सा न रहें. ऐसे बहुत से परिवार हैं जहाँ यह फजीहतें नहीं होतीं.

मुझे भी दिलचस्प लगेगा अगर कोई जानवर शादी करता दिखाई देगा.

Anonymous said...

"मुझे भी दिलचस्प लगेगा अगर कोई जानवर शादी करता दिखाई देगा."
jaanvar insaan sae jyaada samjhdaar hotey haen unkae yahaan bhi vyavshtaa hotee haen par us vyavstha mae shaadi kaa koi aavshyktaa nahin hotee aur isiliyae talak bhi nahin hota , bachcho ko wo aatm nirbhar banatey haen apnii sampati nahin smajhtey
"यदि कोई किसी ऐसी महिला को जानता हो जो ४० पार कर चुकी हो लेकिन फिर भी शादी न की हो तो कृपया उनसे पूछकर बताये कि क्या वे वाकई में खुश हैं?"
lata mangeshkar nae kyaa shaadii kii haen ?? aur bahut sae naam haen enlist karaey kyaa ??

Anonymous said...

FAIRY TALES DONT EITHER GOVERN SOCIETY OR MAKE LAWS. THE INSTITUTION OF MARRIAGE HAS BEEN MADE FOR MANY OBJECTIVES.
YOU ARE LIVING IN THE WORLD OF A NEUROSIS OR YOU ARE SUFFEWRING FROM PSYCHOLOGICAL DISORDERS.
YOU SEEM TO HAVE AN IMPRESSION OF MALE FOBIA WHICH GIVES YOU A FALSE MINDSET THAT IN EVERY FAMILY WIVES ARE TORTURED BY HUSBANDS AND SO EVERY UNMARRIED FEMALE IS HAAPY.
FOR YOUR KIND INFORMATION JUST COME OUT OF YOUR FALSE PARADISE AND SEE THAT THERE ARE MANY INSTANCES WHERE A CRUEL, ILL TEMPERED, UNCULTURED, ANTI SOCIAL, UNSOUND WIFE MAKES THE LIFE OF A GENTLE, PEACELOVING, SOBER, SOFT SPOKEN HUSBAND SO MUCH MISERABLE.
MADAM BE PRACTICAL AND MORE BALANCED. EVERY MAN IS NOT BAD AND EVERY LADY IS NOT DIVINE.
OTHER SIDE OF THIS SITUATION IS IF EVERY MALE AND FEMALE REJECT THE MARRIAGE THEN WHT WILL BE OF THEIR SEXUAL INSTINCT? THEY ARE NOT SUPPOSED AND THEY CANT EITHER SUPRESS THEIR BIOLOGICAL DEMAND THEN WHAT WILL HAPPEN? EVERYBODY WILL BE FREE TO HAVE SEXUAL RELATIONS WITH ANYBODY JUST LIKE IN ANIMALS.
IT SEEMS THAT BACHELORS ARE MORE HAPPY BECAUSE THEY HAVE THE FREEDOM TO LIVE AS THEY WISH BUT IT IS NOT SO.
YOU HAVE TO JUST REWRITE THE TERMS AND CONDITIONS OF FAMILY ON THE NEED OF PRESENT CENTURY BUT YOU JUST CANT DISCARD FAMILY.
dont delete it.

Anonymous said...

neelima-mujhekuchkehnahai.blogspot.com
ब्लॉग पर वो रंगों वाली लड़की पढी
हर रोज की तरह उस दिन भी उस लड़की ने बहुत से सपने देखे थे। कुछ सोती आंखों से तो कुछ जागती कल्पनाओं में। उसे कभी समझ नहीं आया कि उसके सपनों में रंग आधे-अधूरे क्यों हैं. ये पहली उससे कभी हल नहीं हुई। फिर एक दिन सफेद घोड़े पर बैठा एक राजकुमार आया। वो उसके जिंदा सपनों में रंग भरने लगा। अब वो सुबह उठती तो रंगों का दरिया उसके सामने होता। रातभर उसके सपने इन्द्रधनुष की तरह रंगों से जगमगाते रहते। लोग कहते उसकी मासूम हंसी में अब एक खनक घुल गई है।

.....और फिर एक दिन वो राजकुमार उससे बगैर कुछ कहे सुने उससे हमेशा के लिए बहुत दूर चला गया, बहुत दूर। तब से उसके सपनों के सारे रंग उड़ गए। अब बस बचा है तो एक रंग
उस ब्लॉग पर अनोनिमस कमेन्ट नही लेते है और अभी मेरा अकाउंट नही है इस लिए मजबूर होकर अपना कमेन्ट यहाँ दे रहा हूँ कि शायद neelima इसे पढ़ ले या कोई उनको बता दे वैसे इसके बारे में आप भी आगे लिख सकते है
आपकी कहानी अधूरी लगी क्योकि आजके इस नारीवादी समय में आपको कहानी के अंत में उस राजकुमार को कोसना का ऐसा सुनहरा मौका छोड़ना नही चाहिए था
उस राजकुमार के बहाने सारे पुरुषों को सदियों से जुल्म ढहने वाले अत्याचारी अपराधी नारियो का शोषण करने वाले विलेन के रूप में प्रतिबिंबित करते हुए यह भी सिद्ध करने का अवसर नही छोड़ना था कि पुरूष तो सदा से ही अत्याचारी भावनाशून्य पाषाण ह्रदय धोखेबाज होते है तथा सारी नारिया भोली संवेदनशील समर्पित मधुर वाणी से भरी निष्कपट होती है.
सारी नारियो को जाग्रत करना चाहिए था कि पुरूष नामक जानवर से हमेशा दूर रहो इसी में सारी नारियो का कल्याण होगा.
कृपया इसे डिलीट न करे.

आर. अनुराधा said...

अच्छा है कि हंसी खेल में लिखी इस परी कथा के महाभारती पहलू सामने आते गए। लगता है ऐसे विषयों पर लोग सोच रहे हैं और बात करना चाहते हैं। चर्चाएं जारी रहें।

Unknown said...

r anuradhaa ji badhaai. 3 line kee kataa likhkar mhaakaya likne kaa samaan paidaa kar diyaa.

pari katha ek kalpnik sukhad ahsaas hai. logo ne ise bahut seriously liya. log iske hisaab se shadee kee sansthaa kharaab bataa rahe hain ye anuchit hai. jab tak stree shikshaa unhe apne boote atm nirbhar nahee banaa detee. mujhe khushee hogee ki mahilaaye khoob padhe aur nirnay le khusi ke liye shade karnee hai yaa shadee nahee karke khushee kee gyarantee lenee hai. chunav unkaa hai soch unkee hai. aise hee jaise job karnee hai yaa business. lekin isse vicaah naam kee sansthaa kaa mahatva kam nahee ho jataa.

Anonymous said...

मैंने इससे पहले इतनी सुंदर परिकथा कभी नहीं पढ़ी। जब गूगल पर 'विवाह के बहाने यौनिकता पर नियंत्रण' टाइप किया तब रिज़ल्ट में 'चोखेर बाली' ब्लॉग के दर्शन हुए।

मैं आर.अनुराधा जी को शुक्रिया कहना चाहूँगा भले ही वे मेरी इस टिप्पणी को देखने के लिए कभी आएंगी। उनको दिल से सलाम, श्रद्धांजलि...

हम लोग कितना भी वाद-विवाद कर लें, मैं ऐसा सोचता हूँ कि यह 'विवाह संस्था' महिला के शोषण और उस पर अत्याचार करने का बहुत बड़ा 'प्लैटफ़ार्म' है। या तो इसे पूरी तरह से बदल दिया जाए, या फिर समाज महिला और पुरुष दोनों की बराबर भागीदारी से इस संस्था में जरूरी बदलाव करें इसे 'Reform' करें। नहीं तो पता नहीं कितने सालों, कितनी सदियों तक असंख्य लड़कियां विवाह की वेदी पर अपना जीवन कुर्बान करती रहेंगी।

Anonymous said...

माफ़ी चाहूँगा, अपनी टिप्पणी में अनजाने में एक शब्द लिखना मुझसे छूट गया। उसे अभी ठीक करना चाहूँगा- मैं आर.अनुराधा जी को शुक्रिया कहना चाहूँगा भले ही वे मेरी इस टिप्पणी को देखने के लिए कभी 'नहीं' आएंगी। उनको दिल से सलाम, हार्दिक श्रद्धांजली...

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...