Wednesday, July 30, 2008

शादी कितनी ज़रूरी है एक लड़की के लिए ....

मैनें हमेशा यह महसूस किया कि अगर भारतीय माता-पिता अपनी पुत्री के विवाह और विवाहित जीवन के बारे में इतने चिंतित न रहते तो उनकी अधिकांश {लड़कियों व अभिभावकों}समस्याएँ खत्म हो गयीं होतीं ।

आप माने या न मानें , पर लड़कियों को क्या करियर चुनना चाहिये और कैसे कपड़े पहनने से लेकर कैसे चलना - बोलना चाहिये तक सब कुछ जो वे करती हैं वह उस पुत्री के एकमात्र भविष्य़ को ध्यान में रखते हुए होता है जिसमें वह एक अच्छी पत्नी होगी एक ऐसे उदार मना, विशाल हृदय पुरुष की जो पर्याप्त दहेज लेकर उससे शादी करने की कृपा करेगा ।

और इस तरह भारतीय अभिभावक एक योग्य दामाद पाकर पुत्री के सपनों का बलिदान कर देंगे उसे वह देने के लिए जिसे वह एक सपने के साकार होने से कम नही समझते ।एक सपनो का राजकुमार ! एक परफेक्ट कैच ...ऊप्स ..मैच !!


एक लड़की को अनिवार्यत: विवाह करना चाहिये । यह बिल्कुल गैर-ज़रूरी है कि जिसके साथ वह चाह रही है या पसन्द करती है उसके साथ । बल्कि उसके साथ जो उसे सुरक्षा दे सके । लेकिन यह चयन भी समस्यारहित नही होता । लड़की उसका मूल्य अपनी खुशी,मानसिक शांति और आज़ादी देकर चुकाती है । और कई बार जान भी ।


ज़रा सोचिये ,क्या हम और हमारी पुत्रियाँ चैन की सांस नहीं ले सकेंगे अगर हम उन्हें एक सुरक्षित ,सुखी पत्नी बनने के लिए बड़ा करने की बजाए एक व्यक्ति बनने के लिए पालन-पोषण करेंगे ।


* अगर हम उन्हें आत्मनिर्भर, स्नेहमयी,ज़िम्मेदार,स्वतंत्र,भरोसेमन्द,विवेकवान और प्रसन्न चित्त व्यक्ति के रूप में बड़ा

करें ..
*अगर हम उन्हें विवाह करने और विवाहित रहने के कर्तव्य से मुक्त कर दें .....{तलाक और सम्बन्ध विच्छेद के लिए हमेशा सभी उसे हतोत्सहित करते हैं और एडजस्ट करने की नसीहतें देते हैं...और विवाहित बने रहने के कर्तव्य के तले वह घुटती रहती है }


*अगर हम उन्हें जब वे चाहें और जब उन्हें अपने लायक जीवन साथी मिले उससे शादी करने दें...{लड़की के सर इज़्ज़त का ठीकरा है सो उसे ही इमोशनल ब्लैकमेल ज़्यादा किया जाता है ...घर से भागे लड़के के घर लौटने के दरवाज़े सदा खुले होते हैं , घर से भाग कर शादी करने वाली लड़की के लिए वे हमेशा बन्द रहते हैं}

* अगर हम उन्हें सपोर्ट करें ऐसे साथी से विवाह के लिए जो उन्हें बराबरी पर मानता हो और सहज भाव से इसे स्वीकार करता हो कि दोनो साथी अपने - अपने दिमाग से सोचेंगे .....
{अक्सर पत्नी के लिए सोचने और फैसले लेने की ज़िम्मेदारी पति अपने ऊपर खुशी-खुशी ले लेता है :-)}


*ऐसा जो पुत्री के परिवार को भी वैसा ही प्यार व सम्मान दे जैसा वह अपने लिए अपेक्षा करता है ....

*कोई ऐसा जो पुरुष होने से पहले एक मानव हो ...जो पत्नी को पूरक न मान कर टीम का साझीदर माने ..कि वे दोनों मिलकर एक टीम हैं ....{टीम में हमेशा भूमिका बदलने और बराबरी पर रहने की गुंजाएश रहती है }

क्या आप सोच सकते हैं उस लड़की के व्यक्तित्व और आत्मविश्वास के बारे में जिसके माता-पिता उसके जन्म से लेकर रात दिन उसके विवाह के बारे में चिंतित नही रहते .......?
साभार -

an Indian home maker

चलताऊ अनुवाद के लिए अग्रिम क्षमा

24 comments:

Anonymous said...

सुजाता जी
आपने जो कुछ भी लिखा हैं उससे सहमत होते हुए मे सिर्फ़ एक बात कहना चाहती हूँ . स्वयं लड़की से महिला तक का सफर अविवाहित रह कर पूरा किया है इस लिये एक बात जानती हौं की लडकियां अपनी लड़ाई लड़ना ही नहीं चाहती . समय रहते वह अपनी माता पिता से विरोध ही नहीं करती . हम इसके लिये बहुत से कारण तलाश कर सकते हैं पर सबसे बड़ा कारन हैं की लड़किया , महिला अपने को हमेशा "अकेला " समझती हैं सब नहीं तो बहुत सी लड़किया ख़ुद शादी के लिये लालईत रहती हैं . उन्हे लड़का न भी पसंद हो तब भी शादी करती हैं क्योकि माँ बाप जहाँ करेगे वहाँ दहेज़ मिलेगा और अगर पति से ना या ससुराल मे ना बने तो बिचारे माँ - बाप हैं ही ताना मारने के लिये . जिन बातो का विरोध एक महिला शादी के बाद करते हैं उसको अपनी घर मे शादी से पहले क्यों नहीं करती ?? सही हैं लड़कियों को समझाया यही जाता हैं पर अपनी समझ का क्या , जब आप पढ़ लिख जाते हैं तो आप क्यों नहीं अस्सेर्ट कर के नौकरी करते हैं ? पता नहीं पर मुझे हमेशा लगता हैं की लड़किया ज्यादातर "सेल्फिश " होते हैं और केवल सुरक्षा , सुविधा से रहना और सामाजिक रूप से स्वंतंत्र हो जाना शादी करके जी हाँ हमारे समाज मे एक विवाहिता जितनी स्वतंत्र हैं एक अविवाहिता नहीं हैं . हो सकता हैं मे कुछ ज्यादा सवाल जवाब कर रही हूँ पर ख़ुद भी बहुत इसी विषय पर लिखती हूँ सो आप का लिखा देखा तो मन कर गया लिखने का .

गरिमा said...

सुजाता जी क्या कहूँ, मै तो इस स्टुपिड से रिश्ते के बारे मे सोचना ही नही चाहती, छिन जायेंगे मौज के दिन.. अभी तो गाडी निकल रही है, आगे भी चलती रहे :)

वैसे बाते आपने जानदार कहीं, अगर ये सब बाते ठीक हो तो कोई टेन्शन ही नही है।

गरिमा said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

Best part would be for the parents that are found chatting all the time, that we have to save money for kids specially their marriage. They won't have to worry on this aspect. They can divert this focus to supporting their kids (boys and girls on even terms) for education and career buildup activities to make them better person. While doing this they can also enjoy the mental and financial freedom and relinquish the tension they get from making efforts on accumulating the marriage related expenses. BTW majority of the time, this mentality comes from the middle class families, where parents enforce their decisions on kids. This not the case for majority of the lower and higher income groups as the girl kids are more free to chose their fate. In these societies the girls have the courage to defy their parents.

Batangad said...

कमाल की बात पकड़ी है आपने।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

लड़कियों को उचित और पर्याप्त शिक्षा दी जाय ताकि वे अपने भविष्य का निर्धारण खुद कर सकें। इतनी बात तो सोलह आने सच है। लेकिन स्वतंत्रता केवल वैवाहिक बंधन से बाहर ही मिलेगी, यह सोच पुनर्विचार के योग्य है। ईश्वर ने स्त्री और पुरुष को अलग-अलग गुणों से परिपूर्ण करने के साथ-साथ बहुत सी समानताएं भी दी हैं।
इन दोनो बातों का सम्मान होना चाहिए और इन अद्‍भुत कृतियों (लड़की-लड़का) के बीच एक विवेकपूर्ण तालमेल की खोज करना चाहिए। विवाह नामक संस्था की स्थापना इसी खोज का नतीजा है। इसमें जो कमियाँ रह गयी हों उन्हे दूर करने का साझा प्रयास करना उचित और आवश्यक है, लेकिन इसे सिरे से ही ख़ारिज कर देना विवेक की कमी दर्शाता है।
विचारणीय मुद्दा उठाया है आपने। साधुवाद।

जितेन्द़ भगत said...

एक स्‍त्री को बचपन से ही अनुकूलि‍त कि‍या जाता है कि‍ उसे पराये घर जाना है,ससुराल पक्ष की सेवा करनी है।कई बार मुझे खुद लगता है कि‍ वि‍वाह की यंत्रणा सहने से अच्‍छा है स्‍त्री का अवि‍वाहि‍त रहना। सुझाए गए सारे रास्‍तों से मैं सहमत हूँ ,ये जानते हुए कि‍ इनमें कई व्‍यवहारि‍क कठि‍नाइयां हैं।

Vinay said...

bahut achchha likha aapane, taareef ke qaabil!

Asha Joglekar said...

बहुत सही मुद्दा उठाया है आपने । जैसे कि सुजाता जी ने कहा बहुत सी लडकियाँ लालायित होती हैं शादी करने के लिये । क्यूं कि माँ बाप के घर में जो हजारों बंदिशें उन पर होती हैं वे सोचती हैं कि शादी के बाद उनसे मुक्ति मिल जायेगी । माँ बाप सोचते हैं कि समाज को तो वे बदल नही सकते पर लडकियों को ही समाज के अनुसार ढाला जा सकता है तो वही करे ताकि लडकी सुखी (?) रहे ।
पर कुछ हिम्मत वाली लडकियाँ भी देखी हैं मैने जो शादी तभी करती हैं जब वे अपनी पसंद का जीवन साथी पा जाती ङैं । या ता उम्र अकेली और स्वतंत्र जीवन जीती हैं ।

Nitish Raj said...

सुजाता जी, आपने सही लिखा है पर कहना चाहूंगा कि कई बार ऊपरी तरह से देखने पर लगता है कि वैवाहिक महिलाएं ज्यादा स्वतंत्र हैं लेकिन समाज में देख लें तो शायद वो ही सबसे ज्यादा बंदिशों में हैं। यदि शिक्षा ठीक से हो, तो ऐसा नहीं कि फिर शादी जरूरी ही है। मैं यहां पर रचना जी से सहमत हूं कि ज्यादातर लडि़कियां सेल्फिश होती हैं। सच बात है जिन बातों का विरोध लड़की ससुराल जाकर करती है बेहतर हो अपने घर में ही कर ले।

Suresh Gupta said...

मेरे विचार में शादी तो जरूरी है लड़की और लड़के दोनों के लिए.

बैसे आपकी यह बात बिल्कुल सही है - "मैनें हमेशा यह महसूस किया कि अगर भारतीय माता-पिता अपनी पुत्री के विवाह और विवाहित जीवन के बारे में इतने चिंतित न रहते तो उनकी अधिकांश (लड़कियों व अभिभावकों) समस्याएँ खत्म हो गयीं होतीं ।" पर यह भी सही है कि चिंता करने से कोई समस्या हल नहीं होती, बल्कि जिन कारणों से वह चिंता बनी उन कारणों को दूर करने से बात बनेगी. पुरूष प्रधान समाज में अधिकार और जिम्मेदारियों का बंटवारा पुरूष के हक़ में हुआ है. इसे पुरूषों और स्त्रियों में कैसे समान बनाया जाए इस बारे में प्रयत्न किए जाने चाहियें. अभिभावक अपने-अपने घर में देखें और इस विषमता को दूर करें. इससे परिवार मजबूत होगा और वह समाज को मजबूत करेगा. उनके इस प्रयास में सबको सहयोग करना चाहिए. पर अगर इन विषमताओं से दुखी होकर कुछ लोग घर को ही छोड़ कर बाहर चले जायेंगे तो घर कमजोर हो जायेगा और समस्या भी हल नहीं होगी.

L.Goswami said...

1>. sadi waikalpik honi chahiye aniwary nahi.
2>.bilkul sahi baat adhikans ladkiyan shadi ke liye lalayit hoti hain n sirf lalayit blki unhe yah sari samsyayon ka hal lagata hai.
3>.galat baat ka virodh jaruri chahen wah koi bhi kahe.
bilkul sachi baat jo is manch se kahi gayi.

pallavi trivedi said...

बहुत अच्छा मुद्दा उठाया आपने.. मेरी भी अभी तक शादी नहीं हुई है! कारण सिर्फ एक है कि अभी तक मुझे मेरी पसंद का जीवनसाथी नहीं मिला है जिसके साथ मैं सुखपूर्वक जिंदगी गुजार सकूं!सिर्फ इसलिए कि शादी एक काम है और उसे निपटाना है ,मैं शादी नहीं कर सकती ! मैं आत्मनिर्भर हूँ, बिना शादी किये भी जिंदगी खुश रहकर गुजार सकती हूँ! मैं शादी करना चाहती हूँ क्योकी मुझे एक companion चाहिए!लेकिन यह सही है कि अगर मैं आत्मनिर्भर नहीं होती तो आज से कई साल पहले मेरी शादी हो गयी होती! और मैं न करने कि स्थिति में नहीं होती!शादी का फैसला पूर्णतः निजी होना चाहिए और सही निजी फैसला लेने के लिए शिक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों कि ज़रुरत है वरना कम उम्र में अक्सर लड़कियों को गलत फैसला लेते देखा गया है!लेकिन ये भी उतना ही बड़ा सच है कि कई परिवारों में लड़कियों कि परवरिश का उद्देश्य ही महज शादी करना होता है! जो किएकदम गलत है!

Rajesh Roshan said...

उतना ही जरुरी है जितना एक लड़के के लिए.....

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

आज दिन में अमृता प्रीतम की कम्मी और नन्दा पढ़ रही थी। कम्मी अपनी मां से पूछती है कि मां तुम बाऊजी को छोड़ क्यों नहीं देती, मां कहती हैं औरतें गीले आटे जैसी होती हैं, घर में रहती हैं तो उन्हें चूहे खाते हैं और बाहर कौए उन्हें नहीं छोड़ते। शायद ये बात शब्दों में हमें कभी नहीं कही जाती, लेकिन कौए ना खा पाए इसलिए किसी चूहे के हवाले कर दिया जाता है। बस चूहा ऐसा हो जो इस आटे को हमेशा गीला बना रहने दे। सूखने न दे।

Anonymous said...

लेकिन कौए ना खा पाए इसलिए किसी चूहे के हवाले कर दिया जाता है।
issi soch ko badalna haen kyoki aurat ko "cheez " yahii soch banaatee haen

azdak said...

ओह, देख लिया.

sushant jha said...

अच्छा लेख...बधाई हो.

डॉ .अनुराग said...

पल्लवी की बातो से सौ फीसदी सहमत हूँ...आप स्त्री को आत्म निर्भरता दे..आर्थिक ....फ़िर देखे.....पर एक बात जो खटकी शादी को लोगो ने बंधन माना है ,ऐसा नही है ..अगर जीवन साथी समझदार हो ओर आपको समझने वाला हो फ़िर देखिये.....

स्वप्नदर्शी said...

विवाह सस्था एक बडे एतिहासिक पडाव से होकर यहा तक पहुंची है. निश्चित रूप से वर्ग-विभाजन, कर्म-विभाजन, और सम्पति के मालिकाना हक़ के साथ ही ये भी अस्तित्व मे आयी है. पर फिर भी लगातार विवाह के भीतर भी परिवर्तन आये है और समय के साथ-साथ और भी आयेंगे.

हिन्दुस्तान के ही सन्दर्भ मे जन्हा पर एक समय मे स्त्री को पूर्ण स्वतंत्रता थी अपने जीवन साथी को चुनने की, आज के समय मे इसी का सबसे ज्यादा विरोध है. हिन्दु धर्म मे 12 तरह के विवाह, जिनमे प्रेम-विवाह भी शामिल है, को मान्यता है, परंतु प्रजापति -विवाह जिसमे पिता पुत्री का दान करता है, आज सिर्फ वही मान्य है.

और इसके भी अपने कारण है, अगर समाज सामंती है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता स्त्री और पुरुष दोनो के लिये, नही है, या फिर परिवार और समाज व्यक्ति के लिये स्पेस नही छोड्ता है, तो व्यक्ति, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष सिर्फ महज एक उपयोगी वस्तु बन जाता है. ज़िसका नियंता कोई दूसरा है.

जैसे कि समाज का पलडा पुरुष की तरफ है, तो पुरुष को स्त्री के मुकाबिले विवाह की संस्था थोडी राहत देती है, पर अगर ये मान लिया जाय कि पुरुष इस संत्रास से बाहर है तो थोडी बेईमानी होगी.

हमारे समाज के बडे हिस्से मे, पुरुष भी अपनी मर्ज़ी से शादी नही करते. उन्हें भी विवाह के मंच पर पिता एक उत्पाद की तरह बेच देता है, और दहेज की कीमत लेता है. पुरुष के परिवार, पत्नी और बच्चे तक एक तरह से बूढे मा-बाप के बिन खरीद दास होते है. इसमे जो कुछ भी परिवर्तन होता है, वो स्त्री की कभी हार न मानने वाली इच्छा शक्ति, त्रिया चरित्र और आज की बदली स्थिति से ही आया है. जब सन्युक्त परिवार की एक ईकाई स्वंतंत्र होकर सांस लेती है.

इसीलिये विवाह को खारिज़ कर देना, या फिर ये मान लेना कि प्रेम-विवाह हो गया, और मंपसन्द जीवनसाथी मिल गया तो सारी समस्या हल हो गयी, ये एक सरलीक़रण है.

प्रेम-विवाह भी अब एक हिस्से मे स्वीक्रित है, परंतु परिवार का सामंती स्वरूप, और प्रेम विवाह मे भी दहेज, स्त्री की दोयम दर्ज़े की स्थिति और और परिवार के भीतर नयी बहु के लिये एक व्यक्ति का सम्मान अभी भी दूर की गोटी है. मतलब् कि वो कैसे कपडे पहने, क्या खाय, क्या भजन् गाये या ना गाये, किससे मिले, घर से बाहर कब जाय, कब ना जाय, और परिवार के सदस्यो की बेगारी करें. अगर कमा कर लाये, तो उसका खुद इस कमाई पर कितना हक़ हो? बेटा पैदा करें कि बेटी? जैसे सवाल भी बेईमानी है. बहुत सी चीज़ो के लिये रोज़-बरोज़ जद्दोजहद करनी पडती है. कई बार ये भार प्रेम-विवाह वाले जोडो पर ज्यादा होता है.

कई बार प्रेम-विवाह से भी ज्यादा इस बात का महत्व है कि परिवार मे हर सदस्य को स्पेस मिले, आगे बढने के मौके मिले, और एक तनाव्मुक्त परिवारिक महौल मिले बच्चो को बडा होने के लिये. इसीलिये परिवार के स्वरूप मे जनवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्र्ता और थोडी सी मानवता शामिल कर ली जाय तो शायद, स्त्री-पुरुष सब को राहत मिले.

nainitaali said...

मंगलेश डबराल मेरे पसंदीदा कवियों मे से है। उनकी एक कविता, उनके काव्य संकलन "पहाड़ पर लालटेन" से साभार was posted recently
http://nainitaali.blogspot.com/2008/07/blog-post.html

अगले दिन

पहले उसकी सिहरती हुयी पीठ देखी
फ़िर दिखा चेहरा
पीठ जैसा ही निर्विर्कार
कितने सारे चहरे लांघकर आया हुआ
वह चेहरा जिस पर दो आँखे थी
सिर्फ़ देखती हुयी, कुछ न चाहती हुयी।

वह अकेली थी उस रात
वह कही जा रही थी अपना बचपन छोड़ कर
कितने सारे लोगो द्वारा आतंकित
कितने सारे लोगो द्वारा सम्मोहित
कितने सारे लोगो की तनी हुयी आँखों के नीचे
कितनी झुकी है उसकी आँखे
की वह देख नही पाती अपनी और आती मृत्यू

हर चीज़ के आख़िरी सिरे तक
वे उसके पीछे जायेंगे
जहा से एक सुरंग शुरू होती है
सुरंग मे कई पदों मे से एक पेड़ तले
बैठा होता है उसका परिवार
माँ-बाप, भाई बहन
और पोटलिया जिनमे भविष्य बंद है
सापों की तरह

वों सारा कुछ सोच कर रखेंगे
पहले से दया, पहले से प्रेम
पहले से तैयार थरथराते हाथ
वे उसे पा लेंगे बिना परिवार के
बिना बचपन के, बिना भविष्य के
और खींच ले जायेंगे एक जगह

कोई नही जान पायेगा किस जगह
डराते मंत्रमुग्ध करते
अगले दिन उसके भीतर
मिलेंगे कितने झडे पत्ते
अगले दिन मिलेगी खुरो की छाप
अगले दिन अपनी देह लगेगी बेकार
आत्मा हो जायेगी असमथ
कितने कीचड कितने खून से भरी
रात होगी उसके भीतर अगले दिन

सुजाता said...

Nitish Raj said...
सुजाता जी, आपने सही लिखा है पर कहना चाहूंगा कि कई बार ऊपरी तरह से देखने पर लगता है
_--

नीतिश जी , व अन्य कई पाठकों से अनुरोध है कि मूल लेख - एन इंडियन होममेकर ब्लॉग से पूर्व अनुमति के बाद अनुवाद करके छापा गया है जिसका लिंक भी पोस्ट के अंत में दिया गया है , व चोखेर बाली के ब्लॉग रोल में भी है । इसमें मेरी भूमिका अत्यंत लघु है पर यह सत्य है कि उनकी इस पोस्ट से मेरी सहमति है ।
सादर ,

सुजाता

संगीता मनराल said...

बिलकुल, मैं रचना जी कि बात से सहमत हूँ, पता नहीं औरत को चीज़ समझने वाली सोच कब बदलेगीं

Anonymous said...

I feel like adding something to this that has been a worrying concern for me.
In Indian Society , I have been seeing that after marriage , a daughter does not remain as a daughter any more. She becomes someone's wife more. Why they need to adjust their needs and desires according to the
circumstances and tradition. When I see my mother I think ,Should she not have an equal say in everything that relates to her parents . When I see this I felt betrayed on part of my mother.
A parent who raise their daughter with so much affection ,can't think of separation from daughter after her marriage.They just got pissed off or you can say "carried away" by our tradition.
I as a brother have this kinda feeling for my sister.I still worry, will she forget me after her marriage? Or then Someone else than me matters more in her life.This is reality now.Everyone skips this as a part of natural happenings in ones life.But I feel quite strong about it.For that reason I wish to know from you girls what stops you from continuing that kind of unshakeable relationships with your family members after your marriage.
I think girls of present age should address this question of mine.In above blog and comments from the reading what I have felt that you wants to be more individualistic rather than social.
I as a man, have a simple perception about man and woman that while former tries to think rationally in every kind of situation, latter proceeds on the way that is guided by their emotions.Their heart precedes their minds , and I have a great respect for that.
For me this is not the dumbness on her part it is an intelligence that only she is capable of.
From the blogs and present day thinking of the girl I think that they think that they are quite oppressed because they always think of others and not of themselves.This is the woman nature.They in any kind of situation always thinks for the welfare of others , be it their son or husband or father or anyone.They always have this kind of feeling that everyone should be happy.Their happiness comes second to her.I think this is more feminine.This is what present girls are thinking in a reverse way.They think that this kind of social thinking is a result of oppression and they try to shift to more manly thinking which is more selfish and rational.If you are saying this would be the empowerment on the part of girls,then perhaps will have to redefine this word for me,as this is just a degradation of womanly feelings.And we all are becoming quite evident of this in the present society.

If I have offended anyone , than I am extremely sorry.

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स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

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