Thursday, August 7, 2008

लडकी

अरे फिर से लडकी ¡
यही सुना था गुडिया के जन्म पर
दादी का गुस्साया चेहेरा
माँ की बेचारगी
पिता की बेरुखी
यही झेलते झेलते बडी हो रही थीं हम तीनो बहनें

पिर आया भाई, घरमें खुशी लहराई
दादीने नजर उतारी, अम्मा जाये वारी वारी ।

घर खुशी से भर गया
सब कुछ लगता नया नया
हम बहनें भी दौड दौड
काम करतीं लेकर होड
भाई को खिलातीं, दुलरातीं
सुलातीं, हँसाती
भाई को छींक भी आये तो अम्मा बाबूजी की नींद हराम
हम बुखार में तपें तो भी कोई न कहता करो आराम
दीदी का हायस्कूल का रिज़ल्ट
फर्स्ट क्लास विद डिस्टिंक्शन
पर किसी के चेहेरे पर कोई खास खुशी नही
अच्छा है जैसा ठंडा रेसपॉन्स
भाई को टीका लगने की वजह से थोडा बुखार
उसी की परेशानी और त्रास
१२वीं का दीदी का १० वी का मेरा और ८वी का गुडिया का रिज़ल्ट
तीनों क्लास में अव्वल
भाई भी अपनी छोटी कक्षा मे होशियार
शिक्षकों का प्यारा
घरमें सब की आँखों का तारा
दीदी को होना है डॉक्टर
मुझे पढना है कम्प्यूटर
और गुडिया को बनना है रिपोर्टर
बाबूजी की सीमित आय
और हमारे हौसले
क्या होंगे सपने पूरे
जब तौले जायेंगे वे भाई के सपनों से
पर हम तीनों हैं एक साथ
करेंगे मदद एक दूजे की और पायेंगे मंजिल अपनी अपनी

22 comments:

अनूप भार्गव said...

आशा जी:
सुन्दर, यथार्थ से जुड़ी और सब से महत्वपूर्ण बात ’अन्त में आशा की किरण जगाती और समस्या के समाधान की ओर संकेत करती’ हुई कविता के लिये बधाई ।

’चोखेर बाली’ की सोच शायद इस कविता से कुछ सीख सकती है । :-)

सुजाता said...

अनूप जी ,
चोखेर बाली पर तरह तरह के भाव मिलेंगे । आशा जी जैसी आशा भी , मंजू का दुख भी , और आर अनुराधा जी की जैसी फेयरी टेल भी ।
आप सुधी पाठक हैं चोखेर बाली के , पर समझ नही आता कि हर कोई चोखेर बाली की सोच बदलने को क्यों उद्यत है ! क्या चोखेर बाली की बातें आपका हाज़मा खराब करती हैं ? मुझे क्षमा कीजियेगा कटु होने के लिए । पर अफसोस इस बात का है कि चोखेर बालियों ने आज तक किसी को बदलने की बात नही कही ।जो आप सोचते हैं बस उसकी जड़ता को तोड़ने का प्रयास किया है । जिसे आप सब लर्न किये बैठे हैं उसकी डीलर्निंग की कोशिश की है । बार बार कहा है कि सोचिये । यह नही कहा कि बदलिये । बदलाव आप खुद लायेंगे जब सोच के बन्द चौखटो से बाहर निकलेंगे ।
नहीं निकलेंगे तो चोखेर बालियों की सोच बदलने पर हमेशा उतारू रहेंगे ।
कृपया आप भी सुरेश गुप्ता जी के अन्दाज़ मे बात न करें ।अपने सोच को दायरों से आज़ाद करें ।

सुजाता said...

चोखेर बाली पर 22 साल की युवती से लेकर 55-60 साल की वरिष्ठ् सदस्या भी हैं । लेकिन लगता है स्त्री को "सिखाने" का लोभ संवरण कभी नही किया जा सकता ।हर पोस्ट पर बहस का रुख इसलिए भ्रमित होता है कि स्वयम को हमेशा सही मान कर "सीख , नसीहत , चेतावनी" देने का पुनीत कर्तव्य किया जाता है । मुझे यह पोस्ट ध्यान आ रही है - http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/07/blog-post_09.html
चोखेर बाली पर अब तक की सभी पोस्ट उन दबे हुए सत्यों का उद्घाटन करती रहीं जो स्त्री की दासता और मातहती के पीछे थे ।सभी पर्याप्त शोध के बाद लिखी गयी बातें हैं ।पहले इसे स्वीकार तो कीजिये कि व्यवस्था मे दोष है और व्यवस्था की निर्मिति किसी एक लिंग के हितों की सुरक्षा के लिए हुई । नकारते रहने से आगे बढना मुश्किल है । नकारने मे समझदारी भी नही ।

Unknown said...

सार्थक रचना है. पर अब लगता है कुछ बदल भी रहा है. बेटिओं के जन्म पर बेटों जैसे मनाये गए कितने ही उत्सवों में मैं शामिल हुआ हूँ. एक भाई की तीन बेटियाँ. दूसरे भाई के दो बेटियाँ और फ़िर बेटा. कितना कहा लोगों ने बड़े भाई से, पर दोनों पति-पत्नी चौथे बच्चे के लिए तैयार ही नहीं हुए. दोनों ने कहा, बेटा नहीं है तो क्या हुआ? हमारी बेटियाँ क्या बेटों से कम हैं.

Anonymous said...

सुजाता
स्त्री को उसका स्तर बताना , उसकी जगह बताना , और उसकी सोच को बदलना यही होता हैं समाज मे और अब ब्लॉग पर भी दीख रहा हैं . और ये इसलिये किया जाता हैं ताकि मूल मुद्दा ख़तम हो जाए . इस कविता मे ३ छोटी छोटी बच्चियों का समय से पहले ही अपनी सोच मे इतना परिपक्व होना क्या दिखता हैं , दिखता हैं उनकी "survival instinct " और "unequal distribution of opportunities " बात या कविता की हो तो सुंदर कविता हैं , बात अगर कविता की नहीं नारी की हो तो इस कविता मे एक संदेश हैं की हर नारी एक दुसरे से जुड़ जाए तो क्या नहीं कर सकती . मुद्दे पर बात हो केवल कमेन्ट देकर बात को भटकाया ना जाए

Nitish Raj said...

अच्छी रचना है पर अब मेरे कई दोस्तों के यहां पर जब लड़की हुई तो एसएमएस आया कि घर में राजकुमारी आई है, प्रिन्सिज ने जन्म लिया है। समय धीरे धीरे पर बदल रहा है।

सुजाता said...

रचना ,
आपने कविता का मर्म जाना है , इसे जाने बिना कविता को सुन्दर कहते रहना अजीब है । इसे रीडिंग बेट्वीन लाइंस कहते हैं । इसमें समझने के लिए बहुत कुछ है अगर पाठक इसका स्त्रीवादी पाठ कर पाने के लिए अपनी सोच को विस्तार दे सके ।
धन्यवाद !

अनूप भार्गव said...

सुजाता:

ज़िन्दगी एक दूसरे की समझ से समझने और सीखने का नाम है । यदि मै यह मान कर चलूँ कि जो मेरी सोच है वही अंतिम सत्य है तो फ़िर सीखने को क्या रह जायेगा ? मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैनें ’चोखेर बाली’ से पिछले कई महिनो में ’काफ़ी कुछ सीखा है’ और उस से मेरी सोच के कुछ हिस्सों में बदलाव आया है । यह तभी सम्भव हुआ जब कि मैनें अपना दिमाग खुला रखा । यही आग्रह ’चोखेर बाली’ से है । बदलने को मैं भी नहीं कह रहा , बस सोचिये कि आप की सोच से आगे भी कोई सोच सम्भव है ।

मैनें आशा जी की कविता पर टिप्पणी करते हुए शब्दो का प्रयोग सोच समझ कर किया है । सिर्फ़ समस्याओ को सामने लाने और male bashing से अधिक हासिल नहीं होगा । हमें समस्याओं के विकल्प के बारे में भी सोचना होगा । जो समाज का वर्ग आप के साथ है , उसे ले कर चलना होगा । नारी को समाज में समान अवसर प्राप्त नहीं है , इस बात से कोई इंकार नहीं कर रहा , उसे बार बार दोहराने से क्या मिलेगा ? । नारी को स्वयं क्या करना है , इस के बारे में भी सोचना होगा । जैसा कि मैनें अपनी पिछली टिप्पणी में कहा "इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जब की शोषण करने वाले वर्ग ने स्वेच्छा से अपने शोषण के अधिकारों का समर्पण कर दिया हो । पहली आवाज़ शोषित की ओर से ही उठनी होगी । दूसरी बात जो मुझे आशा जी की कविता में अच्छी लगी वह थी ’आशा की किरण’ । ’चोखेर बाली’ में आशा की किरण नहीं दीखती । माना कि स्थिति में काफ़ी सुधार होना बाकी है लेकिन पिछले बरसों की प्रगति को नकारिये भी मत । सिर्फ़ प्रगति ही नहीं हुई है बल्कि प्रगति की रफ़्तार भी बढी है ।
चोखेर बाली का शुभ चाहता हूँ इसलिये खुल कर अपनी बात कह रहा हूँ । दुख पहुँचता है जब कोई आप की ’बेसिक वैल्यूस’ पर हमला करे । यदि चोखेर बाली अपने सत्य को ही अंतिम सत्य मान कर चलना चाहे और कुछ सुनने या सीखने को तैयार नहीं है तो किसी को उस से जुड़े रहने की बाध्यता भी नही है । लेकिन जिस तबके को बदलने की आप कोशिश कर रही है , उसे की बात भी सुनिये , मेरी नहीं तो किसी ओर की सही।

सुजाता said...

सिर्फ़ प्रगति ही नहीं हुई है बल्कि प्रगति की रफ़्तार भी बढी है ।
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अनूप जी ,
इस बात से सहमत हूँ । पर किसी तबके में बदलाव सिर्फ सफलता की कहानियाँ सुना देने से पता नही लगता । मैं ऐसी रोज़ एक खबर प्रकाशित कर सकती हूँ कि फलाँ स्त्री ने केस लड़ा और जीती , या फलाँ ने आवज़ उठाई , या फलाँ स्त्री सर्वोच्च पद पर आसीन हुई । बदलाव इस बात से भी पता लगता है कि जो स्त्रियाँ यहाँ लिख रही हैं उसमें स्त्री की परम्परिक छवि को किस तरह बदलता देख पा रहे हैं ,वे आत्मविश्वासी हैं , वे मुखर हैं ,वे तर्कशीला हैं । यह बदलाव न तो निगेटिव है न ही किसी अन्य बदलाव से कम है और आशा की किरण तो है ही ।पिछली या इस पोस्ट में मेल बैशिंग जैसी कोई बात ही नही है ।आपने जिस बात से आहत महसूस किया वह वाकई गलत थी पर इस तरह के मंच और इस तरह के मुद्दे पर आवेश मे आ जाना स्वाभाविक है ।
और एक अर्थ में यह एक बहुत पॉज़िटिव बदलाव है कि स्त्री अब गूंगी गुड़िया बनकर चुपचाप किसी की बात नही सुन लेती :-)वह बहस करने को उद्यत होती है । सो बहस शीलास्त्री , विवेकशीला स्त्री से आपको पर्याप्त आशा होनी चाहिये ।
हमें भी आप से हैं । और जब जब आपकी बात मुझे सही लगी अनावश्यक रूप से उसे काटने का प्रयास कभी नही किया ।यदि अनचाहे मे हुई किसी बात से आहत महसूस किया हो तो क्षमा चाहूंगी !

Fighter Jet said...

pata nahi ye kitna satya hai....par mai jahan rahta tha..wahan logo ko"putra ratna" ki koi jaroorat nahi hoti hai...ek ladki ho ya do ya teen,sub pe utna hi dhyan diya jata hai jitna ek 'putra' pe........Aur unki ladkiya US,UK aur anya desh videsh jati hai padhne aur naukri karne......aur unke mata pita ko utna hi garva hota hai apni ladki pe jitna kisi aur ko......aur ab log badal rahe hai...jara north east ke rajyon ka bhraman kare ..wo Hariyan,Punjab ye baki rajyon se kahi behtar hai samazik samrupta me.

अनूप भार्गव said...

सुजाता:

इस में माफ़ी की कोई बात नहीं है (और ना ही इस की अपेक्षा थी)। :-)

अपनी बात को दोहरा रहा हूँ लेकिन मैं ’चोखेर बाली’ में दो बाते देखना चाहूँगा :

१. समस्या के साथ साथ विकल्पों की भी बात हो । सिर्फ़ व्यवस्था को दोषी ठहरा देना पर्याप्त नहीं है ।

२. किसी समस्या की बात करते समय इस बात पर भी ध्यान दिया जाये कि समस्या के पात्र ने समस्या को सुलझाने के लिये क्या किया , वह क्या कर सकता था और उसे क्या करना चाहिये था ।

सिर्फ़ सुझाव हैं , ब्लौग तुम्हारा है , जो उचित समझो करो लेकिन तुम्हारी (और अन्य चोखेर बालियों की) इस विषय में राय ज़रूर ज़ानना चाहूँगा ।

Anonymous said...

इस ब्लॉग पर जो भी स्त्री लिखती हैं उसने स्त्री होने की यात्रा को कई चरणों मे जिया हैं और बिल्कुल सब कहूँ तो भोगा हैं . हर पात्र ने अपनी जगह अपनी स्थिती को ठीक करने की निरंतर कोशिश की हैं क्योकि बीमार , बिमारी का इलाज जरुर करता हैं . लेकिन जब है कोशिश नाकामयाब हो जाती हैं तो शब्दों मे अपनी या अपनी किसी की भोगी व्यथा को बांटा जाता हैं . क्युकी आप को अपनी यात्रा मे वो दर्द मिला ही नहीं आप को लगता हैं की ये सब फबिर्काशन हैं और इसको ठीक करने का प्रयास नहीं किया गया हैं . क्या विकल्प दिया जासकता हैं जहाँ बार बार ये समझया जाता हो विकल्प खोजो . आप के पास विकल्प हो शोषण से बचने का तो आप बताये अनूप भार्गव साहेब . आप को फिर लगेगा की अनाम से क्या बात करनी क्योकि आप को लगता हें की नाम के साथ लिखा हुआ ही सब कुछ होता हैं . बहुत सीधी बात हैं आप ने लिखा हैं " मै चोखेर बाली मे ये देखना चाहता हूँ " यानी आप की इच्छा हैं की चोखेर बाली का प्रारूप ऐसा हो , अब क्योकि प्रारूप वैसा नहीं हैं सो आप को सही नहीं लगता , यानी आप को बदलाव की कामना हैं वो बदलाव जो आप देखना चाहे . ठीक उसी तरह यहाँ जो भी लिख रहा हैं वो व्यवस्था मे वो बदलाव देखना चाहता हैं जिसकी उसे चाह हैं . आप को वो सही लगे या ग़लत इस से कोई फरक नहीं पडेगा . बात विकल्पों की तब होगी जब आज तक जिसका पलडा भारी रहा हो समाज मे वो अपने पलडे से नीचे उतरे और दुसरे पलडे को ऊपर आने दे . जिसका पलडा हमेशा से नीचे रहा हैं उसके पास एक ही विकल्प होता हैं , कोशिश करना की जो ऊपर के पलडे पर हो उसको नीचे उतारो . सहन शक्ति जब ख़तम हो जाती हैं तो व्यक्तिगत दोष रोपण होते हैं और ज्यादा उसको सुनना पडेगा जिसने आज तक सुनाया हैं . ना आप सुरेश की ग़लत कमेन्ट पर कमेन्ट करते ना बात आगे बढ़ती . जो सुरेश कर रहे थे वो ग़लत था और रहे गा आप पिछली तीनो पोस्ट पढे आप को ख़ुद लगेगा बात का रुख कहा से बदला .

सुजाता said...

अनाम से पूरी तरह सहमत हूँ !
चोखेर बाली को "ऐसा" देखना चाहता हूँ एक बड़ी पॉलिटिकली इनक्रेक्ट संरचना है ।और शायद चोखेर बाली में इसी मानसिकता का विरोध हो रहा है कि जो आप हमें देखना चाहते हैं वैसा ही हमे क्यों होना है ? आप हमें वैसे स्वीकारें जैसा हम होना चाहते हैं । उसी तरह सराहें ।
अनूप जी ,
मुझे इस बात में वही गन्ध मिल रही है जो किसी भी पितृसत्ता के दृढ समर्थक की बात में मिल सकती है ।ज़रा आप इस पर पुनर्विचार करके देखें ।

Prabhakar Pandey said...

बहुत ही सुंदर रचना। सटीक और यथार्थ।

Anonymous said...

सुजाता
आप किसी के स्वीकार करने को इतना महत्व ही क्यों देती हैं . अगर हम सब " स्वीकारे जाने " की चिंता को छोड़ दे और अपने अपने दृष्टिकोण पुरी सच्चाई से रखे तो हम अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं . हमारा कर्तव्य हैं सोये हूँ रुढिवादी समाज को झकझोरना . अगर आप सरहाने और स्वीकार किये जाने के लिये लिख रही हैं तो आप भी "slave mentality " की शिकार हैं ये सफर औरत से इंसान बनने का हैं औरत के स्वीकारे और सरहाये जाने का नहीं

Anonymous said...

anoop ji kyon kashT uThaa rahe hain ? chokher baaliyaan seekhane naheen sikhaane nikalee hain . purushon ko sabak sikhaane .

अनूप भार्गव said...

सुजाता:

अच्छा किया तुम ने ये बात लिखी , अनाम टिप्पणी का उत्तर मैं नहीं देता (और न आगे देने का इरादा है)।

तो पहले ’पोलिटिकली करेक्ट्नेस’ की बात की जाये , अगर टिप्पणी को पूरा पढो तो वह इस से खत्म होती है :
"सिर्फ़ सुझाव हैं , ब्लौग तुम्हारा है , जो उचित समझो करो"
क्या इस में भी "पितृसत्ता के दृढ समर्थक" की बू आ रही है ?
अब क्यों कि तुम्हारा उत्तर मिल गया है , इसलिये आगे से सुझाव देने की भी ज़हमत नहीं होगी ।

@आप हमें वैसे स्वीकारें जैसा हम होना चाहते हैं । उसी तरह सराहें ।

हम आप को स्वीकारेंगे जैसा आप होना चाह्ते हैं लेकिन आप को तर्क के साथ यह समझाना होगा कि आप वैसा क्यों होना चाह्ते है और वह किस तरह से सही है । यही बात पुरुष के लिये भी लागु होती है ।
Accept me as it is whatever I decide and I won't even explain or justify , is called ARROGANCE.

अब बात करते हैं उस मुद्दे की जिसे मैनें लिखा था :
१. समस्या के साथ साथ विकल्पों की भी बात हो । सिर्फ़ व्यवस्था को दोषी ठहरा देना पर्याप्त नहीं है ।

२. किसी समस्या की बात करते समय इस बात पर भी ध्यान दिया जाये कि समस्या के पात्र ने समस्या को सुलझाने के लिये क्या किया , वह क्या कर सकता था और उसे क्या करना चाहिये था ।

क्या कोई इस बात पर प्रकाश डालेगा कि चोखेर बाली में ऐसा क्यों नहीं हो रहा है, या क्यों नहीं होना चाहिये (और अगर हो रहा है जिसे मै नहीं देख पा रहा हूँ, तब भी बताये) ।
एक बार फ़िर से अगर उत्तर यही है कि ’चोखेर बाली हमारा ब्लौग है , आप कौन होते हो पूछने वाले" - तो मुझ इस के आगे कुछ नहीं कहना है ।

Asha Joglekar said...

माँ री ऐसा तो न सोचा था ।

Anonymous said...

आशा जी, मैं भी आपके साथ हूं।

Anonymous said...

"सिर्फ़ सुझाव हैं , ब्लौग तुम्हारा है , जो उचित समझो करो लेकिन तुम्हारी (और अन्य चोखेर बालियों की) इस विषय में राय ज़रूर ज़ानना चाहूँगा ।"
मुझे सख्त आपत्ति है ब्लॉग पर, सार्वजनिक मंच पर किसी के इस तरह अनौपचारिक हो जाने से, कि कोई तू-तड़ाक पर आ जाए। अब आप कहेंगे कि तू और तुम में फर्क है, तो भी कोई चाहे घर में रिश्तेदार हो, पर सार्वजनिक मंच पर कोई किसी को तुम कहे, और यह अचानक शुरू हो, तो गलत लगता है। इसके पीछे, अचानक साठ-गांठ की भी बू आने लगती है। सुजाता, अब आपको यह मोर्चा भी संभालना होगा!

Anonymous said...

anonymous-2 के नाम से लिख रही हूँ। पहले वाले anonymous की तुलना में थोड़ी तमीज़दार हूँ, बता रही हूँ कि लड़की हूँ, और ये भी कि मैं anonymous की तरह पर्दे के पीछे भी रहना चाहती हूँ क्योंकि मुझमें लड़ने की ताकत नहीं है, उस जैसे ही। ओह! ’उस’ कह गई...’उन’ जैसे ही। anonymous के लिये चाहे तुम हो या तू क्या फ़र्क पड़ता होगा, उसका मकसद, वार सीधे उस पे न आ जाये का पूरा होता ही है, फिर ऊपर से सुजाता को उकसाना भी कि अब ये मोर्चा भी सम्भालिये...बड़ी ही हिम्मत का काम है...वाह क्या कहने...

anonymous-2

Anonymous said...

अब फिरसे कह रही हूं (जी हां, 'रही' हूं) कि यह तुम-तू और आप का मसला खुद के लिए नहीं, सुजाता के लिए जरूरी मान रही थी। यह किसी पर आरोप नहीं, सीधे-सीधे अनूप जी को अनौपचारिक होने से रोकने के लिए और इसके लिए सुजाता को भी उकसाने के लिए था। वैसे, अब तो सुजाता भी समझ रही होंगी कि किसी से अचानक 'तुम' कहलवाना गलत/ अजीब लगता है। यह लड़ाई सुजाता के लिए, सुजाता के हक में थी। और उस बहाने सबके लिए भी। अगर किसी को कुछ और समझ में आया हो तो माफी दई दो (I mean दीजिए)!!!

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स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...