Monday, August 18, 2008

स्वागत कुलदीपिकाओं का

कुछ दिन पहले मेरे एक संबंधी डाक्टर तिवारी, जो एक गायनाकोलोजिस्ट हैं, तीन-चार दिनों के लिए हमारे घर आए थे। वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बडे़ शहर में अपना एक छोटा सा मेटर्निटी होम चलाते हैं जिसे वह एक जूनियर डाक्टर के जिम्मे छोड़ कर आए थे। यहाँ रहने के दौरान भी नियमित रूप से मोबाइल के द्वारा वह अपने मेटर्निटी होम के कर्मचारियों से वहाँ की खबर लेते रहते थे। एक दिन वहाँ से बात-चीत के बाद उन्हें प्रसन्न देख कर पूछ बैठी,

कुछ बढ़िया खबर है क्या?” ,

हाँ, आज हमारे अस्पताल में तीन लड़के पैदा हुए,” उत्तर मिला।

क्या वे बच्चे आपके मित्र परिवारों के हैं?”

नहीं भाभीजी, मेरे मरीज़ हैं, बस”

फ़िर इस खुशी की वजह?”

वजह तो वही सनातन है- तीन कुलदीपक जन्मे हैं- तीन घरों के चिराग,”

लेकिन इससे आपको क्या फ़र्क पड़ता है?”

भाभीजी, लड़का पैदा होते ही अस्पताल में खुशी की लहर दौड़ जाती है। बच्चे की दादी हा्थ जोड़ कर धन्यवाद देने लगती है, पिता मिठाई की दुकान को दौड़ता है। नर्सों, दाइयों को अच्छा इनाम पाने की उम्मीद बँध जाती है। और तो और, मैं भी खुश हो जाता हूँ कि ये लोग अस्पताल का बिल चुकाने में आनाकानी नहीं करेंगे। लड़की हुई तो ऐसा मुँह लटकता है सबका कि क्या कहूँ। सोचते और अक्सर कहते भी हैं कि इतनी बड़ी मुसीबत घर आ गई है उनके, सो मुझे उनके साथ हमदर्दी और रियायत से पेश आना चाहिए और और कुछ नहीं तो उनका अस्पताल का बिल तो माफ़ कर ही कर देना चाहिए,” डा. साहब हँस कर बोले।

हमेशा ऐसा होता है?”

नहीं, हमेशा तो नहीं। कभी-कभार लड़की के पैदा होने पर भी मिठाई मिल जाती है, उसके माता-पिता खुश दिखाई देते हैं। पर ऐसा कम होता है।”

क्या पढे़-लिखे लोग भी लड़की होने पर दुखी होते हैं?”

टीचर हैं न, इसलिये आपको पढा़ई-लिखाई पर बड़ा विश्वास है। भाभी जी, पढा़ई से लोग वाकई कुछ सीखते तो भला शिक्षित समाज की यह हालत होती? इतना भ्रष्टाचार होता समाज में और शहरों में इतने पढ़े लिखे लोग अपनी बहुएं जलाते?”

डा. साहब की बात ने मुझे सोच में डाल दिया। हमारी शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य क्या सिर्फ़ लोगों को लिखना- पढ़ना सिखा कर उनकी आजीविका का प्रबंध करना है या इसके साथ-साथ उन्हें एक बेहतर, विवेकी और न्यायशील इंसान बनाना भी है? अगर मौज़ूदा शिक्षा प्रणाली ऐसा नही कर पा रही है तो क्या उस में बदलाव लाने की ज़रूरत नहीं है?

पर यह भी सच है कि कुछ हद तक तो समाज में बदलाव आया है इस शिक्षा प्रणाली के चलते और यह बदलाव हमें अपने आस-पास दिखाई भी दे रहा है। मेरी माँ की पीढी़ से लेकर मेरी बेटी की पीढी़ तक काफ़ी कुछ बदल गया है। मेरी माँ ने अपने घर में रह कर मेट्रिक तक पढ़ाई की। उनको अपने ही गाँव में अपनी सहेली के घर जाने तक की इजाज़त नहीं मिली थी, न उसकी शादी में, न उसकी माँ के देहांत के समय। कोई दो फ़र्लांग की दूरी पर रह रही सहेलियाँ कभी-कभार एक दूसरे को पत्र लिख कर नौकरानी के हाथों भेज कर अपना हाल-चाल लिया-दिया करती थीं। माँ का विवाह होने के बाद भी संयुक्त परिवार में उन पर कमोबेश बंधन बने रहे, इतने बरसों तक, कि जब वह बंधन हटे तबतक वह अपना आत्मविश्वास खो चुकी थीं। वह अब ७५ वर्ष की हैं पर आज तक कभी अकेले बाज़ार तक नहीं गई हैं। उन्हें कहीं भी जाने के लिये साथ या सहारा चाहिए।

विवाह पूर्व स्कूल-कालेज छोड़ कर और कहीं अकेले आने-जाने की आज़ादी मु्झे भी नहीं थी। पिता मुझे होस्टल भेजने को तैयार नहीं थे इसलिये एक अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश मिलने के बाद भी मुझे वहाँ पढ़ने नहीं भेजा। मैंने अपने शहर के कालेज से ही स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। पर एक फ़ौजी अफ़सर से विवाह के बाद मेरी परिस्थितियाँ बदल गईं। मैंने बाज़ार ही नहीं, बैंक, पोस्ट आफ़िस, बिजली दफ़्तर, टेलीफ़ोन एक्सचेंज, अस्पताल आदि जगहों पर अकेले जाकर अपना काम करवाना सीखा और बस और रेलगाड़ियों में अकेले और बच्चों के साथ सफ़र करना भी।

मेरी बेटी १५ वर्ष की उम्र से होस्टल में रह कर पढी़। पढा़ई के बाद एक दूसरे शहर में नौकरी मिली तो वहाँ कमरा लेकर रहने लगी। विवाहपूर्व अपनी कंपनी की ट्रेनिंग के लिए छः हफ़्ते के लिए अकेली अमेरिका गई और वापस आते समय रास्ते में तीन-चार दिन रुक कर पेरिस और वियेना घूमने के बाद भारत लौटी।

मेरी माँ की लगभग हाउस-अरेस्ट जैसी स्थिति से लेकर मेरी बेटी की अकेले विदेश यात्रा तक का यह जो सफ़र पचास वर्षों में तय हुआ है, उसका कारण शिक्षा के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? यह मानना होगा कि शिक्षा पाने के बाद कुछ लोगों की सोच बदली है और वे अपनी बेटियों को समान अवसर दे रहे हैं या देना चाहते हैं। बाकी की भी सोच सही दिशा में बदले, इसके लिए क्या करना चाहिये?

इस बदलाव को लाने में एक बड़ी सशक्त भूमिका मीडिया निभा सकता है। मीडिया की पहुँच अब उन तबकों तक पहुँच गई है जहाँ बदलाव की सख्त ज़रूरत है। पर क्या मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा है? टीवी सीरियलों को ही देख लीजिए। ज़्यादातर सीरियलों में या तो औरत मजबूर और रोती हुई दिखाई जाएगी, या बिलकुल मंथरा का अवतार। कंज़्यूमरिज़्म के दबाव में आकर हमारे ज़्यादातर सीरियल सास-बहू, ननद-भाभी के झगड़ों, भविष्यवाणियों, अन्धविश्वासों के जाल में उलझे हुए हैं। इस संबंध में एक अपवाद ध्यान में आ रहा है। एक अपेक्षाकृत नये चैनल में दिखाए जा रहे दो टीवी सीरियल -एक पैकेट उम्मीद- और -राधा की बेटियाँ कुछ कर दिखाएंगी-नारी शक्ति और क्षमता को बहुत पाज़िटिव ढंग से उजागर करते हैं। साथ जुड़ कर लड़कियाँ या नारियाँ बहुत कुछ कर सकती हैं।

बदलाव तो आना ही है। यह बदलाव जल्दी आए और सही दिशा में आए इसके लिए हम सबको मिल कर प्रयास करना है। काश, वह दिन जल्दी आए जब हर बेटी के जन्म पर उसके परिवारजन कुलदीपिका के आने की खुशी मनाते दिखाई दें।

18 comments:

Suresh Gupta said...

यह सच है कि हमारी शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य माजूदा हालात में सिर्फ़ लोगों को लिखना- पढ़ना सिखा कर उनकी आजीविका का प्रबंध करना है. उन्हें एक बेहतर, विवेकी और न्यायशील इंसान बनाना भी शिक्षा प्रणाली का एक उद्देश्य होना चाहिए, पर ऐसा नजर नहीं आता. शिक्षा में राजनीति की दखलंदाजी जब तक ख़त्म नहीं की जायेगी तब तक ऐसे ही चलेगा.

डॉ .अनुराग said...

घर की औरत अगर मजबूत हो जाए ओर अपनी बेटियों का डट कर साथ दे .....तो फ़िर ये ये उम्मीद जल्दी पूरी होगी.

Manvinder said...

hamare pariwaaron mai ourate hi ladaka or ladki ka fark paida karti hai....
anurag ji ki baat se mai sahmat hu...ourat ko majbooti dikhaani hogi....
peryaas shuru ho rahe hai to parinaam b aenge.

Manvinder said...

hamare pariwaaron mai ourate hi ladaka or ladki ka fark paida karti hai....
anurag ji ki baat se mai sahmat hu...ourat ko majbooti dikhaani hogi....
peryaas shuru ho rahe hai to parinaam b aenge.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

भाभी जी, पढा़ई से लोग वाकई कुछ सीखते तो भला शिक्षित समाज की यह हालत होती? इतना भ्रष्टाचार होता समाज में और शहरों में इतने पढ़े लिखे लोग अपनी बहुएं जलाते?”
==========================
बहुत ढोस तथ्य
विचारणीय और मनन के योग्य.
==========================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Anil Kumar said...

अंग्रेज़ी में कहते हैं, there is a difference between instruction and education. याने के अक्षरज्ञान या तीन-चार चीज़ें सीख लेने से शिक्षा नहीं हो जाती. शिक्षा का मतलब है समझ, न कि पढ़ना-लिखना. आजकल हमारे बच्चों को जो मिल रही है, वह instruction ही है, न कि education. मुझे आश्चर्य यह हो रहा है कि क्या इतने बड़े भारत में कोई भी ऐसा शिक्षक नहीं है जो अपने विद्यालय में "शिक्षा" दे?

Arvind Mishra said...

"हमारी शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य क्या सिर्फ़ लोगों को लिखना- पढ़ना सिखा कर उनकी आजीविका का प्रबंध करना है "
दुर्भाय्ग्य से यही युग धर्म हो गया है

अनूप भार्गव said...

एक संतुलित लेख के लिये बधाई ।

शिक्षा प्रणाली के उद्देश्य पर आप का प्रश्न बहुत उचित है । दुर्भाग्य से उत्तर वह नही है जो होना चाहिये लेकिन फ़िर भी सिर्फ़ ’सही शिक्षा’ ही है जो कुछ परिवर्तन ला सकती है ।

अनुराग की बात से भी सहमति है ।

Anonymous said...

मेरी एक सहेली ने मुझे इस ब्लाग के बारे में बताया, यह कह कर कि जरा जाओ इस ब्लाग पर, यहाँ स्त्रियाँ सामाजिक परम्पराओं और पुरुषों की जम कर छीछालेदर करती हैं. मानवीय संबंधों का कैसे मजाक बनाया जाता है यह देखने को मिलेगा यहाँ. इन स्त्रियों ने या तो विवाह किया नहीं या किसी कारण विवाह हुआ नहीं, इन्हें बस विवाह से सम्बंधित हर बात स्त्री को गुलाम बनाने के लिए पुरूष द्वारा किया जा रहा षड़यंत्र लगती है. यहाँ तक कि अगर कोई पति अपनी पत्नी के लिए उपहार लाता है तो उस में भी इन्हें षड़यंत्र की बू आती है. और मजेदार बात यह है कि यह स्त्रियाँ ख़ुद को नारी वर्ग का जीवन को प्रतिनिधि मानती हैं. अगर कोई इन की बातों से सहमत नहीं होता तो यह उसे अपशब्द कहना शुरू कर देती हैं.

इस ब्लाग पर आ कर मुझे लगा कि मेरी सहेली की बात काफ़ी हद तक सही है. मैं एक विवाहित स्त्री हूँ. विवाह जीवन को पूर्णता देता है. विवाह बंधन नहीं है और न ही है कोई षड़यंत्र. इसमें मानवीय सम्बन्ध बहुत महत्व रखते हैं. स्त्री और पुरूष मिल कर समाज का निर्माण करते हैं. समाज का केन्द्र परिवार है. परिवार का एक जरूरी अंग है विवाह. स्त्री और पुरूष को अपनी जिम्मेदारियां और उन से सम्बन्धित अधिकार बाँट कर उन का न्यायोचित पालन करना चाहिए. इसमें कोई भी बिसंगति आती है तो उसे दूर करना चाहिए. किसी एक या दो घटनाओं को लेकर पूरे समाज और पुरूष या नारी वर्ग पर दोषरोपण करना ग़लत है. मुझे लगता है कि आज की शिक्षित नारी भारतीय समाज और उसकी परम्पराओं का बिना सोचे समझे विरोध कर रही है.

किसी भी समाज में विवाह एक जरूरी संस्था है. बिना विवाह किए स्त्री और पुरूष का साथ रहना ग़लत है. किसी दुराग्रह के कारण विवाह न करना भी ग़लत है. स्त्री की शारीरिक रचना, उसकी मानवीय भावनाएं ऐसी हैं जो उसे पुरूष से भिन्न करती हैं. स्त्री अपने घर में ज्यादा सुरक्षित हैं. घर उसकी राजधानी है. उसे पुरूष से स्पर्धा करने की जरूरत नहीं है. इस स्पर्धा में अपना समय और उर्जा नष्ट करना सही नहीं है. स्त्री को शिक्षित होना चाहिए पर इस का उद्देश्य केवल नौकरी करना नहीं होना चाहिए. नौकरी अन्तिम विकल्प है जो किसी बुरे समय में स्त्री के काम आता है. घर की रानी को दूसरों की नौकरानी बनना, किसी बेबकूफी से कम नहीं.

यह मेरा सोच है. किसी और सोच की निंदा करना मेरा उद्देश्य नहीं है. अगर किसी को मेरी बात बुरी लगे तो कृपया नकार दें. धन्यवाद.

सुजाता said...

प्रिय वन्दना मिश्र जी ,
हालाळ्कि मुझे आपकी आडेंटिटी को लेकर पर्याप्त सन्देह हैं , पर नेट पर यह एक समान्य बात है कि कोई पुरुष अपनी कुंठा ऐसे निकाल रहा हो ।यह उसकी आज़ादी हैअनाम भी हो सकता था पर एक स्त्री के द्वारा यह बातें कहा जाना शायद ज़्यादा वज़नी हो जाता है , खैर ....


पर्याप्त निन्दा करने के बाद आपने कहा कि
-यह मेरा सोच है. किसी और सोच की निंदा करना मेरा उद्देश्य नहीं है. अगर किसी को मेरी बात बुरी लगे तो कृपया नकार दें. धन्यवाद.
आपसे भी यही अनुरोध है कि आपको चोखेर बाली की बातें ठीक नही लगती तो उन्हें नकार दें! बात खत्म !
वैसे भी जिस पोस्ट पर टिप्पणी स्वरूप आपने अपने विचार प्रकट किये हैं उसे दोबारा पढने का कष्ट कीजिये तो शायद आपकी गलत फहमी दूर हो सकेगी ।

शोभा said...

बदलाव तो आना ही है। यह बदलाव जल्दी आए और सही दिशा में आए इसके लिए हम सबको मिल कर प्रयास करना है। काश, वह दिन जल्दी आए जब हर बेटी के जन्म पर उसके परिवारजन कुलदीपिका के आने की खुशी मनाते दिखाई दें।
समाज की सोच बदल रही है किन्तु कुछ लोग हैं जो आज भी रूढ़िवादिता का दामन थामें हैं । जलद ही समाज की विचारधारा बदलेगी।

pallavi trivedi said...

sachmuch 50 saalon ke is safar ko aapne bahut achchi tarah darshaya hai jisse is wakt mein hue badlaav ko bhi sahaj hi dekha ja sakta hai....aur shiksha se hi badlaav ki ye lahar jald hi har jagah dikhai dene lagegi....

Anonymous said...

आपने ठीक कहा सुजाता जी. मैं आप के ब्लाग पर आई थी सो सोचा कि अपनी राय पोस्ट करती चलूँ, सो कर दी. मैं तो पहले ही आप लोगों की कुंठा से भरी बातें नकार चुकी हूँ. आप लोगों को इस से कुछ हासिल होने वाला नहीं है.

अब रही बात 'मुझे आपकी आडेंटिटी को लेकर पर्याप्त सन्देह हैं' तो ऐसा अक्सर होता है. नफरत करते करते इंसान हर एक में उसी को देख ने लगता है जिसे वह नफरत करता है. बेहतर है आप पुरुषों से नफरत करना बंद कर दें.

Anonymous said...

मुझे लगता है कि पढ़ने और टिप्पणी करने वालों को समझना चाहिए कि यहां लड़ाई एक स्त्री बनाम एक पुरुष से ज्यादा इस व्यवस्था में दोनों की स्थिति को लेकर है। मूलत: विरोध पुरुष की तरफदारी करते और इस कारण महिला को उसकी वाजिब जगह न देते समाज और व्यवस्था से है। और चूंकि पुरुष लगातार इस व्यवस्था से फायदा उठाते और इस प्रक्रिया में महिलाओं का हिस्सा मारते नजर आते हैं, इसलिए उनकी भी लगे हाथों ठुकाई यहां, इस ब्लॉग पर हो जाती है। अब इस पिसाई में गेहूं के साथ कभी-कभी घुन भी पिस जाता है।!!

Vandana Pandey said...

सभी प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यवाद।
"घर की रानी का किसी दूसरे की नौकरानी बनना किसी बेवकूफ़ी से कम नही"
यह वाक्य दिखाता है कि लेखिका सभी कामकाज़ी महिलाओं को कितनी नीची नज़र से देखती है। घर के बाहर काम करने की ज़रूरत तो न मैडम क्यूरी को थी, न इन्दिरा गांधी को, न इन्दिरा नूयी को, और न कल्पना चावला को। जानना चाहूंगी कि इन महिलाओं के बारे में लेखिका की क्या राय है।

shelley said...

parul ji sahi likha hai aapne. aaj v samaj ka pragatishil log kis prakar ka hote hain meine dekha hai. ladki ko laka dukhi hone walon me v adhiktar padhelikhe hi hote hain meine is par kaam v kiya hai

Renu said...

I think the change is already there, i wanted to write in Hindi but didnt know how to. My daughter is 29 yrs old and when she was born, she brought happiness in my family, I wanted a girl and so i was very happy, she was given equal opportunity for everything, sometimes even more than my son, and today she is a qualified postgraduate with many degrees, doing a good job, married but looks after her family and inlaws so well that makes me very proud of her.
The only thing I dislike today is that girls are going to the other extreme--being equal doesnt mean denying your gender or----being arrogant, disrespecting to ur inlaws, spendthrift or no cooking or being indisciplined.
Changes are welcome if they bring better results, but we shoudnt change for worse, I never taught my daughter that being emancipated means--u shouldnt do housework, or shouldnt respect ur inlaws, just care about ur parents and all that. I have given her everything equal and taken the privilege of Kanyaadan, and feel I am lucky to have a daughter who is loved ,cared and respected by her inlaws, I dont expect her to always think of me and all that. Its necessary to inculcate right values. If we want any other way then we will have to remove the custom of Kanyaadan from our rituals, cant have our cake and eat it too,
sorry for a big response !

Dr. Shashi Singhal said...

हालांकि किसी की सोच पर हमारा कोई जोर नहीं है लेकिन यहां सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि चोखरेबाली ब्लॉग भले ही महिलाओं का है किंतु यह किन्हीं भी कूंठाओं से ग्रसित नहीं है । यहां सिर्फ स्त्री ही नहीं पुरुष भी आकर अपने विचार रखते हैं । शायद वंदना मिश्रा जी ने रिपोर्ट को गहरआईसे पढा़ नहीं हैं या फिर वह खुद रूढिवादिता से बाहर नहीं निकल पाई है । जबकि यहां बात समाज में व्याप्त कुरीतियों ,अव्यवस्था, बुराईयों तथा महिलाओं के उअत्पीड़न के खिलाफ समाज में बदलाव लाने की है ।हम सब जानते हैं कि विवाह एक ऎसी प्रणाली है जिसके बगैर हम समाज की संरचना की कल्पना भी नहीं कर सकते । आज मैं अपनी बेटी को हर वो चीज देने का प्रयास करती हूं जिसकी उसे जरूरत है । आज मईं अपने बेटे व बेटी की परवरिश में कतई फर्क नहीं करती । जबकि मैं ऎसे परिवार में पली बढी़ जहां बेटियों की किसी ख्वाहिश को पूरा नहीं किया जाता था बल्कि बेटों की हर बात मानी जाती थी । मेरी मॉ के समय की बात करें तो तब हालात और बुरे थे कि बेटी को बाहर की दुनिया से कोसों दूर घर की चारदीवारी में कैद करके रक्खा जता था । देखा जाए तो अब और तब के माहौल मे जमीन - आसमान का अंतर है यह बदलाव नहीं तो और क्या है ?

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...