Monday, August 25, 2008

अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है{?}

आप सोचते होंगे कि इतने दिन से यूट्यूब पर से गीत,फिल्में ला लाकर जाने क्या कर रही हैं !पर एक तस्वीर कईं शब्दों से ज़्यादा ताकतवर होती है।कई बार एक फिल्म मे कुछ साधारण बातें हमें सोचने को उकसा देती हैं।और अचानक लगता है कि यह उन्हें दिखाएँ जो कहते हैं -


बराबरी मिल तो रही है या सम्मान तो हमसे ज़्यादा मिलता है फिर क्या शिकायत है ?स्वतंत्रता तो है या आरक्षण भी मिलता है या काश मै भी लड़की होता तो बहुत से फायदे लड़की होने से मिल जाते,बॉस प्रमोशन कर देता यूँ ही।

इस नुकसान का क्या करेंगे??



ह्म्म !

शाहिद कपूर नही आता न हर जगह !उसका इंतज़ार भी नही करना चाहिये ।आत्मरक्षा के तरीके सिखाए जाने चाहिये बच्चियों को ।
पर मेरा अभिप्राय है कि समाज , कानून , प्रशासन, सरकार क्या करेगी??
अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है-यह ज्ञान देने के लिए यहाँ सब तैयार रहते हैं। भारत के किसी रेलवे स्टेशन या बस सटैंड या कहीं भी अगर लड़की अकेली है तो उसके लिए हालात इससे अलग होंगे क्या?
संरक्षण से निकलेंगी तो यही होगा , क्या यही चेतावनी हम स्त्रियों , बच्चियों ,लड़कियों को नही देते?बजाय इसके कि हम माहौल को सुरक्षित करें हम जगह जगह प्रचारित कर रहे हैं -स्त्री अपने शील {?}, जो उसकी जान से कीमती है, की रक्षा स्वयम करे{किसी पुरुष के संरक्षण मे रहकर }मानो रेलवे ,कानून या राज्य कह रहा हो सवारी अपने सामान ,अधिकार,सम्मान की सुरक्षा स्वयम करे ।
कानून और प्रशासन की इस समय क्या भूमिका होती है इससे सभी वाकिफ हैं,थानों मे बदसलूकियाँ या बलात्कार की खबरें सुनी ही होंगी।दिल्ली पुलिस के विज्ञापन भी यही कहते हैं न
"समाज के मर्द ही स्त्री को छेड-खानी से बचायेंगे",या अन्धेरे स्थानो पर अकेली न जाएँ जैसी बातें।ऊपर फिल्म में रेलवे इंस्पेक्टर और पुलिस और प्रशासन और सरकार मे क्या कोई फर्क है ??

27 comments:

जितेन्द़ भगत said...

सहमत, सही कहा।

vineeta said...

bilkul sahi kaha. ladkiyan abhishapt hai samaaj ka doglapan aur kuntha sahan karne ke lie.

दिनेशराय द्विवेदी said...

स्त्रियों के साथ बहुत सी चीजें गलत हैं, और यह सब पुरुष प्रधान समाज और समाज की ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान हुआ है। लेकिन अब रास्ता क्या है? इस पर भी विचार रखे जाएंगे कभी? या फिर केवल राजनैतिक दलों की तरह विपक्षी पार्टी की आलोचना से ही काम चलता रहेगा। किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए रास्तों के विकल्प तो सुझाए जाने चाहिए।

रंजन (Ranjan) said...

पुरुष ही माहोल को असुरक्षित बनाता है..
और
पुरुष ही सुरक्षा देने का दिखावा करता है..

जब तक पुरषो कि मानसिकता नहीं बदलेगी.. तब तक राहे मुश्किल है..

Manvinder said...

oorat ki surkash koi nahi kar sakta hai...
sujata ...
ap hi batao, abi tak ese kitnae udhahran hai ? kuch apwaadhon ko chod de to..
oorat ko apni surksha ke liye khud ko hi saksham banana hoga...

सुजाता said...

दिनेशराय द्विवेदी said... लेकिन अब रास्ता क्या है? इस पर भी विचार रखे जाएंगे कभी? या फिर केवल राजनैतिक दलों की तरह विपक्षी पार्टी की आलोचना से ही काम चलता रहेगा। किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए रास्तों के विकल्प तो सुझाए जाने चाहिए।
दिनेश जी ,
जब मैने बार बार कानून,प्रशासन और राज्य का नाम लिया तो ज़ाहिर है कि मै कहना चाह रही हूँ कि ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर प्रशासन की पूरी ज़िम्मेदारी बनती है कि इस पक्ष को लेकर सम्वेदनशील रहे,बजाय यह सिखाने के कि अकेली लड़्की खुली तिजोरी होती है।ज़ाहिर है कि प्रशासन भी इस समाज से जुदा लोगों से नही बना ,तो ऐसे में वोकेशनल व अन्य पाठ्यक्रमों में जेंडर सेंसिटाइज़ेशन एक मुद्दा होना चाहिए।
पोलिओ उन्मूलन के लिए सरकार मुहिम चला सकती है तो इस व्यापक समस्या के लिए कुछ कदम तो उठाए जा सकते हैं!अलग अलग पोस्टस में ये सभी बातें कहीं जा चुकी हैं।
आपने अच्छा किया कि इस पर बात की।

Anonymous said...

पाठ्यक्रमों में जेंडर सेंसिटाइज़ेशन एक मुद्दा.........

no .............at least not in schools(vocational or not)

baste par aur kitna bojhaa?
bachche ki jaan loge kya ab?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

‘खुली तिजोरी’ वाली बात तो फिर भी गलत नहीं है। लाख सुरक्षा बिठा दीजिए, एक से एक चोर-लुटेरे घूम ही रहे हैं। २४ घण्टे का पहरा भी गारण्टी नहीं देता। अपनी सुरक्षा के लिए सतर्क रहने की सलाह से भी आपको आपत्ति है, तो काहे की बराबरी?

सुजाता जी, संसार में मनुष्य से पहले दूसरे जानवर आये जो जंगल में रहते थे। मनुष्य उनका ही परिष्कृत संस्करण है। इसमें जानवरों की कुछ मौलिक प्रवृत्तियाँ तो रहेंगी ही। इन्हें समाप्त करने के बजाय मैनेज करना पड़ेगा, इन्हें नियंत्रित करना पड़ेगा। इसका जिम्मा केवल पुरुषों पर ही मत डालिए।
jab we met का जो प्रसंग आप ने दिखाया उसमें शाहिद कपूर भी तो पुरुष ही था।

ab inconvenienti said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

आपके ब्लॉग की और आपके जैसी स्त्री विमर्श करने वाली और भी महिलाओं की बातें केवल शिक्षित, और आमतौर पर सुसंस्कृत पुरुषों तक ही पहुँच रही है, जिन्होंने अपने अन्दर के जानवर को कुछ हद तक मैनेज कर लिया है, जो काफी हद तक इन मुद्दों की गहरी न सही, कुछ समझ रखते हैं. पर आपकी या दुनिया के किसी भी स्त्री आन्दोलन की आवाज़ झोपडी में रहने वाले निर्धन या निम्न मध्यवर्गीय उस युवक तक नहीं पहुँच पाती जो अपनी पशु प्रवृत्तियों को समझ पाने में अक्षम है, सिर्फ़ अपनी बायोलोजी का गुलाम है. आदमी शिक्षित है तो उसे देर सबेर कभी कुछ दिखाया ही जा सकता है, पर अंधेरों में रहने वाले कैसे समझें? वो उस लड़की रुपी तिजोरी को कैसे छोड़ दें,जब यह भी मालूम न हो की नैतिक मूल्य, औरत का सम्मान, मानव की गरिमा भी किसी चिडिया का नाम है.

उस वर्ग के लड़कों ने सिर्फ़ शरीर के सर्वाइवल को जाना है, भूख ही सब कुछ है उनके लिए. जिस वर्ग को रतलाम स्टेशन में लड़की पर लार टपकाते बताया गया है उसके बारे में क्या विचार हैं आपके? उसकी या (इन जनरल) मानव मन की पशु प्रवृत्तियों के विषय में? कैसे उसतक 'जेंडर सेंसीटाईज़ेशन' पहुंचाएंगे? क्या किताबों के ज़रिये?

Tarun said...

बाल की खाल कैसे निकाली जा सकती है कोई आपसे सीखे,

Unknown said...

@समाज , कानून , प्रशासन, सरकार क्या करेगी?

कानून किताबों में बहुत अच्छा लगता है, पर हकीकत में वह ताकतवर के हार्थों में बंदी हो गया है. जेसिका लाल के केस की तरह उसका सोया जमीर जगाना पड़ता है. पर एक बार जाग कर वह फ़िर सो जाता है. यहाँ जो कमजोर है वह ही सजा पाता है. यहाँ जाहिरा शेख जेल की सजा पाती है. आनंद और खान को जेल नहीं होती.

प्रशासन और सरकार का सोच अलग है, वह आम आदमी के सोच से नहीं मिलता. सरकार की प्राथमिकताएं भी आम आदमी से अलग हैं. यहाँ भीड़ की भाषा सुनी जाती है, उस भीड़ की जो बसें जलाती है, रास्ता रोकती है, पत्थर फेंकती है, रेल की पटरी उखाड़ती है और सरकार को वोट नजर आती है. पुलिस, प्रशासन यह सब सरकार ने अपने लिए बनाये हैं. सरकार इन के माध्यम से कमजोर पर हकूमत करती है.

अब रहा समाज. यह स्त्री पुरूष दोनों से बना है. इस में कमजोर भी हैं और ताकतवर भी. कानून, सरकार और प्रशासन ताकतवर के साथ हैं. कमजोर अकेला है. जिसकी लाठी उसकी भैंस. स्त्री पुरूष की आपस की लड़ाई छोड़कर, कमजोरों को अपनी लाठी मजबूत करनी होगी तभी भैंस उनके हिस्से आएगी.

Renu said...

I want o say that those people who are lecherous, like an animal, they are also brought up by a woman, why didnt she give them values?
As long as we aill depend on others, we cant bring a change, for a change--
first thing is education to all.
Moral science be a must as a subject for children.
Bring awareness among woen to teach their children values.
And teach the girls self defense, it must be made mandatory from the junior classes only.
I have always wondered, who are the mothers of thes men or boys--who salivate to see the girls,
comments upon them, tease them or misbehave with them.
I always taught my son to be respectful to all women, my brother will not even move with the group who commented on the girls in college, because our family name is always on stake.

सुजाता said...

http://rachnaverma.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html
रचना वर्मा की यह पोस्ट उपरोक्त पोस्ट के विषय से जुड़ाव रखती है ।

श्रुति अग्रवाल said...

सुजाता,
पहली बार प्रतिक्रिया दे रही हूँ पढ़ा कई बार है। आज रुक न सकी तो लिख रही हूँ....मैं नहीं मानती, कभी भी नहीं मानती कि अकेली लड़की खुली तिजोरी होती है और मानू भी क्यों भला? बचपन से माँ-पापा ने सिखाया था अपने दम पर जीना, तुम्हें किसी की मदद की कोई जरूरत नहीं है। फिर कोई मेरा बिगाड़ भी क्या सकता है? लड़कियाँ तो खुली तिजोरी हैं या फिर काठ की हांडी..इस तरह के शब्दों के उपयोग कि हम इज़ाजत ही क्यों देते हैं। मैं तो नहीं दे सकती...अगर मेरा बेटा न होकर बेटी होती तो उसे भी यह कहती कि - दमखम से जियो। परिस्थिति कितनी भी विकट क्यों न हो उससे तुम्हें खुद ही निपटना होगा। फिर यदि कुछ अनिष्ट हो भी गया तो क्या...हादसे जिंदगी का दूसरा नाम हैं और रफ्तार पहला । दुगने जोश से फिर से जिंदगी को खुशनुमा पलों में बदल डालों।
सच कहूँ सबसे पहले हमें अपनी सोच का दायरा बदलना होगा। लड़की और इज्जत इस बात का मर्म समझना होगा। एक हादसा किसी लड़की की इज्जत हमेशा के लिए कैसे खत्म कर सकता है? इज्जत तो उस पुरुष की खत्म मानी जानी चाहिए जिसने अपने पुरुषत्व का अपमान किया है।
हमें हमारी पीढ़ि को नई सोच देनी होगी। जो माद्दा मुझे मेरे माता-पिता ने आज से कई साल पहले दिया था वहीं माद्दा हमें आज अपनी हर एक बच्ची को देना होगा...क्योंकि किसी भी व्यक्ति या संस्था चाहे वह पुरूष हो, प्रशासन हो या सरकार की बैसाखियों के सहारे आप चंद कदम चल सकते हैं मंजिल नहीं पा सकते....वैसे चोखेर बाली आँखों में चुभती नहीं प्यारी लगती है...अकसर सुहाती है।

Asha Joglekar said...

Mai bhi shruti kee baton se sahmat hoon apni raksha ka jimma to aap par hi hai. chahe aap stree hain ya purush. Aur auraton ko chahiyeki apne bachchon ko chahe wah stree ho ya purush stree ka aur badon ka samman karna sikhaye.

आर. अनुराधा said...

श्रुति की बातों से सहमत हूं। बहुत साफ विचार, जीने का उत्साह और कुछ करने की लगन आपकी प्रतिक्रिया में झलकती है।
जारी रखें!

Renu said...

ham bhi shruti ki baato se sehmat hain, hame apni soch ka daayra badalna hoga, aurat ki izzat sirf uska nshareer hi nahi ha, .
hame khud ko itna majboot aur saksham banana hoga, tabhi ham izzat se je sakte hain.
aurat hi is samaj ki soch badal sakti ha, ek ma ek beti, ek patni ki jimmedaari acch se nibha kar, mera manan ha ki sakaratmak soch hi sakaratmak badlaav laati ha aur kahin na kahin ham ek ma ke roop me asaafal ha isiliye to aisa samaaj ban raha ha

सुजाता said...

श्रुति आपने सही कहा-इस तरह की बातों,शब्दों और कहावतों को हम स्वीकृति ही क्यों देते हैं।अच्छा है कि आज की पीढी की लड़कियों में ऐसी अस्वीकृतियों के स्वर उभर रहे हैं।आपकी कही बातों से सहमत हूँ , हम सभी अक्सर इसी तरह की बातें चोखेर बाली में कहते रहे हैं, और मानते भी हैं।
आपके हौसलें बुलन्द हैं और ऐसे ही रहें यही कामना है।
पर मैने जो कुछ कहा उसे व्यापक सन्दर्भ में समझने की ज़रूरत है ।
सुरक्षा का ज़िम्मा सही बात है कि खुद के ही ऊपर है।और सही मायने में हर व्यक्ति पर खुद का ज़िम्मा होता है।
लेकिन इससे सरकार और प्रशासन की ज़िम्मेदारी कम नही हो जाती।उस पर सवाल उठाना और वहाँ से अपेक्षा रखना हर नागरिक का अधिकार है।व्यक्तिगत परेशानियों से निबटना सभी को खुद होता है।लेकिन जहाँ सार्वजनिक , समाजिक हालातों की बात हो रही है वहाँ निश्चित रूप से प्रशासन को लताड़ा जाना चाहिये।यह लोकतंत्र नही है कि हर व्यक्ति अपने सम्मान , सामान ,अधिकार के लिए गली-सड़क-प्लेटफॉर्म पर खुद ही लड़ता फिरे।घर से बाहर कदम निकालना ही अंतहीन लड़ाई हो। इससे अंतत: जंगल राज ही होगा।जो शक्तिशाली होगा वह खुद को बचा ले जाएगा जो , कठिन परिस्थिति में कमज़ोर होगा वह प्रताड़ित होगा।
इसलिए कुछ स्थानों पर तो प्रशासन की भूमिका को नज़रान्दाज़ नही किया जाना चाहिये।
यह सरकार की बैसाखी नही है यह सरकार का कर्तव्य है।
जिस समय आप समर्थ होंगे बच जायेंगे अपने प्रयत्नों से , जिस दिन न हुए मारे जायेंगे...

travel30 said...

Bahut sahi kaha aapne... aapse sahmat hone ko dil kahta hai....


New Post :
मेरी पहली कविता...... अधूरा प्रयास

travel30 said...

Bahut sahi kaha aapne... aapse sahmat hone ko dil kahta hai....


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Suresh Gupta said...

अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ना जरूरी है. यह लड़ाई ख़ुद भी लड़नी है और सरकार से भी आग्रह करना है कि सब को सुरक्षा प्रदान करना उसका कर्तव्य है. पर सरकार के ही भरोसे हो जाना शायद नुकसानदेह हो जाए.
http://samaaj-parivaar.blogspot.com/2008/08/blog-post_26.html

श्रुति अग्रवाल said...

सुजाता, सहमत हूँ कि सरकार को बैसाखी नहीं होना चाहिए। इस बात से भी सहमत हूँ कि यदि हम कर देते हैं , यदि हम लोकतंत्र में रहते है, यदि हम गर्व से स्वयं को हिंदुस्तानी कहते हैं तो हमारी, हमारी इज्जत की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी पर है...आखिर हम इस देश के नागरिक है और प्रशासन से लेकर सरकार हर एक हमारे प्रति और हम उनके प्रति जवाबदेह हैं।

लेकिन दिल पर हाथ रखकर एक बार पूछें क्या आज की परिस्थितियों में यह संभव है? क्या हमारी सरकार नारियों के सम्मान के प्रति जवाबदेह है या हो पाएगी? जानती हूँ जवाब ना होगा। इसलिए कहती हूँ कि हमें अपनी बच्चियों में ही शोर्य का बीज अंकुरित करना होगा।

और एक बात यह स्थिति सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं है। मैं पेशे से पत्रकार हूँ औऱ हिंदुस्तान ही नहीं यूरोप के कई देशों में घूम चुकी हूँ। इस बीच मैंने महसूस किया है कि चाहे वह वेनिस की खूबसूरत शाम हो या फिर लंदन की व्यस्ततम ट्यूब ट्रेन में बुश हाउस से वैम्बले का सफर...हर जगह अपनी सुरक्षा अपने हाथ। हर जगह घूरती निगाहें, आँखों से ही मानमर्दन को तैयार नजर आती हैं लेकिन यदि आपके चेहरे में तेज है...चाल में आत्मविश्वास है तो ये आँखे अपने आप झुक जाती हैं । न झुके तो झुकाने का माद्दा रखती हूँ। और ये माद्दा मुझे संस्कारों में दिया गया है...मेरे माँ-पापा ने दिया है और मुझे ही नहीं अपनी तीनों बेटियों को दिया है। उन्होंने कभी हमें बेटा नहीं कहा..हमेशा कहा हम बेहद अच्छी बेटियाँ हैं , बेटियाँ दुर्गा होती हैं चंडी होती हैं गलत परिस्थिति में रणचंडी बन जाओ । फिर यदि कभी कुछ गलत हो गया तो तुम्हारे माता-पिता है कुछ भी हो जाए तुम्हें संभाल लेंगे। और हमें अपने बल पर जीने औऱ जिंदगी में हर चुनाव करने का हक और हौंसला दिया। आज भी जब अपनी कजिन्स की तरफ देखती हूँ तो मन में एक बात चुभती है कि काश उनकी परवरिश भी हमारी तरह होती। इसलिए मुझे लगता है कि सबसे पहले हमें अपनी बेटियों की परवरिश बदलनी होगी। उनमें खुद ही हर जंग को जीतने का माद्दा डालना होगा औऱ यह भी सिखाना होगा कि यदि गलती से कोई हादसा हो जाए तो उसमें तुम गलत नहीं हो। यह विश्वास पैदा करना होगा कि कोई है जो उसके पीछे है...वह जब गिरेगी या लड़खड़ाएगी तो उसे संभाल लिया जाएगा। यदि हम ऐसा कर पाएँ तो देखिएगा हमारी भावी पीढ़ी कभी यह नहीं कहेगी कि ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’

Anonymous said...

shruti ki baat sae sehmat hotey hue bas aap kae laekh kae shirshak mae ek " kyun " shuru mae jodnaa chahtee hun . us " kyun " ko jodtey heee aap aur shruti dono ek hi baat ko kehtey nazar aayegae

Unknown said...

बेशक, हर लड़की तिजोरी होती है। लेकिन खुली तिजोरी नहीं। अगर यह मुहावरा असुरक्षा के लिए है, तो कहूंगा, यह तिजोरी लोहे या टीन की नहीं है। एक जीवित तिजोरी है। अतछ उसका रक्षा कोई और नहीं कर सकता। जो रक्षक वबेगा, वही भक्षक बन जाएगा। इसलिए अपनी इज्जत अपने हाथ। अपनी इज्जत बचाने के लिए जान दे देना भी कोई मंहगा सौदा नहीं है। कायरों की तरह बार-बार मरने से वीर की तरह एक बार मर जाना बेहतर है। जिस दिन यह भावना आधी औरतों के भी दिल में घर कर जाएगी, हर स्त्री सुरक्षित महसूस करने लगेगी।
-- राजकिशोर

सुजाता said...

श्रुति और राजकिशोर जी से सहमत हूँ!
रचना जी , पोस्ट का कंटेंट में "क्यों" निहित है ही, शीर्षक में भी एक प्रश्नचिह्न की कमी थी जिसे आपके कहेनुसार लगा दिया।सही सुझाव के लिए धन्यवाद !

दीपा पाठक said...

मुझे लगता है कि सुजाता और श्रुति दो अलग-अलग बातें कह रहे हैं। सुजाता का कहना बिल्कुल ठीक है कानून सख्त हों, प्रशासन दुरुस्त हो तो क्यों नहीं हम लङकियों के लिए एक सुरक्षित समाज की अपेक्षा कर सकते। श्रुति भी सही कह रही हैं कि लङकियों को दमखम के साथ अपनी सुरक्षा का दारोमदार लेना चाहिए और इज्जत को देह के संकुचित मायनों तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए। लेकिन यह मुद्दा बिल्कुल अलग है। यह हादसे के बाद की बात है लेकिन सवाल यह है कि हादसे की नौबत आने ही क्यों दी जाए? अगर हम सरकार से एक सख्त, चौकस, दुरुस्त सुरक्षा की मांग करते हैं तो इसमें तर्क-वितर्क की गुंजाइश कहां से आती है। आखिरकार बहुत से ऐसे देश हैं जहां सक्षम सुरक्षा व्यवस्था लङकियों को रात दिन की परवाह किए बिना घूमने-फिरने की आजादी देती है। हम कम से कम मांग तो कर सकते हैं, वरना इतना तो हम लङकियां समझती ही हैं कि बच-संभल कर तो हमें ही चलना होगा। श्रुति जब यह कहती हैं कि दुनिया के किसी भी कोने में पुरूष दृष्टि से बच पाना मुश्किल है तो यह समस्या को दूसरे स्तर तक ले जाने की बात है। हम बिना हादसों के खुल कर घूमने-फिरने के लायक व्यवस्था पा लें यही बहुत है। बाकी सब ठीक है तो पुरूष दृष्टि या कहें कि कुदृष्टि अकेले से तो किसी तरह से निपटा ही जा सकता है। वैसे भी घूरने की, ताकने की आदिम पुरूष प्रवृति को बदल पाना लगभग असंभव ही है।

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