Monday, September 1, 2008

कितना मासूम सवाल है यह..इस मासूमियत पर वारी न जाएँ तो क्या करें

कितना मासूम सवाल पूछा है ,देखिये ,

अब बताईए भला औरत की दुश्मन औरत नहीं तो कौन है?

उफ्फ!!इस मासूमियत पर कोई वारी वारी न जाए तो क्या करे भला !!
जाइये पोस्ट पढ आइए और उस पर हमारी प्रतिक्रिया और फिर आगे पढिये मृणाल पाण्डे {सम्पादक -हिन्दुस्तान } क्या कहती हैं।भई हम तो कुछ है नहीं मृणाल पाण्डे का कहा तो अनसुना नहीं करेंगे न ।

मित्र से संलाप

मैं चुपचाप उसकी बातें सुनती गयी।...
औरत ही औरत की दुश्मन होती है।ब्ब्ब..ब्ब्ब
सारी फेमिनिस्ट औरतें तर्क-विमुख होती हैं और पुरुषों से घृणा करती हैं।ब्ब ..ब्ब्ब्ब..ब्ब्ब्ब
फेमिनिज़्म एक पच्छिमी दर्शन है।कोकाकोला की तरह झागदार और लुभावना आयात भर।ब्ब्ब्ब...ब्ब्ब्ब.ब्ब
नारी-संगठन बस नारे बाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं। गाँवों मे उनकी कोई रुचि नही।ब्ब...ब्ब्ब
मध्यवर्ग की शहरी कामकाजी औरतें काम तो क्या मटरगश्ती करने जाती हैं।घर-बच्चे इसी से टूट रहे है।ब्ब..ब्ब्ब
जो लड़कियाँ ससुराली शोषण और सड़कों पर छेड़छाड़ की शिकायत करती हैं एडजस्ट करना नही जानतीं।ब्ब..ब्ब्ब।

उसकी इस फितूरी और बकवासी,उसकी चुहलभरी तर्ज और उससे भी बढ कर उसका कौवे की तरह तिरछी दृष्टि से बीच बीच में मेरे क्रोध के अप्रत्याशित उफान को मापने की चिर परिचित चेष्टा करना,इन सबसे मेरे भीतर एक आग सी सुलगने लगी थी,पर फिर भी उसका जोश बैठने की उम्मीद में मैने चेहरा भावशून्य और प्रतिक्रियाहीन बनाए रखा।या कम से कम मैने समझा कि मै ऐसा कर रही हूँ।
वैसे वह एक भलमानस और पुराना सहपाठी मित्र है।उसके-मेरे बाल एक साथ सफेद हुए हैं।कई राष्ट्रीय परिवारिक मसलों पर हमने एक दूसरे के विद्रोह को मूक या मुखर समर्थन भी दिया है।कम से कम पुरानी मित्रता की दरकार थी कि उसे पूरा का पूरा सुन ही डाला जाए।सींग भिड़ाए जाएँ तो उसके बाद ही।इससे कम से कम इस कम्बख्त की एक स्थपना तो तुरंत निरस्त होती चलेगी,कि आज की पढी लिखी कामकाजी औरतें अपनी ही कहती है दूसरे की नही सुनतीं।
और भई ईमान से पूछा जाए तो फिर औरतों के मामलों में समाज की स्वीकृत नैतिकता से मिला अंतिम फतवा देने का अधिकार छोड़ने के लिए भला कौन सहजता से तैयार हो जाता है ?

.....
दरअसल ,नारीवाद का विषय ही हैसा है कमबख्त ,कि सालों पुराने और अच्छे खासे बुद्धिमान पुरुष मित्र भी इसे हाथ मे लेते ही अपनी सहज मानवीयता छोड़कर एक पकी पकाई पारम्परिक भाषा मे न्यायाधीश के सुर में बोलने लगते हैं-सभाओं में ,घरों में,सम्पादकीयों में......पुरुष मित्रों की बतकही से लेकर अखबारों-विज्ञापनों और फिल्मों तक में अक्सर स्त्रियों की दश परखते समय ठोस भौतिक सच्चाइयों को तो हम लोग लगातार परे ढकेलते चले जाते हैं,और हमारी तमाम वक्तृता उसके कुछ बेहद रूढिवादी तेवरों या खास तरह की बातचीत या पहनने ओढने ,उठने बैठने की प्रदर्शनकारी वृत्तियों पर ही केन्द्रित होकर रह जाती है।
.......
{दरअसल ठोस सम्वेदनात्मक अनुभव उनके दिमागी खांचे मे फिट नही होते}
क्यों नारी को नारी का शत्रु मानने का इतना गलाफाड़ प्रचार होता है,जबकि कसौटी महायुद्ध हों, या कि अदालती मुकद्दमे बाज़ी या फिर {हर देश के }साहित्य में पिता-पुत्र सम्बन्धों की अभिव्यक्ति ,जितनी तल्ख मारक कड़वी टकराहटें वहाँ पर हमें अनादिकाल से पुरुषों के बीच होतीं दीखती हैं,और किसी के बीच नही। फिर दो मनुष्य़ो के बीच का टकराव जितना उनके व्यक्तित्व पर निर्भर नही करत, उतना उनकी स्थिति पर निर्भर करता है।जेलों के कैदियों के बीच,जंजीर से बन्धे पालतू कुत्तों के बीच ,मालिक के अनुशासन तले पशुवत जीवन बिताते बन्धुआ मजूरों के बीच भी परसपर तीखी घृणा तथा हिंसा का प्रदर्शन आम है।उनके द्वेश दूसरे के प्रति आक्रोश से नहीं,खुद अपने प्रति ,अपनी पराश्रयी, हीन स्थिति के प्रति एक उत्कट आत्मघृणा से उपजते हैं।पराधीन जो भी होगा उसे चूँकि सपनेहुँ सुख नही मिलेगा, अत: वह दूसरों को भी क्यों सुख देन चाहेगा? स्त्री को स्त्री से अलग करने भर से परिवारों में हिंसा और घृणा की प्रवृत्तियाँ नहीं मिटी हैं। मिटी हैं,तो स्त्रियों की पराधीनता घटाने से।
...

जारी.......

9 comments:

Anil Pusadkar said...

sujata jee maine ek ghatna-vishesh ke sandarbh me sawal uthaya to aapko bura lag gaya,pata nahi kya-kya upadhiyan de dali.aapko apni muhim me zabardast samarthan mil raha hoga.magar is se pehle maine apne blog par mahila shikshikaon aur sahiyikaon ko 400 aur 200 rs masik maandey milne aur unke sath ho rahe anyay ke baare me likha to aap aur aap jaisi jagruk mahilaon ki pratikriyan milna to dur use padhna tak jaruri nahi samjha.main is jhamele me kabhi nahi padhta,meri maan hai behan hai,bhatiji hai,sab mere liye jaan se bhi pyaari hai,aur main jise jitna samman diya jaana chahiye deta hun.aapko koi baat buri lagi ho to maaf kar dena aur mujhe in sab vivadon se dur hi rakhen to meharbani

सुजाता said...

अनिल जी ,
आप पोस्ट को समझने की कोशिश तो करते।
जो शीर्षक आपने चुना उसकी क्या टोन है शायद आपने महसूस नही किया होगा क्योंकि हमारे समाज के पुरुष की ट्रेनिंग ही ऐसी है कि वह इसे एक समान्य जुमला बना कर आत्मरक्षा मे इस्तेमाल करता आया है।आप अकेले नही हैं। यह पोस्ट बहुतों को बुरी लगी होगी।
पर क्या किया जाए सच अगर इतना कड़वा है तो कहने मे ज़बरदस्ती मिठास भरना भी गलत है।वह भी एक राजनीति है।
स्त्री स्त्री की दुश्मन है - यह तो पूर्वाग्रह है ।इसकी जड़ कौन खोजेगा और समझेगा ?
आपकी किस् पोस्ट पर मैने ध्यान दिया किस पर नही यह मायने नही रखता ,मै ब्लॉग जगत की पुलिसिंग नही करती हूँ ,अक्सर ताक लगा कर बैठी भी नही रहती कि कब किसने क्या कहा ।जब आती हूँ ,जो दिखता है ,उस पर जो प्रतिक्रिया होती है उसे बयान कर देती हूँ।
दर असल स्त्री विमर्श की कठिनाई यह है कि इसमें आपके सामने अपने ही भाई, पिता, पति और मित्र खड़े होते हैं।आपसे असहमत होना भी ऐसा ही संकट है जैसा कि मेरे लिए अपने किसी पुराने मित्र से असहमत होना। इस फ्रंट पर मेरे लिये सभी एक समान हैं। इसमें बुरा मानने की बात नही।आप यदि मेरा मंतव्य समझ लें , यही बहुत होगा।

Anonymous said...

why dont you link your post from your blog notepad also here
the post is where you have wrtten about tv serials and vimal ji ki nazar lag gaeyee

Asha Joglekar said...

NARI KO NARI KE VIRUDDH AKSAR PURUSH AUR USKE BANAYE BHEDBHAW POORN NIYAM HEE UKSATE HAIN.
PAR ISASE BACHNA HEE HOGA.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हम मृणाल जी की की पूरी बात पढ़ने के बाद कुछ कहना चाहेंगे। अभी तक की बातें तो भूमिका मात्र लग रही हैं। सुजाता जी, इस बीच सम्भव हो तो सारथी पर नजर दौड़ा लें। वहाँ शास्त्री जी कुछ परामर्श दे रहे हैं।

Indian Home Maker said...

ऐसा लगा जैसे में अपने ही विचार पढ़ रही हूँ. मैंने मृणाल पांडे के बारे में सुना तो था पर कभी पढ़ा नहीं. इन शब्दों को पढ़ कर लगा रहा है, शायद कुछ मिस कर दिया. इन शब्दों का अनुवाद अंग्रेज़ी में होना चाहिए :)

Unknown said...

मैंने अनिल जी की पोस्ट पढ़ी और उस पर अपनी टिपण्णी भी दी. ऐसी दुखद घटनाएं अक्सर घट जाया करती हैं. अनिल जी ने जो कहा उसमें एक दुःख भरा आग्रह है. जो प्रश्न उन्होंने पूछा है उसे जिस प्रकार लिया गया वह मुझे उचित नहीं लगता - 'उफ्फ!! इस मासूमियत पर कोई वारी वारी न जाए तो क्या करे भला !!' जिस घटना की बात वह कर रहे हैं उस ने उन्हें दुखी किया है. उन के प्रश्न पर यह प्रतिक्रिया मुझे उचित नहीं लगती.

मेरे विचार में ऐसी घटनाएं पूरे पुरूष या नारी वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं. पर कही न कहीं उनके मूल में समाज में चली आ रही विचारधाराएँ उन्हें प्रभावित करती हैं. समाज में सबको शिक्षित होना बहुत जरूरी है, नारी और पुरूष दोनों को समान रूप से शिक्षा के अवसर मिलने चाहियें. शिक्षा केवल नौकरी करने के लिए नहीं, बल्कि एक सकारात्मक सोच बनाने के लिए भी जरूरी है. सकारात्मक सोच के अभाव में, शिक्षित और नौकरी कर रही नारियां भी कभी कभी ग़लत कदम उठा लेती हैं. पुरूष तो इस बारे में नारियों से काफी आगे निकले हुए हैं.

विचार-विमर्श में शामिल लोग जो विचार रखते हैं वह विषय के पक्ष और विपक्ष दोनों में होते हैं. हमें समान विचारों पर ज्यादा चर्चा करनी चाहिए. नारी शोषण के ख़िलाफ़ जो आवाजें उठ रही हैं वह एक केन्द्र विन्दु हो सकती हैं विचार समन्वय का.

RAJ SINH said...

sujataji,

pitri sattatmak vyavastha me sambhavatah jitne dosh hon(kam se kam bharat me) unhen to ginana bhee asambhav hai.purush aham aur us se sambaddha mamle bhee alag kar den.ling vibhajan rekha se bhee badhkar manushyata kee sampoornata me dekhen aapko teen tarah ke hee log milenge.

ACHCHE BURE AUR GHATIYAA.

isme manusya ka dharm jati ling desh prant bhasa bolee varn ya jo bhee algao hain naheen lagu hota.

kids games said...

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