Friday, September 5, 2008

मेरे मालिक


-जब कहा उसने-
-मै अकेली नही-
-मेरे मालिक हैं साथ मेरे-
-क्या तुम अकेली हो?
-मैने देखा उसे मुस्कुराकर और कहा-
-जो मालिक है तेरा वही तो है सबका रखवाला-
-जो रहता है तेरे साथ वही तो है मेरे साथ-
-सुनकर वो झल्लाई,थोडा पगलाई और बोली-
-हम बात करते है अपने पालन हार की-
-मैने कहा हाँ वही तो है जग का पालन हार-
-मै भी तो हूँ उसके साथ-
-इस बार सब्र टूट गया-
-सुन्दर प्यारी आँखों मे-
-पानी सा घूम गया-
-कहा उसने हैरान परेशान-
-अरे! नही है मेरा घरवाला बेईमान-
-मेरा मालिक बस मेरा है-
-उसकी आँखों की सच्चाई-
-उस पुरानी फ़िल्म से जा टकराई-
-जो देखी थी बचपन में कभी-
-कि मेरा पति मेरा देवता है-
-मै असमंजस में थी-
-जिंदगी भर का वादा कर-
-कैसे बन जाता है कोई देवता या मालिक?
-क्या औरत है एक मकान-की चाहर दिवारी-
-और वो मालिक-
-जो रखे उसकी साज-सम्भाल,
-टूट-फ़ूट की जिम्मेदारी-
-कब आयेगी ऎसी बेला-


-जब होगा उसका अपना वजूद-
-और नारी होगी बस एक नारी-





सुनीता शानू

3 comments:

जितेन्द़ भगत said...

nice poem

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अब दिल्ली दूर नहीं... बस अलख जगाये रखें ये चोखेर बालियाँ। शुभकामनाएं।

Suresh Gupta said...

अच्छी कविता है. कोई इंसान किसी दूसरे इंसान का मालिक नहीं हो सकता. हम सबका मालिक एक है और उस की नजर में हम सब बराबर हैं. किसी इंसान को अपने से छोटा समझना उस मालिक के प्रति अपराध करना है.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...