Monday, September 8, 2008

पुरुष की यह रूढ छवि पुरुषों की पहल से ही बदलेगी

पिछले दिनों मुझे पुस्तक मेले से एक नायाब किताब मिली,इस् पुस्तक की लेखिका हैं चित्रा गर्ग जो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से भी सम्मानित है ।पुस्तक का शीर्षक है "नारी अपने रिश्तों का निर्वाह कैसे करे"।यह स्न्योग ही है कि जिस समय हिन्दी के ब्लॉगर स्त्री की नैतिकता और मर्यादा की अहमियत पर पोस्टस लिख रहे थे , मुझे यह पुस्तक देखने को मिल गयी।मात्र 68 रु. की यह किताब मुझे बहुत आकर्षक लगी।इसके कई उपयोग हैं जो कंटेंट देख कर कहा जा सकता है।पर कुल मिलाकर 68 रु.भी बर्बाद करने की क्या ज़रूरत है क्योंकि इस तरह का ज्ञान तो हमारे देश मे हर कोई लड़की, बच्ची , स्त्री को मुफ्त बांटता फिरता है।चाहे वह रेलवे प्लैटफोर्म का अधिकारी हो या एक पिता।पर मुझे तो आप सभी से यह बांटना था ,इस बहाने कुछ लोगों के पैसे बच जायेंगे :-)
किताब की विषय सूची मे ग्यारह अध्याय हैं -
1.पति-पत्नी के रिश्ते
{किसी वूमेन पत्रिका के लिए बढिया सामग्री है}
2.देवर-भाभी के रिश्ते कितने नाज़ुक
3.ननद-भाभी के रिश्ते कितने नाज़ुक
4.देवर-जेठ से रिश्ते
5.सास-बहू के रिश्ते
6.ससुराल के अन्य रिश्ते
7.जीजा-साली के रिश्ते
8.सहेली से रिश्ते
9.कामकाजी नववधुओं के रिश्ते
10.माँ-बेटी के रिश्ते
11.माँ-बेटे के रिश्ते

एक अध्याय की कुछ पंक्तियाँ पेश ए नज़र हैं
"कार्यालय में कभी कभार अपने पति व बच्चों के बारे मे बात करती रहें,ताकिपुरुष कर्मियों को इस बात का अहसास रहे कि आप परिवार को समर्पित महिला हैं।वे आपमे आदर्श पत्नी या स्त्री की छवि ही देखेंगे व आपको छेड़ने का साहस नही कर सकेंगे"
पृ.155
"विवाहित महिलाओं के लिए बेहतर यही है कि वे किसी मौके पर अपने पति से अपने सहकर्मियों की मुलाकात करवएँ। ऐसे मे सहकर्मी आपके पति व परिवार के बारे मे जानकर बेवजह आपके निकट नहीं आयेंगे"
पृ.154
"यह एक समान्य सी बात है किजीजा-साली के बीच छेड़छाड़ चलती रहे,परंतु हर लड़की का दायित्व है कि अपने जीजा के अति नज़दीक आने से बचे।उसे अपने पर फिदा होने का इतना मौका न दे कि जीजा उसकी बहन को भूलकर केवल उसकी ओर आकर्षित हो जाए।कोई भी लड़की यह कदापि नही चाहेगी कि उसकी बहन का परिवार टूट जाए।"
"हर लड़की को अपने जीजा के चुम्बन व ऐसी छेड़ छाड़ का शुरु से ही विरोध करना चाहिये।...जीजा से अकेले मिलना,बहन के बिना अकेले घूमने जाना,फिल्म या प्रदर्शनी देखने जाना।ऐसी अवस्था से बचना चाहिये।कई बार बीमार बड़ी बहन की तीमारदारी करने आई बहन की ओर जीजा आकृष्ट हो जाता है....."पृ.137
एक पुत्री का हितचिंतक पिता या स्नेही बड़ा भाई या माँ ऐसी पुस्तक बेटी को किशोरावस्था मे प्रवेश करते ही पकड़ा दे और पढवा दे तो सोचिये समाज का कितना भला होगा।दुनिया बड़ी खराब है। आखिर आप दूसरों को तो नही समझा सकते ,पर अपनी बेटी को तो समझा ही सकते हैं न!
ऊपर के समस्त उद्धरण पढकर ऐसा नही लगता कि यह मान्य तथ्य औत सत्य है कि पुरुष स्वभावत:भ्रष्ट है , दुराचारी है ,मर्यादाहीन है ,और उसे सुधारा भी नही जा सकता, शिक्षा भी नही दी जा सकती और उसके ऐसे व्यवहार को बहुत हद तक समाज का समर्थन है वर्ना एकाध पुस्तक तो ऐसी भी लिखी ही जा सकती थीकि "पुरुष अपने रिश्तों का निर्वाह कैसे करे" जैसी कि आदत है नैतिकता की सारी ज़िम्मेदारी स्त्री की है, और पुरुष की अनैतिकता की ज़िम्मेदारी भी स्त्री की ही है।इसलिए ही यह कहावत बार बार कहते हैं लोग- "चाकू सेब पर गिरे या सेब चाकू पर ,कटेगा तो सेब ही। "तो माना जाए कि पुरुष की अनैतिकता को अप्रत्यक्ष समर्थन है और इस छवि में बदलाव न लाना पुरुष को आज़ादी और सहूलियत देता है !नहीं तो प्रयास करने होंगे हमे इस धारणा को बदलने के।


मेरी दृष्टि में, पुरुष समाज की यह छवि जो बन गयी है, उसे तोड़ने का पुरज़ोर प्रयास आज की पीढी द्वारा किया जाना चाहिये।आप कैसे सह सकते हैं कि पुस्तकें , नीतिशास्त्र ,लोक व्यवहार आपको बार बार व्यभिचारी ,लोलुप और भ्रष्ट कहे और साबित भी करे??और एक स्त्री को आपके अन्याय ,दुराचार के खिलाफ हमेशा सतर्क होने की सलाहें दे?

पुरुष समाज की ऐसी छवि को तोड़ने की पहल पुरुष की ओर से ही हो सकती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि यह छवि किसी आत्मसम्मानी पुरुष को स्वीकार्य नही है।क्योंकि मै मानती हूँ कि सभी पुरुष व्यभिचारी नहीं हैं।तो उठो मित्रों सिद्ध करो कि यह प्रपंच है , बकवास है !पुरुष बॉस , जीजा, देवर ,मंगेतर के रूप में पुरुष को अन्य परिवार जनों और स्त्री साथियों से कैसा व्यवहार करना चाहिये इसकी कुछ शिक्षा अपने बेटो को भी दें ।
वास्तव मे पिता की पहल से ही समाज मे हालात बदलेंगे ।स्त्री के बीच साथी-साथिन का रिश्ता हो न कि भेड़- भेड़िया का ।ऐसे रिश्तों की इमेज बनने वाली पुसतकों और कहावतो का खुल कर विरोध करें।


इस पुस्तक के अन्य अध्यायों के बारे मे आगे भी आपको अवगत कराऊंगी।

10 comments:

जितेन्द़ भगत said...

nice

Sunil Deepak said...

औरतों की दी गयी शिक्षा पर हँसी भी आती है और क्षोभ भी होता है, पर सोचो तो यह वही कह रही है जैसा रामायण का नाम ले कर सीता का अनुकरण करने के लिए कहते हैं. बर्लिन की दीवार की तरह हमें आस पास से घेरे खड़ी यह मान्यताएँ जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती हैं, कैसे गिरेंगीं यह दीवारें केवल कुछ नारी और पुरुषों के बदलने से? अपने घर में अपने भाई बहनों, मित्रों को तो बदल नहीं पाते, समाज कैसे बदलें?

Indian Home Maker said...

सुजाता में आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. इस तरह की पुस्तकें पुरुषों व स्त्रियों, दोनों का अपमान करती हैं, शायद कुछ ठीक लगता यदि इसमें पुरुषों के लिए भी दो शब्द लिखे होते...मेरे विचार में माताओं का इस तरह की सोच बदले में बहुत हाथ हो सकता है, हम अपनी बेटियों से यह तो नहीं कह रहीं की ठीक से कपड़े पहने , लड़कों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित ना करें ? क्योंकि जब हमारे बेटे हमें यह कहते सुनते हैं तो वो यह समझ सकते हैं की यदि कोई लड़की आकर्षक कपड़े पहनती तो उनको रिझाना चाहती
है...फिर वो तो स्वाभाविक ही है की वो तो बेचारे नादान पुरूष हैं, रीझ ही जायेंगे, उनकी क्या गल्ती!? इस तरह की बातें सुन कर उन्हें यह समझते देर नहीं लगती की उनके सौ खून माफ़ है! ऐसी खुली छूट हम उन्हें जान बूझ कर दे रहीं हैं? - वो पलते बढ़ते यही सुनते आते हैं की अधिकतर गलती वैसे भी लड़कियों की ही होती है..
इसी सोच ने हमारे समाज में हर बात के लिए महिलाओं को दोषी समझने की आदत पड़ गयी है.
सुजाता ऐसी छोटी छोटी बातों से एक समाज की पूरी की पूरी मानसिकता भ्रष्ट हो गयी है.
इतने सुलझे हुए ढंग से, इस पोस्ट में आपने बहुत बड़ी बात कह डाली.

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत ख़ूब...

Anonymous said...

सतीश सक्सेना की जिस कविता का आपने जिक्र किया हैं उसके पहले भाग http://satish-saxena.blogspot.com/2008/07/blog-post.html पर मेने पूछा था "जब भी कोई ख़त मेने पढ़ा हैं चाहे माँ लिखे या पिता , पुत्री को ही सीख और संस्कार दिये जाते हैं . क्या इसकी कोई ख़ास वजह हैं की कभी भी कोई ख़त किसी माँ या पिता नए अपनी पुत्र को नहीं लिखा हैं , ना कभी किसी पुत्र को संस्कार देने की बात की गयी हैं . क्यों ?? क्या इस लिये की लड़किया संस्कार विहीन पैदा होती हैं , या इसलिये की लड़के हमेशा सम्स्काओ के साथ दुनिया मे आते हैं ? या इस लिये की घर का मतलब हैं नारी की सारी जिम्मेदारी , फिर चाहे वोह माँ , हो या बेटी या सास या बहु ?? कभी कोई ख़त किसी पुत्र को भी लिखा जाता , चाहे माँ लिखती या पिता , या ससुर तो शायद भारतीये संस्कारो की गरिमा को कुछ आगे ले जाया जाता ."
लेकिन मेरे बाद उस ब्लॉग पर जितने भी महिला ब्लॉगर नए कमेन्ट किया उन सब ने सतीश जी की अपनी पुत्री को दी गयी " कंडिशनिंग " पर प्रश्न नहीं उठाया . ये बात क्या प्रूव करती हैं सुजाता ??

Unknown said...

मैंने एक बात अच्छी तरह समझी है कि अगर आप अपने बच्चों को अच्छी बातें नहीं सिखायेंगे तब कोई दूसरा उन्हें ग़लत बातें सिखा देगा. यहाँ बच्चों में बेटा और बेटी दोनों हैं. यह जिम्मेदारी मूल रूप से बच्चों के माता-पिता की है. बेटी क्योंकि दूसरे घर जायेगी इस लिए केवल उसे ही सीख देनी है, बेटा घर में ही रहेगा इस लिए उसे सीख देने की जरूरत नहीं है, ऐसा सोचना बहुत ग़लत है. अच्छी बातें दोनों को सिखानी हैं.

मेरे विचार में यह कहना, 'पुरुष समाज की यह छवि जो बन गयी है', उचित नहीं है. कुछ पुरुषों द्वारा किए गए ग़लत कामों के कारण पूरा पुरूष समाज ग़लत नहीं कहा जा सकता. कुछ औरतें भी ग़लत होती हैं. क्या इस लिए पूरे नारी समाज को ग़लत कह देना चाहिए? जो पुरूष व्याभिचारी नहीं हैं उन्हें यह सिद्ध करने को कहा जाना कि वह व्याभिचारी नहीं हैं, उचित नहीं है. क्या किसी औरत को यह कहना उचित होगा कि वह सिद्ध करे कि वह व्याभिचारिणी नहीं है?

यह सोच भी कि 'वास्तव मे पिता की पहल से ही समाज मे हालात बदलेंगे', पूरी तरह सही नहीं है. पूरा सच है, 'वास्तव मे माता-पिता की पहल से ही समाज मे हालात बदलेंगे'. एकतरफा सोच किसी समस्या को दूर नहीं कर सकता, बल्कि उस से समस्या और गंभीर हो जाती है.

आर. अनुराधा said...

दिलचस्प विषय है इस पस्तक का। यह तो पूरी तरह से आर्काइवल मटीरियल है। इसके अँश समय-समय पर ऐसे ही देती रहिए, मज़ा रहेगा। बस, एक गुज़ारिश है सुजाता, ऐसे चुटकुलों को व्याख्या के बिना ही, उद्धरण के रूप में रखा जाए तो ज्यादा दिलचस्प रहेगा और-- लोगों की ईमानदार निजी सोच टिप्पणियों के रूप में आती ही हैं।

Satish Saxena said...

आप ने एक "पुरस्कार" प्राप्त रचना खरीदी और चर्चा की, इस तरह की शैली और शब्दों से युक्त इस की चर्चा,आपके इस प्रतिष्ठित ब्लाग पर हो मैं, उचित ही नही मानता ! आजकल हरतरफ चटपटे शीर्षकों की रचनाओं की बाढ़ आयी हुई है, हर लेखक अपने आपको सुर्खियों में ही रखना चाहता है , नतीजा ....हर चर्चा नारी पर आकर रुक जाती है ! " अपने पर फिदा होने का इतना मौका न दे..." "अपने जीजा के चुम्बन..." जैसे वाक्यों से युक्त यह किताबें सिर्फ़ " बिक्री हो और पैसे कमाओ " जैसे उद्देश्य पूरे करने का जरिया मात्र हो सकती हैं . शायद ही कोई पिता या भाई स्नेह वश यह पुस्तक अपने घर में किसी को भी पढ़वाना पसंद करेगा !
"ऊपर के समस्त उद्धरण पढकर ऐसा नही लगता कि यह मान्य तथ्य औत सत्य है कि पुरुष स्वभावत:भ्रष्ट है , दुराचारी है ,मर्यादाहीन है..." आप यह मानती हैं की यह पुरूष सिर्फ़ आपके हमउम्र ही नही बल्कि आपका भाई, आपके पिता और आपके बावा भी हो सकते हैं, पुरूष और नारी शब्द कहते हुए हम लोग सब पर ऊँगली नही उठा सकते, इसी प्रकार अगर एक पक्ष लम्पट है तो इस लम्पटता में दूसरा पक्ष जरूर शामिल होगा और अधिकतर जगहों पर स्वेच्छा से ही होता है, उस समय आचरण की बात किसी को याद नही रहती !
नैतिकता की सारी जिम्मेदारी स्त्री की होनी भी नही चाहिए, बराबर की जिम्मेवारी है हम सबकी ! बल्कि पुरुषों की जिम्मेवारी निस्संदेह अधिक होने चाहिए ! जहाँ तक सवाल मेरी रचनाओं का है, मैंने वर्णित रचना में अपनी पुत्री को इस समाज में एक राह और नेतृत्व करने का रास्ता दिखाने की चेष्टा की है !
जिस घर के पुरूष अनैतिक हों उस घर के रस्ते एक अँधेरी सुरंग में ही जाते हैं ! स्त्री और पुरूष के स्वभाव जनित गुण अलग अलग होते हैं, अगर स्त्री, पुरुषों जैसी भारी आवाज में बोलने का प्रयत्न करेगी तो सिर्फ़ एक कर्कश ध्वनि ही निकलेगी !
आप और रचना जी बेहद अच्छा कार्य कर रहीं हैं, आपके कार्यों से हमारी लड़कियों में बुराइयों से लड़ने की हिम्मत आयेगी, मगर मेरा अनुरोध है कि नारी कि परिभाषा न भूला करें ... मेरी बेटी, किसी घर की बहू बनने के बाद , उसी घर में जननी, और उसके बाद घर की सर्वोच्च सत्ता और सम्मान की मालकिन भी वही होगी ! इसी तरह जिस पुरूष को "मर्यादाहीन" बोला जा रहा है वह हमारे पिता है , कहीं न कहीं बेहद तकलीफ होती है ऐसे शब्द पढ़ कर !
आदर सहित

Satish Saxena said...

सुजाता जी से जो सवाल रचनाजी ने पूछा है, उसपर चूंकि मेरा सन्दर्भ है, अतः मैं कुछ कहना चाहूँगा....
"लेकिन मेरे बाद उस ब्लॉग पर जितने भी महिला ब्लॉगर नए कमेन्ट किया उन सब ने सतीश जी की अपनी पुत्री को दी गयी " कंडिशनिंग " पर प्रश्न नहीं उठाया . ये बात क्या प्रूव करती हैं सुजाता ??"

८ महिला ब्लागर में छः ने इस कविता को पसंद किया था रचना जी ! यह प्रूव करता है कि आपका सोचने का नजरिया अलग है और अगर बुरा ना माने तो biased है, आप पुरूषों और शायद मनुष्यों के प्रति भी अधिक निर्मम हो जाती हैं, आप पूरी कौम के साथ न्याय नहीं कर पा रहीं हैं ! आप बहुत अच्छा लिखती हैं और जिस तरह बहादुरी के साथ, ग़लत बातों का जवाब देतीं है ! शायद बहुत से तथाकथित पुरुषों को शर्मिंदा भी करती होंगी ! यह बहादुरी मिसाल के रूप में लड़कियों का प्रेरणाश्रोत बनेगी !

Anonymous said...

"८ महिला ब्लागर में छः ने इस कविता को पसंद किया था रचना जी ! यह प्रूव करता है कि आपका सोचने का नजरिया अलग है और अगर बुरा ना माने तो biased है,"
satish ji
maene pasand aur naapasand ki baat nahin kii thii maene baat ki thee ki kisi bhi mahila nae conditioning par prashn nahin kiya kyun ????
mae aap ki kavita ki nahin woman ko condition karney kii samajik koshish ki baat kar rahee hun jisko samajhtey huae bhi mahilaa us par baat nahin karnaa chaatee
kyun
kyunki un sabko "condtion" kiya gayaa haen
aap baised keh aap ki ichcha par mae yahaan nayay aur anaya karne vaali koi nahin hun .
judgementa hona bahut aasan hota haen par sach bolna ?????

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