Thursday, September 18, 2008

शिशु किसकी ज़िम्मेदारी ?

माँ बनना गौरव का विषय है , मै भी मानती हूँ , माँ हूँ भी ,इससे जानती हूँ कि माँ के विषय मे जो भी कुछ कहा सुना जाता है उसकी वास्तविकता क्या है और उसके अंडर्टोंस क्या हैं?
एक अच्छा पुत्र या पुत्री पर सर्वस्व वार कर माँ को जो सुख हासिल होता है वह कोई नही समझ सकता ,जन्म देने और अपनी छाती से लगा कर शिशु को पालने का कष्ट और अहसास कोई अन्य नही जान सकता ।पुत्री समझ सकती है ,जब वह खुद माँ बनती है।पुत्र तो किसी भी तरह समझ नही सकता कि गर्भ मे भ्रूण के अव्स्थित होने से लेकर बच्चे के वयस्क हो जाने तक एक माँ कैसे कैसे शारीरिक ,मानसिक्, भावनात्मक ,समाजिक ,पारिवारिक दबावों को झेलती है।लेकिन दम्भी होने का उसका पूरा हक होता है।और माँ को यह बताने का भी कि क्या तुम्हारे कर्तव्य क्षेत्र में है और तुम्हारे जीवन की रूप रेखा क्या हो ?
मुझे एम फिल का शोध लेखन पूरा करना था।और मेरे पास कुल मिलाकर तीन महीने का समय था जबकि मेरा पुत्र मात्र दो ही महीने का था। सो सुबह सवेरे घर का काम समाप्त कर, दोपहर तक का भोजन बना कर ,बच्चे को दूध पिलाकर मुझे लाइब्रेरी निकलना होता था।शाम के सात बजे तक लौटती थी और आते ही बच्चे को गोद मे लेना चाहती थी। केवल तीन महीने का कष्ट था,और मेरा बच्चा किसी क्रेश मे नही था किसी आया के पास नही था।अपनी दादी के पास था।पर क्या यह बात वह जान पाएगा कि वह समय मेरे लिए कितना मानसिक उथल पुथल का था जब हर कोई छोड़ क्यों नही देती पढाई , नौकरी -जैसी बातें कहता या सोचता था और "संडे मम्मी " जैसे ताने दिया करता था।
मेरे घर मे उस समय मेरे अलावा दो स्त्री सद्स्य और दो पुरुष सद्स्य थे।बच्चे की पीछे से अच्छी देखभाल होती थी पर शाम ढले घर आने पर मुझे उसका मुख देखने की बजाए रसोई मे जाना होता था , दिन भर मैने बाहर गुज़ारा ,घर पर के अपने कर्तव्य पूरे नही किये , सभी ने मेरे बच्चे को पीछे से सम्भाला , इस नाते यह मेरा फर्ज़ मान जाता था कि मै शाम का सारा काम यथासम्भव अधिकाधिक योगदान देकर पूरा करूँ।
रोने पर बच्चा मेरी गोद से छीन लिया जाता था, दूध पीते पीते नन्हे शिशु के मेरे कान से खेलने पर कहा जाता था- अच्छा है अभी से माँ के कान खींच कर रखेगा -
नानी या मौसी के यहाँ क्यों गया इस पर बवाल हो जाया करता था...
घर पर रहती थी तो माँ मात्र बच्चे की परिचारिका ही है माने नौकरानी , वह आराम से गोदी मे खिलाया जाता , पॉटी करे तो जा कपड़े ले आ , अब गर्म करके तेल ले आ , अब नहाने का पानी तैयार कर , अब नये कपड़े निकाल ला,अब सेरेलक बना ला ,सेरेलक नही खा रहा बच्चा तो ले अब- अपना दूध पिला दे।एक टिप्पणी मे यह कहा गया कि नौकरी करने वाली औरत न माँ है न पत्नी वह तो पहले नौकरानी है । तो वह औरत घर मे किसकी नौकरानी नहीं है ?और देखा जाए तो नौकरानी के माने क्या हैं ? कोई गिरी हुई औरत जो अपनी मजबूरी में आपके घर कपड़े धोने या बर्तन मानजने आती हैं ?क्या आप उसे इतनी हीन दृष्टि से देखने के आदि हैं ?क्या यह अपने अच्छे हालात पर दम्भ करना और किसी दूसरे को नीच दिखाने जैसा नही है?

आज मेरे साथ कोई नही रहता, मै उसी घर् मे हूँ ।कोई विदेश मे बस गया और कोई अपना पैतृक घर बनवा रहा है। भविष्य मे भी मेरे साथ कोई नही होगा , कौन होता है , रह भी पाता है हमेशा साथ। पर मेरी शिक्षा , मेरा योग्यता और आत्मनिर्भरता साथ है, जिसे खत्म करने के लिए पर्याप्त हतोत्साहित करने वाली स्थितियाँ मौजूद थीं।

इस व्यवस्था में किसी का दोष नही है। बच्चे हमारे हैं सो हमे पालने हैं , किसी का मुँह नही जोह सकते । लेकिन वे जिस खानदान का चिराग कहलाते हैं , वे जिस समाज का हिस्सा बनेंगे , जिस स्कूल के उत्पाद कहलायेंगे , जिस राष्ट्र के नागरिक कहलायेंगे उसकी इस सब के बीच क्या भूमिका है ? जो माँ अपना पुत्र या पुत्री देश सेवा समाज सेवा ससुराल सेवा के लिए अपना खून जलाकर तैयार करती है उसके इस कर्तव्य मे भूमिका लेने कोई तब क्यों नही आगे आता जब उसके जीवन का सब्से कष्ट कर समय चल रहा होता है?मुझे यह कहते संकोच नही कि दुनिया की , सम्बन्धों की ,असलियत मैने उसी दिन जानी जिस दिन मेरे मातृत्व नीँव पड़ी थी।आज मुझे अपना बच्चा सबसे प्रिय है और उसी की खातिर मुझे अपना जीना सार्थक लगता है।मुझे खुशी है कि मै काम करती हूँ और बुढापे मे मै कुण्ठित हो कर उसे ताने नही दूंगी कि तेरे लिए मैने सब सहा सब छोड़ दिया ,पढाई करियर नौकरी और तेरे लिए आज मेरे पास वक़्त नही है ?

बहुत बार उसकी उपेक्षा हुई , मुझे अपनी आँखों से देखना पड़ता था ,लेकिन क्या इसलिए कि मै बुरी माँ हूँ या इसलिए कि जो भी कोई आदमी मुझ पर यह आक्षेप लगायेगा वह खुद इस आरोप से बरी नहीं है कि इस शिशु के पालन मे उसने अपनी भूमिका का ठीक निर्वाह नही किया ?क्योंकि अंतत: माँ बनने का फैसला किसी स्त्री का एकल निर्णय कभी नही हो सकता। आप विवाह के बाद दो साल बिना बच्चे पैदा किये नही गुज़ार सकते ।अगर ऐसा होगा तो दुनिया भर से हिमायती लोगों की भीड-अ आपको यह सम्झाने के लिए उमड़ पड़ेगी कि अब बहुत हुआ बच्चा पैदा कर लो । इससे भी अधिक समय हो जाए तो आपको डॉक्टर से परामर्श लेने भेजा जायेगा ।यदि वाकई सम्स्या है और डॉक्टर से भी कुछ बात न बनी तो तलाक की नौबत भी आ सकती है।स्ट्रेस , और स्ट्रेस ।ऐसे मे बहुत अच्छा लगता है कि आपका पालन पोषण एक ऐसी महिला के रूप मे हुआ होता कि आपको शादी, बच्चा ,परिवार के अलावा कुछ सोचना ही सिखाया न गया होता।इससे बहुत आसानी रहती है पितृसत्ता को ।लेकिन यह भी कष्ट्कर हो जाता है बहुत बार ।

एक स्कूल में , आज से 7 साल पहले , मुझे स्कूल के बाद यूनिवर्सिटी जाते हुए , एक सहकर्मी ने कहा - "मेरा भी बहुत मन था कि मेरी एम फिल पूरी हो जाती, पर उस दौरान मेरा बेटा हो गया , घर वालों ने कहा छोड़ अब क्या पेपेर देने जाएगी ,अपना बच्चा देखो .....किसी ने थोड़ा बहुत सहयोग किया होता तो ...." और फिर जैसे फिर से मन को समझाने बैठ जाती , और वाकई मै कुछ क्षण बाद उसे फिर से हंसते बोलते हुए पाती ।



शायद यह हमारी सरकार ने अब जाकर समझा है कि बच्चे इस राष्ट्र की आने वाली पीढी हैं , भावी समाज हैं , भावी नागरिक हैं और इसका ज़िम्मा अगर हमने स्त्री पर अकेले ही डाल दिया है तो उसे सताने के बजाए कम से कम उसकी मदद करनी चाहिए , सम्वेदनशील होना चाहिये।शशि, रंजना ,अनुराधा मेरी सभी मित्र कष्ट पूर्ण समय से पार हो गयीं हैं पर यह बेहद खुशी का सबब होगा शशि के लिए कि अब उसके सास-ससुर की तरह कोई यह नही कहेगा कि "बड़ी आयी है नौकरी वाली ,होने दो एक बच्चा ,इसे तो हम बताएंगे "जिसे बताते बताते वह आंसुओं से रो जाया करती थी । और शायद कोई यह भी नही कह सकेगा कि "रोज़ रोज़ अपना बच्चा छोड़ जाती है हमारे पास , छोड क्यों नही देती नौकरी" ।

माँ बनना एक चॉयस है , चुनाव है , सज़ा नही है ,कर्तव्य भी नही है ,और विवशता भी नही होनी चाहिये । मातृत्व सुखद और खुश होना चाहिये वर्न बच्चे पर इसका बुरा असर होता है। बच्चे को वात्सल्य का अधिकार है तो माँ को भी संतुषट और खुश रखना एक दायित्व है । जो माँ सताई जाती है कोई जाती है वह बच्चे को क्या तो पाल सकेगी और क्या ही उसे समझ दे सकेगी ।डॉ. बेजी ने एक बार इसी सन्दर्भ मे लिखा था -
एक शिशु का मतलब क्या है.....
कुदरत का यह खूबसूरत करिश्मा जिसमें स्त्री पुरुष की साझेदारी है। ढ़ेर सारा अनुराग, अनुभूतियों का स्रोत....। इतनी मासूमियत की लगता है परम को छू लिया हो....।

एक शिशु का मतलब नींद में खलल, कई बार बीमार पड़ना, लगातार किसी का हम पर निर्भर रहना....सुसु, पौटी.....उल्टी, हिचकी, डकार, बेमतलब, बेहिसाब रोना, हँसना.....

इतने बदलाव के लिये सबसे जरूरी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे का संबल बन सहजता से इस सौंदर्य को अपने जीवन में सहेजें...


और इसी पोस्ट मे एक बेहद ज़रूरी बात थी -

The most important thing a father can do for his children is to love their mother.
– Henry Ward Beecher

माँ होना निश्चित ही एक निराला अनुभव है पर यह कतई नही मानना चाहिये कि इसमें कोई कष्ट नही है। यह पग पर पर चुनौती भरा रास्ता है और सभे को समान हक है यह चुनने का कि वह इस राह पर कब चलना चाहता है , या नही चलना चाहता है। पति और ससुराल की चॉयस भी तभी स्वीकार्य हो सकती है जब इसमे सबकी साझी ज़िम्मेदारी निर्वाह करने की योग्यता हो।अकेली पड़ गयी माँ को देख बच्चा भी विद्रोही ही बनता है।
मातृत्व पर आक्षेप करने वालों को अपने दायित्वों को भी भली भांति समझना होगा ।यह भी समझना होगा कि कुछेक परिवारों को छोड़ दें तो सर्वत्र निम्नमध्यवर्गीय , निम्नवर्गीय स्त्री के लिए यह एक दुरूह काम बना दिया जाता है।
बहुत ज़रूरी है कि पिता को भी यह छूट दी जाए कि वह 2 साल का अवकाश अपने बच्चों के लिए ले सकता है और माता पिता को पूरी कार्यकल मे एक बार इस तरह के अवकाश की छूट हो। लीव वेकेंसी पर ही सही किसी को रोज़गार भी मिलेगा:-)और इस देश की भावी संतान , भावी समाज, भावी नागरिकों की नींव भी दुरुस्त हो जाएगी ।

11 comments:

seema gupta said...

" ekek shadb sach or sach ke seeva kuch nahee, behtreen abheevyktee"

Regards

Shastri JC Philip said...

विश्लेषणात्मक, काफी संतुलित, एवं दिल को छूने वाला आलेख!! यह लोगों को सोचने के लिये काफी सामग्री देगा.


-- शास्त्री

-- ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसने अपने विकास के लिये अन्य लोगों की मदद न पाई हो, अत: कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर अन्य चिट्ठाकारों को जरूर प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

वर्षा said...

एक औरत की ज़िंदगी में शादी के बाद दूसरा मुश्किल और चुनौतीभरा पड़ाव मां बनना ही है। बहुत सारी लड़कियां शादी के बाद पढ़ाई-करियर छोड़ देती हैं, छुड़वा दिया जाता है और बहुत सारी लड़कियों को मां बनने के बाद इस दौर से गुजरना पड़ता है। पति और परिवार के दूसरे सदस्यों के सहयोग से एक बार ये पड़ाव पार हो जाए तो आगे बच्चे भी ये कहने में फक्र करते हैं मेरी मां काम करती है।

मसिजीवी said...

अब चूंकि इस बात की उद्बाहू घोषणा कर ही दी गई है कि अनुभव क्षेत्र से परे होने के कारण हम इस प्रकरण की समझ से वंचित हैं अत: जो कहेंगे उसे यह कह मटिया देने की सुविधा है ही कि छोड़ो ये मरदों की समझ के बाहर की बात है।:)
तथापि उस विसंगति पर नजर डालना आवश्‍यक है जो किसी भी प्रकरण में एंपिरिकल से थ्‍योरिटिकल के जबाव देने की कोशिश से पेदा होती है। राज्‍य देर से ही अपनी जिम्‍मेदारी की सुध ले रहा है अच्‍छी बात है पर ससुरालपक्ष से 'कुलदीपक' को पालने की अपेक्षा और उनहें अन्‍य ससुरालपक्षीय 'हकों' से वंचित करना ये प्रमाद ही है।

Dr. Amar Jyoti said...

छोटे बच्चे की कामकाजी मां होने के नाते जो आपने भोगा वह इस सामंती समाज में स्वाभाविक समझा जाता है। पूरी विनम्रता के साथ आपके लेख के एक अंतर्निहित विरोधाभास की ओर संकेत करने की अनुमति चाहता हूं। संयुक्त परिवार की जर्जर, जीर्ण-शीर्ण इमारत का सहारा यदि अपना बच्चा पालने के लिये लिया जायेगा तो उसकी कीमत तो चुकानी ही होगी। बच्चे के लालन-पालन,सूसू,पॉटी में पिता हिस्सा क्यों नहीं बटाते? औरों का मुंह क्यों ताकते हैं? शाम का खाना आदि बनाने में पतिदेव को संकोच क्यों होता है? पति-पत्नी ने मिल कर बच्चे को जन्म दिया है तो लालन-पालन अकेले मां क्यों करे? परिवार के अन्य सदस्य जितनी भी सहायता कर दें उसके लिये आभार व्यक्त करना चाहिये न कि शिकायत। आख़िर वो आप दोनों का बच्चा है उनका नहीं! इसे अपने ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप न समझें। मैं इस दौर से गुज़र चुका हूं।

Anonymous said...

New Delhi: That fathers play a minimal role in child rearing had always been suspected, but has found support in a significant Assocham survey.
The survey, in which 4,700 couples from cities across India were interviewed, shows that only 4% working fathers spend time with their kids or take responsibilities like supervising homework. The remaining 96% cite professional pressures and other reasons to play a minimal role in the upbringing of their children.
On the other hand, 65% working mothers help their children with homework, finish school projects for them, read with them and also play with them.

एक सर्वे के अंश हैं ये और पूरी डिटेल आप को यहाँ मिलेगी . सर्वे के अंश

Anonymous said...

मेरा अपना मानना हैं की कामकाजी महिला के बच्चो मे सेल्फ कांफिडेंस ज्यादा होता और वो आत्म निर्भर भी होते हैं . माँ का मतलब केवल वात्सल्य की मूर्ति ही नहीं हैं . माँ का मतलब हैं वो महिला जो हमे हमारे "कदमों पर खड़े होना" सीखाये .

Unknown said...

शिशु के प्रति माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी है.

arun prakash said...

शिशु का मतलब वाली पंक्ती यथार्थ है यह स्त्री की दूसरी परीक्षा है पहली मैं शादी को मानता हूँ शीघ्र ही मैं भी अपने ब्लॉग क्याकहूँ ,ब्लागस्पाट में एक लेख लिखने वाला हूँ मुझे खुशी होगी यदि आप नारियों सम्बन्धी लेखो पर अपने विचार व्यक्त करें

Anonymous said...

माँ के चाल चलन पर उंगली उठाने वालों से पूछो कि हर गली मे बच्चा पैदा करके आ जाओगे तो ममता और वात्सल्य का सवाल नही उठेगा क्या ? वेश्यालयों मे जो औलादें पैदा होती हैं उन्हें बाप के वात्सल्य क हक नही है क्या? वो भी तो मर्दों की पैदा की हुई होती हैं ?इन आदमियों के इल्ज़ामों और तानो से बचने के लिए जब अनब्याही माँ बच्चा अनाथालय छोड़ आती है तब वात्सल्य कहाँ जाता है जब अबॉर्शन की सलाह प्रेमी ही देता है । देश मे अलग और विदेश मे अलग घर बसाने वाले मर्दो से पूछो ज़रा कि बाप का प्यार वात्सल्य नही कहलाता क्या ?
जब औरत विधवा होती है तब पति के ही घरवाले उसे खाने को दौड़ते हैं, भाई भतीजो का हक छीनते हैं,तब उस औरत की शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता होती है तभी तुम्हारे बच्चे पलते हैं।वर्ना दुनिया तो उन्हें चील कौवो की तरह नोच डाले ।
अपने गिरेबान मे झांकना तो आदमियों को सिखाया ही नही गया।

Asha Joglekar said...

बढिया लेख । मैने भी जब पी.एच डी का थीसिस लिखा था तब बेटा १० महिने का था पर थीसिस की वजह से घर से दूर रह कर काम करना पड रहा था पर मेरी ममेरी सासजी ने मेरे बेटे को बहुत प्यार से सम्हाल मै आज तक उनकी ऋणी हूँ । बेटे ने भी बडे होकर कभी दोष नही लगाया वरन हमेशा सराहा ही । कुछ लोग अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे ।

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स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...