Thursday, September 25, 2008

या तन को दिवला करूँ - प्रभा खेतान को श्रद्धांजलि


या तन को दिवला करूँ , बाती मेलूँ जीव
लोहू सींचौ तेल ज्यूँ,कब मुख देखौ पीव


इस तन का दीपक बनाऊँ , प्राण की बाती करूँ , लोहू से तेल की तरह सींचूँ कि कब पिया का मुख देख पाउंगी ।

कबीर की ये पन्क्तियाँ मुझे जाने कब से बेकरार करती रही हैं और जब से स्त्री विमर्श को लेकर जागरूक हुई मन मे जब तब गूंज उठती हैं।पर आज इन्हें याद करने का क्या कारण है ?डॉ प्रभा खेतान का देहांत ।
। एक साहसी स्त्री{कभी कभी बोल्ड की एक निगेटिव सेंस में }, सामाजिक कार्यकर्ता , लेखिका के रूप मे जानी जाने वाली प्रभा खेतान ।
सीमोन दि बोवुआर की पुस्तक सेकेंड सेक्स का हिन्दी अनुवाद "स्त्री उपेक्षिता" नाम से करते हुए डॉ. प्रभा खेतान ने भूमिका मे लिखा था -
क्या देह के अलावा औरत की और कोई पूंजी नही है?


देह को जलाकर ,प्राणों की बाती बनाकर वह संसार मे एक अखंड लौ की जलती आती है और डॉ प्रभा खेतान की आत्मकथा"अन्या से अनन्या" पढकर इन्हीं प्रश्नों के गिर्द मन चक्कर काटने लगता है कि वाकई स्त्री की देह के अलावा उसकी कोई और पूंजी नही है?अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ो से पता लगता है कि दुनिया की 98% पूंजी पर पुरुषों का कब्ज़ा है। और अगर औरत की देह भी उसके लिए पूंजी है तो सोचिये कि स्थिति कितनी भयावह है।

प्रभा खेतान की आत्मकथा मे ऐसा क्या था ?


बकौल मसिजीवी -प्रभा खेतान की आत्‍मकथा के अंश हमारे युग के खलनायक (बकौल साधना अग्रवाल) राजेंद्र यादव की हँस में नियमित प्रकाशित हुए हैं और हिंदी समाज में लगातार उथल पुथल पैदा कर रहे हैं। अब एक सुस्‍थापित सुसंपन्‍न लेखिका साफ साफ बताए कि वह एक रखैल है और क्‍यों है तो द्विवेदी युगीन चेतना वालों के लिए अपच होना स्‍वाभाविक है। जी प्रभा रखैल हैं किसी पद्मश्री ऑंखों के डाक्‍टर की (अपनी कतई इच्‍छा नहीं कि जानें कि ये डाक्‍टर कौन हैं भला) और यह घोषणा आत्‍मकभा में है किसी कहानी में नहीं। अपनी टिप्‍पणी क्‍या हो ? अभी तो कह सकता हूँ कि -
मेरे हृदय में
प्रसन्‍न चित्‍त एक मूर्ख बैठा है
जो मत्‍त हुआ जाता है
कि
जगत स्‍वायत्‍त हुआ जाता है (मुक्तिबोध

हिन्दी मे दलित और स्त्री विमर्श के चलते आत्मकथाओं का एक दौर आया और कुछ बहुत अच्छी और कुछ फैशन मुताबिक आत्मकथाएँ भी आयीं। लेकिन स्त्री की आत्मकथा को देखने की दुनिया का नज़रिया पुरुषवादी ही रहा।बकौल मेरा ई पन्ना -
स्त्री मुक्ति को लेकर पुरुषो का रवैया सामंती ही है। मुक्ति का प्रश्न उठते ही चतुर सामंत की तरह आज का पुरुष तरह तरह की दलीले देकर कि स्त्री तो महान है , वह पुरुष से ज़्यादा सामर्थ्यवान है, वह जीवन का सही उद्देश्य जानती है, वह दैवीय गुण युकत है वगैरह..... , कन्नी काटता है। इससे भी काम ना बने तो छिछोरों की तरह कहने लगते हैं- हटिये, हटिये स्त्रीवादी आयीं,या उसके निजी जीवन मे ताक झाँक बढा देते हैं ।कुछ उसके लेखन मे कामुक आनन्द लेने लगते हैं ।जैसे प्रभा खैतान की आत्मकथा" अन्या से अनन्या" आयी तो लोग उत्सुक होकर लपके उनके डॉक्टर साहब के साथ प्रेम प्रसंग को पढने ।the second sex की भूमिका लिखते हुए डॉ प्रभा खैतान पूछती हैं- क्या शरीर के अलावा औरत की और कोई पूँजी नही है ?
सुबह सुनील दीपक का पोस्ट देख कर भी ऐसे प्रश्न सामने आए ।
अभय कुमार दुबे "{सी एस डी एस से जुड़े हैं}कहते हैं -
मन्नू भंडारी की आत्मकथा ' एक कहानी यह भी ', प्रभा खेतान की आत्मकथा ' अन्या से अनन्या ' और मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा ' गुड़िया भीतर गुड़िया ' का संदेश यह है कि संबंधों की अंतरंगता स्त्री जीवन को पुरुष के मुकाबले अधिक गहराई से प्रभावित करती है। ये तीनों महिलाएं आदर्श सह-जीवन की खोज कर रही हैं। एक स्त्री विवाह किए बिना केवल प्रेम के जरिए , दूसरी प्रेम विवाह करके और तीसरी परंपरा द्वारा थमाए गए वैवाहिक जीवन के भीतर यही तलाश कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि जब विवाहेतर आकर्षण के बगावती प्रभावों से दाम्पत्य का शीशा चटख जाता है और स्त्री उसमें अपनी छवि निहारती है तो उसे लगता है कि आज उसका चेहरा पहले से सुंदर लग रहा है।

कुल मिला कर ये आत्मकथाएं बताती हैं कि स्त्री एक ' पौरुषपूर्ण समय ' में रहने के लिए अभिशप्त है। वह पुरुष के साथ अपने संबंधों को केवल यौन कामना की भाषा में ही परिभाषित नहीं करना चाहती। वह चाहती है कि अंतरंगता के सभी पहलुओं को सेक्सुअल न माना जाए। अंतरंगता बौद्धिक भी हो सकती है , राजनीतिक हो सकती है , और प्रगाढ़ मैत्री के रूप में भी। लेकिन स्त्री की मुश्किल यह है कि वह जिन अंतरंगताओं को अपनी तरफ से ' ए-सेक्सुअल ' या अ-यौनिक मान कर चलती है और उसी रूप में उन्हें निभाना चाहती है , जरूरी नहीं कि संबंध का दूसरा पक्ष उसके प्रति वही नजरिया रखता हो। अधिकतर स्थितियों में पुरुष की तरफ से मानस के धरातल पर (भले ही देह के स्तर पर उसकी अभिव्यक्ति हो पाए या न हो पाए) कामनाओं का खेल अपने व्यक्त-अव्यक्त रूपों में जारी रहता है।


जाने किस इंतज़ार मे स्त्री अपना समस्त जीवन ऐसे ही देह की दिया -बाती बनाते बनाते खप जाती है।नयनतारा बनने की कवायद भी उतनी ही आत्म पीड़क है जितनी कि चोखेर बाली कही जाकर अपने जीवन के शोध और प्रयोग की प्रक्रिया,पहचान की तलाश ।ऐसे मे आज तक स्त्री का कुल जमा हासिल क्या है?देह और देह के पार एक इंसान होने की चाहत को लिए एक विकल जीवन जीते जाना शायद!


अदम्य स्त्री ,प्रभा खेतान को हमारी श्रद्धांजलि ।

11 comments:

neelima garg said...

True shradhanjali...

rakhshanda said...

खुदा उनकी रूह को पुरसुकून रखे...और जन्नत उनकी मुताजिर हो...

Unknown said...

ईश्वर उन की आत्मा को शान्ति प्रदान करें.

Arun Aditya said...

achchha likha hai.

शायदा said...

बहुत अच्‍छा सुजाता। इंतजार था प्रभा खेतान पर इस पोस्‍ट का।

आर. अनुराधा said...

मन में तो बहुत था कि प्रभाजी के निधन पर कुछ नहीं, काफी कुछ लिखूं, लेकिन सुजाता की पोस्ट ने लगभग वह सब कुछ कह दिया है। उसमें जोड़ने के लिए फिलहाल कुछ नहीं है।
हो सका तो सिमोन द बोआ की पुस्तक 'The Second sex' का प्रभाजी का अनुवाद 'स्त्री उपेक्षिता' के कुछ हिस्से पोस्ट करूंगी।

प्रभाजी को हम सबकी श्रद्धांजलि।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आदरणीय प्रभाजी को
श्रध्धँजलि व नमन !
- लावण्या

जितेन्द़ भगत said...

प्रभा खेतान को श्रद्धाजंलि‍।

स्वप्नदर्शी said...

Mujhe Prabha khetaan kee lekhan se prichay novel "Chinnmasta" aur second sex ke hindi anuvaad "stri-upexita" se shuru huya. mujhe dono hee kitaabe kaee maayano me hindi me uplabdh achchi kitaabe lagatee hai.

"देह और देह के पार एक इंसान होने की चाहत को लिए एक विकल जीवन जीते जाना शायद!"

ye chaahat banee rahe!! isee me jeene ke naye raaste bhee banege.

Prabhaji ko meree bhee shardaanjali.

Unknown said...

Dear All,
Prabha's Life & now 'Passing away' should raise a very valid question---is marriage required for everyone? Today in our society the institution of marriage is under threat. In fact 'marriage' is never a right solution because both man & woman are polygamous by nature. Hence if one is not made for this compromise called 'marriage'then one should stay away from it by all his/her heart. Prabha bravely did exactly that. Even if she would have settled in a marriage it would not have lasted & worst sufferers would have been children. I sincerely feel women & men of independent & freaky(?) nature should be independent financially & instead of cursing each others creed by entering marraiage, should stay away from marraige & be forever attracted to each other ..... & save pain in the surroundings.
Bravo & Heartfelt Shraddhanjali To a woman of Prabha's stature who lived her life on her own terms & in her own way.

makrand said...

sirf itana hi kahuga
deha to nashwar hey
vichar khbhi nahi marate

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