Friday, September 26, 2008

हालिया मंजूर चाइल्ट-केयर लीव क्या अनुचित है?

कुछ दिनों पहले इन्हीं पन्नों पर एक पोस्ट डाली थी कि अब सरकारी क्षेत्र की महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश 6 महीने का मिलेगा। पुरुषों के लिए पितृत्व अवकाश 15 दिन से बढ़ा कर एक महीने का कर दिया गया है। साथ ही महिलाएं अपने दो बच्चों के लिए उनके 18 साल के होने तक कभी भी, किसी भी समय कुल दो साल तक की चाइल्ड केयर लीव ले सकती हैं।

इस पर अंजलि सिन्हा का राष्ट्रीय सहारा में एक लेख है जो इस मसले के कई दूसरे पहलुओं को भी सामने लाता है।

उनका कहना है कि "यह घिसे-पिटे/स्टीरियोटाइप नजरिये का नतीजा है कि बच्चे के पालन–पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ औरत पर डाली जाय तथा उसे अपनी नौकरी पर काम करने के अवसर वे वंचित किया जाय। कोई यह भी मान सकता है कि जो औरत छुट्टी न लेना चाहे तो वह नहीं लेगी लेकिन इससे आखिर बढ़ावा किस प्रवृत्ति को मिलने वाला है ? सरकार को अपनी तरफ से घरेलू काम की इन जिम्मेदारियों के लिये पुरूषों को भी प्रेरित करना चाहिये।"

आगे वे लिखती हैं- "कल को घर का पुरूष सदस्य यह कह सकेगा कि तुम्हें सरकार से इसीलिए छूट मिली है कि घर में रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाआ॓। इसी समझ के कारण परिवार कल्याण मंत्रालय ने पिताओं के लिए कभी क्रैश/पालनाघर की सुविधा की बात नहीं सोची न ही पिताओं ने अपने लिए ऐसी सुविधा की मांग सरकार से की। दूसरी समस्या यह आयेगी कि प्राइवेट नियोक्ता यह सोचेगा या सोेचेगी कि यदि औरत को फलां समय तक बैठ बिठाये वेतन देना है तो उसे नियुक्त ही क्यों करे ?"

मैंने सोचा क्यों न उनके विचार आपके सामने भी रखूं और हम इस पर बातचीत को आगे बढ़ाएं। घरेलू जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए खास तौर पर महिलाओँ को मिलने वाली छुट्टियां क्या अनुचित हैं, औरतों को घरों में बांधने की ज़ंजीरें हैं? क्या ऐसी छुट्टियां उन्हें वापस, 100 साल पीछे धकेलने की तैयारी हैं? या उनके नौकरी जारी रखने के लिए एक सहयोग, सपोर्ट? आपके विचारों का इंतज़ार है।

15 comments:

Unknown said...

इंतज़ार रहेगा महिलाओं के विचारों का इस विषय पर. मुझे बस एक बात कहनी है कि मातृत्व और पितृत्व के बीच में कहीं बच्चे न पिस जाएँ.

स्वप्नदर्शी said...

meri sahamati inhi vichaaro ke saath hai. ek aise samaj me janhaa, mahilao ko naukaree n dene ke hazaar bahaane ho, aur naukaree mil bhee jaay to leadership ke mauke lagbhag nil, vahaan par is tarah kee policy stree ke prati anaay ko aur gaharaa karegi.

mere vichaar se kisee bhee stree yaa purush ko yadi bachho kee dekhbhaal, ya fir kisi gambheer roop se beemar parijan yaa mata-pita ke liye chhutti kee zaroorat ho to naukaree ke pure karykaal me is tarah kee chuutti kaa pravadhaan hona chahiye. Aaaj ke yug me bahut se kaam internet ke zariye ho sakate hai, aur vyakti ko apanaa kaam ghar le jaane kee izaajat honee chaaiye, ya fir flexible hours me kaam karane kee. office me haaziree lagaakar kaam karanaa zarooree nahi hai.

sirf kuchh aurato ko isase faayadaa milega, aur bahut see aurate iskee keemat bharengee. mera vote is policy ke virodh me hai.

rakhshanda said...

बात वाकई सोचने की है...बच्चों की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ स्त्रियों की नही है, पता नही क्यों ऐसा क्यों सोचा जाता है...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यहाँ पढ़कर मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि उक्त लेखिका द्वारा यह मान लिया गया है कि बच्चों की देखभाल और घर का प्रबन्ध बहुत छोटा और निम्न स्तर का काम है, तथा नौकरी करना बड़ा उच्च स्तर का...। जो घर सम्हाल रहा है, वह हीन है और जो बाहर निकल कर काम कर रहा है वही उत्कृष्ट कोटि का मानव है। मुझे मूलतः इस सोच और धारणा पर ही आपत्ति है।

नौकरी को जीविका कमाने के उद्देश्य की पूर्ति का साधन मात्र ही मानना चाहिए। एक सुखी और सन्तुष्टिदायक पारिवारिक जीवन के लिए घर में पैसा आना जरूरी तो है लेकिन यह अच्छे जीवन की एकमात्र गारण्टी नहीं है। बच्चों की उचित देखभाल करने, उनके अन्दर सहज मानवीय मूल्यों का विकास कराने और परिवार के भीतर भावनात्मक रिश्ता विकसित करने का काम मैं अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ। और यह भी कि इन कामों को कुशलता पूर्वक निभाने में स्त्री अधिक योग्य होती है।

यदि नौकरी मेम इन दायित्वों को बेहतर तरीके से निभाने का अवसर दिया जा रहा है तो यह स्वागत्योग्य कदम है। हमारी पारम्परिक व्यवस्था को सिरे से खारिज करने के पहले बेहतर विकल्प सामने लाए जाने चाहिए। अन्यथा उसमें आवश्यक परिमार्जन का मध्यमार्ग ही ग्राह्य है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अन्तिम वाक्य में ताइप की त्रुटियाँ यहा ठीक कर दी है:
यदि नौकरी में इन दायित्वों को बेहतर तरीके से निभाने का अवसर दिया जा रहा है तो यह एक स्वागत योग्य कदम है। हमारी पारम्परिक व्यवस्था को सिरे से खारिज करने के पहले बेहतर विकल्प सामने लाए जाने चाहिए। अन्यथा उसमें आवश्यक परिमार्जन का मध्यमार्ग ही ग्राह्य है।

Anonymous said...

सरकारी नौकरी मे ही ये सब सुविधा हैं । प्राइवेट नौकरी मे इस प्रकार की कोई सुविधा ही नहीं हैं । बड़ी से बड़ी पोस्ट पर भी मातृत्व अवकाश का कोई प्रावधान नहीं हैं । लेबर कानून मे हैं पर महिला लेबर को गर्भवती होने का पता चलते ही "चलता " कर दिया जाता हैं ।

प्राइवेट जॉब मे इस प्राकार की कोई सुविधा नहीं दी जाती हैं क्युकी वहाँ " बराबरी का दर्जा और सैलरी " मिलती हैं । और इसलिये अपेक्षा होती हैं की आप घर , पति और बच्चो को घर पर ही छोड़ कर आए ।

सरकारी नौकरी मे professionalism बहुत कम हैं और इसीलिये वहाँ छुटियो की बहुतायत हैं और लोग उनको पाकर खुश भी होते हैं । सरकार जब भी कोई फैसला लेती हैं तो उसके पीछे काफ़ी रिसर्च होती हैं । लेकिन इस तरह का फैसला प्रगति मे बाधक होता हैं अगर कोई महिला "नौकरी " को प्राथमिकता देना चाहे । आज भी बहुत से घरो मे सरकारी नौकरी रत नारी की शादी बहुत जल्दी होती हैं और बहुत से घरो मे पुरूष की आय से घर नहीं चल पाते हैं सो महिला की आय की जरुरत होती है । ऐसे मे ये फैसला उन सब महिला को एक राहत देगा जिनकी जिंदगी मे घर और बछो का सारा भार होता हैं । लम्बी अवधि के मातृत्व अवकाश का बस एक ही फायदा हैं की माँ की सेहत सही रहेगी ख़ास कर उन परिवारों मे जहाँ नारी की आय ही स्त्रोत हैं ।

सरकारी तंत्र कब सारकारी नौकरी के दायरे से बाहर आकर "professional attitude " को मान्यता देगा पता नहीं .

अच्छा होता अगर इसी नियम मे ये भी जोड़ दिया जाता की महिला छुटी के लिये आवेदन देते समय ये बताये की क्या वो चाहती है की छुट्टी की अवधि उसके और उसके पति दोनों मे बराबर बांटी जाए । लेकिन ये सम्भव नहीं हो सकता क्युकी क्या पता पति कहां काम करता हें , करता भी हैं या नहीं ।

और पति से आप कभी भी पूछोगे वो यही कहेगा जब सरकार पैसा दे रही है तो तुम घर पर रहो ।

किसी भी प्रकार की छुट्टी आप को आप के कार्य छेत्र मे पीछे ही ले जाएगी इस लिये सिदार्थ जी की बात माने और तभी नौकरी करे जब आप को जीविका कमानी हो अन्यथा बच्चे पालने और उन्हे बड़ा करने मे ही आप अपनी ऊर्जा लगाय क्युकी आप ये काम करने मे अधिक योग्य हैं । बाकी कामो मे नारी की योग्यता और कुशलता का आकलन अभी भी बाकी हैं । वैसे यहाँ बात उस छुट्टी की हो रही थी जो एक वर्किंग महिला को मिलनी हैं इस मे इस बात को उठाना की कौन सा काम कौन कुशलता से करेगा मुझे बिल्कुल समझ नहीं आया । पारम्परिक व्यवस्था को सिरे से खारिज करने के प्रश्न इस पोस्ट पर क्यों हैं ?? क्युकी छुट्टी उनके लिये हैं जो काम कर रही हैं

मसिजीवी said...
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मसिजीवी said...

हमें तो यह कदम संवेदनशील लगता है भले ही हमें इसके लिए प्रगतिशीलता का विरोधी समझा जाए।
कोई शक नहीं कि आदेश में रोल स्‍टीरियोटाईप की अभिव्‍यक्ति हो रही है। किंतु यदि समाज में स्‍टीरियोटाईप है तो वह इन संरचनाओं में भी अभिव्‍यक्‍त होगा ही। सरकारी नियोजन समय से आगे जाने वाली संरचनाएं नहीं हैं। इसलिए बनिस्‍पत इसके कि इनसे सामाजिक बदलाव के शुरू होने की अपेक्षा रखें, बेहतर हो कि समाजिक बदलाव के बाद इन संरचनाओं में बदलाव की अपेक्षा रखी जाए। समाज ने अब आकर इस बात को पहचाना है कि बहुत सी नई माएं अपने परिवार की अपेक्षाओं व कामकाज में पिस के रह जाती है तो यह जाहिर है संवेदनशील बात है कि उन्‍हें कुछ रियायत दी जाए।

ये छुट्टी प्रोफेशनलिज्‍म के खिलाफ है ये बेहद पितृसत्‍तातमक तर्क है। इस 'प्रोफेशनलिज्‍म' की निर्मिति जिसके अनुसार आप अपनी लैंगिकता को दफ्तर के दरवाजे के बाहर रखकर आएं, स्‍वाभाविक है स्‍त्री विरोधी है। छुट्टियों पर जाने से आप गैर प्रोफेशनल बनते हें ये संभव है कुछ हाथ के कामों मसलन मशीन चलाने आदि के लिए सच हो पर ये हर चीज पर लाग नहीं होता। उदाहरण के लिए शिक्षण, प्रशासन, न्‍यायिक आदि सेवाओं में सवेतन अध्‍ययन अवकाश दिए जाते हैं जो हमें ज्यादा प्रोफेशनल बनाते हैं। हमें तो विश्‍वविद्यालय में कुल मिलाकर पॉंच साल के सवेतन अवकाश पढ़ने के लिए दिए जाते हें जो लोगों को बेहतर शिक्षक बनाते हैं। अक्‍सर शिक्षिकाओं को इन अध्‍ययन अवकाशों को इस प्रकार टाईम करना पड़ता था कि वे चाइल्‍ड रीयरिंग के काम में भी इनका इस्‍तेमाल कर सकें। अब वे उन छुट्टियों का इस्‍तेमाल पूरी तरह प्रोफेशनल विकास के लिए कर पाएंगी।

Manoshi Chatterjee मानोशी चटर्जी said...

ladies! decide. अगर मातृत्व अवकाश कम दिया जाये तो भी मुश्किल, अब ज़्यादा है तो भी उसमें आप लोगों को मुश्किल नज़र आती है। मातृत्व अवकाश का ज़्यादा होना तो अच्छी बात है, मां बच्चे के साथ उसके थोड़े बड़े होने तक वक्त गुज़ार सकती है, खुद भी शारीरिक तौर पर स्वस्थ होने के बाद काम पर जा सकती है। चोखेर बाली को नज़रिया ज़रा बदलना होगा अपना, हर जगह दाल में काला दिखना...

Anonymous said...

जब १९९८ मे दिल्ली विश्विद्यालय मे नए वेतन मान लागु किये गए थे तो २ एक्स्ट्रा इन्क्रीमेंट उन लोगो के लिये थे जिन्होने Phd अपने कार्यकाल मे किया था लेकिन उसके लिये कोई भी अवकाश सवेतन या बिना वेतन के नहीं लिया था . ८४० रुपए का ये इन्क्रीमेंट था { या ७४० का , सही याद नहीं हैं } पर था और ये अपने आप मे प्रमाण हैं की professionalism की जरुरत हैं और सरकार चाहती भी है पर सरकारी नौकरी मे कार्यरत लोग ख़ुद इस बात के लिये नहीं तैयार होते . UGC का दिल्ली विश्विद्यालय मे शिक्षको के लिये समय ८.३० - ५.३० का हो इस बात पर टीचिंग कम्युनिटी बिल्कुल नहीं तैयार होती .

ये कहना की

"ये संभव है कुछ हाथ के कामों मसलन मशीन चलाने आदि के लिए सच हो पर ये हर चीज पर लाग नहीं होता। " केवल एक पारम्परिक सोच हैं और इसीके चलते नौकरी मे प्राइवेट सेक्टर मे लड़कियों का आना आज भी समाज को उतना मान्य नहीं है जितना टीचिंग मे जाना क्युकी टीचिंग मे ही फ्लेक्सिब्ले टाइमिंग और छुट्टी की सबसे ज्यादा सुविधा हैं

Asha Joglekar said...

शर्व साधारणता माँ भावनात्मक रूप से बच्चों से ज्यादा जुडी होती है बच्चे भी माँ घर पर हो तो ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं । तो मेरे विचार से तो सरकार नो अच्छा ही किया है । और यह भी कि आप १८ साल तक ये कभी भी ले सकते हैं ।
मेरे विचार में यह स्वागतार्ह है ।

आर. अनुराधा said...

मैं इस तरह की छुट्टी के हक में हूं। इसके दो कारण हैं। एक तो, महिलाएं वैसे ही नौकरियों (अर्थोपार्जन) के लिए कम ही निकलती हैं। उस पर अगर उन्हें इन्हीं कारणों (बहानों) से अर्थोपार्जन से दूर किया जाता रहेगा तो उन्हें समर्थ बनाने की प्रक्रिया धीमी ही रहेगी। दूसरे, कमज़ोर वर्गों के आरक्षण की तरह यह भी महिलाओँ के लिए एक सुविधा है कि (जब तक) पुरुष वास्तव में घर- परिवीर की जिम्मेदारियों में हर स्तर पर महिलाओं के समकक्ष नहीं हो जाते (यह संभव है या नहीं, इसकी जरूरत है या नहीं, ये अलग बहस के मुद्दे हो सकते हैं), स्त्री-पुरुष सहभागी नहीं हो जाते, तब तक के लिए मातृत्व अवकाश जैसी सुविधाएं माओं को काम करने को प्रोत्साहित करने का साधन हैं।

Anonymous said...

''उनका कहना है कि "यह घिसे-पिटे/स्टीरियोटाइप नजरिये का नतीजा है कि बच्चे के पालन–पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ औरत पर डाली जाय तथा उसे अपनी नौकरी पर काम करने के अवसर वे वंचित किया जाय।'' मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ, भले ही कुछ हद तक ये सही है पर इसका कुछ बायोलोजिकल आधार है, मैं माँ बनने वाली हूँ और अपने शरीर में होने वाली तकलीफों को महसूस कर रही हूँ, मेरे पति क्या ज़िम्मेदारी लेंगे अभी, शिशु तो मेरे शरीर पर ही पल रहा है अभी भी और पैदा होने के कुछ दिन बाद तक भी, तो जाहिर है छुट्टी और उस-से मिलने वाले आराम की जरूरत भी मुझे ही होगी, और रही बात शिशु के मुझ पर निर्भरता ख़तम होने के बाद की बात तो तब की जरूरतों के लिए छुट्टी कौन लेगा अलग मसला है..बीमार बच्चे को माँ का साथ पिता से ज्यादा सुकून वाला लगे तो इसमें किसी की conspiracy नहीं है, यह स्वाभाविक है, हर बात को शक की नज़र से देखना जीवन को दुखदायी बना देगा, स्त्री को जागरूक होना जरूरी है hyper alert होना नहीं यह तो समस्या को बढ़ाएगा कम नहीं करेगा..

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

Anonymous जी,
आपकी ये बातें बड़ी सुलझी हुई और सहज हैं, किसी को आपसे आपत्ति नहीं होनी चाहिए ...लेकिन अनाम होकर टिप्पणी करने की वजह क्या है, समझ नहीं सके हम।

Anonymous said...

धन्यवाद सिद्दार्थ जी, अनाम हो कर टिप्पणी करने की वजह बहुत छोटी सी है, ब्लॉग जगत में मेरे बहुत सारे आत्मीय मित्र है, मैं अपने गर्भवती होने की सूचना किसी टिप्पणी के जरिये नहीं देना चाहती हूँ इसलिए अनाम हो कर लिखा, इसके अलावा कुछ और वजह नहीं है, मेरे ख्याल से ये खुशखबरी व्यक्तिगत तौर पर देना ही उचित है, बस इसलिए नाम छुपाया, आशा है आप सब लोग अन्यथा नहीं लेंगे ...

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