Friday, September 19, 2008

'"मेरा घर" का सजावटी भ्रम

सपना चमड़िया
ज़िन्दगी का अनुवाद
नवां भाग
आज शाम जब दरवाज़े की घण्टी बजी तो मैने एक परिचित चेहरे को दरवाज़े पर पाया।आँखे कह रही थीं कि इस व्यक्ति को मैने कई बार देखा है,बातें भी की हैं।चेहरे पर असमंजस के भाव तो थे ही कि आने वाले ने भी टोक दिया-"भूल गयीं आप मुझे"
मैने कहा "नही तो आइये"
लेकिन सच है कि मुझे याद नही आ रहा था।इस पर भी कि वह व्यक्ति घर मे इतना आता जाता था कि स्वयम ही कमरे के भीतर घुसा ,कम्प्यूटर टेबल के पस रुका और कम्पयूटर ऑन करके बैठ गया।ओह!
यह तो अजीत है ।अक्सर हमारे यहाँ कम्प्यूटर ठीक करने आता था।मै हैरान थी अपने आप पर कि इसे मै पहचान नही पाई मै कहँ गुम रहती हूँ।अच्छा मान लीजिये कि उस दिन वह कम्प्यूटर ठीक करने नही मुझसे मिलने आता और देर तक उस कुर्सी पर बैठा बतियाता रहता तो शायद मै उसके जाने तक भी उसे नही पहचान पाती।यात्रा कहाँ से चली और कहाँ जाकर खत्म हुई,व्यक्ति से वस्तु पर।घर मे आने वाले एक व्यक्ति की पहचान एक वस्तु ने कराई।

सुनीता भाभी एक दिन् बहुत खुश हो रही थीं कि जब भी वे पति से कोई उपहार मांगती हैं तो जवाब मिलता है"सब कुछ तो तुम्हारा ही है"।सुनीता भाभी को तो आप जानते ही होंगे।मेरे ठीक सामने वाले घर मे रहती हैं-एक बेतरह सजे घर मे।उनके घर का एक- एक कोना सजावटी वस्तुओं से लबालब भरा हुआ है।अक्सर जब मै उनके घर मे बैठ कर सांस लेने की कोशिश करती हूँ तो मेरी सांसे कभी किसी फूलदान या औरत की इज़्ज़त जैसे महीन नाज़ुक कांच के डेकोरेशन पीस से टकरा कर टूट जाती हैं।
आपका घर बेहद खूबसूरत है याआपने कितना बढिया घर सजाया है, बनाया है मेंटेन किया है जैसे वाक्य लोग अक्सर उनकी झोली मे डाल जाते हैंऔर सुनीता भाभी उन्हें कभी तमगे या शो पीस की तरह घर के बच गये कोनो मे सजा लेती हैं।और ये सब चीज़े सुनीता भाभी की अपनी हैं,घर उनका है --
एक भ्रम जो अपने सजावटी रूप से मूर्ख बना रहा है।और मै एक काल्पनिक स्थिति की रचना करती हूँ-एक सुहानी सुबह है -छुट्टी का दिन है,बढिया नाश्ता,भरा पूर घर ,मधुर हंसी ठिठोली,या कुछ नया बड़ा सामान खरीदने का चाव भरी बातें....ऐसे मे सुनीता भाभी का कॉलेज का कोई दोस्त पता ढूंढता ढूंढता उनके दरवाज़े आ जाता है और अचानक सारा परिदृश्य बदल जाता है,उस गुद् गुदे गद्दे वाले सोफे पर और सुनहरे पर्दों से सजे कमरे मे सुनीता भाभी कितनी देर अपने मित्र को बिठा पायेंगी।वो घर जहाँ सब कुछ उनका है , उनकी सांसे रुक जाएंगी , वे असहज हो जाएंगी,नाश्ता बेस्वाद हो जाएगा,बड़ी बड़ी चीज़ें तुच्छ् हो जाएंगी एक पल मे और सुनीता भाभी का डरा मन ज़रूर ज़रूर यह चाहेगा कि उस आगंतुक को किसी सामान की तरह उठाएँ और घर के सुरक्षा घेरे से बाहर कर दें।पर ऐसा कभी नही होगा , मै कुछ ज़्याद ही सोच गयी।किसी पुरुष का किसी औरत से परिचय की डोर पकड़ कर मिलने आना हमारे घरों मे आज भी वर्जित है। जो महिला दबंग हो,ठहाके लगा कर हंसती हो,पुरुषो से न डरती हो ऐसी स्त्री को भी हमारे घर चौखट नही लांघने देना चाहते।
महिलाएँ, जिनके लिए कहा जाता है कि उन्हें वस्तुओं से बहुत प्यार होता है,-दर असल उसके बहुत पुख्ता सामाजिक कारण होते हैं।जब घर में लड़ की पैदा होती है और होश सम्भालती है तभी से उसे घर की साज सम्वार और रख रखाव मे लगा दिया जाता है-बाहरी दुनिया और समाज से उसका परिचय न के बराबर होता है। व्यक्तियों के नाम पर आस पास के रिश्ते ही मिलते है वे भी बड़ो की छत्र छाया में-किसी तरह का स्वतंत्र सम्वाद कायम नही हो पाता।साथ ही वे रिश्ते भी जो नापसन्द हो ताउम्र हमें उन्हें अपना दायित्व बनाकर निभाना होता है।ऐसे मे वस्तुओं से उम्र भर का सम्बन्ध बन जाना आश्चर्य नही।

बेटियों को तैयार किया जाता है -औरों के लिए
बेटो को तैयार किया जाता है - बस अपने लिए
डॉ.सपना चमड़िया

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9 comments:

rakhshanda said...

bilkul sach....kitna bevakoof banaya jata hai orton ko, ki unhen ghar kii cheezon se zyada pyaar hota hai, ghar se zyada pyaar hota hai..jab vahin jeena marna hai to pyaar ho hi jaayega...jail mein rahne vala kaidi bhi to ek din jail ko hi apna maanne lagta hai...

pallavi trivedi said...

सही बात है...मैं ऐसे कई लोगों को जानती हूँ जिन्हें अपनी महिला मित्रों से मिलने में कोई ऐतराज नहीं है लेकिन उनकी पत्नी का कोई पुरुष मित्र नहीं होना चाहिए!

Unknown said...

पहले ऐसे मित्र नहीं या कम ही होते थे. अब ऐसे मित्र ज्यादा होने लगे हैं. इस लिए बेटे और बेटिओं को इस के लिए भी तैयार करने लगे हैं कुछ माता-पिता.

आर. अनुराधा said...

"अब ऐसे मित्र ज्यादा होने लगे हैं. इस लिए बेटे और बेटिओं को इस के लिए भी तैयार करने लगे हैं कुछ माता-पिता."

बात कुछ समझ में नहीं आई। क्या यह कहना चाहते थे कि लड़के-लड़कियों के विपरीतलिंगी मित्रों को सहजता से स्वीकार करने के लिए माता-पिता खुद को तैयार करने लगे हैं? क्योंकि जहां तक मुझे समझ में आता है, मित्र बनाना तो अपनी-अपनी फितरत में होता है, उसके लिए किसी को 'तैयार' कैसे किया जा सकता है। ये कोई 'ईवेंट' थोड़े ही है।!!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

रीश्ते - नाते और औरत का जीवन विश्व की धुरी सा !
उस पर आधुनिक जीवन का ताना बाना बहुत कुछ घटता है इन सब के बीच !

- लावण्या

Asha Joglekar said...

यह बात कुछ हद तक सही है कि स्त्री का ऐसा मित्र जिसे पती न जानता हो हमारे घरों में वांछित नही होता . पर बेटा हो या बेटी उन्हें एक अचअछा इनसान बनाना ही सबसे जरूरी है फिर शायद ये समस्या ही न रहे ।

Unknown said...

@क्या यह कहना चाहते थे कि लड़के-लड़कियों के विपरीतलिंगी मित्रों को सहजता से स्वीकार करने के लिए माता-पिता खुद को तैयार करने लगे हैं?

हाँ यही कहना चाहता था.

स्वप्नदर्शी said...

mujhe lagataa hai ki sapanaa ji, mohan rakesh kaa female roop hai, shaharee madyavargeey mansiktaa aur uske andhere-band kamaro kaa andaaze-basyaa bahut achchaa hai.

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

गयी।किसी पुरुष का किसी औरत से परिचय की डोर पकड़ कर मिलने आना हमारे घरों मे आज भी वर्जित है। जो महिला दबंग हो,ठहाके लगा कर हंसती हो,पुरुषो से न डरती हो ऐसी स्त्री को भी हमारे घर चौखट नही लांघने देना चाहते।

par yehi to sach hai na

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