Wednesday, October 1, 2008

सुख-खुशी

कई सुख और खुशियों पर सिर्फ औरतों का हक होता है, अच्छा लगता है ये सब देखते।

आज रश्मि कि गोद भराई की रस्म है, वो बहुत खुश है उसके घर वाले उसका खूब ख्याल रखते हैं घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है रश्मि की सास उसे अपनी बेटी सा प्यार देती है, सभी बहुत उत्सुक है कब वो मेहमान आयेगा रश्मि आज बहुत सुंदर दिख रही है, उसके सर पर लाल सुनहरे गोटे वाली चुनरी और माथे पर बङी गोल सिंदूर की लाल बिंदिया थी एकदम जैसे राजसी महारानी

उसकी सासू माँ ने उसे नज़र का काला टीका लगाया दाँये कान के ठीक पीछे,लेकिन फिर भी वो हर दो मिनट बाद आकर उसके चहरे को अपने दोनों हाथों से प्यार से सहलाती और फिर हाथों को अंगुलियों से चूम लेती तो कभी उसके सर पर अपने दोनों हाथ घुमाकर अपने माथे के दोनों ओर अंगुलियों से कङक की अवाज़ करती जैसे आज शायद सारे ज़माने की बलायें उस पर आ गिरेगीं।

सभी औरते बारी बारी से उसकी गोद में अपने उपहार रखतीं और पास आकर कान मे अच्छी बातें कहती और रश्मि ये सब सुनकर खिलखिलाकर हँस पङती. सच ये खुशी कि हकदार तो औरत ही है
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अभी पिछले दिनों रितू से मुलाकात हुई बहुत खुशी से बता रही थी उसकी २ साल की बेटी ने पहला शब्द माँ बोला ऐसा लगा जैसे आत्मा तृप्त हो गई उसके पति इर्ष्यावश बोले रितू ये क्या बात हुई बेटी के लिये इतने खिलौने, चाकलेट, कपङे मैं लाता हूँ, लेकिन उसने अपना पहला शब्द तुम्हें दिया

सच ये सुख, खुशी कि मिठास सभी दर्द को भुला देने में सक्षम होते हैं जिनपर सिर्फ औरत का अधिकार होता है मतृत्व ऐसी छाँव है जहाँ सारे जग की धूप भी सुहानी लगती है यहाँ रश्मि और रितू कोई नहीं महज़ एक कल्पना है, एक जरिया है ये दिखाने का कि औरतों के लिये जाहे जितने दुख, भेदभाव या बंदिशे हों ये भी एक पहलू है जहाँ औरत की खुशी उसका सुख सर्वोपरी है और जो उसे सभी से अलग करता है


30 comments:

Unknown said...

रश्मि जी को बधाई हो । मिठाई अब तो खिलाना होगा । मां शब्द ही महान है।

संगीता पुरी said...

रश्मिजी को बहुत बहुत बधाई।

Anonymous said...

अंतरतम को छूते हुये
बेहतरीन उद्गार ।

roushan said...

रश्मि जी और ऋतू जी को बधाई
बच्चे पहला शब्द माँ ही बोलते हैं इसमे ईर्ष्यालु बनने की कोई जरुरत नही होती

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

स्त्री का माता बनने का स्वरुप सदा पूज्य और प्रिय रहेगा -

Shastri JC Philip said...

"एक पहलू है जहाँ औरत की खुशी उसका सुख सर्वोपरी है और जो उसे सभी से अलग करता है"

बहुत ही वस्तुनिष्ठ कथन है यह!!

-- शास्त्री

-- हिन्दीजगत में एक वैचारिक क्राति की जरूरत है. महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

Unknown said...

"एक पहलू है जहाँ औरत की खुशी उसका सुख सर्वोपरी है और जो उसे सभी से अलग करता है"
इस विशेषता को बनाये रखना बहुत जरूरी है.

स्वप्नदर्शी said...

There is an african proverb
" A child is born and a women is lost to humanity."

Pregnancy and child rearing both are pleasant experiences and yet they sabotage the life of a grown up, individual, a women, specially if there is no support for the new mothers in the family and in society.

Many women, due to lack of support in the families, overburdened with motherhood and household chores and pressures from families or work situations are paying the price in terms of their mental and physical health.

Its good to talk about the happiness and celebration, but there should also be talk about, how these situation entrap an individuals and where are the resources for helping out new mothers.

makrand said...

ma hi sansar dikha ti hey
now a days it s an fashion to
express woman r in trouble and man is samantwadi its my view if u r not agree ok

आर. अनुराधा said...

मां बनना किसी भी मादा जीव का बायलोजिकल काम और जरूरत है। लेकिन मेरे मन में इस पोस्ट को पढ़ने के बाद कुछ सवाल आए-
1) इस पूरे कार्यक्रम में कोई पुरुष क्यों नहीं है? वे इस कार्यक्रम से दूर क्यों हैं/ उन्हें दूर क्यों रखा गया है?
2) क्या पुरुष को पिता बनने की खुशी नहीं होती या उसकी खुशी कोई माने नहीं रखती?
3) क्या किसी ने उस होने वाली मां से पूछा कि उसका हमसफर अगर इस मौके पर भी साथ होता तो उसे अच्छा लगता या नहीं?
3) 'मां' के महिमामंडन के बहाने उस बच्चे की सारी जिम्मेदारी क्या गुप-चुप उस महिला पर डालने का षड्यंत्र नहीं है यह?
4) क्या पुरुष द्वारा बच्चा पालने की अपनी जिम्मेदारियां मां पर डालने की शुरुआत यहीं से नहीं हो गई है?
5) क्या इस कार्यक्रम के बाद भी उस महिला को मां बनने और परवरिश के पूरे दौर में परिवार का उतना ही सपोर्ट मिलता रहेगा, भले ही बिटिया पैदा हो?
6) क्या इस उत्सव के दौरान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से यह बात उस होने वाली मां की कुंवारी या अब तक मां न बनी सखियों को नहीं याद दिलाई गई कि अब तुम्हारी बार है, चाहे तुम्हारी इच्छा हो या नहीं?

--सवाल और भी बहुत हैं मन में, लेकिन पहले इनके जवाब मिलें तो चर्चा आगे बढ़ाई जा सकती है।

Renu said...

sawaal bahut acche hain lekin kuch hi aur kuch nakaratmak soch lagti ha, agar ham dukh me dukhi hote hain to sukh me sukhi kyon nahi, kyon nahi bindaas khush ho sakte, wahan koi bhi karan dhoondne ki kya jaroorat ha, uski jagah ham aisa kyon na karen ki is me purushon ko bhi shaamil karen, balki na shaamil karna jyaadti ha unke saath, bacche par pita ka bhi utna hi haq ha jitna ma ka, shayad thoda kam, par yahan ham unhe kyon nakaar rahe hain.
Paramparagat roop me bhi saara jimmedaari ma ki nahi, ma use paalan poshan karti ha ,par uske liye dhan to pita hi laata ha, nahi to palan poshan kaise hoga.

BrijmohanShrivastava said...

पूरे ब्लॉग में बहुत महनत की गई है ,तस्वीरों का चयन भी सुंदर है =ऐसी मेहनत आम तौर पर थीसिस लिखने वाले ही किया करते हैं

स्वप्नदर्शी said...

I agree with anuradha's questions, and more or less these symbols are not for loving a pregnant women, but "kuch aise jaise bali se pahale bakare ko sajaayaa jaataa hai".

आर. अनुराधा said...

स्वप्नदर्शी ने शायद थोड़े क्रूर ढंग से कही, लेकिन बात दरअसल यही है। कोई लड़की 'शादी लायक उम्र' की हो जाए तो लगातार उससे पूछा जाता है कि शादी कब कर रही हो, और जब शादी हो जाती है तो सबकी जबान पर एक ही सवाल रहता है- 'खुशखबरी कब सुना रही हो।' एक तरह से उस पर सामाजिक दबाव रहता है कि वह अपने परिवार के लिए एक वारिस पैदा करे। क्या कभी कोई यह भी पूछता है कि उस लड़की, शादीशुदा महिला की क्या इच्छा है? दरअसल उसकी भी कुल अपब्रिंगिंग इस तरह की होती है, कंडीशन्ड, कि वह इस प्रेम से बाहर कोई विकल्प देख तक नहीं पाती।

औरत को समाज में पूरा सम्मान तभी मिलता है जब वह मां हो। क्या मां हुए विना कोई महिला पूरी इंसान नहीं होती? अगर कोई अपनी इच्छा से बच्चे पैदा न करने का फैसला करे तो लोग एक ही बात सोचते हैं कि जरूर उसमें कुछ खराबी है- शरीर में, वैवाहिक संबंधों में या दिमाग में।

अगर किसी के अच्छे अनुभव हों तो मुझे यह बताए कि क्या उसे मां बनने के पहले वह सब बताया गया जिससे उसको खुद को सहूलियत हो? या कहा गया कि बच्चा पैदा करने में ये तकलीफें तो होती ही हैं, सब सह लो क्योंकि बच्चा तो पैदा करना ही है। और क्या आप सब मांओं को गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद भी कई अनिच्छत काम ऐसे नहीं करने पड़े जिनके पीछे एकमात्र कारण यह रहा कि बच्चा ठीक रहे, स्वस्थ रहे?

Anonymous said...

I think its a social makeup of our homes. The very same women often do not treat their own clan (females) in a better way knowingly that they may not have received the best of all. In that case they should emphasize on mending their own ways of social behavior. Men try their best, but often keep themselves aloof from the process because they have their own tussle of how to please the spouse and/or mom (including inlaws). Somehow instead of fighting the system men have chosen the escape route. In any case, if the friends themselves can help the new moms in an encouraging way, that will also somehow effectively alert the men (spouses) to shed off their inhibitions and start enjoying the process of fatherhood and share the excitement with the new mom. Among the new breed specially the educated urban class have started to celebrate equally with their spouses and love to be a father.

Anonymous said...

BTW why don't a couple of women in every city come together and start giving Lamaz classes, that will help the women in this process. Encourage husbands and parents (including in-laws) to attend it and see the beautiful and exciting results.
Also the biggest aspect, be positive and appreciative.

स्वप्नदर्शी said...

There is also other aspect of motherhood. If motherhood is the occasion of celebration and only the afair for women and her child, then it should be equally celebrative for unmarried women, or women who got pregnant in extramarital relations, . But those women are still and their motherhood is condemned and takes their lives.
So being mother and having children is not solely the issue of happiness for mother and occasion where she can find solace from the injustice done to her in every corner.

Anonymous said...

लेख पढ़ के मन खुश हो गया, पर कुछ टिप्पणियाँ बहुत ही रद्दी मिली हैं.
क्या इनको हटाने की सुविधा के बारे में आपको नहीं पता है !! आप चाहें तो पूछ सकती हैं मेरे ब्लॉग पर.
आपके लेख में जिस कृत्य की बात की गई है, इस पर सिर्फ़ नारी का ही हक़दार है. हाँ पुरूष भी सम्मिलित हो तो बात अलग है पर सभी कार्यक्रमों में पुरूष नहीं भाग ले सकते, पुरुषों से लजाने और संकोच करने वाली महिलायें इन्हें सिर्फ़ महिलाओं के लिए बचा कर रखती हैं.
स्त्री और पुरूष में सामाजिक स्तर पर एक मर्यादा का भाव होता है. दो महिलाएं आपस में कुछ भी बात कर सकती हैं, पर यदि कोई पुरूष वहाँ पर होगा तो वे सकुचायेंगी. अब इसमें कोई षडयंत्र देखना घोर निंदनीय और समाज विरोधी कृत्य है.

आर. अनुराधा said...

ई-गुरु राजीव जी, यह कम्यूनिटी ब्लॉग है, और जहां तक हो सके लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत चलता है। इसलिए इससे टिप्पणियां हटाने की कोई नहीं सोचता। फिर भी आपके इस ऑफर के लिए धन्यवाद।

जहां तक मर्यादा की बात है तो यह समय के साथ इसकी परिभाषा बदलती है। वैसे एक साझा उत्सव साथ मनाने में मर्यादा का सवाल कहां से आता है? क्या वहां ब्लू फिल्म देखी जा रही थी, या ऐसा ही कुछ कि सबके साथ मिलकर नहीं किया जा सकता? क्या महिलाओं का पुरुषों के सामने हंसी-मज़ाक करना अमर्यादित काम है? बात कुछ समझ में नहीं आई जनाब, थोड़ा खुल कर कहें।

और मैं फिर स्वप्नदर्शी से सहमत हूं, मसला सिर्फ मां बनने का नहीं, एक वारिस की पैदाइश का है। वरना बिनब्याही होने वाली मां के लिए यह उत्सव!? उस दिन का इंतज़ार रहेगा।

Anonymous said...

राजीव जी, बिलकुल सही कहा आपने लेख बहुत अच्छा है जिसे पढकर एक खुशी हुई, कि हा सच मे आज भी बहुत सी खुशियो की हकदार सिर्फ औरते हि है ! हा उनमे अगर पुरुषो को भी शामिल किया जाये तो बहुत अच्छा रहेगा ! परन्तु हर बात को नकरात्मकता से हि जोड दिया जाये यह सही नही है ! अनुराधा जी आपके सवाल भी सही है काफी हदतक लेकिन यहा बात हर उस रश्मी ओर रितु कि हो रही है जिन्हे वो सुखद अनुभव पर्याप्त हो रहा है , उनके लिये तो सारी जिन्दगी के दुख एक तरफ और ये खुशी एक तरफ है, तो हमे भी उनकी इसी खुशी मे शामिल होना चाहिऐ ओर उन्हे हार्दिक बधायी देनी चाहिये !

मुबारक हो संगीता जी आपको और आपकी रश्मी ओर रितु को :-) :-)

भावना - रेगुलर रीडर

आर. अनुराधा said...

भावना जी, आपका स्वागत है इस ब्लॉग पर। लेकिन आपने अमॉनिमस के नाम से क्यों टिप्पणी भेजी? आप अपने नाम के साथ भेजें तो ज्यादा अच्छा लगेगा। उम्मीद है आपसे नियमित मुलाकात होगी इस ब्लॉग पर।

स्वप्नदर्शी said...

@bhawana
Please read again, the Ritu and Rashmi are imaginary characters, as mentioned in the original article.

I can see that people are congratulating these characters!!!

स्वप्नदर्शी said...

यहाँ रश्मि और रितू कोई नहीं महज़ एक कल्पना है, एक जरिया है ये दिखाने का कि औरतों के लिये जाहे जितने दुख, भेदभाव या बंदिशे हों ये भी एक पहलू है जहाँ औरत की खुशी उसका सुख सर्वोपरी है और जो उसे सभी से अलग करता है

Asha Joglekar said...

माँ बनना केवल औरत का हक है । केवल इसी वजह से वह ईश्वर के समकक्ष खडी हो जाती है क्यूं कि यह अपने जैसे किसी का सृजन केवल औरत ही कर सकती है पुरुष नही । इस आयोजन में पुरुषों को आमंत्रित नही किया जाता क्यूं कि गर्भवती महिला अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों से सकुचाई शरमाई सी रहती है । वह इसमें खुल कर आनंद ले सके इसीसे यह केवल स्त्रियों का फंक्शन होता है । हर बात में मीन मेख निकालना अच्छा नही होता । एक बात याद रहे कि सारा खेल ताकत का होता है जहाँ जो भी ताकतवर होता है चाहे पुरुष हो या स्त्री वह उसका गलत इस्तेमाल जरूर करता या करती है ।

आर. अनुराधा said...

"माँ बनना केवल औरत का हक है ।"
तो यह हक विवाह की शर्त से जुड़ा नहीं होना चाहिए। पर ऐसा होता है क्या?

"माँ बनना केवल औरत का हक है ।" अगर ऐसा है तो तो मां न बनना भी उसका हक होना चाहिए,है न! पर ऐसा है क्या?

स्वप्नदर्शी said...
This comment has been removed by the author.
स्वप्नदर्शी said...

Since we are talking about motherhood, I will suggest two resources for the mothers, two books, which helped me to go through the journey of motherhood.

1. "What to Expect, when you are expecting" : the most popular book, has week by week description, of physical changes, emotional changes, and medical information, useful excercises and interpretations of the various otherwise complicated pregnanacy tests.

2. Misconceptions by Naomi Wolf: which deals with the issues of medical practices, social norms, and the verious aspects of motherhood and choices one has. Also, she has a balanced view of the traditional versus modern clinical approach, myths associated with both.

I think , if some of us have time we should compile some other resource list. I will try to post some material I got from Lamaze Class.

October 6, 2008 12:08 AM

Anonymous said...

मेरा अमॉनिमस नाम से लिखने का कोई विशेष कारण नहीं है, दरअसल मेरा कोई ब्लाग नहीं है| और फिर वैसे भी अमॉनिमस तो तब होता जब मैं अपना नाम भी नहीं लिखती|

किसने कहा की इस पूरे समारोह में पुरुष वर्ग शामिल नहीं होता, जबकी सच ये होता है की इस समारोह की तयारियाँ पुरुष ही कराते हैं जैसे टेन्ट वाले को बोलना, पानी के टैंक मगानाँ, ५०-६० या उससे भी ज्यादा लोगों के खाने पीने की व्यवस्ता करना इत्यादी| तो वो भी तो इस कार्यक्रम का हिस्सा हुये ना| अब वो बात अलग है कि जहाँ नाच गाने का प्रोग्राम चल रह होता है वो उससे दूर ही होते है, क्यों की अगर नज़दीक आये भी तो शायद हम में से कोई उन पर चरित्रहीन होने का दाग ना लगा बैठे| जहाँ तक बिन ब्याहे माँ बनने की बात है तो उस बात को तो शायद ही कभी भारत मे स्वीकारा जाये जो की मेरी दृष्टी से भी गलत ही है| ठीक उसी तरह जिस तरह हम अपने लङको को वैश्यालय जाने से रोकते है या फिर वो सब बाते जो हमारे मूल्यों को दागदार कर देती है|

भावना - रेगुलर रीडर

Renu said...

I agree completely with bhavnaji. It is ok if men are condemned for their faults or misbehaviour, but I wud never condemn them just like that.My father, brother, husband and son, all are men and lovely human beings and they fully respect and love women and care about them. I have no reason to complain.
But yes wherever there is injustice, we must raise our voices and as Gandhiji said---hate the sin, not sinner.

Anonymous said...

हर व्यक्ति को खुश रहना चाहिये। मां बनते समय यह बात खास तौर से लागू होती है क्योंकि इस समय एक और जीवन की बात है जो आने वाला है। उस पर, इस बात का मनोविज्ञानिक असर पड़ता है। मैं इस उत्सव को इसी तरह से देखता हूं।

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