Friday, October 17, 2008

आत्म का विस्तार कर संतत्व को प्राप्त हुईं जो...


अब से कुछ दिन पहले तक हम नही जानते थे सिस्टर अल्फोंसा को ,जाना तो वेटिकन सिटी मे उन्हें मिली संत की पदवी मिलने की खबर से जाना ।केरल मे जन्मीं अल्फोंसा ने नन की तरह जीवन जिया और अंत समय तक पीड़ितों की सेवा की। यह खुशी की खबर थी कि वे संत की पदवी पा गयीं ,पर शायद इससे बेखबर अधिकांश भारतीय स्त्रियाँ अपने घर परिवारों को सहेजती सम्भालतीं बचपन से ही किसी अखबार को पढने,खबरें सुनने और जागरूक रहने की किसी ट्रेनिंग के बिना एक लीक पे जीती और खटती चली जाती हैं। मेरी माँ , उनकी माँ ,उनके नानी,उनकी सास ,उनकी दादी .....कईं पीढियाँ ...40 की होते होते अनेक बीमारियाँ अपने उपेक्षित शरीर और मन में पैदा कर लेती हैं और बच्चों की शादियाँ उनके बच्चे ...वगैरह वगैरह के बीच रोते-कलपते कभी संतुष्ट रहकर अंतिम परिणति को प्राप्त होती हैं।
मुझे पता नही क्यों लगता है कि हमारी ये माएँ ,नानियाँ ,दादियाँ ,परदादियाँ ,परनानियाँ ....यदि अपनी सेवा त्याग बलिदान समर्पण और सहनशीलता को चार दीवारी और चन्द स्वार्थों के भीतर बान्धने की बजाए अगर उनका जगत के लिए कुछ और विस्तार कर लेतीं तो संत ही होतीं ।अगर खाना विशिष्ट स्वादिष्ट है या कम पड़ रहा हो तो मैने अपने हिस्से का भोजन बांटते हुए ही माँओं को देखा है।अपने हिस्से का आराम भी पति के लिए छोड़ देते देखा है।अपने सामर्थ्य और शक्ति को पूरी तरह घर पर खर्च कर देते देखा है ।राजकिशोर जी ने अपने पिछले लेख मे लिखा था-"पुरुष स्त्री के मानव गुणों को अपना कर एक समेकित मनुष्य बनना चाहता है। उदाहरण के लिए, स्त्रीत्व के बहुत-से गुण ईसा मसीह, गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी में देखे जा सकते हैं। सच तो यह है कि ये पुरुष कम, स्त्री ज्यादा लगते हैं। गांधी जी का तो मानना ही था कि वे अपने बच्चों के पिता और माता दोनों ही हैं। उनकी पौत्री मनु गांधी ने अपनी एक किताब के शीर्षक में गांधी जी को अपनी मां बताया है। प्रेमचंद ने कहा है कि जब पुरुष में स्त्री के गुण आ जाते हैं, तब वह देवता बन जाता है।"
मै नही जानती कि इन बातों का निहितार्थ उतना ही सीधा है जितना दिखता है या उससे कहीं अधिक गहरा है । पर यह तो निश्चित है कि जो मुक्त है वही आत्म का विस्तार कर सकता है ...जो स्वयम मुक्त नही वह किसी और को भी मुक्त नही कर सकता ..न कष्टों से न कुरीतियों से ,न अन्धविश्वासों से ....
स्त्री की ज़रूरत घर से बाहर समाज को भी है ,इसलिए उसे मुक्त होना होगा संकीर्णताओं से । कामना करूंगी कि स्त्री खुद को मुक्त करने का प्रयास करे और जो मुक्त सोच वाले साथी-साथिन हैं वे दूसरों की मुक्ति के लिए सदा प्रयास करें ..
और संत अल्फोंसा को नमन !

10 comments:

मसिजीवी said...

धर्म नाम की इस सत्‍ता संरचना में कई गोरखधंधे हैं। यह संतत्‍व भी एक है। हमारी राय इस प्रकरण पर यह थी जो बरकरार है

संजय बेंगाणी said...

इन्हे उपाधि देना एक बड़े गोरखधंधे का हिस्सा मात्र है. धर्म की बेड़ियाँ सबसे ज्यादा महिलाओं के पैरों में बाँधी जाती रही है. और यह सब नौटंकी धर्मान्धता को बढ़ावा देने के लिए है. नारी मुक्ति का सपना देखने वाले अगर इसका स्वागत करे तो आश्चर्य होगा.

संजय बेंगाणी said...

कृपया अन्यथा न लें. मैने पाया है की धर्मान्धता के कारण सबसे ज्यादा महिलाओं ने भोगा है और आज भी भोग रही है, तो यह टिप्पणी कर दी. आपको किसी का भी सम्मान करने का पूरा अधिकार है.

वर्षा said...

फिर भी धर्म रहेगा, धार्मिक लोग रहेंगे और इस सत्ता को चलानेवाले अब तक पुजारी,मौलवी,फादर होते थे, उसमें अब महिला पुजारी, महिला मौलवी, महिला संत भी हो जाएं तो ये भी नई सोच की राह ही है, इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

Arvind Mishra said...

विचारोत्तेजक !

जितेन्द़ भगत said...

nice post

BrijmohanShrivastava said...

किसी दूसरे की मुक्ति का प्रयास दूसरा कैसे करेगा =यदि करेगा तो वह एक नाटक होगा ,ड्रामा होगा ,झूंठा प्रदर्शन होगा /यदि किसी ने प्रयास किया भी और हम उस अनुसार चल कर मुक्ति का प्रयास करें तो वहभी एक नक़ल होगी ,उधार होगी ,गलत भी हो सकती है और यदि आपका विचार लौकिक है तो किसने किसको बाँध रखा है जो मुक्त करेगा -हम स्वम भ्रम में है कि हमें किसी ने बाँध रखा है /पिंजडे में बंद तोते को रटाया गया ""पिंजडा छोड उड्जा"" वह पिंजडे के वाहर बैठ कर भी यही चिल्लाएगा और वापस पिंजडे में चला जायेगा

Asha Joglekar said...

मुक्त होना या न होना तो अपने सोच पर निर्भर है । कोई मुक्त होकर भी मुक्त नही है और कोई घर में रह कर भी मुक्त है ।

Unknown said...

@जो मुक्त है वही आत्म का विस्तार कर सकता है ...जो स्वयम मुक्त नही वह किसी और को भी मुक्त नही कर सकता ..न कष्टों से न कुरीतियों से ,न अन्धविश्वासों से .... स्त्री की ज़रूरत घर से बाहर समाज को भी है ,इसलिए उसे मुक्त होना होगा संकीर्णताओं से । कामना करूंगी कि स्त्री खुद को मुक्त करने का प्रयास करे और जो मुक्त सोच वाले साथी-साथिन हैं वे दूसरों की मुक्ति के लिए सदा प्रयास करें ..

बिल्कुल सही बात है. ईश्वर आपकी कामना पूरी करें.

मेरे विचार में संत वह होता है जिस के पास बैठ कर मन प्रसन्न हो, आत्मिक शान्ति मिले. वह कोई भी हो सकता है, किसी भी धर्म का, किसी भी जाति का, स्त्री, पुरूष, शिक्षित, अशिक्षित, कोई भी वेश-भूषा हो, कोई भी खान-पान हो, कहीं भी रहता हो, कुछ भी करता हो. हमारे आस-पास अनेक संत हैं पर हम उन्हें पहचान नहीं पाते. संत को खोजेंगे तो पास ही कहीं मिल जायेगा. पर उस से पहले हमें अपना सोच सकारात्मक करना होगा.

Renu said...

ek baat bataaye Sujaataji..
kya balidaan privaar ke liye kiya jaye to shoshan aur daasata aur samaaj ke liye kiya jaaye to sant aur mukt?
mujhe to yeh bhi dohri manasikta hi lagti ha. har pariwar me stree ha aur agar woh accha dhyaan rakhti ha to saraq sansaar hi accha ho sakta ha, waise to soch apni apni.

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