Saturday, October 18, 2008

जो मन्दिर नही जातीं वे ज़रूर पब जाती हैं-कैसे सोच लेते हैं ?

कहीं न कहीं जाना और माथा टिकाना बहुत ज़रूरी होता है ,आस्था इस या उस किसी न किसी चीज़ के प्रति होगी ही होगी ।कोई प्रेमी या ब्वायफ्रेंड तो होगा ही होगा । करवा चौथ नही तो लिव इन होगा ।सिन्दूर नही तो एक्स्ट्रा मैराइटल होगा । कभी किसी लड़की के पीछे आने वाली लड़के बार बार प्रेम के अस्वीकार किये जाने पर पूछते हैं -"क्यों प्रिये कोई और है क्या ?" उफ्फ!
हद ही है न!अगर मै मन्दिर नही जाती तो आप यह मान लेंगे कि मै ज़रूर पब जाती हूँ ? यानि कोई भी स्त्री अगर सास के साथ नही रहती तो ज़रूर् परिवार को लात मार रखी होगी ,और करवा चौथ नही करती तो आज की हॉट बेब कहलाने के लिए ! मेहन्दी नही लगाती तो ज़रूर कमर के बहुत नीचे या छाती पर सिजलिंग टैटू गुदवाती होगी । और अगर लिव इन रिलेशन मे रहती है तो निश्चित ही चरित्रहीना है और हर रात नया खिलाड़ी पसन्द करती है ,एक ही चेहरा बोरिंग लगता होगा न !
अगर आपकी ऐसी सोच है तो निहायत अफसोसनाक है और निन्दनीय भी ।माने यह सम्भावना ही नही छोड़ी जाती है कि स्त्री एक भी काम स्थापित मान्यताओं से हट कर करे अन्यथा आप उसे पब गामिनी और क्लीवेज व नाभि प्रदर्शिणी ,रोज़ नया सम्भोग साथी तलाशने वाली बेगैरत औरत मान लेंगे ? जो पुरुष मन्दिर नही जाता और अपनी पत्नी के घरवालों से जिसके प्रगाढ सम्बन्ध नही उसे भी क्या पब गामी ,वेश्या गामी की उपाधि दी जाती है?
लिव इन हो या विवाह - क्या स्त्री को इस तरह की वाहियात शर्तो पर परखना कभी बन्द नही होगा ? व्यक्तिगत पसन्द और व्यक्तिगत उसूल नाम की कोई चीज़ क्यों स्त्री के लिए मानी नही जाती ?मन्दिर न जाना या करवा चौथ न करना या सिन्दूर न लगाना या प्रेम को बिना सम्बन्ध का नाम दिये जीना ...छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात जो स्त्री अपनी मर्ज़ी और पसन्द से करें उसे ही कुलक्षण की संज्ञा मिल जाती है । वास्तव में यही वह दृष्टि है जो स्त्री और पुरुष के बीच खाइयों को बढाती है ,और वास्तविक स्त्री विमर्श को पुरुष की भर्त्सना की ओर ले जाती है । अगर उपरोक्त विचारों वाले बुद्धि के अनुसार कहना चाहूँ तो यह आग लगाने वाली भाषा और सोच है ।
बुद्द्धिवान जनों को इससे बचना चाहिये !

18 comments:

Asha Joglekar said...

जो अपने मर्जी से जीना जानती है और जी रही है उसे क्यूं कर समाज के ठेकेदारों की परवा करनी चाहिये ? जिसकी जो मर्जी सोचे । आप अपनी मर्जी से जियें या समाज की कुछ तो लोग कहेंगे ही ।

जितेन्द़ भगत said...

सौ प्रति‍शत सही। शुक्र है मैं ऐसे वि‍चार नहीं रखता।

Dr. Amar Jyoti said...

नशा तो दोनों जगह होता है।पब में भी और मंदिर में भी। अंतर सिर्फ़ इतना है कि पब का नशा सुबह तक उतर जाता है मगर मंदिर का………।

Unknown said...

ऐसी सोच बाकई निहायत अफसोसनाक है और निन्दनीय भी. पर समाज में सब तरह के लोग होते हैं, सब तरह की बातें होती हैं. अगर हर बात पर उत्तेजित होते रहे तो जिंदगी बहुत मुश्किल हो जायेगी. कुछ बातों को नकार देना चाहिए. किस-किस की सोच पर पाबंदी लगायेंगे? हमें अपना सोच सकारात्मक रखना चाहिए.

Anonymous said...

सुजाता जी
आने वाली पीढी के पुरुषों को कैसे " कन्डीशन " किया जा रहा हैं . समय निकाल कर इस पर एक आलेख दे . और इस लिंक
http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2008/10/blog-post_9296.html
को जरुर देखे . आप को ख़ुद पता लगेगा की नयी पीढी के लड़को को क्या बेक ग्राउंड दी जा रही हैं .

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

jo yah dushit soach rakhte hai kabhi unke ghar main jhank ke dekhe har voh kaam ho raha hoga jiska jorshor se virodh karte hai

Ashok Kumar pandey said...

great ! sou feesadi sahmat
lekin pub mandir se to behtar hota hi hai
sharaab ne kabhi dange nahi karaye.

अजित वडनेरकर said...

सही सही....

ambrish kumar said...

blog per samprdaik aur mahila virodi kuch jyada hi ubhar rahe hai.

महेश लिलोरिया said...

अव्वल तो यह कि कहानी के किसी एक पात्र की मानसिकता को लेखक की मानसिकता मान लेना क्या उचित है? फिर भी, सुजाताजी, ‘लिव इन’ के काफी मुद्दों पर आपकी नाराजगी जायज है। आखिर हम अपने समाज, संस्कृति के बारे में ऐसी दूषित मानसिकता वाली बातें कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? लेकिन ‘लिव इन v/s करवा चौथ!’ तो मात्र इशारा है, कानून बनने के बाद जब ‘लाइव इन’ होगा तब भी क्या आप इतना ही मुखर होंगी? या अभी की तरह पक्ष लेंगी। इंतजार रहेगा...

यह विडंबना ही है कि पश्चिम के आकाश से जबरदस्ती कुछ विचार के बादल, अपने नजरिए की बारिश हमारे ऊपर करते जाते हैं तो हम बजाय विरोध का छाता तानने के, उनके लिए लाल कालीन बिछाने लगते हैं। बेशक ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की उपयोगिता न्यूयार्क, लंदन में होगी जहां बच्चों और परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे के रिश्तों का महत्व बताने की जरूरत पड़े। अमेरिका में चौदह साल की उम्र तक पहुंचने वाली आधी से ज्यादा किशोरियां गर्भवती हो चुकी होती हैं, सोलह साल के बाद बेटा बाप के साथ नहीं, अलग रहता है। क्या ‘लिव इन’ के बहाने हम ऐसी दुनिया को खुद न्योतने की तैयारी नहीं कर रहे हैं? ऐसे दुर्दिन ईश्वर ना बताए, अगर ऐसा दिन आ गया है तो मानना चाहिए कि हमारे समाज के अंत की शुरूआत दस्तक दे रही है।

सवाल यह है कि ‘लिव इन’ क्या वाकई महिलाओं की स्थिति को मजबूत बनाएगा? एक तरफ जहां हम वसुदेव कुटुंबकम के झंडाबरदार बनने का दावा करते हैं, दूसरी ओर परिवार को तोड़ने की पैरवी कर रहे हैं? क्योंकि संशोधन यदि हुआ तो उसमें मुख्य रूप से पत्नी (जिसके बिना परिवार की कल्पना ही नहीं की जा सकती) शब्द की परिभाषा ही बदल जाएगी।

अब इसे सिलसिलेवार देखें- पहला पहलू : दरअसल भारतीय महानगरों और बीपीओ इंडस्ट्री से जुड़ी नौकरियों में पिछले कुछ सालों में साथ रहने का ‘ऐसा’ चलन बहुत तेजी से बढ़ा है। कुछ युवा इसे नए फैशन की तरह अपना रहे हैं, तो कुछ लोगों के लिए यह आधुनिक जीवन की मजबूरी है। मसलन आर्थिक तौर पर सक्षम नहीं हो पाना या शादी में बंधने के बारे में निर्णय न ले पाना। ऐसी मजबूरियां करियर के लिए संघर्ष कर रही लड़कियों के साथ भी हैं। वे अपने घर-परिवार से दूर किसी मेट्रो में आ कर रहती हैं और अनियमित घंटों वाली नौकरियां भी करती हैं। उनके लिए महानगरीय अकेलापन, सुरक्षा और खर्च जैसे मुद्दों के लिहाज से साथ रह लेने का इंतजाम एक सुविधाजनक रास्ता है। लेकिन इस लिव-इन जुगाड़ में भी ज्यादा घाटा स्त्रियों को ही उठाना पड़ रहा है। साथ रहने वाला पुरुष अचानक उन्हें छोड़ कर चल देता है और वे नतीजे भुगतने के लिए छोड़ दी जाती हैं।

दूसरे पहलू पर गौर फरमाएं : लंबे समय से इस बात पर भी बहस चल रही है कि विवाहेत्तर संबंधों को अपराध माना जाए कि नहीं। क्योंकि राष्ट्रीय महिला आयोग मांग कर चुका है कि विवाहेत्तर संबंधों को अपराध न मानते हुए एक समाजिक समस्या के रूप में देखा जाए। सर्वोच्च न्यायालय की वकील के मुताबिक यह मामला इसलिए भी सामाजिक है क्योंकि विवाहेत्तर संबंध की समस्या को दंड देकर नहीं रोका जा सकता। समाधान मुआवज़ा या तलाक़ देकर किया जा सकता है।

अब तीसरा पहलू भी देखें : भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई है कि हिंदू विवाह अधिनियम जितने घर बसा नही रहा उससे ज़्यादा घरों को तोड़ रहा है। तलाक़ के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के एक पीठ ने यह टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाक़ के बढ़ते मामलों का बुरा असर परिवार के बच्चों पर पड़ता है. वर्ष 1955 में बने इस क़ानून में कई बार संशोधन किया जा चुका है. पहले भारतीय विवाह पद्धति में तलाक़ का कोई प्रावधान या प्रचलन नहीं था और संसद ने क़ानून पारित करते हुए जब इसमें तलाक़ का प्रावधान किया तो इसे ब्रिटिश क़ानून से लिया गया था. अब तो शादी के समय ही तलाक़ की अग्रिम याचिका तैयार कर ली जाती है। अदालत का कहना था कि पारिवारिक जीवन में पहले भी समस्याएं आती थीं लेकिन उन्हें घर के भीतर ही सुलझा लिया जाता था।

ऊपर के तीनों उदाहरणों में एक बात बेहद साफ है कि अंत में भुगतना तो स्त्री को ही पड़ता है। क्या आप ऐसे मुद्दों की पैरवी करेंगे? बताइए आग लगाने वाली सोच किसकी?

एक जमाने में गांव की लड़की पूरे गांव के लिए बहन या बेटी होती थी। आज बच्चा दहलीज से लगे मकान में रहने वाली पड़ोसी की लड़की को वेलेंटाइन ग्रीटिंग मय दिल के भेंट करने के लिए मौका तलाश रहा है। प्यार, मोहब्बत, इश्क इन लफ्जों के मायने आज की दुनिया में हमारे युवा वर्ग के लिए क्या हैं? इस उपभोक्तावादी दौर में जहां टीवी चैनल की तरह खटाखट दिल बदले जाने लगे हैं, प्रेम का अर्थ महज सैक्स आकर्षण तक सिमट गया है। आज जब टीवी और नेट के मार्फत पूरा विश्व हमारे ड्राइंग रूम में कब्जा जमा चुका है, इस महाभारत में वही बचेगा जिसकी जड़ें मजबूत हैं, जो अपने इतिहास और संस्कृति को ढाल नहीं तलवार बनाएगा। बाकी सब अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में लड़ते-लड़ते मारे जाएंगे।

हम यह कैसे भूल जाते हैं कि सांस्कृतिक विविधता ही हमारी जड़ें हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर चंद किलोमीटर पर बदली जाने वाली भाषा, भोजन के बावजूद हजारों सालों से हम एक रहे हैं। बर्बर हूण, शक, मंगोल और मुगलों के आक्रमणों को तो हम झेल गए और उन्हें अपनी मिट्टी में ऐसा समाहित किया कि वे आज कहीं नजर नहीं आते। लेकिन आज होने वाला आक्रमण इतना सुनियोजित है कि हम उसका मुकाबला करने के बजाय उसके सहयोगी बनते जा रहे हैं।

इसलिए जिन घरों में दौलत की इफरात है या बाप-बेटे साथ बैठकर चीयर्स करते हैं, वहां तो ‘लिव इन’ का शो चल जाएगा लेकिन मध्यमवर्गीय या गरीब घरों में जहां रोटी और बेरोजगारी की जंग संस्कृति और परंपराओं की छतरी तले लड़ी जा रही है, ये विदेशी रस्म तनाव पैदा कर बैठेगी।

सुजाता said...

आपका यह सोचना फिर से उसी मानसिकता के तहत है कि यह नही तो वही बात होगी । कि मैने करवा चौथ पर नाराज़गी दिखाई तो ज़रूर मै लिव इन की हिमायती हूँ । मेरी घोर आपत्ति केवल इस बात पर है कि आप पहले से ही परम्परा संकृति और न जाने क्या क्या को लेकर तरह तरह के डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं और सहमत हूँ रचना जी से कि -शायद हमारा समाज ये नहीं चाहता की नयी पीढी जिम्मेदार बने ।सारा सवाल नियंत्रण का है । समाज को इंडीविजुअल पर पूरा नियंत्रण चाहिये , माता पिता को औलादों पर पति को पत्नी पर ....कोई किसी की समझदारी पर यकीन नही करता और अपने सिखाए पर ।
यद्यपि जिस विषय पर आपने लिखा उस पर बहस करने का मेरा इरादा कतई नही केवल उस सोच को लक्ष्य बनाया था कि मै करवा चौथ और सुहाग की बात नही मानती तो आप उसका कैसे अर्थ यह करे लेते है कि लिव इन मे विश्वास है?
आपके लेख से प्रतीत होता है कि यह मान लिया गया है कि स्त्री जाति है ही मूर्ख ।हद है कि हमारे देश में एक वयस्क व्यक्ति 18 साल की उम्र में देश की ,सरकार बनाने की ज़िम्मेदारी तो ले सकता है पर अपने जीवन की ज़िम्मेदारी नही उठा सकता। तो फिर ऐसे मे हमें अपने बच्चों को ज़िम्मेदार बनाने के बारे मे विचार करना चाहिये न कि किसी अज्ञात भविष्य का डर बिठाना चाहिये और प्राक्कल्पनाएँ गढनी चाहियें।एक समय था जब इस समाज मे बड़ों के सामने पति-पत्नी का आपस मे बात करना भी अपसंस्कृति मानी जाती थी। शादी की परिभाषा अगर हम लोगों ने बेड़ियाँ बना रखी हो तो निश्चित ही उनके कभी न कभी टूटने के लिए भी तैयार होना पड़ेगा ।
खैर,
मेरा मात्र विरोध है तो आपकी इस सोच से कि एक खास ढांचे मे न ढली स्त्री भ्रष्ट है।

Anonymous said...

विचारों की जुगाली करना बुरी बात नहीं लेकिन सुजाता जी ने जिन तर्कों के साथ अपनी बात रखने का प्रयास किया है, निश्चित ही उसे बौद्धिक मंच पर उचित नहीं कहा जा सकता। सुहाग, करवाचौथ का महत्व पश्चिम की जूठन चाटने वाले वो लोग क्या समझेंगे जो हर रात के बाद अपने घर का रास्ता भूल जाते हैं। यदि उन्हें विचारों की जुगाली करने का इतना ही शौक है, तो चम्बल के बीहड़ों में बसे गांव या फिर बस्तर के घने जंगलों के रहने वाले परिवारों के बीच कुछ समय बिताएं और फिर समझाने का प्रयास करें। हम तो भगवान से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि ऐसे लोगों को सदबुद्धि प्रदान करे, जो लिव-इन रिलेशनशिप और करवा चौथ को एक ही तराजू पर तौलना चाहते हैं। और हां, सुजाता जी आप भावनाओं को समझें। दिल पर लेने या व्यक्तिगत बात करने से किसी की बात को दबाया नहीं जा सकता।

ज्ञान said...

सुजाता जी,
मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ, टिप्पणी करने से।

जब कोई अपनी पत्नी (या कथित अन्दर-रहने वाली) से कहे कि
-मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ,
-इसके बावज़ूद अगर तुमने बेवफ़ाई की तो,
-मैं तुम्हें जान से मार दूँगा!

तो वो क्या करेगी?
A. खुश होगी कि वह उसे बहुत चाहता है।
B. चिंतित होगी कि इसे कोई गलतफहमी तो नहीं?
C. पुलिस में जाकर FIR करवा देगी, अपनी सुरक्षा के लिये!

उत्तर देने में सुविधा हो इसलिये यदि कोई लिखता है कि
^^करवा चौथ के आते ही हर विवाहिता के मन में एक अजीब सी हलचल होने लगती है।
**तो क्या इसका मतलब होता है कि लिखने वाले की मान्यता है, अविवाहिता के मन में ज़रूर हलचल नहीं होती?
^^नवविवाहिताओं को तो जैसे बस इंतजार रहता है शरमाकर बादलों के घूंघट में छिपे चंद्रमा का सुंदर मुखड़ा देखने का।
**तो क्या इसका मतलब होता है कि लिखने वाले की मान्यता है, जो नहीं शरमातीं वे ज़रूर भरी दोपहरी में सूरज का चेहरा देखतीं हैं
^^पूजा करने के बाद हर सुहागन जी भर के खाती है।
**तो क्या इसका मतलब होता है कि लिखने वाले की मान्यता है, हर सुहागन बाकी दिन ज़रूर जी भर के नहीं खातीं?
^^वो मंदिर नहीं पब में जाती है
**तो क्या इसका मतलब होता है कि लिखने वाले की मान्यता है, जो मन्दिर नही जातीं वे ज़रूर पब जाती हैं?

आप ही के शब्द हैं ना?
अगर आपकी ऐसी (**)सोच है तो निहायत अफसोसनाक है और निन्दनीय भी ।
अगर उपरोक्त (**)विचारों वाले बुद्धि के अनुसार कहना चाहूँ तो यह आग लगाने वाली भाषा और सोच है ।
बुद्द्धिवान जनों को इससे बचना चाहिये !!

अभी तक तो आपको बुद्द्धिवान मान रहा हूँ, लेकिन खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आपकी भाषा भी अन्य नारी समान ही है।

डॉ .अनुराग said...

जहाँ तक मै समझ पाया हूँ की लिव- इन को मान्यता शायद उन स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए दी गई है जिनको एक अरसे बाद ये महसूस हो की उनका इस्तेमाल किया गया है ओर उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए वे किसी कानून का सहारा नही ले सकेगी ..क्यूंकि वे ब्याहता नही है या अगर किसी स्त्री को कोई संतान होती है तो उसे भरण पोषण का दावा मिल जाये ... समाज में इस तरह की क्रान्ति लाने का शायद कोई इरादा या साहस सरकार नही कर सकती है.
हाँ इस देश में इसका दुरूपयोग करने वाले लोग भी मिल जायेगे ....वैसे आदरणीय द्रिवेदी जी ने इस कानून पर अपनी स्पष्ट व्याख्या अपने ब्लॉग पर कुछ दिन पहले दी है .
जहाँ तक मन्दिर का सवाल है ...मै ख़ुद मन्दिर नही जाता ...पर इससे कोई फर्क नही पड़ता ...आप वास्तविक जीवन में कैसे है ,अपने परिवार ,अपने कर्तव्यों के प्रति कितने सजग है ,अपने बूढे मां- बाप की भी देखभाल करते है या नही ,किसी जानवर के प्रति आप कोमल है या नही ,दोस्तों की जरुरत के वक़्त आप खड़े होते है नही .किसी का दुःख देखकर आप विचलित होते है या नही.....ये सब किसी व्यक्ति के चरित्र का पैमाना है....मन्दिर जाना या पब में जाना नही..अगर पब में जाने वाला इंसान ये सब करता है....तो मुझे उसका चरित्र कही ऊँचा लगता है.
मेरे दोस्त को दो महीने का बेटा अभी दिल्ली एस्कोर्ट की icu में है ..उसकी हार्ट की सर्जरी अभी १४ तारीख में हुई है....दोनों मियां बीवी हस्पताल में २४ घंटे साथ है ...अपनी ५ साल की बड़ी बेटी को माँ बाप के पास छोडे हुए ..ख़ुद दोनों डॉ है ...पर एक साथ है...क्या करवा चोथ ओर क्या दिवाली ?ये रिश्ता लिव -इन में नही मिलेगा .......

BrijmohanShrivastava said...

इसके अलावा भी बहुत सी बातें है जो अक्सर दोनों के बीच खाई बढाने का काम करती हैं / खाइयों को बडाना ==मतलब साफ़ है चीज़ वही घटाई बडाई जा सकती है जिसका अस्तित्व हो /खैर
दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं /दीवाली आपको मंगलमय हो /सुख समृद्धि की बृद्धि हो /आपके साहित्य सृजन को देश -विदेश के साहित्यकारों द्वारा सराहा जावे /आप साहित्य सृजन की तपश्चर्या कर सरस्वत्याराधन करते रहें /आपकी रचनाएं जन मानस के अन्तकरण को झंकृत करती रहे और उनके अंतर्मन में स्थान बनाती रहें /आपकी काव्य संरचना बहुजन हिताय ,बहुजन सुखाय हो ,लोक कल्याण व राष्ट्रहित में हो यही प्रार्थना में ईश्वर से करता हूँ ""पढने लायक कुछ लिख जाओ या लिखने लायक कुछ कर जाओ ""

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आदरणीया सुजाता जी,

मेरे खयाल से आपकी प्रतिक्रियात्मक पोस्ट कदाचित्‌ मूल पोस्ट को जल्‍दबाजी में पढ़ने के कारण इतनी तल्ख हो गयी है। आप द्वारा दी गयी लिंक से ही मैं पहली बार इस ब्लॉग पर गया। उस पोस्ट को पढ़ने के बाद मुझे ऐसा नहीं लगा कि लेखक की मान्यता वैसी है जैसा आपने समझ लिया।

करवा चौथ को पूरे मनोयोग से व्रत करने वाली ‘परम्परा-प्रिय सुहागिनों’ और लिव-इन सम्बन्धों में सहज रहने वाली ‘अविवाहित आधुनिकाओं’ के बीच जो कण्ट्रास्ट है, सिर्फ़ उसी को यहाँ रेखांकित किया गया है। इन दो paradigms के इतर भी एक बहुत बड़ी दुनिया है जिसको नकारा नहीं गया है। जबकि आप का गुस्सा इसी शंका से फूट पड़ा है।

यहाँ लेखक ने दो ‘ध्रुवों’ के बीच तुलना दिखाने की कोशिश की है जिसके बीच में एक बहुत बड़ा मध्यमार्ग भी पड़ता है। इससे लेखक ने कहीं इन्कार नहीं किया है, लेकिन आपने यह समझ लिया कि लेखक ने पूरे नारी समाज को इन्‍ही दो श्रेणियों में बाँट दिया है।

खेद के साथ कहना चाहूंगा कि इसी शंकालु सोच के कारण आज का तथाकथित नारीवाद हँसी का पात्र बन रहा है; जो वस्तुतः ‘पुरुषविरोधवाद’ से बाहर नहीं निकल पा रहा है।

वर्षा said...

मैं भी यही कहूंगी दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होती। जो सिर्फ ब्लैक एंड वाइट में दुनिया को देखते हैं उनकी नज़रों का धोखा है, खाने दो।

सुजाता said...

पब जाने वाली स्त्री भ्रष्ट है करवा चौथ करने वाली स्त्री के मुकाबले यह फूहड़ बात है । यह तुलना और दो कंट्रास्ट दिखाना ही फूहड़ और उथली सोच है सिद्धार्थ जी !
और बाकी एक कहावत है -
"when do men insist that women are illogical ?
ans- When a woman doesn't agree with them !"

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स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...