Monday, October 20, 2008

हम तो अतार्किक हैं, जब ईश्वर समझदारी बांट रहा था हम करवा चौथ कथा सुन रहे थे ..

सवाल - पुरुषों को कब लगता है कि स्त्रियाँ अतार्किक हैं ?




जवाब - जब कोई स्त्री उनसे सहमत नही होती !

इसलिए जब पब जाने वाली स्त्री को हीनता सूचक अर्थ मे करवा चौथ करने वाली स्त्री की महानता के बरक्स खड़ा किया गया और हमने इस सोच का विरोध किया तो हम भी अतार्किक हो गये और "उस सोच "की सतर्क व्याख्या करने हमारे मित्रों की भीड़ आ जुटी ।
साथ ही बहुत बारीकी से एक लड़ाई पब जाने वाली और करवा चौथ करने वाली स्त्री के बीच भी पैदा कर दी गयी । अब दोनो किस्म की औरतें आपस में लड़ें कि कौन ज़्यादा चरित्रवान है और कौन भ्रष्ट ,और आप तमाशा देखें ,उन लड़ाका औरतों की मूढ मति पर मन्द मन्द मुस्काएँ और दोस्तों की महफिल में एक जुमला छोड़ दें- हमने तो कहा था ये बेवकूफ होती हैं ,व्यर्थ बातों पर झगड़ती हैं,ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे!
पहली बात ,कुल मिलाकर नतीजा यह निकला कि पब जाने वाली स्त्री भ्रष्ट है ,करवा चौथ न करने वाली भी ।और मुझे इसी बात से आपत्ति है ।इस तरह के पैरामीटर्स तय करने वाले कोई भी कैसे खड़े हो जाते हैं ?
दूसरी बात ,
लिव इन रिलेशन से यदि व्यभिचार बढेगा तो क्या यह मान लें कि वैवाहिक सम्बन्धों मे अब तक तो कोई व्यभिचार है ही नहीं ?
तीसरी बात ,
यह फिर से लक्षणों और अज्ञात भयों पर बात करेने जैसा हुआ जिसका कोई सार्थक परिणाम नही आता कभी ।यदि विवाह की बजाए लिव इन रिलेशन् प्रचलित हो रहा है तो हमें यह नहीं जानने का प्रयास करना चाहिये कि आखिर विवाह में ऐसी क्या गड़बड़ी है कि हमारी संतानें उस ओर झुक रही हैं? यह पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव न होकर कहीं भारतीय संस्कृति की कोई भयानक त्रुटि तो नहीं है ?
जो अतार्किक हैं वे कभी इस पर बात नहीं करना चाहेंगे कि विवाह लड़के -लड़की के लिए अक्सर कितना भयानक हो जाता है , वे केवल इतना भर सोचेंगे कि जिसे अभी तक वेश्यालयों तक सीमित रखा गया और छिपाया गया वह उजागर होने लगेगा ...व्यभिचार के संस्कार भी फिर तो हमारे दिये हुए ही है न । बस अब तक इतना समझाया गया था कि-बेटा करो पर बात खुलने न पाए ..
चौथी बात ,
यदि ऐसा माना जा रहा है कि स्त्री का शोषण इससे बढेगा तो चोखेर बाली व अन्य नारियों की अब तक की पोस्टें दिखा चुकीं कि स्त्री का शोषण लिव इन रिश्तों की शुरुआत से बहुत पहले से ही किया जा रहा है । और यूँ भी जो स्त्री ऐसा निर्णय अपने लिए लेगी उसे मैं इतना तो समझदार मानूंगी कि वह उसके सम्भावित बुरे परिणामों को जानती होगी ।
पांचवी बात ,
संतान की समस्या निश्चित ही गम्भीर है और मै मानती हूँ कि माता पिता के अपने जीवन के जो भी फैसलें हों , उनका संतान के जीवन पर क्यों प्रभाव आना चाहिये । सो यदि संतान का फैसला कोई ऐसा दम्पत्ति लेता है तो उसे इस बारे मे आश्वस्त होना होगा कि {अगर हमारा समाज उन्हें अपने फैसले लेने काबिल मानता है तो ,अन्यथा तो बात इस ढंग से होती है कि संतानें तो हो जातीं है ,की नही जातीं }उसे संतान को माता पिता दोनों सम्बन्धों की प्यार और रखरखाव दे सके ।

और बाकी, यदि विवाह संस्था की गड़बड़ियाँ अब भी न थमीं तो इसके लिए भी तैयार रहिये कि आने वाले समय मे स्त्री पुरुष रिश्तों का स्वरूप यही होने वाला है ।
शादी दो वयस्क व्यक्तियों के बीच का सम्बन्ध है ,उनका नितांत निजी सम्बन्ध जिसे समाज ही स्वीकृति देता है उन्हें वयस्क और समझदार मान कर ...लेकिन हम लोग इतनी बुरी आदतों के शिकार हैं कि हमेशा इनके बीच अपनी भोंडी नाक घुसाना चाहते हैं -शादी किससे हो ,कितना दहेज आये ,लड़के के सम्बन्धियों को क्या क्या मिले,किसके लिए बहू कितना काम करे ,बेटा बहू बच्चा कब पैदा करें और कितने बच्चे और किस लिंग के पैदा करें ,वे कहाँ जाएँ ,कहाँ न जाएँ , किस त्योहार पर किसके लिए क्या करे ,कौन सी नौकरी करे कौन सी न करे....कमाएगी तो अपने लिए हम क्यों सपोर्ट करें..अंतहीन है अपेक्षाएँ ...और शिकायतें अलग ....उस दिन चाय नही बनाई , फलाँ दिन व्रत नही रखा , मुझसे पूछे बिना अपने मायके गयी , कल देर से क्यों आयी ,आज देर से क्यों उठी ,संडे है तो क्या ,हमें तो 6 बजे चाय चाहिये होती है ........इसका बाप ऐसा , भाई वैसा , बहनें ही खराब हैं ,माँ सिखाती है सब .....लड़का लगाम कस के नही रखता न..दो झापड़ लगाए तो अभी ठीक रास्ते आए ..

स्त्री पुरुष का आपसी प्यार ?? वह क्या चीज़ है ?? उसकी किसे ज़रूरत है भाई साहब ? शादी चलाने के लिए प्यार व्यार की ज़रूरत नही होती !! है न !बच्चों के फैसलें ? अजी वो इतने समझदार कब से हुए कि अपने फैसले खुद लेने लगें , हम क्या मर गये हैं ?हमारी जीते जी तो ऐसा होगा नही , हमारी लाश पर से गुज़र कर लाइयो उस लड़की को घर !

सिर्फ दबाव , प्रेशर , कंट्रोल , नियंत्रण ,शासन ......क्या इंसान पढ लिख कर भी इतना वाहियात और गैर ज़िम्मेदार रहता है कि उस पर निरंतर दमघोंटू दबाव बनाए रखा जाना चाहिये ?

ऐसे लोगों से कहें कि बाज आइये ,अब भी वक़्त है स्त्री के चरित्र की आड़ मे और पाश्चात्य संस्कृति के कुप्रभावों का नाम लेकर अपनी खामियों को न छिपाएँ । हो सके तो उन्हें दुरुस्त करें, न हो सके तो उनके नष्ट हो जाने का इंतज़ार करें ,छाती पीटें और तमाशा देखें ।

इसके बाद भी कहूंगी कि विवाह एक सुन्दर सम्बन्ध है ...संतान होना बहुत सुखद होता है पर ये दोनों फैसलें कर्तव्य नही चयन होना चाहिये । हर एक व्यक्ति शिक्षित होने के साथ साथ ज़िम्मेदार नागरिक होना चाहिये । और अगर हम अपनी 25-30 साल की संतान को भी बच्चा मानने पर उतारू हैं और उसे अपने जीवन के फैसलें नही करने देते तो यह मुहिम भी चलानी चाहिये कि देश में वोटिंग का अधिकार् केवल बुज़ुर्गों के पास हो क्योंकि हमारे देश के युवा निहायत बेवकूफ,व्यभिचारी ,बदमाश और बेईमान हैं !

16 comments:

Anonymous said...

rajesh ,aap ne kafi khul kar likha hai live in relationship per.Thanks

कुमार आशीष said...

प्रत्‍येक मनुष्‍य को अपनी पूर्णता में जीने का अधिकार है, किन्‍तु उस अधिकार से वंचित रह जाने का कारण भी बीजरूप में उसके संस्‍कारों में ही पड़ा होता है- अब वह स्‍त्री हो अथवा पुरुष। हां, पुरुष होने के नाते पुरुष की मनमानी उजागर करने में ही मेरी विनम्रता है और प्रामाणिकता भी।

Unknown said...

सुजाता आप कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाती हैं. आप एक अच्छा ब्लाग चला रही हैं. अपेक्षित परिणाम भी आ रहे होंगे. यह सब धीरे-धीरे हो तो ठीक है. हमारा समाज बहुत बड़ा है, तरह तरह के लोग रहते हैं यहाँ. तरह तरह के सोच हैं उन के. आप को लगता है कि इस समाज में बहुत सुधार की जरूरत है इस के लिए आप यह काम कर रही हैं. लेकिन समाज इतनी जल्दी आप की बात नहीं मान लेगा, सुधर नहीं जायेगा. अतीत में कितने समाज सुधारक आए, सुधार भी हुए, पर कमियाँ भी आती गईं. यह सब चलता रहा है और चलता रहेगा. आप अपना काम करती रहिये, पर ज्यादा परेशान मत होइए. मुझे अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं -
मैं चला जब कर्म पथ पर द्रढ़ निश्चय पर अकेला,
आ जुड़े हर जीत के संग मित्र इतने जैसे मेला.
आप अपने कर्म पथ पर चलती रहिये, लोग साथ आते रहेंगे. मंजिलें बहुत हैं, एक-एक कर के मंजिलें भी आती रहेंगी.

"एक व्यक्ति यह नहीं करता है इस लिए जरूर यह करता होगा, या एक व्यक्ति यह करता है इस लिए जरूर यह नहीं करता होगा", यह भी एक सोच है. हो सकता है कहीं पर यह सच भी हो, पर करवा चौथ का व्रत रखना और पब जाना, इस सोच का हिस्सा नहीं है. एक स्त्री करवा चौथ का व्रत भी रख सकती है और पब भी जा सकती है. यह उस का अपना सोच है, अपना निर्णय है. इसी प्रकार, एक स्त्री करवा चौथ का व्रत नहीं रखती और पब जाती है, दूसरी स्त्री करवा चौथ का व्रत भी नहीं रखती और पब भी नहीं जाती, इन का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. इस मुद्दे को विचार का विषय बनाने की जरूरत नहीं है. इसे नकार देना चाहिए.

विवाह संस्था में यदि गड़बड़ियाँ हैं तो उन्हें दूर किया जाना चाहिए, इन के कारण विवाह की संस्था को ही नकार दिया जाय यह मुझे सही नहीं लगता. लिव-इन विवाह संस्था की जगह नहीं ले सकता. वह सोच ही दूसरा है. मैं लिव-इन का कभी समर्थन नहीं कर सकता, पर जो करते हैं उन्हें ग़लत कहने का मुझे कोई अधिकार नहीं है. आप को लगता है जिन बातों पर आप विश्वास करती हैं कुछ लोग उन का विरोध करके अपनी खामियों को छिपा रहे हैं. हो सकता है कुछ लोगों के साथ यह सही हो पर सब के साथ नहीं. कुछ लोगों के सोच के लिए सब को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है. हम अपनी सोच को सही मानते हैं, इस में कोई बुराई नही है, पर इस का अर्थ यह नहीं है कि हम यह कहें कि दूसरों का सोच ग़लत है. अगर हमें लगता है कि दूसरों का सोच बदलना चाहिए तो वह आपसी प्रेम और आदर से तो हो सकता है, जबरदस्ती और अनादर से नहीं हो हो सकता.

Anonymous said...

सुजाता जी, फिर वही प्रश्न-उत्तर (ज्ञान जी की प्रश्नावली एक बार फिर देखें) और स्त्री-पुरुष को आपने आमने-सामने रख दिया। एक तरफ आपने यह नतीजा निकाल लिया कि पब जाने वाली स्त्री भ्रष्ट है, करवा चौथ न करने वाली भी। दूसरी तरफ आप ही कह रही हैं- इस तरह के पैरामीटर्स तय करने वाले कोई भी कैसे खड़े हो जाते हैं?
आपकी दूसरी बात में एक बार फिर वही राग अलापा गया है कि लिव इन रिलेशन से यदि व्यभिचार बढेगा तो क्या यह मान लें कि वैवाहिक सम्बन्धों मे अब तक तो कोई व्यभिचार है ही नहीं? अरे, इस बारे में मैं पहले भी कह चुका हूं कि यह सही है कि अभी समाज में थोड़ा जहर है तो क्या आप जहर उतारने की बात करेंगे या फिर पूरी तरह जहर में डूब जाने की???

तीसरी बात आपकी बिलकुल सही है। मैं पूरी तरह सहमत हूं कि यदि विवाह की बजाए लिव इन रिलेशन प्रचलित हो रहा है तो वाकई हमें यह जानने का प्रयास करना चाहिये कि आखिर विवाह में ऐसी क्या गड़बड़ी है कि हमारी संतानें उस ओर झुक रही हैं? यह पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव न होकर कहीं भारतीय संस्कृति की कोई भयानक त्रुटि तो नहीं है? मैं इसी जहर रूपी त्रुटि को उतारने की तो बात कहता रहा हूं।

चौथी बात जो आप कर रही हैं कि- ...और यूँ भी जो स्त्री ऐसा निर्णय अपने लिए लेगी उसे मैं इतना तो समझदार मानूंगी कि वह उसके सम्भावित बुरे परिणामों को जानती होगी। सुजाता जी बुरे परिणामों को जानने के बावजूद कोई दलदल में कूदे, ऐसी मानसिकता स्थिति से उबारने के प्रयास क्या सभी को नहीं करना चाहिए?

आपकी पांचवी बात में आपका मानना भी काबिले गौर है। और यह भी कि यदि विवाह संस्था की गड़बड़ियाँ अब भी न थमीं तो इसके लिए भी तैयार रहिये कि आने वाले समय मे स्त्री पुरुष रिश्तों का स्वरूप यही होने वाला है ।
आपने कहा है- .....सिर्फ दबाव , प्रेशर , कंट्रोल , नियंत्रण ,शासन ...... क्या इंसान पढ लिख कर भी इतना वाहियात और गैर ज़िम्मेदार रहता है कि उस पर निरंतर दमघोंटू दबाव बनाए रखा जाना चाहिये?
मेरा मानना है कि नहीं। लेकिन उसे उछृंखल बनने की छूट भी नहीं दी जाना चाहिए। यहां भी आप ही का नजरिया सही है कि त्रुटि को सुधारना होगा।

मेरा निवेदन है कि पूरे मुद्दे को तर्क-वितर्क-कुतर्क या फिर स्त्री-पुरुष से न जोड़ते हुए समाधानात्मक नजरिये से देखा जाए।

एक और बात- यहां मेरे मानने या ना मानने से भी कुछ नहीं होता। बात नजरिये की है और वो सभी का है अपना-अपना।

सुजाता said...

एक तरफ आपने यह नतीजा निकाल लिया..
***
महेश जी नतीजा मैने नही निकाला बस बताया है कि जिस पोस्ट का ज़िक्र हुआ उसके अनुसार यह नतीजा निकला ।
आपको कुछ बातें काबिले गौर लगीं और आपने अपनी राय दी इसका बहुत शुक्रिया ।
अपने कमेंट मे सुरेश जी ने कहा कि समाज जल्दी नही मानता । ठीक कहा ,पर जल्दी नही बहुत समय हो गया है । शायद सदियाँ । समाज जिन हथियारों से अब तक मनुष्य पर नियंत्रण रखता आया है -पुरस्कार ,दण्ड ,धर्म, नैतिकता - वे सब सभ्यताओं के विकास के साथ साथ अपना महत्व खोते गये हैं और बहुत सी शक्तियाँ राज्य और कानून के हाथ मे आती गयीं है। यह लम्बी प्रक्रिया रही , और हैरानी है कि विकास और समतामूलक समाज के लक्ष्य के साथ समाज ने कभी हाथ नही मिलाया । इसी का परिणाम है कि यदा-कदा लिव इन जैसे गैर संस्थाई रिश्ते पनपने लगे ।अब भी और समय चाहिये हम सब को सिर्फ यह स्वीकार करने मे कि जो कूड़ा है , वह कूड़ा है ,उसे फेंकना होगा ? {कूड़ा से मेरा अर्थ शादी कतई नहीं , जैसा कि सोचा जा सकता है}

Unknown said...

@अपने कमेंट मे सुरेश जी ने कहा कि समाज जल्दी नही मानता । ठीक कहा ,पर जल्दी नही बहुत समय हो गया है । शायद सदियाँ ।
समाज में सुधार भी होते रहते हैं और कुछ नई कमियाँ भी आती रहती हैं. ऐसा समय शायद ही कभी आए जब समाज में कोई कमी न हो. सुधार हुए हैं - विधवा विवाह, बाल विवाह, सती. यह सब पूरी तरह तो ख़त्म नहीं हुए पर काफ़ी कमी आई है. दहेज़ के मुद्दे पर भी काफ़ी सुधार हुआ है और बहुत होना बाकी है. तकनीकी प्रगति के साथ-साथ कुछ नई कमियां भी आई हैं - कन्या-भ्रूण हत्या.

@समाज जिन हथियारों से अब तक मनुष्य पर नियंत्रण रखता आया है - पुरस्कार ,दण्ड ,धर्म, नैतिकता - वे सब सभ्यताओं के विकास के साथ साथ अपना महत्व खोते गये हैं और बहुत सी शक्तियाँ राज्य और कानून के हाथ मे आती गयीं है।
पुरस्कार और दण्ड समाज के हथियार होने चाहियें, पर धर्म और नैतिकता समाज को हथियार के रूप में प्रयोग नहीं करना चाहिए. पर यह हुआ है. समाज के कुछ प्रभावशाली वर्गों ने धर्म और नैतिकता को हथियार के रूप में प्रयोग करके सामजिक समन्वय को काफ़ी नुकसान पहुंचाया है. आज भी ऐसा हो रहा है. अल्पसंख्यकवाद एक नए हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है. इस के परिणाम बहुत भयंकर होने वाले हैं.

सामाजिक सुधार की प्रक्रिया हमेशा लम्बी होती है. आज के तेज रफ़्तार युग में भी यही देखने को मिलता है. संसद में महिला आरक्षण विधेयक इस का एक ज्वलंत उदहारण है. यह सही है कि विकास और समतामूलक समाज के लक्ष्य के साथ समाज कस कर हाथ मिलाने से बार-बार चूकता रहा. पर इस का कारण है कमी एक निस्वार्थ सामजिक नेतृत्व की. आजादी के बाद तो कोई नेतृत्व नजर ही नहीं आया. अपने को नेता कहने वाले अपने सुधार में ही लगे रहे और इस के लिए समाज को काफ़ी नुकसान भी पहुंचाया. शाह बानो केस इस का एक उदहारण है.

लिव इन जैसे गैर संस्थाई रिश्ते अपने कर्तव्य को भूल कर केवल अधिकार की बात करने का परिणाम हैं. यहाँ समाज फ़िर एक बार गलती करेगा इन रिश्तों को सामजिक अनुमति दे कर. इस के परिणाम सुखद नहीं होंगे. व्यक्ति को परिवार पर मुख्यता दे कर समाज अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार रहा है.

दीपक कुमार भानरे said...

महोदया मेरा मानना है की यदि बड़े बुजुर्ग अपने जीवन के अनुभव के आधार पर अपने बच्चों पर कोई सीख देते हैं और पाबंदी लगाते है तो उनका भला ही सोच कर लगाते हैं . इसे अनावश्यक रोक टोक नही समझनी चाहिए . हाँ इस मामले मैं कुछ अपवाद हो सकते हैं . दूसरा यह की क्या कभी मनुष्य सीमा विहीन जीवन जी सकता है . संस्कारों और मर्यादा के बंधन मैं न बंधकर उन्मुक्त और स्वछन्द आधुनिक जीवन जीने की चाह भौतिक सुखों की लालसा और पाश्चात्य सभ्यता का ही प्रभाव ही तो है . अपनी जिम्मेदारी और संस्कारों से दूर भागने के ऐसे प्रयास को क्या कहेंगे . साथ ही यह भी की यदि किसी बाग़ के कुछ फूल ख़राब है तो उससे पूरे बाग़ को ही ख़राब नही कहा जा सकता है . हम उसमे से अच्छे फूल भी चुन सकते हैं और ख़राब चीजों मैं सुधार की गुंजाइश भी रखी जा सकती है . धन्य वाद .

आर. अनुराधा said...

यह बहस लंबी चलेगी और बिना किसी निष्कर्ष के। क्योंकि बहस के नतीजों का एक्शन में तब्दील होना ही इसका निष्कर्ष होगा।

इस बहस में आम तौर पर पुरुषों को स्थितियां उतनी बुरी नहीं लग रही हैं। जबकि औरतें चीख रही हैं कि यह पढ़ा-लिखा समाज अब तो कम से कम उस सदियों पुरानी दासता की जकड़न से निकले और ताजा हवा में सांस ले और दूसरों को भी लेने दे। पर ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

दरअसल जो बदलाव आए हैं, वे बाहरी हैं, भौतिक हैं। मूल विचारों में कोई बदलाव नहीं है तभी तो आधुनिकता के साथ-साथ कन्या-भ्रूण हत्या भी चल रही है/ बढ़ रही है।

बगिया में जिन्हें फूल-ही-फूल दिख रहे हैं- अच्छे या खराब, उन्हें कांटे दिखाने का एक ही उपाय है- कायांतरण/भूमिकांतरण। तभी शायद वे समझ पाएंगे कि शादीशुदा औरतों के साथ ही लिव-इन में रह रही महिलाओं के अधिकारों और समानता के बारे में सोचना और करना पड़ेगा। (और कृपया इस कथन के आधार पर मुझे लिव-इन के पक्ष या विपक्ष में खड़ा करने की जबर्दस्ती कोशिश न करें।)

Vivek Gupta said...

यह भी सही है | सभी नारियों को उनका हक मिलना चाहिए |

Rachna Singh said...

किस समाज की बात कर रहे हैं हम ब्लॉग पर ब्लॉग समाज की . एक पढा लिखा जहीन तक्बका जिसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिल गयी हैं ब्लोगिंग से . और क्या अभिव्यक्त होता हैं जब

लवली अपनी सौवी पोस्ट मे लिखती हैं की उसने अपना चित्र और प्रोफाइल हटा दिया ताकि प्रोब्लम ना हो .

वाही मेने भी किया क्युकी भाई शर्ट और ट्राउज़र पहने वाली ४८ वर्षीया अविवाहित स्त्री तो चरित्र हीन होती हैं और समाज मे अनैतिकता ही पहलाती हैं . जी हाँ हर जगह अगर मुझ पर लिखा जाता था तो बात मेरे लेखन की नहीं मेरी ड्रेस पर होती थी . एक ब्लॉग पर तो याहा तक कहा गया की मुझे ब्लॉग्गिंग करनी के लिये " बाहरी देशो " से साहयता मिलती हैं . वही एक विवाहिता ब्लॉगर के साथ मतभेद को वैचारिक मतभेद कहा जाता हैं .
क्या विवाह समझदारी और अकलमंदी का पर्याय हैं और अविवाहित चरित्र हीनता हैं .
ये केवल और कवल तरीका हैं एक विवाहिता को एक अविवाहिता के ख़िलाफ़ खडा करने का

कविता वाचकनवी के ब्लॉग पर एक कमेन्ट हैं की ४० से ऊपर की महिला सोच मे बुढी हो जाती हैं और उसको ब्लॉग लेखन नहीं करना चाहिये रिटायर हो जाना चाहिये .
नारी का तर्क हमेशा कुतर्क होता हैं क्युकी पुरूष को "तर्क " सुनने " की आदत ही नहीं हैं .
लिव इन रिलेशनशिप पढ़ लिया और नैतिकता की लाठी ले कर पिल पडे .

और ये भी भूल गए की क्या लिख रहे हैं क्या वो विचार आधरित भी हैं .

नहीं जी सुजाता ने कमेन्ट किया हैं तो काटना जरुरी हैं क्युकी सुजाता "चोखेरबाली " चलाती हैं . सो पढ़ना जरुरी हैं ही नहीं .
अरे कभी बहस तो करे सार्थक बहस कथन को कथन से काटे अपारम्परिक नारी की सोच को सामाजिक पारंपरिक सोच के साथ रख कर खुले मन से बहस हो . बिना ये कहे की तुम औरत हो और बेवकूफ हो

स्वप्नदर्शी said...

kaun see bahas ke chakkar me paD gaye sab log.

american aur russian kabke chaand par pahalkadamee kar aaye hai, aur yahan chaand kaa hee ronaa zaaree hai?

karavaa chauth moolt: pajaab kee taraf kee rasm hai, mujhe nahee lagataa ki 25% se jyaada log ise manaate honge.

baakee bahut kuchh to boolywood kaa kamaal hai, jahan se log copy karake apanaa jeevan chalaate hai!!!


mauliktaa hai kahaan??

सुजाता said...

हाँ स्वप्नदर्शी जी , आपने सही कहा ।
लेकिन मुझे इसी मानसिकता पर क्रोध है कि बॉलीवुड के दिखाने पर आप करवा चौथ को तो हँसी खुशी अपनी बीवी से चरितार्थ करा लें लेकिन जब वही बॉलीवुड लिव इन रिलेशन के कानूनी पहलुओं पर बात करे तो आप नैतिकता की गुहार करने कगें और उसे त्याज्य मानें !
अनुराधा जी की बात से भी सहमत हूँ कि दर असल मानसिकता तो वहीं की वहीं है बस बाह्य रीतियाँ ही कुछ बदल गयीं हैं ।ये बदलाव केवल भौतिक ही हैं ।
यह वाकई अफसोसनाक है कि लिव इन रिलेशन मे रहने वाली स्त्री को पत्नी का दर्जा मिलने की बात हो या कन्या भ्रूण हत्या की समस्या ....यह सब एक देश काल मे हो रहे घटना क्रम हैं और हम सब भारी अंतरविरोधों को लिए ही जैसे है वैसे आगे बढते जाने के बारे मे सोच रहे हैं ।

सुजाता said...

बॉलीवुड और एकता कपूर जो दिखाते हैं जीवन उससे कहीं व्यापक ,जटिल और विविध है ।

संजय बेंगाणी said...

मैने पोस्ट नहीं पढ़ी मगर शीर्षक इतना जोरदार व्यांग्यात्मक है की कई देर तक मुस्कुराता रहा. मस्त शीर्षक. खूब!

महेश लिलोरिया said...

सुजाता जी
आरी को काटने के लिए सूत की तलवार???
पोस्ट सबमिट की है। कृपया गौर फरमाइएगा...
-महेश

महेश लिलोरिया said...

सुजाता जी
आरी को काटने के लिए सूत की तलवार???
पोस्ट सबमिट की है। कृपया गौर फरमाइएगा...
-महेश

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