Thursday, October 23, 2008

बालिका- वधू उनके लिए सीरियल के पैटर्न बदलने का मामला भर है





तो समझिए चैनल नहीं चाहते कि लड़कियों की तस्वीर बदले
विनीत कुमार




अभिषेक बच्चन ने आनंदी से सवाल किया कि- तुम स्कूल क्यों नहीं जाती. आनंदी ने जबाब दिया, मेरी शादी हो चुकी है न। उसके बाद अभिषेक ने बगल में खड़ी उसकी सहेली से भी यही सवाल किया-तुम क्यों नहीं जाती स्कूल। वो कुछ कहती इसके पहले ही आनंदी चहकते हुए बोल पड़ी- इसकी भी शादी हो चुकी है न। लेकिन बगल में खड़ा जगदीश जो कि आनंदी का पति है वो रोज स्कूल जाता है और न सिर्फ स्कूल जाता है, बल्कि धीरे-धीरे वो सबकुछ सीख रहा है जो कि पितृसत्तात्मक समाज को बनाए रखने के लिए और उस समाज में बने रहने के लिए जरुरी है.
टीआरपी की दौड़ में अच्छे-अच्छे सास-बहू सीरियलों को पछाड़ चुके बालिका-वधू की कुल मिलाकर यही कहानी है कि बाल-विवाह किस तरह से लड़कियों के बचपन को, उसके स्वाभाविक विकास को और उसकी जीवंतता को लील जाता है। बिहार, मध्यप्रदेश और खासकर राजस्थान में कच्ची उम्र में लड़कियों की एक बड़ी समस्या है। आप कह लीजिए कि जिस उम्र में लड़कियों की शादी होनी चाहिए, उस उम्र तक आते ही वो विधवा हो जाती है. बचपन का गला तो पहले से ही घोंट दिया जाता है, और इसी क्रम में आगे के जीवन को तबाह करने की तैयारी हो जाती है।
सास-बहू सीरियलों को देख-देखकर जो लोग पक चुके हैं, उनके लिए संभव है, बालिका-वधू इसलिए अच्छा लगे कि एक नए ढंग का फ्लेवर मिल रहा है। सात-सात साल से भी अधिक चले आ रहे सीरियलों को लेकर ऑडिएंस की एक लॉट राय भी बना चुकी है कि सब बकबास है, कुछ नहीं रखा है इन सीरियलों में, आज उनमें से भी कुछ लोग इस सीरियल को लेकर टीवी पर फिर से जमने लगे हैं। उन्हें न सिर्फ स्टोरीलाइन पसंद आ रही है बल्कि लम्बे समय के बाद और वो भी किसी निजी मनोरंजन चैनल पर राजस्थान का टिपिकल ग्रामीण परिवेश दिखाई दे रहा है। मैंने कलर्स चैनल के लांच होने के पहले ही दिन लिखा था कि- बाकी जो भी हो, इस चैनल के लगभग सारे कार्यक्रमों के फुटेज आंचलिकता को छूती हुई जाती है। खैर,
टेलीविजन में दुनियाभर की बकवास आ जाने के बाद भी जो लोग इससे सामाजिक विकास की उम्मीद लगाए बैठे हैं उन्हें बालिका-वधू में एक जबरदस्त सोशल मैसेज दिखायी दे रहा है। एक हद तक आप कह लें कि जो काम आज न्यूज चैनल नहीं कर पा रहे हैं वो एक सीरियल करने की कोशिश में लगा है। सीरियल की कहानी समस्यामूलक है। संभव है आनेवाले समय में मैलोड्रामा पैदा करने के लिए इसमें अबतक की सीरियलों की तरह की खुरपेंच किए जाएं। लेकिन अच्छी बात है कि सीरियल के बीच-बीच में जो कैप्शन आते हैं, उसका सीधा संबंध सामाजिक जागरुकता से है? जो लोग सीरियल में रुचि नहीं लेते लेकिन स्त्री समस्याओं और उसके अधिकारों को लेकर काम कर रहे हैं, लिख-पढ़ रहे हैं उनके लिए ये बेहतर संदर्भ है। अबतक के एपिसोड को लेकर अपनी तो समझदारी इसी रुप में बनी है।
लेकिन इसी क्रम में इस कार्यक्रम को लेकर अगर न्यूज चैनलों की बात करें तो उनकी समझदारी मेरी समझदारी से बिल्कुल अलग है।
कहानी घर-घर की पिछले सप्ताह खत्म हो गया। बालाजी टेलीफिल्मस ने १० नबम्बर को क्योंकि सास भी कभी बहू थी, खत्म करने की घोषणा कर दी है। न्यूज चैनलों के लिए इस दौरान बढ़िया मसाला मिलेगा। उनकी भाषा में कहें तो खेलने के लिए बहुत कुछ है। चूंकि इ-२४ देश का पहला मनोरंजन न्यूज चैनल है इसलिए उसे इस मामले को लेकर औरों से पहले तैयार होना स्वाभाविक है। उसने अभी से ही इस पर स्पेशल पैकेज बनाने शुरु कर दिए हैं।
कल रात इ-स्पेशल में चैनल ने क्योंकि सास भी कभी बहू थी की तुलसी और बालिका-वधू की आनंदी को आमने-सामने लाकर रख दिया। चैनल के मुताबिक अब धाराशायी हो रही है तुलसी। एक दौर था कि जब देश की महिलाएं चाहती थीं कि उसे तुलसी जैसी बहू मिले और वही तुलसी जब सास बन गई तो हर लड़कियां सोचने लगी कि उसे तुलसी जैसी सास मिले। लेकिन अब तुलसी के उपदेश लोगों को रास नहीं आ रहे हैं। अब लोग तुलसी के बजाए, बहू के रुप में लोग चुलबुली चुहिया यानि आनंदी को देखना पसंद कर रहे हैं। अब जब लोग तुलसी को पसंद नहीं कर रहे हैं तो जाहिर है कि उसे भी आनेवाली बहू के लिए जगह तो छोड़नी ही होगी। चैनल बालिका-वधू की लोकप्रियता को पीढ़ी के बदलाब के रुप में देख रही है। थोड़ा आगे जाकर समझें तो लोग अब इन्नोसेंट बहुएं पसंद करने लगे हैं.
यहां पर एक तो कलर्स चैनल की खुद की गड़बड़ी है कि आनंदी बालिका बधू है, दिन-रात मांस्सा के ताने और उपेक्षा झेलती हुई जिंदगी, लेकिन उसके चेहरे पर कभी भी शिकन नहीं दिखाया। हमेशा नटखट और मनचली। चैनल ने टीआरपी के फेर में उसके बचपन को बख्श दिया है। बीच-बीच में भले ही कहती है कि- एक तो शादी कर दी औऱ अब उपर से अमिया भी नहीं तोड़ सकती। लेकिन कहीं भी बहुत रोते-बिलखते नहीं दिखाया गया। इससे ज्यादा तो आदर्श उम्र की बहुएं रोती हैं। अब दूसरा काम ये चैनल कर रहे हैं।
नियत चाहे जो भी हो लेकिन यदि किसी मनोरंजन चैनल ने सामाजिक मुद्दों को आधार बनाकर सीरियल शुरु किए हैं तो न्यूज चैनलों को उसे प्रोग्रेसिव एलीमेंट इस्टैब्लिश करने चाहिए। उसे आधार बनाकर उस इलाके की समस्याओं को सामने लाने चाहिए थे। जो काम सीरियल के स्तर पर हो रहे हैं, वहीं काम रिपोर्टिंग केएस्तर पर होने चाहिए. लेकिन बिडंबना देखि कि लाफ्टर चैनल की दर्ज पर लगभग सारे चैनल हंसी के हंसगुल्ले परोसने के लिए तैयार हैं लेकिन बदलाव के नाम पर सक्रिय होना तो दूर उल्टे उसमें मिट्टी डालने का काम कर रहे हैं। तो क्या बालिका- वधू उनके लिए सीरियल के पैटर्न बदलने का मामला भर है।
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यह सबूत मुझे अभी यूट्यूब मिला , आप भी देखें -


6 comments:

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

balika vadhu ne man ko chua hai.aanandi apni beti se lagti hai.lekin valika ko vadhu nahi bnana chahite,yah sandesh bhi de rahi hai balica vadhu.

जितेन्द़ भगत said...

इस समीक्षात्‍मक आलेख के लि‍ए वि‍नि‍त जी को बधाई। मैंने एक दो एपीसोड ही देखें हैं इस सीरि‍यल के, मगर काफी तारीफ सुनी है। आपके आलेख से अच्‍छी सूचना मि‍ली। शुक्रि‍या।

shivraj gujar said...

बहुत बढ़िया सीरियल है. हाँ थोड़ा अतिरेक इसमें है लेकिन वो अखरता नही है. दीपावली की हार्दिक सुभकामनाएँ.
मेरे ब्लॉग (meridayari.blogspot.com) पर भी कभी आयें
शिवराज गूजर

Unknown said...

एक अध्यापिका ने इस बाल विवाह को रोकने की कोशिश की थी पर रोक नहीं पाई. सारा गाँव उस के ख़िलाफ़ हो गया था. अगर इस सीरियल में यह बाल विवाह रोक दिया जाता तो ज्यादा बेहतर रहता.

आशापूर्णा देवी के उपन्यास पर भी एक सीरियल बना था, बहुत पहले. कहानी की नायिका का बचपन में विवाह कर दिया जाता है. वह यह प्रण करती है कि वह अपनी बेटी का बचपन में विवाह नहीं करेगी, उसे शिक्षित बनाएगी. पर उसका पति और उस की सास एक षड़यंत्र करके उस की बेटी का बचपन में ही विवाह कर देते हैं. इस बात पर नाराज हो कर वह अपने पति का त्याग कर देती है. आशापूर्णा देवी ने यह उपन्यास बहुत पहले लिखा था. मुझे बहुत अच्छा लगा था. उस नारी ने इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ संघर्ष किया, अपने पति तक का त्याग कर दिया.

इतने वर्षों बाद इस सीरियल में एक अध्यापिका बाल विवाह नहीं रोक पाई, बल्कि एक अनपढ़ बूढ़ी स्त्री ने अपने विधुर बेटे का विवाह उस की बेटी की उम्र की कन्या से करा दिया. लोगों ने इस दौरान तरक्की की है या और पीछे चले गए हैं?

Anonymous said...

विनीत, आपने सही लिखा है लेकिन न्यूज चैनल वाले टीआरपी बढ़ाने के लिये चटपटी खबरों से मुक्ति पायें तो कुछ ठोस कर पाये ना। वैसे इस सीरियल के बारे में पढ़ने को मिला कि अच्छा है लेकिन आज तक देखा नही है।

राजकिशोर said...

सुजाता ने विनीत कुमार का यह पोस्ट प्रकाशित कर बहुत अच्छा काम किया है। यह टीवी नाम के गिरगिट का एक नया रंग है। इससे अभिभूत होने की जरूरत नहीं। बहुत जगह मनमोहक भजन करते-करते या मिठाई खिली-खिला कर दर्शकों की जेब काट ली जाती है।

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