Wednesday, October 15, 2008

माफ करें, यह तो पुरुष विमर्श है

राजकिशोर

बहुत ही खेद के साथ लिखना पड़ता है कि हिन्दी में जिसे सर्वसम्मति से स्त्री विमर्श कहा जाता है, वह मुख्यत: पुरुष विमर्श है। उसमें स्त्री की चर्चा कम, पुरुष की चर्चा ज्यादा होती है। अगर सारी चर्चा यहीं तक सीमित रहे कि पुरुष कैसा होता है, उसने स्त्री के साथ क्या किया है, वह स्त्री के साथ क्या कर रहा है, तो इसे पुरुष विमर्श नहीं तो और क्या कहा जाए? जैसे रीतिकालीन साहित्य का लक्ष्य स्त्री चर्चा थी यानी स्त्री का सौन्दर्य, स्त्रियों के प्रकार, स्त्रियों के कौशल, स्त्री के साथ प्रेम या रति प्रसंग, वैसे ही जिसे स्त्री विमर्श का साहित्य कहा जा रहा है, वह मुख्यत: पुरुषों के स्वभावगत लक्षणों, उनकी दमनकारी विधियों और उसके द्वारा होनेवाला स्त्रियों का शोषण आदि पर केंद्रित होता है। इसमें स्त्री का अपना संघर्ष कम है, पुरुष के प्रति शिकायत
यह काफी हद तक स्वाभाविक है, क्योंकि किसी भी स्त्री के आंसुओं में पुरुषों के जुल्मो-सितम का लंबा इतिहास समाया हुआ होता है। 'पर्सनल इज पोलिटिकल' को सही मान लें, हालांकि मुझे इसमें थोड़ी शंका है, तो नारीवाद मुख्यत: एक राजनीतिक आंदोलन है। यह पुरुष राजनीति को स्त्री राजनीति से संतुलित करना चाहता है।

वैसे तो स्त्री आदि काल से ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करती रही है। उसे मुख्य साहित्य में स्थान नहीं मिला, तो उसने लोक गीतो, लोक कथाओं का माध्यम चुना। हिन्दी की लोक भाषाओं -- अवधी, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, बुंदेलखंडी आदि -- में चित्रित स्त्री की व्यथा को एकत्रित किया जाए, तो एक और गंगा बह निकलेगी। खड़ी बोली प्रारंभ से ही पुरुष-भाषा रही है। लेकिन वह हिन्दी क्षेत्र में आधुनिक चेतना के उदय की भाषा भी है। इस उदय में स्त्रियां भी भागीदार रही हैं। अत: खड़ी बोली हिन्दी साहित्य के प्रारंभ से ही स्त्री स्वर भी उपस्थित दिखाई देता है। यह स्वर पिछले एक दशक में तीव्र और व्यापक हुआ है। इसलिए दलित विमर्श की तरह एक अलग नाम भी मिला है -- स्त्री विमर्श।

अगर इतने साहित्यिक और वैचारिक विकास के बावजूद स्त्री स्वर अभी भी पुरुष समाज को अपराधी ठहराने पर ही केंद्रित है, तो मैं कहना चाहूंगा कि पुरुष को पर्याप्त पहचान लिया गया है, उसके दोहरे स्वभाव और पुरुष वर्चस्व की इस चली आ रही संस्कृति को मोटा मोटी बहुत बारीकी से समझ लिया गया है, इसी विषय को दुहराते जाने से क्या फायदा? साहित्य में पुनरावृत्ति नाम का दोष भी होता है। यह दोष इस समय इतना फैला हुआ है कि एक स्त्री लेखक और दूसरी स्त्री लेखक के स्वरों में फर्क करना मुश्किल हो गया है। जिधर देखता हूं, उधर तू ही तू है। ऐसे कब तक चलेगा? हिन्दी का स्वर स्वर प्रौढ़ होने से हिचक क्यों कर रहा है? वास्तविक स्त्री विमर्श की ओर बढ़ने से वह डर क्यों रहा है?अगर नारी विमर्श में पुरुष विमर्श भी स्वस्थ और पूर्णतावादी होता, तो हमारी मित्रगण देख पातीं कि ऐसे पुरुषों की भी एक परंपरा रही है, जिन्होंने स्त्री के श्रेष्ठ गुणों को अपने में समोने में का प्रयास किया है, जिस तरह अनेक स्त्रियों ने पुरुषों के लिए स्वाभाविक माने जाने वाली अधिकार चेतना और खूंखारियत की नकल करने की कोशिश की है।

दुख की बात है कि जिस तरह वर्तमान स्त्री विमर्श में इस दूसरी प्रवृत्ति को समझने और उसकी निंदा करने की समझ दिखाई नहीं देती, वैसे ही पुरुष संस्कृति की इस दूसरी धारा की पूर्ण अवज्ञा है जिसमें पुरुष स्त्री के मानव गुणों को अपना कर एक समेकित मनुष्य बनना चाहता है। उदाहरण के लिए, स्त्रीत्व के बहुत-से गुण ईसा मसीह, गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी में देखे जा सकते हैं। सच तो यह है कि ये पुरुष कम, स्त्री ज्यादा लगते हैं। गांधी जी का तो मानना ही था कि वे अपने बच्चों के पिता और माता दोनों ही हैं। उनकी पौत्री मनु गांधी ने अपनी एक किताब के शीर्षक में गांधी जी को अपनी मां बताया है। प्रेमचंद ने कहा है कि जब पुरुष में स्त्री के गुण आ जाते हैं, तब वह देवता बन जाता है। ऐसे देवता-स्वरूप पुरुषों की समानांतर चर्चा चलती रहती, तो स्त्री विमर्श इस संभावना को भी देख पाता कि पुरुष संस्कृति में भी महत्वपूर्ण अंतर्विरोध हैं, जिसकी कोख से वह सज्जन पुरुष निकल सकता है जिसकी स्त्री विमर्शकारों को प्रतीक्षा है। ऐसा कोई आदर्शवाद नहीं है जिसमें जीवन के यथार्थ की अनुगूंज नहीं सुनाई पड़ती हो। इसी तरह, ऐसा कोई यथार्थवाद नहीं है जिसमें आदर्शवाद के कुछ तत्व न हों। इसी द्वंद्वात्मकता के माध्यम से ही वर्तमान कलुषित संस्कृति के बीच से एक बेहतर संस्कृति की पीठिका खोजी जा सकती है और उसमें नए रंग-रूप भरे जा सकते हैं।
एक बात और। आज तक कोई ऐसा महत्वपूर्ण आंदोलन नहीं हुआ, जिसके सदस्यों ने अपने लिए आचरण संहिता न बनाई हो। ईसा मसीह को माननेवाला किस तरह की जिंदगी जिएगा, इसकी एक लिखित-अलिखित संहिता थी। इस संहिता का एक सूत्र यह था कि अगर कोई तुम्हारा कोट मांगे, तो तुम उसे अपनी कमीज भी उतार कर दे दो। गौतम बुद्ध का अनुयायी किसी भी स्थिति में अन्याय और हिंसा नहीं कर सकता था। गांधी जी ने तो अपने पीछे चलनेवालों के लिए इतने नियम-उपनियम बना रखे थे कि उन पर खुद गांधी जी का भी चलना मुश्किल जान पड़ता था। वे अपनी कसौटियों से स्खलित होते रहते थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने स्वयं बताया है कि अंतिम दिनों तक उन्हें स्वप्नदोष होता रहा। प्रश्न यह है, स्त्री विमर्श अपनी विमर्शकारों को किस तरह का जीवन बिताने की सलाह देता है? पुरुष की अधीनता में दिन और रात गुजारती जाओ, इसकी सारी सुरक्षाओं का लाभ लेती रहो और अपने साहित्यिक पाठिकाओं-पाठकों को बताती रहो कि ये मर्द बड़े हरामी होते हैं। सारी मांग पुरुषों से है, स्त्रियों से कोई अपेक्षा नहीं कि उनका चरित्र या व्यक्तित्व कैसा होना चाहिए। इतने एकतरफापन से कोई बड़ी चीज नहीं उभर सकती।

3 comments:

Unknown said...

मैं आपकी बात से काफ़ी हद तक सहमत हूँ. किसी भी आन्दोलन का कोई उद्देश्य होता है. स्त्री की स्थिति पर विचार विमर्श भी एक आन्दोलन ही है. लेकिन इस का उद्देश्य क्या है? क्या यह उद्देश्य केवल पुरूष द्वारा किए जा रहे अत्त्याचार के बारे में लिख देना भर है या उस अत्त्याचार से मुक्ति पाना इस का उद्देश्य है? अगर कुछ स्त्रियाँ ऐसा महसूस करती हैं कि उन्हें पुरूष अत्त्याचार से मुक्ति मिल गई है तब क्या इस आन्दोलन का उद्देश्य पूरा हो गया मान लिया जाय? क्या कुछ स्त्रियाँ सब स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं?

मैंने हमेशा यही महसूस किया है कि इस विचार विमर्श में कुछ कमी है. शायद इस का उद्देश्य पूरी तरह परिभाषित नहीं है? शायद इस उद्देश्य को किस प्रकार प्राप्त करना है ऐसी कोई योजना नहीं बनाई गई है? हो सकता है ब्लाग की सूत्रधार इस बारे में पूरी तरह स्पष्ट सोच रखती हैं, पर इस ब्लाग पर आने वाली सभी नारियां शायद उन के उद्देश्य को समझ नहीं पाई हैं.

मैंने एक बात और महसूस की है कि परिवार के अन्दर रह कर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना और अपने सम्मान की पुनर्स्थापना करना एक उद्देश्य होना चाहिए. परिवार से अलग हो जाना एक तरीका हो सकता है पर उद्देश्य नहीं. इस के लिए पुरूष से स्पर्धा करने में अपना समय और शक्ति न लगा कर, अपनी सामर्थ्य का पूरा उपयोग और सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए. किसी भी समाज के विकास में स्त्री का योगदान बहुत आवश्यक है. अगर भारतीय समाज इस योगदान से बंचित रह जाता है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी.

आर. अनुराधा said...

हममें से कोई भी समाज से अलग विशुद्ध चिंतक नहीं है, जो साफ-साफ महिलाओं को अलग खांचे में रखकर उनकी स्थिति के बारे में विश्लेषण कर पाए। यह ब्लॉग एक माध्यम है जिसके जरिए हम अपने समानतावादी विचारों को अपने-अपने परिवेश, हालात की पृष्ठभूमि में देखते हुए स्त्री-पुरुष समानता की आदर्श स्थिति के पैमाने पर कसते हुए जैसा समझ पाते हैं, जाहिर कर देते हैं। इस उम्मीद में कि इस अधकचरे और अस्पष्ट ही सही, कई दिशाओं से आते विचारों के सामूहिक मंथन से कोई नायाब विचार का मोती निकलेगा जो हमारे समाज को दिशा दे पाएगा। इसलिए यह विमर्ष तब तक (संभवतह अनंत काल तक) चलेगा जब तक कि समानता का सटीक फार्मूला नहीं निकल आता।

राजकिशोर said...

अनुराधा से शत-प्रतिशत सहमत हूं। मुझे यकीन है कि कुछ समय के बाद यह समानता विमर्श ही हो जाएगा।
रा.

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