Saturday, November 1, 2008

अपनी ज़मीन खुद तय करो!

सिमोन बोआ की बात एकदम सरल है, फिर भी गूढ़ - पुरुषों के बनाये ढाँचे के हिसाब से अपना मूल्याँकन मत करो। अलग हटो, दूर जाओ, अपने माप दंड खुद बनाओ, अपनी ज़मीन खुद तय करो।


स्त्री के लिए एक नया क्षेत्र
पोस्ट पर कुछ ज्यादा लंबी टिप्पणी यहां पोस्ट के रूप में दे रही हूं।

यह सही कहा है कि

"अगर स्त्री ऐस्ट्रोनोट बन सकती है, डाक्टर बन सकती है, माँ बन सकती है तब पण्डिता भी अवश्य बन सकती है -
कोई भी जन्म से सब सीख कर पैदा नहीँ होता -
शिक्षा ही व्यक्ति को सबल बनाती है"

एक पेशे के तौर पर यह सब सीखना और करना ठीक है। दुनिया में हज़ारों-लाखों पेशे हैं, उनमें से एक यह भी, जिसे स्त्रियां भी अब अपनाने लगी हैं और समाज खुल रहा है, इसे स्वीकृति देने में। बहुत अच्छा है।

हाल के समय में समाज में एक ऐसी ही, मिलती-जुलती घटनाएं हुईं हैं, जिनका जिक्र जरूरी है। इस साल के शुरू में हरिद्वार में शंकराचार्य की तर्ज पर एक महिला के लिए पार्वत्याचार्य का पद बनाया गया जिसकी तारीफ कम हुई, धार्मिक अखाड़ों में विरोध खूब हुआ, 'सत्ता' और 'ताकत' के बंटवारे के मुद्दे पर।

इसी तरह कुछ समय पहले आंध्र प्रदेश के अनंतपुर शहर के एक मंदिर में प्रवेश का हक पाने के लिए 6-8 दलितों का एक दल जबर्दस्ती मंदिर में घुसा। इस पर मंदिर में तो हुआ ही, शहर भर में भी काफी हंगामा हुआ। देश के कई हिस्सों में बहस छिड़ गई कि दलितों को मंदिर प्रवेश का हक होना चाहिए या नहीं, और इस हक को पाने के लिए जबर्दस्ती प्रवेश का यह तरीका उचित है या अनुचित।

"पुरूष प्रतिपादीत व्यवस्था" में "धार्मिक अनुष्ठान आज भी पुरूष प्रधान" "ही रहे है जिसका विरोध रोमन केथोलिक चर्च भी नही कर पाया है!" ऐसे में स्त्री को पण्डित की तरह धार्मिक अनुष्ठान, विधि विधान करवाने के लिए प्रशिक्षण, शंकराचार्य की तर्ज पर एक महिला के लिए पार्वत्याचार्य का पद बनाए जाने और दलितों के मंदिर प्रवेश की घटनाएं मुझे एक तरह की लगती हैं।

आज के समय में दलित के पास यह सामाजिक और आर्थिक ताकत है कि वह आगे आकर कहे कि उसे मंदिर जैसे ढकोसले में पड़ कर सदियों पीछे नहीं जाना है बल्कि जाति व्यवस्था के स्टीरियोटाइप को तोड़ कर इससे आगे बढ़ना है। खोखली हो रही मंदिर व्यवस्था का बहिष्कार कर, और दिशाओं में अपनी ऊर्जा लगानी है ताकि तरक्की करके जमाने के साथ चल सके, बल्कि उससे आगे निकल सके।

इसी तर्ज पर महिलाएं सदियों पुरानी और असामयिक साबित होती शंकराचार्य परंपरा को नए सिरे से अपना कर सदियों पीछे क्यों चली जाएं? इसे आगे बढ़ने और बराबरी पाने का जरिया क्यों मानें? उसे पाना क्यों चाहें और मिल जाए तो उसे अपनी जीत क्यों माने और पाकर खुश क्यों हों? उसे हक मानने की बजाए क्यों न उसका बहिष्कार करे? क्यों न वे साफ कहें कि जिस व्यवस्था में हम सदियों तक लगातार गैर-बराबरी झेलती रहीं, अपने लिए जगह खोजने की बेकार कोशिश करती रह गई, उसकी जीर्णावस्था में हम क्यों उसे महत्व दें? लेकिन सोचने की बात यह है कि जब अभी तक उसके बिना हमारा गुजारा चल गया तो अब जबकि हमारे पास और विकल्प हैं अपनाने के लिए, साधन हैं कुछ बेहतर लक्ष्य पाने के लिए। फिर क्यों इस मृतप्राय, बेकार बासी व्यवस्था को अपनाने की जुगत में खुद सदियों पिछड़े हो जाएं?

और अगर कोई कहे कि परंपरा को बचाए रखने....(इत्यादि), तो इसका जिम्मा अब इसकी मृतप्राय हालत में औरतों पर क्यों? जब पुरुष इस पेशे में मलाई काट रहे थे तब औरतों को इसे सुनने से भी वंचित रखा गया,("दलित और स्त्री वेद सुनें तो उनके कानों में पिघला सीसा डाल दिया जाए"- मनु स्मृति) और अब जबकि इस पेशे की हालत मरणासन्न है तो सेवा-सुश्रुषा महिला के जिम्मे, वह भी सदियों पुरानी झूठे महिमामंडन की तरकीब से!!

और अगर यह सिर्फ व्यवसाय है तो एक बड़ा तथ्य यह है कि आज कोई भी पुजारी सिर्फ कर्मकांड करवा कर अपना और परिवार का पेट नहीं पाल सकता। इसके लिए उसे कोई और रोजगार करना ही होगा। यह सिर्फ साइड बिज़नेस या रिटायर होने के बाद का काम होगा। या फिर उसका एक मठ हो जिसमें सारे राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक शोषण के दांव-पेंच चलते हों। क्या ये प्रशिक्षित पुरेहित महिलाएं भी आर्थिक स्वावलंबन के लिए कुछ और करती हैं/ करेंगी? और अगर यह सिर्फ व्यवसाय है तो फिर "ऋतुकाल" में "स्वेच्छा से कई पण्डिता अपने यजमान का मान रखते हुए या स्वयम्` के निर्णय से प्रेरीत होकर इस अवधि मेँ धार्मिक कार्य नहीँ करतीँ - " जैसे स्पष्टीकरण की क्या जरूरत है?

लब्बोलुबाब ये कि विशुद्ध पेशे के तौर पर (एक आम हिंदुस्तानी के लिए पुरोहिताई एक पेशा बिल्कुल नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा एक पवित्र भगवत् कार्य है, खास तौर पर औरतों के लिए) पुरोहिताई को अपनाना आज कतई फायदे का सौदा नहीं है। क्यों न अपने टैलेंट से, काबिलियत से कोई, रॉकेट साइंस न सही, आज की दुनिया का काम-काज सीखा जाए जो वाकई एक पेशे का संतोष दे सके!?

और अगर यह सिर्फ व्यवसाय नहीं है, तो फिर मरते हाथी का बोझ हम अपनी पीठ पर क्यों ढोएँ, जिसकी सवारी का हमें कभी हक नहीं दिया गया?

क्या सोच रहे हैं आप?

16 comments:

Unknown said...

@"अगर स्त्री ऐस्ट्रोनोट बन सकती है, डाक्टर बन सकती है, माँ बन सकती है तब पण्डिता भी अवश्य बन सकती है -
कोई भी जन्म से सब सीख कर पैदा नहीँ होता - शिक्षा ही व्यक्ति को सबल बनाती है"

बिल्कुल सही बात है. शिक्षा प्रेम करना भी सिखाती है.
प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से.

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

अगर स्त्री ऐस्ट्रोनोट बन सकती है, डाक्टर बन सकती है, माँ बन सकती है तब पण्डिता भी अवश्य बन सकती है -
कोई भी जन्म से सब सीख कर पैदा नहीँ होता -
शिक्षा ही व्यक्ति को सबल बनाती है"

true, par nahi lagta pandita banne se bhi zyada zaroori hai shikhshit hona, bdhai samaayik mudda uthane ke liye.

आर. अनुराधा said...

सुरेश जी, नीलिमा जी,

आप दोनों ने लेख का जो हिस्सा टिप्पणी के लिए उठाया- "अगर स्त्री ऐस्ट्रोनोट बन सकती है, डाक्टर बन सकती है, माँ बन सकती है तब पण्डिता भी अवश्य बन सकती है - कोई भी जन्म से सब सीख कर पैदा नहीँ होता - शिक्षा ही व्यक्ति को सबल बनाती है"

य़ह हिस्सा मैंने खुद लावण्या जी की पिछली पोस्ट से उठाया है, जिस पर टिप्पणी के रूप में मेरी यह पूरी पोस्ट है। इसलिए ये दोनों टिप्पणियां इस पोस्ट के साथ न्याय नहीं करतीं।

मेरा निवेदन है कि कृपया यह पोस्ट फिर पूरी पढ़ें और तब नए सिरे से टिप्पणी करें। विषय निश्चय ही विचार के योग्य है।

Vivek Gupta said...

सटीक विचार

Rachna Singh said...

ये कि विशुद्ध पेशे के तौर पर (एक आम हिंदुस्तानी के लिए पुरोहिताई एक पेशा बिल्कुल नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा एक पवित्र भगवत् कार्य है, खास तौर पर औरतों के लिए) पुरोहिताई को अपनाना आज कतई फायदे का सौदा नहीं है। क्यों न अपने टैलेंट से, काबिलियत से कोई, रॉकेट साइंस न सही, आज की दुनिया का काम-काज सीखा जाए जो वाकई एक पेशे का संतोष दे सके!?

और अगर यह सिर्फ व्यवसाय नहीं है, तो फिर मरते हाथी का बोझ हम अपनी पीठ पर क्यों ढोएँ, जिसकी सवारी का हमें कभी हक नहीं दिया गया?

क्या सोच रहे हैं आप?

All though choice of career is a personal choice and if some lady is happy doing पुरोहिताई we should not outright reject the option . firstly she is breaking a TABU which in itself says a lot and secondly she being independent.

But
For me पुरोहिताई etc are just ritualistic options and too orthodx to follow { still i would not like to say they are wrong becaue some relious sentiments are attached to it }

I would any day prfer that woman study professional subjects and become earners and independents .

Besides this aniradha
in india पुरोहिताई is a profitable option . we have temple near our house and the pandit is neither educated nor learned yet in a span of 20 years thru the earnings fromt he temple !!! you can understand earnings are thru many ample ways he has been able to buy a house , a shop , 2 scooters , 1 motercycle . the shop and house are rented and he gets income from there , he has 3 sons , none educated , one looks after the shop { where is the reliious sentiment that brahmins should not do business !!!!} and 2 others now assist him , he stil lives in the free 2 room accomdation given to him by temple management . his sons and 2 daughter i lawas also live with him.
the ladies earn money and other things on various ocassions where a brahmini is needed .

earning from a job largely depends on our own abiltiy to make the best out of that job .

as materialism will grow , more and more people will be seeking solace in religion as well .
you can see how much money comes in chaddhavaa in big temples

who knows woman opting for this profession may be in fro a bright future !!

आर. अनुराधा said...

हां रचना, सही कहा। लेकिन यह भी देखने की बात है कि उन बड़े चढ़ावे वाले बड़े मंदिरों में पुरेहिताई का मौका किसे मिलता है। और उनमें भी हिस्सा-बंटाई अपने आप में बड़ी राजनीति है। किसी भी बड़े मंदिर में ट्रस्ट होता है या फिर पुश्तैनी पुरेहिताई जिसमें खेती की तरह चढ़ावा भी कई परिवारों के कई सदस्यों में फीसदी के हिसाब से बंटता है। इन सबके बीच महिला पुरोहित की क्या जगह है/ होगी।

Rachna Singh said...

anuradha
maene kewal apna view point rakha haen .
woman ko survival ki ladaaii shyaad har jagah ladni haen
ham bas itna kar saktey haen ki ham ek woman honey ka naatey jahaan bhi haen us jagah dosri woman kae liyae raasta saaf aur kam pathrilla banaatey chalae .

mae koi vivaad yaa behas nahin kar rahee aap ke view point se bas kewal aur kewal apna input dae rahee hun

इन सबके बीच महिला पुरोहित की क्या जगह है/ होगी।

Unknown said...

अनुराधा जी, पोस्ट के जिस हिस्से ने मुझे ज्यादा प्रभावित किया मैंने उस पर अपनी राय दे दी. आपको यह क्यों बुरा लगा मैं नहीं समझ पाया.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

ham ek woman honey ka naatey jahaan bhi haen us jagah dosri woman kae liyae raasta saaf aur kam pathrilla banaatey chalae .
हम एक नारी / स्त्री होने के नाते, जहाँ भी हैँ उस जगह दूसरी स्त्रीयोँ क लिये रास्ता साफ और कम पथरीला बनाते चलेँ
ये रचना जी ने अपनी समझ का अच्छा परिचय दिया है -आर. अनुराधा जी, पुरोहिताई का कार्य एक तरह से नारी के लिये नया क्षेत्र तो हुआ ही -
अब कितने प्रतिशत नारी . स्त्री इसे अपनातीँ हैँ ये भी तो देखना है और जो नगण्य प्रतोशत पँडिता बनना चाहतीँ हैँ उन्हेँ क्योँ रोका जाये ?
भारतीय जहाँ कहीँ भी जा कर बसे हैँ वहीँ पर विशाल मँदिर, धार्मिक रीति रीवाज भी पहुँच गये हैँ - और पुरोहिताई से कमा भी रहे हैँ लोग !
नारी के लिये हरेक कार्य ज्यादा प्रशस्त हो यही कामना है मेरी तो और नारी को उसे कौन सा कार्यक्शेत्र चुनना है उसका सबल अधिकार भी प्राप्त हो इस प्रक्रिया को जारी रहना चाहीये -

आनंद said...

मेरे विचार से यह घटाना महत्‍वपूर्ण है। इसमें अहम बात यह नहीं है कि पुरोहिताई या मंदिरों के आचार्य बनने से स्‍त्री का कितना भला होगा, बल्कि यह है कि जो कार्य अब तक वर्जित था, अपने तमाम विरोधों के बावजूद अब वह संभव हो रहे है। विरोध करने के बावजूद एकाधिकार वाले क्षेत्र में महिलाओं का दखल बन रहा है।

पुरोहिताई अच्‍छा है या बुरा, यह तो पुरोहितगण ही बेहतर जानते होंगे। तभी तो पुरोहिताई के लिए मार-काट तक की नौबत आ जाती है। चढ़ावा हो तो बहुत अच्‍छा, यदि न हो तो एक सत्ता का सुख है ही।

क्षेत्र कौन सा है, इससे ज़्यादा ज़रूरी है कि रास्‍ता तो खुला।

आर. अनुराधा said...

सुरेश जी, मुझे बुरा कतई नहीं लगा, बस यह कह रही थी कि आपने एक तरह से पिछनी पोस्ट पर कमेंट दिया है, इस ताज़ा पोस्ट पर भी आपकी कीमती बेबाक प्रतिक्रिया जानने की इच्छा है।

शेष सभी से - महिलाएं पुरोहिताई करें, अच्छा है, यह मैंने पहले चंद वाक्यों में ही कह दिया है। अर्ज सिर्फ यह है कि इस पिछड़े रास्ते से 'तरक्की' करने, की बजाए अपनी मेहनत अगड़ाई के रास्ते पर चलने में खर्च करें तो हम वास्तव में तरक्की कर पाएंगी। बात ये है कि हमें सिर्फ पहाड़ नहीं चढ़ना है, हमारा लक्ष्य तो एवरेस्ट फतह करने का रहना चाहिए। और हमें समझना पड़ेगा कि जिस पहाड़ पर हम चढ़ रही हैं, वह एवरेस्ट या किसी और चोटी तक ले जाता है या एक छोटी सी बर्फीली पहाड़ी पर चढा कर अंधे मोड़ पर पहुंचा देता है।

अर्ज ये है कि नए रास्तो/अब तक प्रतिबंधित रास्तों पर चलने की ऊर्जा तो हम खर्च कर ही रही हैं, क्या ये बेहतर न होगा कि वही ऊर्जा हम प्रगति की ओर ले जाते रास्तों पर चलने में खर्च करें। सिर्फ नए रास्ते अपने लिए खोलने के गर्व में आंखें बंद किए न रहें, देखे भी कि वह हमें आखिर कहां ले जा सकता है।

आर. अनुराधा said...

नए, अब तक वर्जित क्षेत्र में स्त्री का प्रवेश- स्वागत है। इस व्यवसाय पर भी स्त्री का हक- पूरा-पूरा समर्थन। लेकिन इस नया रास्ता खोलने के जोश में विवेक का साथ कतई नहीं छोड़ना है।
देहवृत्ति सदियों से औरतों का पेशा रहा है। अभी पुरुष भी इस 'नए रास्ते, नए पेशे' में आ रहे हैं तो क्या सब इसका ऊपर दिए गए तर्कों के आधार पर समर्थन कर रहे हैं? यह उनके लिए भी तो औरतों के एकाधिकार को तोड़ने की मुहिम है! (कृपया इस तुलना को कुतर्क न समझें। खास तौर पर इस लिए कि ज्यादातर लोग इस घटना को सिर्फ, विशुद्ध रूप से औरतों के लिए रोजगार के नए अवसर के रूप में देख रहे हैं।)

Unknown said...

अनुराधा जी, मैं जहाँ तक आपकी बात समझा हूँ, उससे पूरी तरह सहमत हूँ. जिन रास्तों पर नारी आज काफ़ी आगे निकल गई है, उन रास्तों पर चलते रह कर और नए रिकार्ड बनाए जाने चाहियें. साथ ही नए रास्तों पर चलना भी शुरू करना चाहिए. पर यह एक दूसरे की कीमत पर नहीं होना चाहिए. दोनों महत्वपूर्ण हैं. साथ ही नए रास्तों पर आने वाले संभावित खतरों से सावधान रहने की भी जरूरत है.

सिमोन बोआ की बात एकदम सही है. अपना मूल्याँकन दूसरों के बनाये हुए पैमाने के अनुसार नहीं करना चाहिए. अगर दूसरों की राय की चिंता करते रहे तो जिंदगी एक तरह से उन पर आधारित हो जायेगी. अपने कर्तव्य और उन्हें पूरा करनेके लिए अपने अधिकार स्वयं तय करना और उनके अनुसार कार्य करना चाहिए. लेकिन यह सब परस्पर प्रेम और आदर के साथ करना चाहिए.

अखाड़ों जैसे धार्मिक संस्थानों का मैं पक्षधर नहीं हूँ. अक्सर इन में सत्ता का युद्ध प्रारम्भ हो जाता है और जिन उद्देश्यों के लिए इन्हें बनाया गया है वह पीछे चले जाते हैं. जहाँ तक मंदिरों में दलितों के प्रवेश का प्रश्न है, मेरा यह मानना है कि मन्दिर तो भगवान् का घर है, उसमें प्रवेश के नियम मानव कैसे तय कर सकता है? भगवान् का घर तो सब के लिए खुला है, जो चाहे आय जाय. श्री राम ने शबरी से कहा था, 'मानहूँ एक भगति कर नाता'. बड़े-बड़े ऋषि मुनि देखते रह गए और भगवान् शबरी के घर पहुँच गए, उसके झूंठे बेर खाने. दुर्योधन और उसे के छप्पन भोग इंतज़ार करते रहे और कृष्ण पहुँच गए विदुर के घर साग खाने. जब भगवान् कोई भेद नहीं करता तो इंसान कौन होता है भेद करने वाला?

मंदिर व्यवस्था, शंकराचार्य परंपरा खोखली नहीं हैं, वह हिंदू धर्म और समाज का ठोस आधार हैं. हमें इन का वहिष्कार नहीं, सम्मान करना चाहिए. जो विषमताएं इन में आ गई हैं उन्हें दूर करना चाहिए. किसी धर्म में धार्मिक स्थानों और व्यवस्थाओं को नकारा नहीं जाता बल्कि उनमें और ज्यादा श्रदा एवं विश्वास किया जाता है. बस हिन्दुओं मैं ही ऐसा नकारात्मक सोच है. हमें इस सोच को सकारात्मक बनाना चाहिए.

स्त्रियाँ भी धार्मिक अनुष्ठान कराएँ, मेरे विचार में यह एक प्रगतिशील कदम है. हम तो अपने यहाँ यह करवा भी चुके हैं. आर्य समाज से जुड़ी दो महिलाओं ने हमारे यहाँ हवन कराया था. हमारे शास्त्री जी ने इस का प्रबंध किया था. शुद्ध उच्चारण, मंत्रों की व्याख्या, सब कुछ बैसे ही जैसे हमारे शास्त्री जी करवाते हैं. बहुत आनंद आया.

श्रुति अग्रवाल said...

अनुराधा, तुम्हारे विचारों में मुझे अपनी सोच का प्रतिबिंब दिखता है। तुम्हारी बात से बिलकुल सहमत हूँ कि यदि कुछ करना है, करके दिखाना है तो पंड़िताइन ही क्यों बने? कई ऐसे नए अवसर हैं जिन्हें अपना, आप लोगों को आवाक कर सकते हैं, साथ ही नई पीढ़ि के लिए एक नया रास्ता खोल सकते हैं। लेकिन तुम्हारे साथ एक सच्चा वाक्या बाँटना चाहूँगी।

मैंने अपने पिता को मुखाग्नि दी है...परिजनों ने विरोध किया लेकिन जल्द ही हार मान ली। उसके बाद आई पंडितों की बारी...कुछ ने सीधे मना कर दिया। इसी बीच एक महिला पंडिताईन सामने आईं...सारे क्रियाकर्म उन्होंने ही करवाएँ। उस समय का तो मुझे कुछ याद नहीं लेकिन कुछ समय बाद मैं उनसे मिलने उनके डेरे पर गई थी। काले वस्त्र पहने उस तेजस्वी पंडिताइन को देख मैं चमत्कृत रह गई। उन्होंने बताया '' मेरे पिता प्रकांड पंडित थे। पूरे रीति-रिवाज और आस्था के साथ अंतिम क्रिया करवाना पसंद करते थे। लेकिन उन्हें शंका थी कि उनकी मृत्यु के बाद लोभी और व्यवसायी पंडित उनकी अंतिमक्रिया अच्छे से नहीं करेंगे...साथ ही चिंता थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनका ज्ञान खो जाएगा।'' तब इस इकलौती बेटी ने अपने पिता से अंतिम क्रिया की पूरी रीती सीखी। श्मशान में डर नहीं लगता...इस प्रश्न पर वे मुस्कुराई थीं और बोली श्मशान में तो शिव का वास होता है। जहां मोक्ष मिले वहां डर कैसा। मेरे ख्याल से पूरे देश में चंद ही महिलाएँ होंगी जो अंतिमक्रिया करवाती हैं।

इस वाक्ये को बाँटने का अर्थ यह नहीं कि हम पंडिताइन करने लगें, बल्कि यह है कि वो करें, जो मन को अच्छा लगे। जिसे करने से आत्मा खुश हो और हम अपनी आँखों के दर्पण में अपना अक्स निहार सकें। फिर भले ही उसका पूरा करने के लिए खुद से लड़ना पड़े, पूरे समाज का सामना करना पडे़...वैसे गार्गीय और मैत्रीय जैसी विदुषी महिलाएँ इतिहास थीं और मुझे यकींन है कि भविष्य भी होंगी। तुम्हारा कैंसर पर ब्लॉग बेहद अच्छा है...यूँ भी धरती गोल है...यहाँ घूमते हुए कभी न कभी हमारी मुलाकात जरूर होगी।

Atmaram Sharma said...

bahut umda post. theek baat hai.

atmaram

स्वप्नदर्शी said...

I feel that this is a new opportunity for women, who by their circumstances and education can not afford to find the job and neither have means to become professionally skilled.
But in a new wave of women lib seek roles within the traditional system and will get accommodated very easily by society. The constant subhuman struggle and trauma turns many women to religion by 40 or so, and that's the only place where they get some space, some oxygen to breath.

There is reason why so many Gurus. swamis, and maharaaj in India have a huge audience in their pravachans, and one or more channels have been broad castings those daily. Considering that rise of women population , may serve well to some of the women swami's and sadhawii's. It is a good and flexible business. and does not demand any skills, training and constant work pressure and layoff in this unstable economy.

Now, the question is "is this good for women in longer run?" definitely a big NO

but unless, the politics, the justice system is fixed and women feel physically, emotionally and economically secure in this society, until then the escape or the morphine of religion is inevitable.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...