Wednesday, November 19, 2008

झाड़ू-पोंछे से लेखिका बनने का सफ़र

नाम बहुत आम सा "बेबी हालदार" दुबली-पतली, सांवला रंग और इच्छायें शायद अनेकों लेकिन वक्त बेवक्त ये अहसास हो जाता आखिर गरीब आदमी की औकात ही क्या होती है और ऊपर से औरत कई लोग कहते हैं किस्मत थी और कई की, वो तो उसकी लगन और मेहनत ही थी की उस मुकाम तक आ पहुँची जहाँ शायद वो अपने सजीले सपनों में ही पहुँच सकती थी आज जहाँ है वहाँ उसे देख कई लोग हैरान हैं, कई परेशान और कई बेहद खुश वो एक प्रेरणा का स्रोत है और आदर्श भी उसके बच्चे आज गर्व से कहते हैं "माई मदर इस ए राईटर" ये तो सच ही है कोई चमत्कार नहीं जब इंसान कुछ करने की ठान ही लेता है तो कोई कैसे उसे रोक सकता है फिर वो कहावत भी तो सटीक है जब कोई कुछ दिल से करना चाहता है तो कुदरत भी खुद उसके लिये कई ऐसे रस्ते बुनती है जो उसके लिये मददगार सबित होते हैं खैर आईये मिलते है बेबी हालदार से मैं उनसे मिली नहीं लेकिन उनको पङा जरूर है फिर ख्याल आया आप सब भी तो जरूर मिलना चाहेगें और मिलकर जरूर खुश होंगे जैसे मैं हुई थी सो अपनी खुशी आप सभी से बांट रही हूँ
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दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली एक नौकरानी का लेखक बन जाना किसी फ़िल्म की तरह कपोल-कल्पित कहानी लगती है. लेकिन यह चमत्कार सचमुच हुआ है और बेबी हालदार अब बाक़ायदा एक लेखिका हैं.

उनकी पहली किताब “आलो आंधारि” पिछले साल हिंदी में प्रकाशित हुई और अब तक उसके दो संस्करण छप चुके हैं। हाल ही में इसका बांग्ला संस्करण प्रकाशित हुआ है और इसका विमोचन सुपरिचित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने किया है.

“आलो आंधारि” छपने के बाद तो अड़ोस-पड़ोस में काम करने वाली दूसरी नौकरानियों को भी लगने लगा है कि ये उनकी ही कहानी है।बेबी हालदार अपने को “काजेर मेये” (काम करने वाली) कहती हैं.

29 साल पहले जम्मू-काश्मीर के किसी ऐसी जगह में उनका जन्म हुआ, जहां उनके पिता सेना में थे. अभाव और दुख की पीड़ा झेलती बेबी अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि अपनी किताब “आलो आंधारि” को मानती हैं.

पिछले दिनों वे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर पहुँचीं तो आलोक प्रकाश पुतुल ने उनसे लंबी बात की।
बेबी हालदार की आत्मकथा सुनिए उन्हीं की ज़ुबानी -

पिता सेना में थे, लेकिन घर से उनका सरोकार कम ही था। सेना की नौकरी से रिटायर होने के बाद पिता बिना किसी को कुछ बताए, कई-कई दिनों के लिए कहीं चले जाते। लौटते तो हर रोज़ घर में कलह होता।

एक दिन पिता कहीं गए और उसके कुछ दिन बाद मां मन में दुख और गोद में मेरे छोटे भाई को लेकर यह कह कर चली गई कि बाज़ार जा रही हैं. इसके बाद मां घर नहीं लौटीं.
इधर पिता ने एक के बाद एक तीन शादियां कीं. इस दौरान मैं कभी अपनी नई मां के साथ रहती, कभी अपनी बड़ी बहन के ससुराल में और कभी अपनी बुआ के घर.मां की अनुपस्थिति ने मन में पहाड़ जैसा दुख भर दिया था.यहां-वहां रहने और पिता की लापरवाही के कारण पढ़ने-लिखने से तो जैसे कोई रिश्ता ही नहीं बचा था.

शादी और दुख
सातवीं तक की पढ़ाई करते-करते 13 वर्ष की उम्र में मेरी शादी, मुझसे लगभग दुगनी उम्र के एक युवक से कर दी गई.फिर तो जैसे अंतहीन दुखों का सिलसिला-सा शुरु हो गया.पति द्वारा अकारण मार-पीट लगभग हर रोज़ की बात थी. पति की प्रताड़ना और पैसों की तंगी के बीच ज़िल्लत भरे दिन सरकते रहे.एक-एक कर तीन बच्चे हुए.उसी क्रम में दो जून की रोटी की मशक़्कत के बीच पति का अत्याचार बढ़ता गया. अंततः एक दिन अपने बच्चों को लेकर घर से निकल गई. दुर्गापुर...फ़रीदाबाद...गुड़गांव. एक घर से दूसरे घर, नौकरानी के बतौर लंबे समय तक काम किया. नौकरानी के बजाय बंधुआ मज़दूर कहना ज़्यादा बेहतर होगा. सुबह से देर रात तक की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी ख़ुशियों की कोई रोशनी कहीं नज़र नहीं आ रही थी.

प्रेमचंद के परिवार का सहारा
ऐसे ही किसी दिन मेरे एक जान-पहचान वाले ने मुझे गुड़गाँव में एक नए घर में काम दिलवाया. यहां मैंने पाया कि इस घर का हर शख़्स मेरे साथ इस तरह व्यवहार करता था, जैसे मैं इस घर की एक सदस्य हूँ.

बांग्ला में लिखी किताब पहले हिंदी में छपी
घर के बुजुर्ग मुखिया, जिन्हें सब की तरह मैं भी तातुश कहती थी, (यह मुझे बाद में पता चला कि इसका अर्थ पिता है) अक्सर मुझसे मेरे घर-परिवार के बारे में पूछते रहते. उनकी कोशिश रहती कि हर तरह से मेरी मदद करें.कुछ माह बाद अतिक्रमण हटाने के दौरान मेरे किराए के घर को भी ढहा दिया गया और अंततः तातुश ने मुझे अपने बच्चों के साथ अपने घर में रहने की जगह दी. इसके बाद दूसरे घरों में काम करने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया. तातुश के घर में सैकड़ों-हज़ारों किताबें थीं. बाद में पता चला कि तातुश प्रोफ़ेसर के साथ-साथ बड़े कथाकार हैं. उनकी कहानियां और लेख इधर-उधर छपते रहते हैं. उनका नाम प्रबोध कुमार है. और यह भी कि तातुश हिंदी के सबसे बड़े उपन्यासकार प्रेमचंद के नाती हैं.

अक्सर किताबों की साफ़-सफ़ाई के दौरान मैं उन्हें उलटते-पलटते पढ़ने की कोशिश करती। ख़ास तौर पर बंगला की किताबों को देखती तो मुझे अपने बचपन के दिन याद आ जाते।

तातुश ने एक दिन मुझे ऐसा करते देखा तो उन्होंने एक किताब देकर मुझे उसका नाम पढ़ने को कहा। मैंने सोचा, पढ़ तो ठीक ही लूंगी लेकिन ग़लती हो गयी तो? फिर तातुश ने टोका तो मैंने झट से किताब का नाम पढ़ दिया-“आमार मेये बेला, तसलीमा नसरीन!” तातुश ने किताब देते हुए कहा कि जब भी फुर्सत मिले, इस किताब को पढ़ जाना।

फिर एक दिन कॉपी-पेन देते हुए तातुश ने अपने जीवन के बारे में लिखने को कहा. मेरे लिए इतने दिनों बाद कुछ लिखने के लिए कलम पकड़ना किसी परीक्षा से कम न था.

लिखने का सिलसिला
मैंने हर रोज़ काम ख़त्म करने के बाद देर रात गए तक अपने बारे में लिखना शुरु किया. आपबीती लिखना दुखों का सामना फिर करने की तरह था.पन्नों पर अपने बारे में लिखना ऐसा लगता था, जैसे फिर से उन्हीं दुखों से सामना हो रहा हो. तातुश उन पन्नों को पढ़ते, उन्हें सुधारते और उनकी ज़ेराक्स करवाते. लिखने का यह काम महीनों चलता रहा.

एक
दिन मेरे नाम एक पैकेट आया, जिसमें कुछ पत्रिकाएं थीं। अंदर देखा तो देखती रह गयी. अपने बच्चों को दिखाया और उन्हें पढ़ने को कहा. मेरी बेटी ने पढ़ा - बेबी हालदार! मेरे बच्चे चौंक गए-“मां, किताब में तुम्हारा नाम.” तातुश के कहानीकार दोस्त अशोक सेकसरिया और रमेश गोस्वामी ने कहा-ये तो एन फ्रैंक की डायरी से भी अच्छी रचना है. मैं अपनी कहानी लिखती गई॥लिखती गई.

फिर एक दिन एक प्रकाशक आए. वो मेरी किताब छापना चाहते थे. तातुश ने मेरी बंगला में लिखी आत्मकथा का पूरा अनुवाद हिंदी में कर दिया था. इस तरह मेरी पहली किताब छपी- “आलो आंधारि.” कोलकाता के रोशनाई प्रकाशन ने इस किताब को प्रकाशित किया है. कुछ ही समय में किताब का दूसरा संस्करण निकला... फिर इसका बांगला संस्करण.

इधर मैंने हाल ही में अपनी दूसरी किताब पूरी की है। अब मेरी बेटी बड़े गर्व के साथ मेरा परिचय देती है- माइ मदर इज़ अ राइटर इस किताब में “आलो आंधारि” के छपने के बाद मेरे जैसी नौकरानी के प्रति समाज के व्यवहार में आए बदलाव को केंद्र में रखा गया है। ज़ाहिर है, कल तक जो लोग मेरी तरफ़ देखते भी नहीं थे, वो अब मुझसे बात करने को लालायित रहते हैं।

हर रोज़ कई चिट्ठियां आती हैं। अंधेरे और उजाले की मेरी इस कहानी का कोई नाट्य रुपांतरण करना चाहता है, कोई किसी और भाषा में अनुवाद। कोई इसका काव्य रुपांतरण करना चाहता है तो कोई इस पर फ़िल्म बनाना चाहता है। पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में इस पर चर्चा हो रही है।

लेकिन मैं कोई लेखिका नहीं हूं, मैं तो अब भी एक काजेर मेये (काम करने वाली) ही हूं। मैं तो अब भी यह समझ नहीं पाती कि मेरी अपनी कहानी लोगों को क्यों इतनी पसंद आई। तातुश को पूछती हूं तो वो टाल जाते हैं।हां, कल तक मेरे बच्चे अपनी मां का परिचय देने में शरमाते थे।
मैं गुड़गाँव में ही रहती हूँ. अब मेरी बेटी बड़े गर्व के साथ मेरा परिचय देती है- माइ मदर इज़ अ राइटर.
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मुझे उम्मीद है आप सब भी "बेबी हालदार" से मिलकर खुश हुये होगें

(इन्टरव्यू : बी।बी।सी। हिन्दी के सौजन्य से)

19 comments:

vimmi said...

sangeeta ji .....bahut hi achha laga beby haldaar ji ke baare me jaan kar.........ek sarahneeya prayas.....aur ham sabko sabak lene ki prerna......

डॉ .अनुराग said...

जी हाँ इनके बारे में पढ़ा था आहा जिंदगी ओर कथादेश में .....

Neelima said...

धन्यवाद संगीता ! यह किताब निशिचित तौर पर पठनीय और संग्रहणीय है !

ghughutibasuti said...

पढ़कर अच्छा लगा । पहले भी इनके बारे में पढ़ा था आज और विस्तार से पढ़ने को मिला। धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

iqbal abhimanyu said...

Maine yah kitab hindi me padhi hai. bahut hi achhi lagi, aap sab bhi padhiye. Lekhika ke baare me jaankar achha laga.

Vinay said...

मुश्किल कभी हायल नहीं, हम ख़ुद हायल रहते हैं।


(हायल: बाधक)

दिनेशराय द्विवेदी said...

यह पुस्तक नहीं पढ़ी है। पढ़ने की कोशिश करता हूँ। पर लगता है सच बिना किसी आवरण के सामने आया होगा।
बेबी के जीवन को बदलने में प्रबोध कुमार जी की महति भू्मिका है, उन्हों ने कचरे में पड़े हीरे को पहचाना।

सागर नाहर said...

धन्यवाद संगीताजी,
बेबी हालदार के बारे में बताने के लिए। बेबी कईयों की प्रेरणा स्त्रोत बन गई होंगी।

पारुल "पुखराज" said...

dhanyavaad sangeeta...din ki sabsey acchhi post!!!

अपना अपना आसमां said...

बेबी हालदार के बारे में जहां-तहां पत्रिकाओं में पढ़ा था...पर पहली बार उनके शब्दों में उनकी संघर्षगाथा पढ़ने को मिली। जाहिर तौर से एक बेबी ज़िंदगी की बाधाओं और कठिनाइयों पर विजय की एक बड़ी मिसाल हैं। आंखे नम हो गईं...। दिल को छू जाने वाली सामग्री प्रस्तुत करने के लिए बधाई!
सुमित सिंह

सतीश पंचम said...

प्रबोध कुमारजी को उनकी इस हीरे की तराश पर बधाई। साथ ही बेबी हालदारजी को भी मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

आज पता चला कि सचमुच कमल कीचड मे ही खिलता है

(कुछ ईधर कि-कुछ उधर की)
http://bakwaashibakwaas.blogspot.com

umesh chaturvedi said...

मैंने ये पुस्तक सामयिक वार्ता के प्रबंध संपादक भाई महेश जी के चलते पूरी पढ़ी है। बेबी हालदार की कहानी अपने आसपास काम करती दूसरी काम वाली महिलाओं की ही जैसी होते हुए भी इस मायने में अहम है - क्योंकि इसे बेबी हालदार ने लिखा है। ना सिर्फ लिखा है - बल्कि आंखों में आंसू लाने के लिए मजबूर कर दिया है। आलो आंधारि पढ़ने के बाद भले ही लगे कि बेबी हालदार अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ चुकी हैं। लेकिन हमारे जैसे पाठकों के मन में हजारों सवालों के साथ अंधेरा और बढ़ जाता है। सवालों के केंद्र में होती है चिंता कि आखिर कब तक सृष्टि में कुछ लोग --कुछ औरतें ऐसे दारूण दुख भोगती रहेंगी।

mehek said...

sach manana padega itani himmat aur hausla,aisi lekhika ko naman

आनंद said...

बहुत प्रेरक... अब तो किताब पढ़नी ही पड़गी।

- आनंद

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

जयपुर में पिछले साल साहित्या उत्सव में रिपोर्टिंग के दौरान जब मैं बेबी हाल्दार का इंटरव्यू ले रही थी, तो मैंने उनसे एक प्रश्न किया था, कि लेखन ने आपके लिए जिन्दगी कैसी बदली। बेबी की बगल में दीप्ति नवल और सामने मैं बैठी थी और बेबी ने टूटी फूटी हिन्दी में जवाब दिया कि आप मेरे पास बैठी हैं। यही क्या कम अचीवमेंट हैं। वरना क्या मुझ जैसी एक कामवाली बाई को आप अपने बगल में बैठाती।

सलमान रश्दी और किरण देसाई जैसे लेखकों की बजाय बेबी हालदार का इंटरव्यू आज भी मेरे लिए अविस्मरणीय है। लेकिन एक बात स्वीकारनी होगी कि वे इतनी हिम्मती हैं कि सारी दुनिया को अपने खिलाफ पाकर भी उसने लिखा और झाड़ू पोंछा करते हुए भी अपने लिए वो स्थान पा लिया जिसके लिए लोग सिर्फ सोचते रह जाते हैं।

Anonymous said...

वरिष्ठ पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल ने सबसे पहले बेबी हालदार की कहानी बीबीसी में सामने लाई http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2004/08/040829_haldar_story.shtml और उसके बाद तो बेबी को लेकर जाने कितनी रिपोर्ट छपी. आपने भी बहुत समग्रता में इसे छापा है.

स्वप्नदर्शी said...

very nice. Thanks for sharing this story. This reminds me of someone, a house maid who use to write poems in Lucknow. One of my friend gave me her poems to read and asked about my opinion. For sure, there was life experiences and a lot of "tana-bana" about the Bhakti-poems, poems typically addressed to god for salvation and some were typical tukbandee around the bollywood songs too.

Of course with best of our helping instincts, we could not see a future for her publishing all that. Neither we were resourceful enough, and what so ever had no connections to go around, to help her. We were just students, and all our energy concentrated towards a high acedemic gearing.

On retro-respect, I feel that association with words and rhymes, and books, opens opportunity for all of us , all human beings to see the unseen. Something that extends our being and brings light, courage, experience to our life which is otherwise not possible in the routine and harsh life.

आर. अनुराधा said...

बहुत प्रेरक है बेबी की कहानी। लेकिन वह अकेली तो नहीं। इस तरह की कई कहानियां हमारे आस-पास होंगी। क्यों न इस मंच पर उन पॉजिटिव कहानियों को भी शेयर करें। जरूरी नहीं कि उपलब्धि एक प्रकाशित किताब जितनी बड़ी हो। जैसा स्वप्नदर्शी ने कहा, लखनऊ में उनकी जानी एक काम वाली कविताएं लिखती थी। क्यों न उन्हें भी हम सामने लाने की कोसिश करें। मैं नजर रखती हूं, आप भी तलाशें ऐसी, और इससे भी 'समृद्ध' बेबियों को।

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