Thursday, November 27, 2008

अब डर कैसा

अब डर कैसा
अब जब शुभ काम होना तय हो ही गया है तो सबने कहा कि कोई पंगा न करो । मेरा तो बहुत मन था कि मैं अपने कौशल भैया को भी कानपुर सगाई के लिए बुलाउं । लेकिन सब उनसे पूछे बिना ही कह रहे हैं कि वे अपने कामधंधे में व्यस्त हैं । उन्हें शादी पर बुला लेना । अभी उनकी मां को ही साथ ले चलते हैं । न चाहते हुए भी मैंने कहा चलो ठीक है । सगाई हो ही गई और उसके साथ ही नई समस्या ख़डी हो गई कि शादी कहां होगी । कानपुर शादी करवानी बहुत मंहगी पड़ेगी, इसलिए लड़के वाले चाहते हैं कि सहारनपुर में ही शादी हो जाए, लेकिन फिर सारी जिम्मेदारियां जो लड़केवालों की होती हैं वे भी मां पर ही आ पड़ेंगी । अंतत: मां ने ही सारी जिम्मेदारी ओढ़ ली । हम लड़कीवाले जो ठहरे। और कई तरह की अडचनों को पार करते हुए, शादी भी हो ही गई । खूब खुशियां मनाई गई भाभी को बड़ी वाहवाही मिली कि एक विकलांग लड़की की शादी करवाकर उन्होंने बड़े पुन्य का काम किया है । भाभी बहुत खुश थीं ।मैं सहारनपुर के स्टेशन पर अपने नए नवेले दुल्हे और सास के साथ खड़ी थी । द्रेन आ गई और मैं मां से अलग होकर अपने नए परिवार के साथ अपने को बैठा हुआ देखती हूँ । मन में एक टीस सी उठती है । हालात का ऐसा जादू कि मैं अपने पर भी उसी का नियंत्रण सा महसूस कर रही थी । मां से जाकर चिपक जाना चाहती थी लेकिन पैर जैसे जम से गए थे । गाड़ी चल पड़ी और मां की डबडबाती आँखें मेरे सीने में कहीं गड़ सी गईं । मैं गुमसुम सी खिड़की के पास बैठ गई और मेरा दुल्हा और सास सामने बैठे कभी कनखियों से मुझे देखते और कभी आपस में कुछ धीमे धीमे बात कर लेते । मैं उदास तो थी लेकिन यह भी चाह रही थी कि किसी से बात करूं या कोई मुझसे ही बात कर ले । लेकिन नई दुल्हन का संकोच कैसे छोडती । पूरा सफर चुप रहकर ही काटना पड़ा । जाने कब आँख लग गई और जागी तो गाड़ी से उतरने की गहमागहमी में मैंने अपने को भी कानपुर स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़े पाया । आटो में अपना सारा साजो सामान रख मैं अपने नए परिवार के साथ अपने नए घर पहुँची । सुबह का मौसम ठंडक भरा था । नमी और ओस की ठंडक भरी हवा से मेरा समूचा शरीर कांपने सा लगा । लेकिन नए रिश्ते की गर्मी ने तन मन दोनों से मौसम की ठंडक के एहसास को गायब सा कर दिया । इस तरह मैं आई थी तुम्हारे घर नई नवेली दुल्हन बन कर ।इन सब बातों को बीते अभी दो ही साल हुए होंगे लेकिन, मुझे ऐसा लग रहा है मानो अरसा बीत गया । मुझे तो ऐसा लग रहा है ये मानो मेरा तीसरा जन्म है । पहला जन्म शादी से पहले, दूसरा शादी के बाद और तीसरा अब जब जिंदगी फिर एक बार रिश्तों को नए सिरे से समझने को मज़बूर है। मैने तो हर संभव कोशिश की । मां से छुप छुप कर बहुत से समझौते किए । लेकिन अपनी जिंदगी खोकर तो मैं यह रिश्ता नहीं निभा सकती थी । साल भर ससुराल में रहने और हर तरह से वहां की जिंदगी में ढलने की कोशिश करते करते मुझे पता ही नहीं चला कि कब बीमारी ने मुझे जकड़ लिया । मां ने जब सुना कि लगातार पंद्रह बीस दिन में बुखार चढ़ने की बात सुनी तो डाक्टर के पास ले गयी । पूरी जांच हुई ।खतरनाक हद तक ब्रोंकाइटिस और वजन मात्र २६ किलो डाक्टर भी देखकर हैरान कि आप जी कैसे रही हैं । मां ने ता ठान लिया कि अब चाहे कुछ हो जाए । मैं अपनी बेटी को दोबारा मरने के लिए ससुराल नहीं भेजने वाली । उन्हें अपनी उस भांजी की याद हो आई जो गर्भावस्था में अपनी मां, अपने भाई और पिता से सहायता मांग थक गई लेकिन सबने उसे ससुराल वालों की जिम्मेदारी समझ उसके हाल पर ही छोड़ दिया ।

2 comments:

सुजाता said...

बेहद कटु है पर सत्य है ,बीमारी मे बहू मायके और ससुराल वालों के बीच कैसे डोलती है सहायता के लिए मैने बहुत बार सुना है ...जल्द ही इस पर एक सत्य घटना का वर्णन करूंगी ।

Anonymous said...

मानवीयता को तार तार करते ये हमारे रिश्ते,
क्या सामाजिक बंधन जरुरी है,
ऎसी घटनाओं से कभी कभी लगता है की हमें हमारा समाज चाहिए ही नही,
अपने दर्द के सौदागर.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...