Monday, December 8, 2008

इन्हें चांद चाहिए

राजकिशोर

अलोकप्रिय या अलोकप्रिय बना देनेवाली बात कहने से घबराना नहीं चाहिए, यह सिद्धांत 'हितोपदेश' से जरा आगे का है। प्रस्ताव यह है कि 'सत्य वही बोलो जो प्रिय भी हो' की नीति व्यक्तिगत मामलों के लिए तो ठीक है, पर सामाजिक मामलों में कटुतम सत्य बोलने की जरूरत हो तो संकोच नहीं करना चाहिए। इसी आधार पर स्त्रियों के यौन शोषण के एक तकलीफदेह पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। आशा है, मेरी नीयत पर शक नहीं किया जाएगा। लेकिन कोई शक करता भी है, तो मुझे परवाह नहीं है। यह लड़ाई सच की है और सच के मामले में निजी फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता।

तो किस्सा यह है कि यौन शोषण के हर मामले में पुरुष ही सब तरह से दोषी नहीं होता। यह सच है कि पुरुष से भी हम वैसे ही संयम की उम्मीद करते है जैसे स्त्री से। किसी स्त्री की स्थिति का लाभ उठाना महापाप है। यह हर स्त्री जानती है कि वह जैसी भी है, पुरुष कामना का विषय है। भगवान ने उसे ऐसा ही बनाया है। यदि ऐसा नहीं होता, तो इस सृष्टि या जगत के जारी रहने में गंभीर बाधा आ जाती। यह स्त्री की शक्ति भी है। प्रेम या विवाह में स्त्री की इस शक्ति और पुरुष की कामना का सुंदर समागम होता है। स्त्री-पुरुष के साहचर्य में यह समागम केंद्रीय होना चाहिए। बाकी सब छल या माया है।

स्त्री पर भी इस छल या माया का आरोप लगाया गया है। अनेक मामलों में पाया गया है कि पुरुष ही स्त्री को प्रदूषित नहीं करता, स्त्री भी पुरुष को प्रदूषित करती है। यौन जीवन के सभी सर्वेक्षणों में यह तथ्य उजागर होता रहा है कि कई पुरुषों ने स्त्रीत्व का पहला स्वाद अपने से ज्यादा उम्र की भाभी, चाची या मामी से प्राप्त किया था। मैं यह नहीं कह सकता कि यह अनैतिक है। जो बहुत-से मामले नैतिक-अनैतिक के वर्गीकरण से परे हैं, उन्हीं में एक यह है। सभी मनुस्मति या भारतीय दंड संहिता को कंठस्थ करने के बाद जीवन के गुह्य पहलुओं का ज्ञान या अनुभव प्राप्त नहीं करते। संस्कृति के साथ-साथ प्रकृति के भी दबाव होते हैं। संत वही है जो इस दबाव से मुक्त हो गया है। बाकी सभी लोग कामना और कर्तव्य के बीच झूलते रहते हैं तथा पारी-पारी से आनंद का सुख और ग्लानि का दंश महसूस करते हैं।

इसीलिए दुनिया में सच है तो धोखा भी है। कोई गुरु अपनी शिष्या को, मैनेजर अपनी अधीनस्थ कर्मचारी को और नेता अपनी अनुयायी को धोखे में रख कर यौन सुख हासिल करता है, तो वह इसलिए अपराधी है कि उसने अपनी उच्चतर स्थिति का नाजायज फायदा उठाया है। किसी अत्यंत पवित्रतावादी समाज में ऐसे अपराधियों को गोली से उड़ा दिया जाएगा। कुछ मामलों में सच्चा प्रेम भी हो सकता है, जिसका अपना आनंद और अपनी समस्याएं हैं, पर अधिकतर मामलों में किस्सा शोषण का ही होता है। माओ जे दुंग की सीमाहीन बहुगामिता का खुला रहस्य यही है। भारत में जनतंत्र है, पर यहां भी ऐसे किस्से अनंत हैं। यहां तक कि साधु, योगी, तांत्रिक और मठाधीश भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल पाते।

लेकिन ऐसी स्त्रियों की उपस्थिति से कौन इनकार कर सकता है जो अपने स्त्रीत्व के आकर्षण का अवसरवादी लाभ उठाती हैं? वे जानती हैं कि पुरुष की नजर में वे काम्य हैं और इस काम्यता का लाभ उठाने की लालसा का दयनीय शिकार हो जाती हैं। किसी को एमए में र्फस्ट होना है, किसी को, अपात्र होने पर भी, लेक्चररशिप चाहिए, कोई चुनाव का टिकट पाने के लिए लालायित है तो किसी को, परिवार की आय कम होने के बावजूद, ऐयाशी और मौज-मस्ती का जीवन चाहिए। किसी को टीवी पर एंकर बनना है, कोई फिल्म में रोल पाने के लिए बेताब है, कोई अपनी कमजोर रचनाएं छपवाना चाहती हैं, किसी को जल्दी-जल्दी प्रमोशन चाहिए तो कोई लाइन तोड़ कर आगे बढ़ना चाहती है। कोई-कोई ऐसी भी होती है जो खुद पीएचडी का शोध प्रबंध नहीं लिख सकती और अपने प्रोफेसर-सुपरवाइजर से लिखवा कर अपने नाम के पहले डॉक्टर लिखना चाहती है। ज्यादा उदाहरण देना इसलिए ठीक नहीं है कि हमें समाज का बखिया उधेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। पर यह जरूर याद दिलाना चाहते हैं कि जिस स्त्री शक्ति के परिणामस्वरूप ये सारी इच्छाएं आनन-फानन में पूरी की जा सकती हैं, उसी का राजनीतिक उपयोग करते हुए सामंती काल में सुंदर कान्याओं को विष का क्रमिक आहार देते हुए और उसकी मात्रा बढ़ाते हुए विषकन्या का करियर अपनाने के लिए बाध्य किया जाता था। आज भी जासूसी के काम में स्त्रियों को लगाया जाता है। जिस आकर्षण का दुरुपयोग वे राज्य के काम के लिए कर सकती हैं, उसका अनैतिक इस्तेमाल वे अपने अवैध स्वार्थों की पूर्ति के लिए क्यों नहीं कर सकतीं?

एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता। बहुत-सी ऐसी स्त्रियां भी यौन हेरेसमेंट का शिकार बनाए जाने की शिकायत करती हैं जिन्होंने यह हरेसमेंट काफी दिनों तक इस उम्मीद में सहन किया कि उनका काम हो जाएगा। जब काम नहीं बनता, तो वे शिकायत करने लगती हैं कि मेरा शोषण हुआ है या मुझे परेशान किया गया है। मुझे रत्ती भर भी संदेह नहीं कि ऐसे मामलों में भी पुरुष ही अपराधी है। लेकिन यह सोच कर कम दुख नहीं होता कि कि हमारी बेटियां-बहनें इस जाल में अपनी मर्जी से दाखिल ही क्यों होती हैं। 'हम प्यार में धोखा खा बैठे' -- यह एक स्थिति है। दूसरी स्थिति यह है कि यह धोखा जान-बूझ कर खाया गया, क्योंकि नजर कहीं और थी। यह एक ऐसा मायावी संबंध है, जिसमें दोनों शिकार होते हैं और दोनों ही शिकारी।

कुल मिला कर स्थिति बहुत ही पेचीदा है। पुरुष की ओर से पेच ज्यादा हैं, पर कभी-कभी स्त्री भी पेच पैदा करती है। यह सच है कि अपने स्त्रीत्व का शोषण करनेवाली स्त्रियों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं होगी, पर यह धारणा गलत नहीं है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। यहां मामला तालाब को गंदा बनाने की नहीं, उसकी छवि बिगाड़ने का है। इसलिए 'सब धान तेइस पसेरी' का सोच एकांगी है। फिर भी, स्त्रियों का दोष कम करके आंका जाना चाहिए, क्योंकि वे जन्म से ही अन्याय और भेदभाव का शिकार होती हैं तथा अनुचित तरीके से अवैध लाभ हासिल करने के लालच में पड़ जाती हैं। ये अगर चांद की कामना न करें, तो इनकी गरिमा को कौन ठेस पहुंचा सकता है?

27 comments:

Anonymous said...

I read this article on kavitas blog yesterday
Even today 99% of man and woman as well think that the rise of woman in career is because she is a woman { or that woman makes a rise in career only becuase she has a female body }
this is an age old perception that man work hard and get sucess where as woman sell their body { or yu can call the woman charm } and get the sucess .

the author is also going by the same perception that if woman should not desire for moon because if they desire for moon than they can get moon only if they make a ladder of their body


its a wrong percepttion all together and the woman who have risen in career are also working hard to get sucess .

exploitation of "need" is there every where irrespective of the gender and even man have to do "cchores " that are not part of office to keep the CR intact . chores like getting drinks for their boss , getting cigrettes for their boss , aaranging for the bosses car getting serviced and now in certain career even man are exploited sexually

i strongly put my vote against this view

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

यह धारणा इसलिए बनी है क्योंकि अधिकतर बास पुरुष ही होते हैं। आज की परिस्थिति में यह शायद सही भी हो। यदि महिला बास हो, तो ऐसे भी पुरुष मिल जाएंगे जो अपने देह के उपयोग से सीढी चढ पायें। यह किसी लिंग से जुडी बात नहीं अपितु परिस्थिति से जुडी है।

आर. अनुराधा said...

"एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता।"


"ये अगर चांद की कामना न करें, तो इनकी गरिमा को कौन ठेस पहुंचा सकता है?"
इन दो वक्तव्यों से मैं कतई असहमत हूं। राजकिशोर जी, दोबारा सोचें, पीड़ित के नजरिए से। आज के समय में किसी के लिए दारू-सिगरेट लाने और सेक्शुअल हरासमेंट में कोई फर्क नहीं रह गया है क्या? अगर ऐसा है, तो मैं सायद समय से बहुत पीछे हूं।, और इसी बिनाह पर मेरे इस नजरिए के लिए माफ करें।

arun prakash said...

सुजाता जी आपने बहुत सही चित्रण किया है पुरूष मानसिकता की और स्त्रियों की .... कहीं कहीं
आपका यह कथन की पारी पारी से आनंद और ग्लानी का दंस महसूस करतें है यह कथन सभी पुरुषों के साथ है स्त्रियों के साथ न्यून मात्रा में है सशक्त अभिव्यक्ति खास तौर से तीसरा पैरा तो अटल सत्य है

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

राजकिशोर जी ने बहुत सन्तुलित ढंग से अपनी बात रखी है। कोई भी बात ऐसी नहीं है जिससे नारी जाति के बारे में कोई अनादर झलकता हो। लेकिन जिन बातों का उदाहरण दिया गया है उनमें सच्चाई से इन्कार करना एक विशेष पूर्वाग्रह को परिलक्षित करता है।

अच्छे और बुरे लोग हर स्थान, जाति, धर्म और लिंग में पाये जाते हैं। सबका सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। न ही लेखक की ऐसी मन्शा लगती है। जिस प्रकार पुरुष वर्ग के बारे में जितनी नकारात्मक बातें कुछ नारीवादी लेखिकाएं कहती हैं वे सभी पुरुषों के लिए सही नहीं हो सकती उसी प्रकार यहाँ कही गयी बात सभी महिलाओं के लिए नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऐसे मामलों का अस्तित्व ही नहीं है।

लेखक ने एक सच्चाई की ओर इशारा किया है जो कत्तई प्रिय नहीं है लेकिन विचार करने पर मजबूर अवश्य करती है।

Rajat Yadav said...

पढ़ा और सहमत हूँ.

यह भी एक रूप है और जरूरत है कि इसे अनदेखा न किया जाय. अन्यथा विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है.

himanshu said...

मैं रचना जी के साथ सहमति जताते हुए विरोध दर्ज़ कराता हूं.

श्रुति अग्रवाल said...

राजकिशोर जी, क्या बोरी में से कुछ चावल के दाने निकालकर परखने की तरह समाज को परखना उचित है। आप समाज के एक छोटे से तबके का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं......शायद इसलिए कि आप स्त्री नहीं है। किसी की माँ, बहन, बेटी, बीवी या घर की इज्जत नहीं हैं(सोचिएगा कि लड़कियों को ही घर की इज्जत क्यों कहा जाता है।) शायद इसलिए कि कुछ आँखों से झलकती गंदगी से आपकी नजरों ने खुद को अपमानित महसूस नहीं किया।

भाईसाहब आप सिर्फ आफिस की बात कर रहे हैं। शायद कुछ मौका परस्त लोगों की जिसमें पुरूष और स्त्री दोनों ही शामिल हैं। लेकिन दुनिया की आधी आबादी में शामिल अधिकांश स्त्रियाँ हर मौके पर सैक्चुअल हैरेसमेंट का शिकार होती हैं। ऐसे समय में लंपट पुरूषों का क्या करेंगे...इन स्थितियों पर तनिक विचार कीजिएगा (सोचिएगा भी क्योंकि यह स्थति किसी की भी माँ, बहन, बेटी या परिचिता के साथ हो सकती है क्योंकि सृष्टि की सजृनता का अधिकार सिर्फ महिला के पास है)

उस माँ का दर्द,तड़प और अपमान महसूस कीजिए जो ट्रेन या बस में अपने मासूम को अमृतपान कराने से पहले आस-पास सहमी हिरणी सी ताकती है...कहीं कोई देख न ले। माकूल उपाय करती है। फिर जैसे ही मासूम संतोष की सांस लेता है। माँ खुश हो नजर उठाती है तो दो-चार घिनौनी आँखों को अपनी ओर उठा देख .....आगे क्या लिखूं?

एक तेरह साल की किशोरी बास्केटबॉल खेल रही है...। उसका गेम्स टीचर उसे खेल के गुर बताते हुए यह भी समझा देता है कि वह बड़ी हो रही है? मर्यादा मुझे खुला लिखने से रोक रही है ...लेकिन मैं क्या कहना चाहती हूँ सभी समझ सकते हैं। आगे यह भी बताना चाहती हूँ कि वह किशोरी अगले ही दिन से खेल-कूद से दूर होने लगती है ...घर की दादी-नानी की सलाह जो आज तक नागवारा गुजरती थी...वह मानते हुए दुपट्टा ओढ़ने लगती है।

एक बारह साल की बच्ची ( घरेलू नौकरानी) पोछा लगा रही है। उसकी पिता की उम्र से बड़ा मालिक उसे घिनौनी नजरों से देखता है...अब उस बच्ची का क्या कसूर । हो सकता है मालिक बहला-फुसलाकर उस बच्ची से संबंध भी बना ले। अब आप कहेंगे कि किसी स्त्री की सहमती के बिना संबंध नहीं बनाया जा सकता। अब यह बच्ची किस स्त्री की श्रेणी में आती है यह तय करने का अधिकार मैंने आप पर छोड़ा...

एक युवती है। तेज तर्रार है, काम में माहिर साथ ही सुंदर। कालेज और घर की चाहरदिवारी से अभी-अभी बाहर निकली है। साथी लड़कों में शर्त लगती है - बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधेगा, या यह तो पट ही नहीं सकती। एक जांबाज सामने आते हैं...बाकी सब उनके भगत बने " उनकी तारीफों और अच्छाईयों का उस युवती के सामने ढ़िठोरा पीटते हैं। "

युवती की हर मुश्किल में यह सो काल्ड गुड मैन सामने आता है। यह भी छिपाया जाता है कि ये गुडमैन पहले ही शादीशुदा है। लड़की प्यार में गिरफ्तार। फिर फिल्मी स्टाइल में शादी....जिसमें न तो घराती न ही बराती शामिल।

लंबा अरसा बीतने के बाद लड़की को पता चलता है कि सामने वाला तो पहले ही शादीशुदा था। अब यह युवती यह न कहे कि "प्यार में धोखा खाया" तो क्या कहे। हाँ चंद लोग जरूर उस पर गंदी लड़की होने का तमगा जड़ देंगे और कहेंगे कि तलाब को गंदा कर रही है। यह तीनो वाक्यें हम में से हरएक को हर जगह फैले-परसे मिल जाएँगें....इसलिए यदि हमें जानना हो, समझना हो तो पहले अपने आप को हमारी जगह रख कर देखे.....तब आप दुनिया की आधी आबादी और सैक्सचुअल हैरेसमेंट का दर्द समझ पाएँगें...शायद अनुराधा की तरह मैं भी आपको पुरातनपंथी लगू...लेकिन मुझे लगता है स्त्रियों के लिए समय ही नहीं बदला है चाहे फिर वह महाभारत की द्रोपदी हो या 21 वीं सदी की कोई यंग प्रोफेशनल डेशिंग लेडी!

Unknown said...

श्रुति जी से सहमत, एक बात मैं अपनी तरफ़ से जोड़ना चाहता हूं कि "अनावृत्त" स्त्री देह को देखकर जिसके मन में "लालसा" न जागे वह या तो महापुरुष है या फ़िर पुरुष ही नहीं है…… है तो यह गलत बात, लेकिन कड़वा सच है। हाँ, यदि स्त्री "मजबूर" या "दबी" हुई है और तब पुरुष बुरी नजर रखे तब तो उसकी आँखें निकाल लेना ही उचित है…

ghughutibasuti said...

सुरेश जी, लालसा जागना या न जागना लालायित की समस्या है । एक बढ़िया मकान, कार, या दुकान में रखे कुछ,एक बगीचे में लगे फूलों, या फिर एक नन्हे प्यारे बच्चे को देख उसे गोद में लेने, दुलारने की या फिर हो सकता है कि किसी पुरुष को देखकर भी किसी की लालसा जागृत हो सकती है । इसका उपाय लालायित को ही करना होता है । यदि पाने की संभावना हो तो यत्न करता है और न हो तो अपना रास्ता नापता है। उसकी लालसा का इलाज मकान, दुकान, कार आदि को ढककर या छिपाकर नहीं किया जाता । न ही लालसा के पात्र को लालायित करने का दोषी ठहराकर इलाज किया जाता है । यदि लालायित को अपनी लालसा पर लगाम कसना न आता हो तो उसके लिए अपनी आँखें बन्द करना ही एक इलाज बचता है ।
घुघूती बासूती

Anonymous said...

waah shruti likhtee rahen
जब ही कोई औरत कपडे उत्तार कर
तस्वीर अपनी खिचाती हैं
सबको नग्नता उसमे नहीं
उसके काम मे नज़र आती हैं
पर उसकी नग्न तस्वीर
ना जाने क्यों ? ऊँचे दामो मे
मन बहलाव के लिये खरीदी जाती हैं ।
अभी ना जाने और कब तक
मन के कसैले पन को
भूलने के लिये लोग तेरी तस्वीर
अपने घरो , कमरों , दीवारों पर टांगेगे
किसी भी उम्र के हो वो
पर औरत की तस्वीर
यानी एक मन बहलाव का साधन
कभी किताबो मे , कभी पोस्टर मे
और कभी ब्लॉग पर घूमती हैं
तस्वीरे औरतो की

http://chitthacharcha.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html

is link par asehmati dee thi par yae asmati ham sab ko kab tak daeni hogee

सुजाता said...

"चाँद" की कामना का प्रतीकार्थ यदि असम्भव ,अप्राप्य ,दुर्लभ की कामना से है तो मै मानूंगी कि एक आम आदमी की तरह सहज हो कर जीवन गुज़ार पाना भी स्त्री के लिए किसी असम्भव,दुर्लभ की कामना से कम नही है।जीवन भर दुनिया उसके लिए असहज माहौल ही रचती है।

जबकि तरक्की के लिए रिश्वत,चापलूसी ,तरह-तरह के हथकंडे अपना कर आगे बढने वाले पुरुषों की कमी नही तो ऐसी स्त्रियाँ भी अवश्य होंगी ही ..इसलिए अनफेयर मींस का ही मामला है ....इसे नैतिक-अनैतिक वाली श्रेणी मे रखना मुझे ज़रा विचित्र लगता है।
लेकिन इतना अवश्य है कि रिश्वत देने के बाद भी जब काम नही बनता तो आप रिश्वत लेने वाले को ही दोषी नही ठहरा सकते ,आप बराबर दोषी हैं ।इसी तरह यौन शोषण का रूप देह के इस्तेमाल को देना जबकि आपका काम नही बना ...तो भी आप बराबर दोषी हैं।
लेकिन अधिकांशत: बात दूसरी तरह की होती है। कि लड़कियाँ लिहाज़ के कारण नहीं बोल पातीं ,या बदनामी के डर से , या पता लगने पर माता-पिता पढाई ही छुड़ा देंगे इस भय से । केवल लालच ,लो ही हर बार काम नही करता। हालांकि आपकी बात सत्य है कि काम बनने की उम्मीद तक कुछ स्त्रियाँ शोषण कराती हैं और उम्मीद बर नही आती तो आवाज़ उठाती हैं ।

लड़कियों की सामाजिक और बचपन से परिवार द्वारा ट्रेनिंग ऐसी होती है कि वे अक्सर अपने परिवार से सम्बन्धित पुरुषों के शोषण के खिलाफ भी कुछ कह नही पातीं , अधिकांश मामलों मे वे ही "लुभाने" "रिझाने" के लांछनों का शिकार होती हैं । व्यापक स्तर पर भी आवाज़ उठाना तीन मोर्चो पर एक साथ लड़ाई खो ल देता है। सत्ता , पुरुष ,समाज .......
तीनों से , दुखद है कि , चरित्र पर हमले सहने होते हैं,पारिवारिक जीवन {विवाहित हों तो} नष्ट होने के आसार होते हैं ,या जल्दी शादी की जा सकती है बदनामी सुन सुन कर माता पिता द्वारा ।"असफलता" का भी भय होता है लड़की को ,कि जाने कैसे कैसे तो करियर बनाने निकली है , असफल हुई तो यही कहा जाएगा कि तुम्हारे बस का नही , घर सम्भालो।
लड़कियों को "ना" कहने की ट्रेनिंग भी न देना इन घटनाओं को बढावा देता है । यूँ भी उन्हें हमेशा कहा जाता है"इग्नोर "
ऐसे मे शोषक़ की हिम्मत बढती है ।आप पायेंगे कि राह चलते शोहदे के आंख मारने या सीती बजाने पर भी लड़कियाँ अक्सर सर झुकाकर निकल जाती हैं ...यही उन्हें सिखाया जाता है ...पंगा लिया तो किसी दिन मुँह पर एसिड पड़ जाएगा या रेप हो जाएगा या एक की बजाय अगले दिन से दो चार शोहदे छेड़ने लगेंगे.. ।
बातें उतनी आसान नहीं हैं..इतने एंगिल्स हैं कि ज़रा से मे कहते नही बनता ।

श्रुति अग्रवाल said...

सुरेश जी, रचना जी,मेरी बात से साम्य रखने के लिए शुक्रिया। आज यह लेख मुझे कुछ और सोचने ही नहीं दे रहा। " ये अगर चांद की कामना न करें, तो इनकी गरिमा को कौन ठेस पहुंचा सकता है?"

एक बेहतरीन उपन्यास है " मुझे चाँद चाहिए" एक लड़की की इच्छाओं का दर्पण। महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए दिया तर्पण। मैंने महसूस किया है कि अच्छे से अच्छे लोग भी इस उपन्यास का मर्म नहीं समझ पाएँ हैं। वैसे ही हर व्यक्ति सोचता है कि उसने स्त्री को समझ लिया......लेकिन समझ नहीं पाता। और हाँ, मुझे चांद चाहिए इक्कीसवीं सदि की महिला ही नहीं बल्कि मुगलकाल की नूरजहाँ या आजादी की दीवानी झाँसी की रानी सभी ने सोचा था, पाया था। मेरी माँ के लिए उनका चांद हमारा घरौंदा था जिसे उन्होंने अपने प्रेम से मुक्कम्मिल किया तो बड़ी मम्मी ने डॉक्टर बनकर। हर नारी की सोच का चांद अलग होता है। हम भी इस चांद की कल्पना करते हैं और इसे पाने का माद्दा भी रखते हैं, वो भी सिर्फ अपने दम पर। इसलिए एक प्रतिशत से भी कम के आकड़े की नहीं बल्कि विश्व की आधी आबादी की बात करें ....उसे समझे...हमारी नजरें आपका सम्मान करेंगी।

Malaya said...

घघूती जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। बस इतना जरूर खटक रहा है कि नारी देह की तुलना एक बढ़िया मकान, कार, या दुकान में रखे कुछ,एक बगीचे में लगे फूलों, या फिर एक नन्हे प्यारे बच्चे को देख उसे गोद में लेने, दुलारने की लालसा से करना ठीक नहीं है।

अनावृत रहने या न रहने के पीछे एक सोच या एक उद्देश्य जरूर होता होगा। इसे मूल्य निरपेक्ष नहीं मानना चाहिए। इसके औचित्य पर मत-मतान्तर अवश्य होंगे। इसे कोरी स्वतंत्रता का नाम देकर छोड़ना जायज है क्या?

और यदि उत्तर ‘हाँ’ है तो उससे उठने वाले सामाजिक विकार भी पैदा होते ही रहेंगे। आपने खुद ही लिखा है कि ...इसका उपाय लालायित को ही करना होता है । यदि पाने की संभावना हो तो यत्न करता है और न हो तो अपना रास्ता नापता है। अब यदि यत्न में कुछ ऐसा-वैसा भी कर बैठा तो दोष भी उसे ही देंगी? पर... क्या अनावृत्त देह क्या पूर्णतः दोषमुक्त है?

ghughutibasuti said...

मलय जी, मैंने बड़ी उद्दंडता से 'या फिर हो सकता है कि किसी पुरुष को देखकर भी किसी की लालसा जागृत हो सकती है ।' भी लिखा था ! वैसे इस लेख पर टिप्पणी के रूप में एक लेख भी लिख डाला है जो शायद पोस्ट भी कर दूँ या न भी ।
घुघूती बासूती

डॉ .अनुराग said...

ऐसे सार्थक विषय पर शायद ओर बहस की भागेदारी की अपेक्षा थी..... निर्णय की प्रक्रिया में स्त्री की भागीदारी जब तक नही होगी स्त्री शोषित रहेगी.....

Anonymous said...

हर नारी की सोच का चांद अलग होता है। हम भी इस चांद की कल्पना करते हैं और इसे पाने का माद्दा भी रखते हैं, वो भी सिर्फ अपने दम पर।
shruti ek dam sahii baat

problem haen ki chaand { yaani jo aasani sae nahin miltaa } par sirf purusho ka hii adhikaaar hona chahyae aur agar stri chand lae aatee haen to seedhi usaka shareer haen yae ek vidrup soch haen

राजकिशोर said...

मेरी खुशकिस्मती है कि आप लोगों ने मेरे इस लेख पर विचार-पुनर्विचार किया। मामला इतना विशद और गहरा है कि दो-चार लेखों तथा सौ-पचास टिप्पणियों से न्याय नहीं हो सकता। सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इस बारे में डेटा (तथ्य और आंकड़े)की बहुत कमी है। यह एक गुह्य संसार है जहां अफवाह को खबर मान लिया जाता है। इसलिए मैं आप सभी के मत का सम्मान करता हूं और अपनी राय बदलने का कोई कारण नहीं देखता।

Neelima said...

राजकिशोर जी ,
आपका लेख मुझे चांद चाहिए विचारोत्तेजक लगा ! जब स्त्रियां स्वेच्छा से यौन शोषण की शिकार बनती हैं तो वास्तव में हमारी सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त पितृसत्ता की मौजूदगी और स्त्री के समक्ष विकास के समान अवसरों की न्यूनता अनुपलब्धता ही दिखाई देती है ! शोषण करवाने में स्त्री की सहमति के बहाने से शोषण करने वाला पुरुष कतई कम दोषी नहीं माना जा सकता !
वैसे आपका लेख हमेशा की तरह साहसिक तेवरों वाला है !

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

यहाँ मामला दो ही है -
1. परिस्थितियों से समझौता कर अपने लाभ अथवा सफलता या अस्तित्व existance के लिए रास्ता बनाना. चाहे वे जैसे भी हो किसी तरह बन जाए. शरीर समर्पण तो सबसे बड़ा और आखरी हथियार हो सकता है. (कम से कम 2% नारि के लिए)
लेकिन इस मामले में भी पुरुषों की ही संख्या ज्यादा होगी. वे तो धन, बुद्धि बल रहते हुए भी अपने लिए शार्टकट की तलाश में ईमान संस्कार सब भूल जाते हैं. (कम से कम 5 % पुरूष जरुर होंगे.)

2. देह का भूगोल और इन्द्रियों को वश में रखना ये प्राकृतिक बातें है. बगैर किसी लोभ या तरक्की से हटकर भी बहुत से लोग सीमाओं का उलंघन करते हैं. यहाँ भी पुरुषों का ही प्रतिशत ज्यादा होगा.

नोट: एक कटु सत्य यही है की अपने पारिवारिक रिश्तों से जुड़े लोग ही इज्ज़त के दायरे में आते है. बाहरी औरत मर्द या लड़के लड़कियों को लालायित निगाह से देखना न देखना अपने अपने संस्कारों की बात है.

- सुलभ पत्र

आर. अनुराधा said...

"1. परिस्थितियों से समझौता कर अपने लाभ अथवा सफलता या अस्तित्व existance के लिए रास्ता बनाना. चाहे वे जैसे भी हो किसी तरह बन जाए. शरीर समर्पण तो सबसे बड़ा और आखरी हथियार हो सकता है. (कम से कम 2% नारि के लिए)
लेकिन इस मामले में भी पुरुषों की ही संख्या ज्यादा होगी. वे तो धन, बुद्धि बल रहते हुए भी अपने लिए शार्टकट की तलाश में ईमान संस्कार सब भूल जाते हैं. (कम से कम 5 % पुरूष जरुर होंगे.) "

सुलभ जी,
आंकड़ों का इस्तेमाल जितनी सावधानी से करें, अच्छा है। वैसे ये आंकड़े (2ज् और पांच फीसदी) कहां से जुटाए? मेरी जानकारी में तो ऐसा कोई अध्ययन हाल के समय में नहीं हुआ। कुछ भी अंदाज़ा ले कर सार्वजनिक मंच पर उतरना अच्छा नहीं।
डॉ. अनुराग कहते हैं- "ऐसे सार्थक विषय पर शायद ओर बहस की भागेदारी की अपेक्षा थी..... निर्णय की प्रक्रिया में स्त्री की भागीदारी जब तक नही होगी स्त्री शोषित रहेगी"

आप अगर इस ब्लॉग को लगातार देख रहे हैं या कुछेक पोस्ट्स को पढ़ें तो समझ जाएंगे कि विचार विमर्ष सिर्फ इस एक लेख के बहाने नहीं हो रहा है, बल्कि इस ब्लॉग की पहली पोस्ट से जारी है।
और मैं अपनी बात कहूं तो "स्त्रियों के लिए समय ही नहीं बदला है चाहे फिर वह महाभारत की द्रोपदी हो या 21 वीं सदी की कोई यंग प्रोफेशनल डेशिंग लेडी!"
इसमें विमत्रष से ज्यादा समझदारी की जरूरत है। अपने आस-पास ही देकिए। अपने घर की 'बहू-बेटियों' की इज्जत के लिए आप जान पर खेल जाते हैं और बह इज्जत जाने का अंदेशा किस से होता है- 'पराए मर्द' से। बात समझने की कोशिश करेंगे तो इस लंबी बहस की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

अगर ये सार्वजनिक मंच है तो मैंने अपना ओब्सेर्वेशन ही रखा है. चूकि ये मुद्दा वैश्विक है और अलग अलग तरह के सर्वे में (दुनिया भर से) कुछेक आंकडे आते रहते हैं लेकिन ये सत्य को उजागर नही करते इसीलिए मैंने न्यूनतम (कम से कम) शब्दों का इस्तेमाल किया.

वैसे मैं इस मामले में jyada लिखना नही चाहता. क्योंकि मैं समाधान भी चाहता हूँ. बेहतर होगा यदि हमलोग स्वयं को प्रबुद्ध नागरिक समझने के साथ साथ अपने आस पास सीधे सीधे चर्चा करें तो परिणाम साकारात्मक बन सकते हैं. यहाँ ब्लॉग पर लेखन से फिलहाल कोई फायदा नही दिखता.

अनुराधा जी, पुराने पोस्ट को नही पढ़ पाने के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ.
- सुलभ

सुनीता शानू said...

राजकिशोर जी के आलेख हमेशा प्रभावशाली और विचारोत्तेजक होते हैं...अभी पढ़ नही पाये अच्छी तरह से...पढ़कर ही हम भी अपने विचार प्रस्तुत करेंगे...

Anonymous said...

राजकिशोर के अनुसार ," एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता। " बिना सहमति के बनाया गया सम्बन्ध ,सम्बन्ध नहीं होता -पुरुष के लिए। बलात्कार यानी स्त्री की अस्मिता पर हमले को राजकिशोर नकार रहे हैं ?

सुनीता शानू said...

यह नही कहूँगी की राजकिशोर जी की सम्पूर्ण पोस्ट अक्षरस्य सत्य है, क्यूंकि पढ़ते-पढ़ते कहीं ऎसा अहसास हुआ कि अगर औरत को चाँद चाहिये तो उसकी गरिमा को भंग होना पड़ेगा...बस यहीं आकर अटक गई, चाँद तो पा चुकी है नारी चाँद पर पहुँच कर,देखिये उसकी अस्मिता को तो कहीं से खतरा नही हुआ, हाँ यह ठीक है कुछ औरते अपने काम निकालने के लिये अपने रूप यौवन का सहारा लेती हैं परन्तु सारा तालाब गंदा नही कहा जा सकता...

आप पुरूष हैं आपने जो महसूस किया वही लिखा, जहाँ दोनो ही दोषी पाये गये और औरत खुद अपने शोषण की जिम्मेदार ठहराई गई,किन्तु बस एक वही बात मन में खटकती है, इन भीड़ में घुसे भेडियों से डर कर जो बचपन से ही कभी चाचा, कभी मामा,कभी रिश्तेदार बन कर अपने पुरूषत्व को दिखाते रहें है क्या वह डर कर बैठ जाये, न आवाज उठाये उनके खिलाफ़,न कामना करे चाँद की ?

सुजाता said...

स्त्री की सहमति के बिना उससे सम्बन्ध नही बनाया जा सकता ...-
यह वाक्य वाकई व्याख्यासापेक्ष है ,

किंतु अंतिम पंक्ति का सन्दर्भ विशिष्ट है ..केवल वे एक प्रतिशत स्त्रिया जो डिसर्व करें न करें आसान और शीघ्र
सफलता पा लेना चाहती हैं वे ही लक्ष्य हैं ..लेखक ने शुरु मे ही स्पष्ट किया है कि वह केवल उन्हीं स्त्रियों के बारे मे कह रहा है जो यौन शोषण होने देती हैं ताकि उनका कोई काम सध सके।
दोषी वहाँ भी पुरुष ही है लेकिन उसके हौसलें बुलन्द करने मे इस प्रकार के मार्ग अपनने वाले भी साथी हैं।
इसी बात को समान्यत: स्त्री के व्यवहार और आकांक्षा से जोड़ दिये जाने से भ्रम पैदा होता है।
सेक्शुअल हरासमेंट के मुद्दे का यह केवल एक पक्ष है,निष्कर्ष नही।
और यूँ भी यदि वह एक प्रतिशत स्त्रियाँ यदि बे ईमान हो जाती हैं ..तो यह "यह तुम्हारी {मर्दों की}दुनिया मे तुम्हारे{शरीर को तरजीह देने,भौतिकतावादी होने } तरीकों से अपने लिए चाँद{पॉवर,पोज़ीशन } हासिल करने जैसा है क्योंकि मेहनत और प्रतिभा के बावजूद तुम वह आसानी से नही दोगे " यह भी लेखक ने अंतिम पैरा मे स्पष्ट किया है।

Vikas said...

main bhi is baat se katai sahhmat nahi hu ki kisi stree ki sahmati ke bagair usse samband nahi banaya ja sakta. Ye sirf ek lijlija awaran hai jisake peechhe balatkar ke "sukh" ki kalpana karti adamya yaun kunthaein chhipi hain.

अनुप्रिया के रेखांकन

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