Friday, December 19, 2008

अब तोड़ने ही होंगे दुर्ग सब ,ढहाने ही होंगे मठ और गढ,करनी ही होगी शिखरों की यात्रा!


जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ,मुम्बई से मैनेजमेंट डिग्री प्राप्त 46 वर्षीया चन्दा कोचड़ अब भारत के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक ICICI की नयी सी. ई. ओ. होंगी। चन्दा आगामी वर्ष मई से बैंक के संरचनागत बदलावों की शुरुआत करेंगी।अब तक की सबसे पॉवरफुल व्यवसायी महिलाओं में चन्दा कोचड़ का नाम लिया जाता है।इससे पहले वे आई सी आई सी मे ही जॉइंट डायरेक्टर रह चुकी हैं।
उनकी सफलता व उपलब्धियों के कुछ प्रमाण --

Ranked 33th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2007
Ranked 37th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2006
Ranked 47th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2005
Awarded Business Woman of the Year 2005 by The Economic Times
Selected as Retail Banker of the Year 2004 (Asia-Pacific region) by The Asian Banker from amongst prominent retail bankers in the Asia Pacific region
Selected as ‘Rising Star Award’ for Global Awards 2006 by Retail Banker International

निश्चित रूप से कठिन परिश्रम और लगन से ही वे इस ओहदे तक पहुँची हैं। आर्ट्स मे बी ए करने के बाद उन्होंने एम बी ए की परीक्षा मे टॉप कर दिखाया और बतौर ट्रेनी ICICI जॉइन करने के बाद आगे ही बढती गयीं।

मै अभी सोच रही हूँ ,कि ऐसी खबरें हौसला बढाती हैं अवश्य ..लेकिन क्या उस समय हम यह भी सोच रहे होते हैं कि अपनी एक बेटी और एक बेटे को पालने पोसने के साथ साथ चन्दा कैसे यह सब कर पाती होगी?

गृहस्थ जीवन जीते हुए ,बिज़नेस वूमेन ऑफ थ यिअर अवार्ड लेने पर लाखों लोग चन्दा के लिए तालियाँ बजाते क्या केवल यही नही सोचते होंगे कि - देखो भई , घर ,बच्चे सम्भालते हुए भी इतनी सफल महिला है। बात काबिले तारीफ है।लेकिन वह कौन सा सपोर्ट सिस्टम है जिसकी वजह से चंदा किसी आम कामकाजी स्त्री की तरह ऑफिस खत्म होने से 5 मिनट पहले घर की ओर सर पर पैर रखकर नही दौड़ती ,कि देर हुई तो बच्चे को क्रेश से कौन लेगा? या क्लास खत्म कर नाक की सीध मे बच्चे के स्कूल उसे लेने नही पहुँच जाती कि देर हुई तो बच्चा बस स्टॉप पर अकेले खड़ा रहेगा? या कि देर रात आने पर उसे लोगों के चेहरे पहले रसोई की तरफ और फिर उसकी ओर उठते हुए नही दिखते ,और पति से यह कहने नही मिलता कि - बस का नही है तो छोड़ क्यों नही देतीं नौकरी ? अपना घर देखो ! पता है कल राहुल का एग्ज़ाम है?रितु का फ्लॉर डेकोरेशन कम्पीटीशन है ? माँ की तबीयत खराब है , बाबूजी की आँख का ऑपरेशन हुआ है और तुम्हें बिज़नेस से फुर्सत नही ?
बहुत सम्भव है कि यह सब चन्दा ने अनुभव भी किया होगा और विपरीत परिस्थितियों मे लड़ी भी होगी । यह भी सम्भव है कि वह सपोर्ट सिस्ट्म घर परिवार रहा हो , या आर्थिक सबलता रहा हो ।

मै जानना चाहती हूँ कि ऐसी सफल स्त्री ,गृहस्थ स्त्री ,व्यवसायी स्त्री ,कर्मठ स्त्री ....क्या आपकी नौकरी पेशा पत्नी,बहन,बेटी ...जैसी अभी है और जैसी आप उन्हें चाहते हैं कि वे रहें ....वैसी ही रहते हुए भी और हम सबके भी जैसे है वैसे ही रहते हुए भी .........वैसी स्त्री हो सकना सम्भव है ?? बाहर चुनौतियों के बढने के साथ क्या हम पत्नियों और बहनो बेटियों के लिए घर मे भी चुनौतियाँ बढा नही देते ? यदि हाँ ! तो चन्दा कोचड़ आपके -मेरे परिवार मे तो कैसे ही हो पाएगी भला!और अगर हुई तो निश्चित जानिए कि आपके बनाए ढांचो को ढहाए बिना नही हो सकेगी ! ढाँचे ढह जाने से आपका विद्वेष बढेगा और ईर्ष्या भी बढेगी और ऐसा समाज स्वस्थ समाज कैसे हो सकेगा जहाँ दोनो विपरीत
लिंगी सथियों के बीच ऐसा विद्वेष हो।
क्या मै इस निष्कर्ष पर पहुँच सकती हूँ कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँचने के लिए एक स्त्री को समाज संरचनागत बहुत सी परम्पराएँ तोड़नी पड़ती हैं और दुर्ग ढहाने पडते हैं ? एक आम स्त्री के लिए यह संघर्ष तो बेहद दर्दनाक और कठिन होता है।
और क्या इसका मतलब यह है कि स्वयम को साबित करने और अपनी क्षमताओं से सर्वोत्तम प्राप्त करने मे पितृसत्ता अधिकांशत: स्त्री के खिलाफ ही खड़ी होती है ?
यदि ऐसा है तो निश्चित रूप से यह सफलता पुरुष की हासिल सफलता से कई गुना महत्वपूर्ण होती है । और यही कारण है कि ऐसी खबरें हमारे लिए सुर्खियाँ बन जाती है।

16 comments:

Arvind Mishra said...

सदविचार और विश्लेषण !

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

आज के युग में स्त्री और पुरुष कन्धे से कन्धा मिला कर चलने का युग है। बस, देखना यही है कि किस में कितनी बुद्धि और कौशल है- चाहे वह पुरुष हो या नारी। सुश्री कोछार इस बात का प्रमाण है कि नारी किसी पुरुष से कम नहीं। हां, ऐसी कई नारियां अतीत में इसकी मिसाल दे चुकी है, और आगे भी देती रहेंगी. पर शायद यह बहस जारी रहेगी कि नारी और पुरुष में क्या अंतर है।

श्रुति अग्रवाल said...

आज से लगभग चार-साढ़े चार साल पहले चंदा कोचर से एकबार मुलाकात हुई थी...अपने आप में बेहद सबल और दृढ़ महिला लगी थीं। तब भी वे काफी ऊँचे ओहदे पर थीं लेकिन विनम्र मुस्कान उनके चेहरे को रोशन कर रही थी। मुझे याद है एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहाँ था- आई एम ए फैमली वुमन.....ये कहते हुए उनके गरिमामय चेहरे पर मुस्कान और गर्व की मिलीजुली आभा नजर आई थी। मेरे ख्याल से दृढ़ निश्चय और उनका परिवार ही उनकी सफलता की सीढ़ी है। और सच कहूँ तो किसी भी महिला या पुरूष को आगे बढ़ना हो तो उसका सबसे मजबूत सपोर्ट सिस्टम उसकी फैमली ही होता है...हाँ अपवाद हर जगह हैं।

siddheshwar singh said...

इस पोस्ट के बहाने दुर्ग द्वार पर दस्तक देतीं और और उसे धकियाकर अंदर प्रविष्ट होती स्त्रियों के हौसले कायम रहें .यही कामना है.

Anonymous said...

सुजाता
कुछ हमे मिलता हैं और कुछ हमे पाना होता हैं . जो पाना चाहते हैं , पाने की कामना मे केवल और केवल इंतज़ार नहीं करते की कब हमे सपोर्ट सिस्टम मिलेगा , कब कोई आगे बढ़ सड़क के कंकर साफ़ करेगा और हम उस पर दौड़ सकेगे . अपने रास्ते के कंकड़ ख़ुद साफ़ करने होते हैं . अगर आज से ४० साल पहले किसी ने ऐसा प्रशन किया होता तो मुझे लगता ये प्रश्न सम सामाईक है . लेकिन इस दौर मे ये प्रश्न करना की चन्दा कोचड़ की उपलब्धि के पीछे कौन सा सपोर्ट सिस्टम हैं ग़लत हैं . ये प्रश्न चंद्र कोछड़ को उसकी उपलब्धि का जिम्मेदार नहीं मानता बल्कि आप का प्रश्न हर उस नारी की उपलब्धि को उसके परिवार और समाज की उपलब्धि मान कर उस नारी को फिर उसी मोड़ पर खडा कर देता हैं .
चन्दा कोचड़ की मेहनत और काम के प्रति उनकी लगन और उनका प्रोफेशनल attitude ही उनका सपोर्ट सिस्टम हैं . और सच कहूँ तो मुझे ये कोई ऐसी उपलब्धि नहीं लगी महिला समाज के लिये क्युकी ये केवल उनका प्रोफेशनल rise हैं जो उन्हे उनकी मेहनत से मिला . जो भी इतनी मेहनत करेगा वो आगे जरुर जायेगा . {आप ये भी कह रही हैं सो थैंक्स }
"चन्दा" को चाँद चाहिये था उन्होने उसकी कामना भी की और पाया भी अब अगर एक आध पोस्ट राजकिशोर की पोस्ट जैसी भी आजाए तो क्या फरक पड़ता हैं चंद्रा की गरिमा को उससे कोई फरक नहीं पडेगा .

मेरा एक प्रश्न हैं जब कोई पुरूष अपने करियर मे टॉप पर पहुच जाता हैं तब क्यूँ नहीं ये ही प्रशन होता हैं " भाई किस सपोर्ट सिस्टम का नतीजा हैं ये सक्सेस " . जब तक हम पुरूष और स्त्री की सफलता को एक नज़र से नहीं देखेगे हम उनको बराबर नहीं समझगे . प्लीज़ सुजाता कम से कम तुम तो दोनों की सफलता को बराबर आको ताकि ये भेद भाव मन से ख़तम हो . चन्दा कोचड़ को बधाई

bairaagi said...

लगता है रचना जी को लेख समझ ही नही आया। आपसे गुज़ारिश है कि गहन बातों का ऐसे सिम्प्लीफिकेशन न किया करें। मुझे लगता है सुजाता जी कह रही हैं कि कोई स्त्री (या पुरुष)वैक्यूम मे नही जीता । उसके आस पास क्या है, कौन कौन लोग है, वह किस टाइम और स्पेस मे है,इन सब बातों से मुझे नही लगता कि कोई व्यक्ति अछूता रहकर काम कर सकता है। मुझे लगता है कि सुजाता जी का इशारा इन्ही सब चीज़ों की ओर है जब वे कहती हैं कि हर व्यक्ति का सपोर्ट सिस्टम अलग अलग हो सकता है।उदाहरण के तौर पर - एक ऐसी महिला जो अकेली रहती है और अपने सारे निर्णय केवल खुद को ध्यान में रखकर लेती हैं और एक महिला ऐसी जो अपने परिवार के साथ रहती है- उसके बच्चे,पति,सास-ससुर...तो मुझे लगता है कि ये दोनो महिलाएँ एक ही लक्ष्य को "बराबर" मेहनत करके नही पा सकतीं ।उनमें से शायद एक को अधिक मेहनत करनी ही होगी क्योंकि उनके हालात अलग हैं।इन दोनो तरह की स्त्रियों के लिए दुर्ग भी अलग अलग तरह के होंगे और उनके संघर्ष के कंकर और रास्ते भी अलग होंगे।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सुजाता जी,
चँदा जी की सफलता से हमेँ खुशी है - स्त्रियाँ आगे बढेँ और समाज तथा समाज का ही आधार स्तँभ परिवार
हरेक स्त्री का मनोबल बढाये और स्त्री की खुशी और उन्नति मेँ साथ दे, वही अहम्` बात होनी चाहीये -
- लावण्या

Dr. Amar Jyoti said...

'परंपराएं तोड़ने और दुर्ग ढहाने का काम यदि स्त्री-पुरुष मिल कर करें तो दोनों की ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। एक बात रचना जी से भी- स्त्री व पुरुष की सफलता को आज के सामाजिक ढांचे में बराबर नहीं आँका जा सकता। कुछ अपवादों को छोड़ कर समान कामयाबी के लिये स्त्री को पुरुष की अपेक्षा
कई गुना अधिक परिश्रम करना पड़ता है।

Anonymous said...

bairaagi
"एक ऐसी महिला जो अकेली रहती है और अपने सारे निर्णय केवल खुद को ध्यान में रखकर लेती हैं और एक महिला ऐसी जो अपने परिवार के साथ रहती है- उसके बच्चे,पति,सास-ससुर...तो मुझे लगता है कि ये दोनो महिलाएँ एक ही लक्ष्य को "बराबर" मेहनत करके नही पा सकतीं "

आप की मेरी सोच मे जो अन्तर हैं वो वर्गीकरण का हैं . बात अगर समानता की करनी हैं तो पुरूष - स्त्री . स्त्री - स्त्री मे समान अधिकार की करे . सिंगल स्त्री और विवाहित स्त्री के फरक को दिखा कर आप फिर सिंगल स्त्री की म्हणत का आकलन सही नहीं करेगे . जब हम किसी भी नौकरी मे जाते हैं तो वहाँ के कानून मर्रिएद और सिंगल के लिये एक ही होते हें . आप के कथन के हिसाब चालू तो हर जगह विवाहित स्त्री को जल्दी घर जाने की सुविधा दे दी जानी चाहिये ताकि वो घर जा कर परिवार संभाल सके ? क्यों ? एक तरफ़ एक अविवाहित स्त्री परिवार का सुख छोड़ कर काम करती हैं तो दूसरी तरफ़ विवाहित स्त्री परिवार का सुख भी भोग रही हैं और उसी काम को जिसको अविवाही स्त्री कर रही करने के लिये रियायत भी चाहती हैं .
ये तो दोहरी नीति हुई .

आप मे जितनी काबलियत हैं और जितना उस काबलियत को आगे लाने की ताकत हैं आप उतना ही आगे जायेगे . हर एक की अपनी म्हणत और अपनी काबलियत होती हैं और करियर मे आगे जाने के लिये वही आप का सपोर्ट सिस्टम होता हैं .
अगर एक विवाहिता चंदा कोचर आगे गयी हैं तो अपनी म्हणत से और अगर एक विवाहिता उसी बैंक मे आज भी क्लर्क हैं तो अपनी म्हणत से .
अपने रास्ते के कंकर ख़ुद ही साफ़ करने होते हैं , अपनी लड़ाई भी ख़ुद ही लड़नी होती हैं . और जब कामयाबी मिलती हैं तो भी अपनी ही होती हैं .
लक्ष्य भी अपना ही होता हैं . जरुरत भी अपनी होती हैं . कर्तव्य को sacrifice का नाम दे कर आप विवाहित स्त्री को बार बार "देवी " बना कर उसको आगे बढ़ने से रोकते ही हैं .

तारीफ़ की बात इतनी हैं की १९८४ से एक मैनेजमेंट त्रनिई आज उसी बैंक की हेड हैं . और २५ साल की निरंतर म्हणत रंग लाई हैं .
इसके अलावा उसका परिवार भी हैं जिसके बारे मे ना तो वो बात कर रही हैं ना उसका परिवार मीडिया मे आकर कुछ बोला हैं . कारपोरेट वर्ल्ड में उसका अचिएव्मेंट हैं जो उसके विवाहित या अविवाहित होने के कारण नहीं हैं . २५ साल कोई भी म्हणत करे अपनी लाइन मे तो निसंदेह आगे ही जायेगा .

"गहन बातों का ऐसे सिम्प्लीफिकेशन न किया करें।"
अब मे बुद्धिजीवी नहीं नहीं हूँ , जिन्दगी की गहनतम परेशानियों के सिम्प्लिकरण से ही जिंदगी चलती हैं बाकी आप शबो को जैसे चाहे घुमा ले आप को इख्तियार हैं

लेकिन अगर महिला समानता की बात करे तो समानता से जिन्दगी की लड़ाई मे अपनी मेहनत करे और अपने विवाहित होने , माँ बनने और बहु बनने को अपना कर्तव्य समझे और इन बातो को अगर वो अपने करियर मे रोड़ा मानती हैं तो अविवाहित रहे .
चुनने का अधिकार संविधान मे आप के पास हैं

Anonymous said...

एक बात रचना जी से भी- स्त्री व पुरुष की सफलता को आज के सामाजिक ढांचे में बराबर नहीं आँका जा सकता। कुछ अपवादों को छोड़ कर समान कामयाबी के लिये स्त्री को पुरुष की अपेक्षा
कई गुना अधिक परिश्रम करना पड़ता है।


aap jo keh rahey haen mae bhi vahi kehtee hun striyon ko aur parishram karna hoga aagey aaney kae liyae apnae liyae , apnae adhikaro kae liyae aur
isii liyae jab koi stri itni mehnat kar kae aagey aaye to please uskae peechay kae support system ko taarif naa dae , tareef uski mehnat ko dae

sanjay patel said...

इसे कहते हैं अदम्य साहस,समर्थता और रचनात्मकता का भरपूर इस्तेमाल.सलाम चन्द्रा कोचर की उपलब्धि को.

संतोष कुमार सिंह said...

आर्थिक संघर्ष के इस दौङ में हमारे कई मानक और लक्ष्य बदले हैं।गीता को अपनी मंजिल पाने के लिए पता नही किस दौर से गुजरना पङा होगा आज की पीढी के लिए यह ताज है।इस ताज को पाने के लिए आपके द्वारा उठाये गये सवालों का बेहतर समाधान आप खुद सोच सकते हैं।हमने भी अपने ब्लाग पर इसी तरह के सवाल खङे गये हैं।आपकी राय उपक्षित हैं।

neelima garg said...

I disagree. In most of the cases fathers support their daughters to get good education and later in career , hard work , firm determination , will to move forward and family support is a must.

अर्चना said...

mere khyal se do hi kism ki mahilayen hgar se bahar sahajata se nikal paatin hain , ek jinake pariwar ko aarthik aawashyakata hoti hai ya fir we mahilaayen jiname kuchh wishash hota hai. shesh prayah sabhi ko ghar se baahar nikalane ke liye kafi jaddojahad karani parati hai.

एस. बी. सिंह said...

परम्पराओं और रुढियों के ये दुर्ग जल्दी ध्वस्त हों यही कामना है....

Unknown said...

sunder prastuti hai. agar sujataa jee ne support system kee baat kahee hai to bahut galat nahee hai. jis udaartaa se bahut se safal purush apnee safaltaa ke liye apnee dharam patni ko shreaya dete hai vaise agar ko support system ho aur ho sake to ismai mahilao kaa kalyaan hee hai. duniyaa stree pirush ke jhagde kaa akhadaa nahee hai balki is duniyaa mai sabhee ko aage badhne kaa maukaa mile, yogyata ko samman mile bahut badhiyaa baat hai.

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