Friday, December 26, 2008

मैं ऐंवे थोड़ी तेरे उत्ते मरदा नी ...



बहुत दिन से इस गाने ने परेशान किया हुआ था -

इक उच्चा लम्बा कद
नाले गोरी वी तू हद
उत्ते रूप तेरा चमचम करदा नी
...
मैं ऐंवे थोड़ी तेरे उत्ते मरदा नी ...

वैसे तो पॉप संगीत ने पंजाबी की काफी समझ लोगों में पैदा कर दी है तो भी कुछ शायद म्यूज़िक पर ही थिरकते होंगे इसलिए इन पंक्तियों का तर्जुमा कर ही देना चाहिए-
एक तो ऊँचा , लम्बा कद
उस पर से गोरी भी हद ,
और उस पर रूप तेरा चम चम करता है
मै ऐसे ही थोड़ी तेरे ऊपर मरता हूँ

आप कहेंगे कि इस गाने की लाइनें यहाँ हाइलाइट करने का मतलब क्या है ?अब चोखेर बालियाँ क्या नयनतारा बनने की होड़ करना चाहती हैं {जिसका आशय इस पोस्ट की दूसरी ही टिप्पणी में था ,भले ही पोस्ट को ठीक से समझे बिना दिया गया?}तो अब क्या चोखेर बाली पर ब्लीच , क्रीम , मेड ,फिगर की बातें हुआ करेंगी ?
ज़रा रुकिये !
जैसा कि पहले भी एक पोस्ट में कहा जा चुका कि यह मान लिया गया है कि “सुन्दरता किसी भी स्त्री का कर्तव्य है ” । सुन्दरता स्त्री के लिए ज़रूरी है ताकि कोई पुरुष उसे पसन्द कर सके । वर्ना यह कैसे होता है कि जो माता पिता बेटी को विवाह से पहले तक सजने सँवरने से मना करते हैं वही विवाह के लिए देखने आये लड़के के सामने उसे सजा-धजा कर पेश करते हैं।

जानती हूँ यह विचार भी प्रचलित है कि हर स्पीशिज़ मे सुन्दर दिखने की चाहत होती है फिर हम तो मनुष्य हैं। ठीक बात है। इसमे कोई दोराय नही हो सकती कि आप सुन्दर दिखना चाहें और उसके लिए कुछ प्रसाधनों और आभूषणो को धारण करें।
दिक्कत वहाँ पैदा होती है जब लड़कियाँ सुन्दर दिखने की चाहत इसलिए करने लगें कि वे किसी (या हर एक को)को पसन्द आएँ और वह उन्हें हासिल करना चाहे।यह एक प्रकार का वस्तुकरण है। लड़कियाँ इस पूरी व्यवस्था मे यह भूल जाती हैं कि उनका शरीर बाज़ार मे रखा कोई पण्य नही है जिसका उद्देश्य किसी और के आनन्द और मनोरंजन की सिद्धि करना है। यह शरीर उसके लिए भी इस दुनिया के तमाम सुखों और आनन्द को भोगने का माध्यम है यह वे भूल जाती हैं।दूसरी ओर लड़को मे भी यही धारणा बलवती होती है कि ये जो बने ठनी हमारे आगे घूमती दिख रही हैं इनके हँसने ,गाने, खेलने , उड़ने,मँडराने या सजने,सँवरने,विशेष पोशाक धारण करने का एक ही प्रयोजन है ....यह तो बस हमारे लिए है।ऊपर गाने मे भी हीरो सकारण बता रहा है कि मै यूँ ही तुम्हारे ऊपर नही मरता।तुम्हारे ऊपर मरने की वजह तुम्हारा मन,दिमाग,व्यक्तित्व नही है केवल रूप है!

एक ऑबजेक्ट मे तबदील होती लड़कियों और उपभोक्ता होते लड़कों की मानसिकता को बनाने मे हम सभी का कहाँ
कहाँ क्या योगदान है क्या हम कभी इस पर विचार करेंगे? कब कब माता-पिता ने चाहा कि लड़के वालों के आने से पहले लड़की फेशियल करा ले ,ब्लीच करा ले और सजी-धजी गुड़िया बन कर सामने आए ताकि कोई लड़का उसे पसन्द करे।

बॉलीवुड की संस्कृति जो सिखा रही है कि - आओ , मै ही सबसे सेक्सी हूँ ,मेरे साथ सेक्स करो ....के चलते कैसे इस पीढी की लड़कियों के एक बड़े हिस्से को वस्तु बनने से बचाया जा सकेगा ? नए उत्पादों की प्रदर्शनी मे सुन्दर बालाओं को साथ मे खड़ा रखने और इसमे गर्व महसूस करने से कैसे इन लड़कियों को रोका जा सकेगा ?
वे वाकई नही जानतीं कि वे एक ऐसी व्यवस्था के पंजे मे जकड़ी हैं जो उन्हें गुलाम बनाने के नित्य नए तरीके ईजाद कर रहा है। जब वे चूल्हे-चौखट तक सीमित थीं तब भी और अब जब वे देहरी के बाहर कामयाब होने निकलीं हैं तब भी धीमी धीमी ट्रेनिंग से वे गुलाम ,पण्य़ वस्तु ,एक मॉडल(जिसे दिमाग इस्तेमाल करने की इजाज़त नही , मधुर भंडारकर की "फैशन" में दिखाया गया कि मॉडल होना एक ऐसा प्रोफेशन है जिसमें आप केवल एक वस्तु हैं ,एक शरीर जिसे सोचने नही दिया जाता,और फिर जो धीरे धीरे सोचना बन्द कर देता है)एक उत्पाद में तब्दील की जा रही हैं। इस ब्रेन वॉश से अपनी लड़कियों को नही बचाया जा सका तो स्त्री-मुक्ति की हकीकत सदियों दूर हो जाएगी।

बार्बी और ज़ीरो फिगर मॉडलस को आदर्श मानने वाली लड़कियाँ अगर चिंतनशील हैं,विचारवान हैं ,अपनी अस्मिता के प्रति सचेत हैं,स्वयम को इनसान से वस्तु मे तबदील होने नही देना चाहतीं , तब शायद चिंता की बात नही ...पर क्या वाकई ऐसा है?मुझे नही लगता!

15 comments:

Anonymous said...

कुछ लोग इसे ही "स्त्री-मुक्ति" समझ बैठे है.. ये सोच रुपातंरित करने की जरुरत है.

PD said...

मैं शीर्षक देखकर चौंक गया था कि आज यहां ये गीत कैसे, फिर पोस्ट पढ़ने से पहले पोस्ट करने वाले का नाम देखा तो सुजाता.. मन में आया कि सुजाता जी कैसे यह गाना पोस्ट कर दीं? मगर पोस्ट पढ़ने के बाद लगा कि नहीं सब ठीक है.. :)एक अच्छी पोस्ट..

Dr. Amar Jyoti said...

पूँजीवाद हर व्यक्ति,हर वस्तु,हर भावना,हर सम्वेदना को बिकाऊ माल में बदल देता है मुनाफ़े के लिये। सचेतन, सुसंगठित संघर्ष से ही इस प्रवृत्ति को उलटा जा सकता है।एक सार्थक मुद्दा उठाने के लिये
साधुवाद।

ghughutibasuti said...

सुजाता, बहुत अच्छा लिखा है। मुझे पहले टिप्पणी करनी चाहिए थी फिर दिए हुए लिंक्स पर जाना था। परन्तु सदा की तरह मैं लिंक्स को क्लिक करती रही और न जाने कितने कुछ पढ़ आई।
घुघूती बासूती

Vinay said...

बहुत बढ़िया, भई

---
चाँद, बादल, और शाम
http://prajapativinay.blogspot.com/

गुलाबी कोंपलें
http://www.vinayprajapati.co.cc

sarita argarey said...

स्त्री घर की दहलीज़ लांघ बाहर तो आ गई है मगर वो अब भी वैचारिक स्तर पर स्वतंत्र कहां है ? आज वो बाज़ार के हाथ का खिलौना मात्र है । चमक दमक की दुनिया में आकर शोहरत और पैसा हासिल करने वाली ज़्यादातर लडकियां ज़ेहनी तौर पर आज़ाद तो नहीम कही जा सकतीं ।

श्रुति अग्रवाल said...

सुजाता बिलकुल सही लिखा...सुंदर तो हर स्पशीज लगना चाहती हैं...लेकिन सिर्फ सुंदर लगना यदि जिंदगी का मकसद बन जाए तो काफी कुछ पीछे छूट जाता है...आज के भौतिकतावादी युग में आप तब अवाक रह जाते हो जब आपकी नौ साल की भतीजी आपसे वैक्सिंग करवाने की जिद्द करे क्योंकि शादी में उसे सबसे सुंदर लगना है। आप उस समय सोचने समझने की स्थिति में नहीं रहते जब मोटी नहीं स्वस्थ सुंदर (जिसकी नर्म गुलाबी हथेलियाँ और गालों की रंगत किसी के भी चेहरे पर मुस्कान ला दे) सात साल की बालिका आपसे कहे कि उसका फिगर बिगढ़ रहा है इसलिए वो चाकलेट नहीं खाएँगी।

यदि याद करूँ तो याद आता है कि ब्यूटी कांटेस्ट की चमक ने कईयों की आँखे चौंधिया दी। वैसे प्राचीन काल से ही दादी-नानी को खूबसूरत लड़कियाँ ही पसंद थी। न जाने कब खूबसूरती का मोहजाल हमारा पीछा छोड़ेगा......नई पीढ़ी सुंदर दिखना चाहती है दिखे लेकिन यह भी याद रखे कि सुंदरता से बड़ा गहना बुद्धिमत्ता है। अगर ये दोनों साथ है तो सोने पर सुहागा। वैसे यदि आप बुद्धिमान हैं तो आपकी सुंदरता में गरिमा की खास चमक मिश्रित होगी।

sandeep sharma said...

behtareen...

अर्चना said...

aaj ladakiyon me sexy dikhane ki jitani chaahat hai agar usaki aadhi bhi buddhamati dikhane ki hoti to shayad we 'maal' me tabdil hone ki jagah aadar ki paatra hotin.
Aapaka aaj ka post padh kr 'Kthadesh' ke pichhale ank me padha Prabhu Joshi ka lekh yaad aa gaya.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

ब्युटी कोन्टेस्ट और परिधान और सौँदर्य प्रसाधन बहुत बडे कारोबार हैँ
जो सीधे आत्म विश्वास पर दस्तक देते हैँ
स्वछता,
अलग बात है
और ऊपरी आडँबर अलग बात है -
हाँ अगर स्त्री
मन माफिक सजना चाहे
या जो भी शालीन पोषाक पहनना चाहे
वह स्त्री की इच्छा और
पसँद पे निर्भर होना चाहीये -
पर विज्ञापनोँ से आकर्षित होकर
खर्चा करना,
मूर्खता है -
बोलीवुड के पीछे कौन सी
ताकतेँ काम कर रहीँ हैँ
और उनके आदर्श क्या हैँ
उस पर भी सोचिये
तब सब स्पष्ट हो जायेगा,
वे हमेँ क्या परोस रहे हैँ -
- लावण्या

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

असली सुन्दरता तो मन के भीतर से झाँकती दिखती है। बाहरी सजावट तो असली व्यक्तित्व को दिखाती कम है छिपाती ज्यादा है।

व्यक्तिगत रूप से मुझे वो लड़कियाँ बेवकूफ़ नजर आती हैं जो चेहरे पर तमाम रंग पोत कर सुन्दर दिखने का प्रयास करती दिखती हैं।

बुद्धिमानी की एक बात सौ आभूषणों से अधिक प्रभाव छोड़ती है। शालीनता की एक दृष्टि चंचल चितवन की सौ अदाओं पर भारी पड़ती है।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

आप ने ठीक कहा कि हर स्पीशीज़ में सुंदर दिखने की चाहत होती है। परंतु गौर करने वाली बात यह है कि अन्य स्पीशीज़ में नर सुंदर दिखता है मादा नहीं, उदाहरण के लिए मोर, मुर्ग आदि हैं । शायद हमारी स्पीशीज़ में ही नारी सुंदर दिखने के लिए सजती-संवरती है। वैसे आज पुरुष भि ब्यूटी पार्लर जाने लगे है!!

स्वप्नदर्शी said...

Thanks for the perspective, and our thoughts and worries are also similar to yours.



However, there is a tilt to this as well. The only positive thing that is coming out of this, is that women to some extent are now more aware of exercise, yoga, and by hook or crook are taking care of their health ever than before. This I realize during my recent visit to India. I went for a family marriage, and everybody kept telling me to beauty parlor. I kept telling those that " Iam anyway the most beautiful, you girls go so that you can have some lift up".

I have never been a beauty-parlor girl except the hair cut. But at that point my worries were not the one you mentioned, but were related to HIV. The beauty-parlors are highly unhygienic, they use all their instruments (scalpel, forceps etc.) again and again and without sterilization. some of the methods are quite invasive to the body and have a risk of spreading HIV.


this is a complicated matter and deep rooted in our history, psyco and culture.

Sometimes cross-cultural concepts of beauty perse and the changing concept of beauty through out the history, make one realize that the contemporary beauty concept is also going to be short lived and its just the limitation of our mind. After all the "saundaryabodh" is also conditioned in a given circumstances. its not same in India and west for example.

सुजाता said...

क्या पहने ,क्या प्रसाधन इस्तेमाल करें , सुन्दर दिखने के लिए क्या क्या करें ,क्या न करें
से कहीं अधिक मेरी चिंता लड़कियों के उत्पाद , माल,या भोग्य वस्तु मे तबदील होने से है। यदि वे इसके प्रति सचेत हैं तो कोई मुश्किल नही , पर यदि ऐसा नही है तो यह एक भयंकर दिक्कत है।
किसी और के भोगने लायक बनने की कोशिश की बजाए वह अपने आनन्द के प्रति जागरूक हो तो वह अधिक मानवी हो सकेगी। जिस सेक्सुअलिटी को एक्स्प्लोर करने की छूट लड़कों को अनकहे रूप से समाज मे मिल जाती है उसी सेक्सुअलिटी के प्रति लड़की के अबोध रहने की अपेक्षा की जाती है , या कम से कम वह ऐसा ही दिखाए कि वह नही जानती यह अपेक्षा की जाती है।लेकिन उसी सेक्सुअलैटी का इस्तेमाल किसी को आकर्षित करने के लिए करने के प्रति वह सचेत होती है इस सब में वह समाजीकरण के दौरान केवल भोग्या के रूप मे तैयार होती है ...वह स्वयम भोग सकती है यह कंसेप्ट उसे और समाज को कुलक्षण लगता है। क्या यही कारण नही कि हमारे समाज मे प्यार के इज़हार की पहल करने मे लड़कियाँ हिचकिचा जाती हैं।
इस मायने मे स्वस्थ दृष्टिकोण कैसे डेवेलप किया जा सकेगा युवतियों , बच्चियों में..यह वाकई चिंता का विषय है। मुझे दूर दूर तक कोई समाधान नही दीखता।सिवाय इसके कि आज हम सभी सचेत हो जाएँ ताकि कम से कम अपने परिवारों में भविष्य की कोई किरण उजागर हो।

ये बातें मानसिकता मे पैठी हुई हैं ,इतनी आसानी से बदलने वाली नहीं

शायद कुछ बातें मै पोस्ट मे स्पष्ट नही कर पाई।

Unknown said...

निश्चित रूप से चोखेर वाली पर पढ़े हुए लेखो मे ये सबसे संतुलित, प्रभावशाली और बहस किये जा सकने बाला लेख है. सुजाता जी को साधुवाद. सौंदर्य बुरी चीज नहीं है. लेकिन सौंदर्य वोध भी होना चाहिए, लेकिन इसका उपयोग क्या हो, इसका ध्येय क्या हो. एक सिने तारिका का सौंदर्य वोध एक घरेलु महिला के सौंदर्य वोध से अलग होना चाहिए. एक बात और है - रूप वो नहीं है जो दिख रहा है बल्कि वो है जो देखने के बाद भी दिखने से रह गया है. जो दिखता है वो दृष्टि का व्यापार है. सौंदर्य के दर्शन करने हो तो मन की आँखों से जो दिखता है वो रूप है. एक और बात चर्चा मे आयी है वो ये कि जितना हम चेहरे को चमकाने पे धुंआ देते है उसका कुछ अंश गुणवान होने पर लगाए तो शायद सत्यम शिवम् सुन्दरम की अनुभूति होगी. क्या वस्त्र पहने है ये ज्यादा चिंता की बात नहीं है लेकिन वस्त्र दिखाने को पहने है या छिपाने के लिए ये बहुत महत्त्वपूर्ण है.

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