Monday, December 29, 2008

पुरुष अपने वाहियातपने या पतितावस्था को सगर्व स्वीकार क्यों करता है?शर्मिन्दा क्यों नहीं होता?

पिछली पोस्ट "क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ने लिया हुआ है?" पर डॉ अनुराग लिखते हैं --"मै तो ये सोचकर काँप गया हूँ जब औरते इस की अभ्यस्त हो जायेगी ..? एक आइना दिखाया है हम सब को .शुक्रिया"
वे पोस्ट की निहितार्थ समझ गए थे।यह गान्धीगिरी का रास्ता है कि जब बेटी पिता के मुख से "भैन.." सुने तो अगली बार उसी के सामने यह गाली दें ताकि अगली बार से वह अपने भाषा व्यवहार मे सचेत रहे।ऐसी कल्पना से आपको आभास होगा कि गाली देना कितना आहत करता है।यह वाचिक हिंसा है स्त्री के प्रति।अब मैने कोई मुहिम तो चलाई नही यह केवल मेरा ओबज़र्वेशन , और उसके आधार पर आने वाले समय की चेतावनी, और नाराज़गी थी।

लेकिन यह बात दूर तलक जाती है और बहुत से लोगों के लिए गाली विमर्श स्त्री सशक्तीकरण की बेहूदी तकनीक हो जाती है।उन्हें लगने लगता है कि स्त्रियाँ हर जगह पुरुष की बराबरी करके बराबरी हासिल करना चाहती हैं।
जब डॉ अमर ज्योति कहते हैं
Dr. Amar Jyoti said...
"फूहड़ यौनिक/लैंगिक गालियों पर लज्जित या नाराज़ होने के स्थान पर यदि स्त्री उनमें रस लेने लगती है तो यह उसका विकास कहलायेगा या अधःपतन ?
तो पोस्ट के पीछे की नाराज़गी को वे क्या नज़र अंदाज़ कर गए हैं ?
HEY PRABHU YEH TERA PATH said...क्या पुरुष प्रधान सस्कृति कि बराबरी के लिये इस तरह कि बॉतो को कोनसे तर्क से सही ठहरायॉ जा सकता है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी कहते हैं-
स्त्री सशक्तीकरण के जोश में पुरुषों से गन्दी आदतों की होड़ लगाना कहीं से भी नारी समाज को महिमा मण्डित नहीं करेगा। गाली तो त्याज्य वस्तु है। इसमें कैसी प्रतिद्वन्द्विता?
वहीं आलोचक भी कहते हैं कि स्त्री पुरुष की बराबरी क्यों करना चाहती है?
वहीं सारस्वत शेखर कहते हैं -बराबरी करनी है किसी सुसंस्कृत मुद्दे पर करनी चाहिए|
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कमेंट्स मे यह स्पष्ट दिखता है कि -गालियाँ पुरुष प्रधान संस्कृति की विशेषता है,यह गन्दी आदत है ,यह पुरुषों की गन्दी आदत है।
लेकिन इस गन्दगी पर शर्मिन्दगी इनमें से किसे कमेंट मे नही है बल्कि सवाल करने वाली एक स्त्री को उसकी ओछी ख्वाहिश के लिए शर्मिन्दा करने की नीयत ज़रूर है।इनमें से कोई नही कहता कि हाँ यह गलत है और अगर हम चाह्ते हैं कि हमारी बेटियाँ ऐसी भाषा न बोलें तो हमें इस गन्दी आदत को छोड़ना होगा। क्यों ? पतन पर इतना मोह क्यों ?

जब आप कहते हैं कि स्त्री भी पुरुष की तरह वाहियात गालियाँ देना चाहती है, एकाधिक पुरुषों से संसर्ग करना चाहती है , पतित होना चाहती है, होड़ करना चाहती है .....तो क्या आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि पुरुष खुशी से पतित होना स्वीकार करता है?और वह पतित होना चाहता है ? कहीं इसलिए तो नही कि पतित होकर वह् ज़्यादा मनुष्य हो पाता है,ज़्यादा सहज,ज़्यादा स्वतंत्र ,ज़्यादा मानवीय ? क्या इसलिए आप सगर्व कहते हैं कि हम तो गिरे हुए हैं तुम क्यों गिरना चाहती हो? और यह भी कि इस पतन को कंट्रोल करना भी ज़रूरी है इसलिए इसे स्त्रियों के लिए प्रतिबन्धित किया जाए?इसका यही तरीक हो सकता है कि जो ज़्यादा आज़ाद है(संतनोत्पत्ति ,संतान पालन आदि से)वह और आज़ाद रहे....जो बन्धा है वह और बन्ध जाए!


जैसे स्वाभाविक इच्छा किसी पुरुष की हो सकती है -सिगरेट पीने ,शराब पीने , दोस्तों के साथ ट्रेकिंग पर जाने,अपने करियर मे श्रेष्ठतम मुकाम तक पहुँचने और उसके पीछे जुनून की हद तक पड़ने,या फ्लर्ट करने, या गाली देने, या लड़कियों को छेड़ने ,या गली के नुक्कड़ पर अपने समूह मे खड़े रहकर गपियाने ...............
ठीक इसी तरह ऐसे या इससे अलग बहुत सारी इच्छाएँ स्त्री की स्वाभाविक इच्छाएँ हैं जिन्हें करते आपने उन्हें अपने बन्द समाज मे नही देखा आज देख रहे हैं लेकिन स्वीकार नही कर पा रहे और स्त्री वैसा न करे कहते ही आप सिरे से यह नकारते हैं कि वह एक मनुष्य है,विचारवान है,वयस्क है,अस्मितावान है ....और वह जो जो चाहती है कानून और शिष्टाचार के दायरे मे रहकर वह सब करने की हकदार है भले ही वह आपको बुरा लगता है ।( यहाँ भी स्त्री के लिए शिष्ट और पुरुष के लिए शिष्ट की भेदक रेखाएँ खींची गयी हैं जो कि गलत है)



मान लीजिए आपके सामने लड़कियाँ ,स्त्रियों गालियाँ प्रयोग सहज हो कर कर रही हैं तो आप क्या केवल दुखी होकर ,क्या ज़माना आ गया है कहते हुए निकल जायेंगे ? या कान मूंद लेंगे?
मै चाह रही हूँ आप न कान बन्द करें , न दुखी हों , न दिल पर हाथ रखे ज़माने को कोसें ...
आप इसके कारणो को समझने का प्रयास करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें । मै चाहती हूँ कि आप लक्षणों का इलाज न करें । आप जड़ को खत्म करने का प्रयास करें । आपके कहे अनुसार जो घटिया विरासत पुरुषों के पास है उसे "घटिया" मानते हैं तो नष्ट भी कर दीजिए बजाए इसके कि उसकी तरफ न झाँकने से बेटियों,स्त्रियों ,लड़कियों को यह कह कर रोकते रहिए कि -यह तुम पर शोभा नही देता क्योंकि तुम लड़की हो।जड़ को खत्म करने के लिए गालियों को सबसे पहले अपने अभिव्यक्ति कोश मे से निकालना होगा। और शायद हम यह करने को तैयार नही हैं। क्यों?

माता-पिता कमरे मे बैठ कर वयस्कों का कार्यक्रम देख रहे हैं और बच्चे को लगातार कह रहे हैं -"तुम खेलो यह तुम्हारे लिए नही है!"
अगर आपको खुद पर नियंत्रण नही तो ,
बच्चा कब तक इस बात को सुनेगा कि यह तुम्हारे लिए नही है? जब तक वह समझदार नही होता,है न! फिर वह क्या देखना चाह्ता है ,करता है ,आपसे पूछेगा भी नही। सही है न!अब भी आप उसे यही कहेंगे कि मै तो ड्रिंक करता हूँ और जानता हूँ कि यह गलत बात है पर यह तुम्हारे लिए सही नही है तो क्या आपका 20 साल का बेटा मानेगा, मानेगा तो भी एक द्वन्द्व उसके मन मे चलता रहेगा, और आपकी इज़्ज़त कम होती रहेगी।

स्त्रियाँ जब तक पितृसत्ता के बस मे रहती है उसके लिए करणीय-अकरणीय के दायरे घर-समाज के पुरुष खींचते हैं।जब वह खुद सोचती समझती है और अपने दायरे खुद बनाती है तो इसे सराहने के बजाए बहुत आसानी से कह दिया जाता है कि वह होड़ करना चाहती है।

दर असल सब तभी तक खुश हैं जब तक स्त्री को घर-समाज-पितृसता "बनाती " है जैसा वह स्त्री को देखना चाहती है।
मेरे खयाल से इस बहस से सिर्फ इतना हासिल है कि हम यह अपनी बेटियों पर ही छोड़ दें कि वे अपने लिए क्या चुनें और चुनाव मे उनकी फ्रीडम को अपनी घरेलू,सामाजिक शिक्षा से प्रभावित करने की कोशिश न करें जो कि हम हमेशा करते आए हैं।इज़्ज़त और तमीज़ की दुहाई मे उनकी समझदारी और व्यक्तित्व को कुँठित न होने दें।आने वाले ज़माने की बेटियाँ अपने पिताओं की दोगली नीतियों की वे अच्छी खबर लेने वाली हैं यह जान लीजिए।अब वे आपकी ही खबर न लें इसके लिए आप उन्हें समझदार न बनने दें,जानकार न होने दें,बरगला कर रखें, तो यह बे ईमानी होगी, धोखा होगा।

27 comments:

Anonymous said...

जो जिस भाषा मे बोले उसका जवाब उस भाषा मे उसको दिया जाए तो कष्ट तो होगा ही . वर्जनाए सब स्त्री के लिये ही बनी हैं .
स्त्री हो कर शराब oh my god
स्त्री हो कर सिग्रत oh my god
स्त्री हो कर गाली oh my god

इन तीनो वाक्यों मे शायद स्त्री होना अपमान हो गया हैं ना की वो काम करना अपमान जनक हैं जो पुरूष सदियों से कर रहा हैं .

dono post bahut achchi haen

L.Goswami said...

बदलाव तो हो ही रहा है हर मोर्चे पर ..कोई माने या न माने ..वैसे न मानने से हकीकत बदल नही जाती ..किस किस बात के लेकर रोयेंगे दोमुहे लोग

गौरव सोलंकी said...

अब इस पोस्ट पर आई टिप्पणियों में भी यही बेशर्मी उभरकर सामने आएगी और कई उलझे हुए नैतिक तर्क, जिनके आखिर में स्त्री का हाथ थामकर उसे सम्बल देते हुए, ऐसी कामनाओं के लिए शर्मिन्दा किया जाएगा।
क्या रीत है! :)

मुनीश ( munish ) said...

An incessant eruption of volcano, a brave attempt to show the mirror to a sick society. Kudos to u n ur firebrand gang! Hats off to u for raising these issues!

विजय तिवारी " किसलय " said...

एक सार्थक चर्चा के लिए अपने और पोस्ट पर आगंतुकों ने समय निकला,ये ठीक है,लेकिन इस पर कितना सकारात्मक अनुकरण होता है ये भविष्य देखेगा

आपका
विजय

Sanjay Grover said...

फिर कुछ और शब्द हैं । स्त्री देवी है, मां-बहन और बेटी है । भारतीय संदर्भो में स्त्री की दुर्दशा को देखते हुए उसे देवी कहा जाना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे कि एक मुहावरे के अनुसार किसी को पोदीने के पेड़ पर चढ़ाकर उससे अपना काम निकलवा लेना । बार-बार स्त्री को मां-बहन-बेटी कहते रहने में जो अर्थ छुपा है, उसकी धुरी भी पुरूष है । निहितार्थ इसके भी यही हैं कि वो पुरूष की मां, बहन और बेटी है । उसकी परवरिश, सुरक्षा या परवाह चूॅंकि पुरूष को ही करनी है, अतः हर मामले में उसे अनुमति या सलाह भी पुरूष से ही लेनी चाहिए । इस कारक ने भी स्त्री को बौद्विक या मानसिक रूप से अपंग बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है । अगर ऐसा न होता तो अकसर हमें यह भी सुनने को मिलता कि ‘पुरूष हमारा भाई है, बेटा है, देवता है, इसलिए उसे हमें घर में, एक कोने में संभालकर रखना चाहिए । स्त्री को देवी कहने वाला समाज वास्तव में उसे क्या मानता है, इसका पता हमें इसी बात से चल जाता है कि हमारे यहां प्रचलित लगभग सभी गालियां स्त्री को लक्ष्य करके कही गयी हैं। स्त्री की वास्तविक हैसियत बताने वाले ऐसे कितने ही शब्द हैं । 'जैसे अर्दधागिंनी' । निहितार्थ है पुरूष का आधा भाग, वो भी अनिवार्य रूपेण स्त्री ही, क्योंकि पुरूष को तो ‘अर्दधागिंना’ हम कहते नहीं ।
(7 मार्च 1997 को अमरउजाला, रुपायन में प्रकाशित मेरे एक लेख का अंश)

sujaataa ji aap kahiN galat nahiN haiN. yuhiN bekhauf likhti rahiye.

मसिजीवी said...

कई बार मैं आप चोखेरबालियों के ब्‍लॉगजगत पर इस विश्‍वास को देखकर हैरान होता हूँ। खुद ब्‍लॉग को लेकर बीसियों मंचो से सकारात्मक बाते कहता रहा हूँ किंतु कभी नहीं लगा कि ब्‍लॉगजगत में परिपक्‍वता का वह स्‍तर है कि वह गालियों के पितृसत्‍तात्‍मक रूप को समझने में रुचि लेगा। आप यदि इस विमर्श में इन प्रतिक्रियाओं से हैरान हो रही हैं तो इसका अर्थ हुआ कि आपको कुछ अलग प्रतिक्रियाओं की उम्‍मीद थी।

तय है कि गालियों की समाजशास्त्रीय समझ यही कहती है कि प्रयुक्‍त होती हैं पितृसत्‍ता द्वारा तथा लक्षित होती स्त्रियों के विरुद्ध। और हॉं व्‍यक्तियों को शर्मिन्‍दा करके उनकी निर्मिति बदल देने के गांधीवादी इरादे भी दिवास्‍वप्‍न हैं। समाज की निर्मिति बदलेगी तो गालियों की प्रयुक्तियॉं भी बदलेंगी उनकी भाषा भी तथा लख्‍य भी।

पर गालीमुक्‍त समाज का यूटोपिया गढ़ने वाले अकारण ही भाषा को वंचित करते हैं। भाषा समुदाय है तो गालियॉं भी होंगी होनी ही चाहिए। कौन सी व किस किस के अधिकार क्षेत्र में - ये संघर्ष का डोमेन है।

ss said...

"लेकिन इस गन्दगी पर शर्मिन्दगी इनमें से किसे कमेंट मे नही है बल्कि सवाल करने वाली एक स्त्री को उसकी ओछी ख्वाहिश के लिए शर्मिन्दा करने की नीयत ज़रूर है।"
तो आप यह कहें ना| भाई लोग सब कोई बोले कौन कौन शरमिंदा है?
मैं तो भाई बहुत शर्मिंदा होता हूँ अगर मुहं से गाली निकलती है, वैसे बिरले ही निकलती है|

अगर यही मनवाना इस पोस्ट का उद्देश्य था तो आप सफल हुईं|

मैं गाली के मनोविज्ञान पर २ उदहारण देना चाहूँगा.......निष्कर्ष आप निकालें.....

१) राखी का त्यौहार हम सभी मानते हैं (ऊँगली भी उठाते हैं की राखी का त्यौहार औरतों को नीचा दिखाने की कोशिश है, लेकिन वो दूसरा मुद्दा है), क्या होता है उसमे, बहन की रक्षा भाई करेगा, व्यापक अर्थ यह है की, औरतों लड़कियों की रक्षा, पुरूष करेंगे| (रक्षा शारीरिक क्षमता के संदर्भ में उपयोग हुआ है)

अब अगर कोई कुछ कुकृत्य करने की कोशिश करता है तो मारपीट और गाली| (गाली मन के उदगार/विकार को निकालने का साधन मात्र है)

२) हमारे पीछे के फ्लैट में एक औरत अचानक आती है और घर के पुरूष को भद्दी भद्दी गालियाँ देती है कुछ इल्जाम लगाकर| अचानक उनकी पत्नी निकलती हैं और वो भी जवाब देती है गालियों से|

मेरे इन उदाहरणों से ये निष्कर्ष न निकला जाए की चाहता हूँ गालियाँ ऐसे ही बदस्तूत जारी रहें!!!!
मैं बस आप लोगों की राय जानना चाहता हूँ|

ss said...

"इज़्ज़त और तमीज़ की दुहाई मे उनकी समझदारी और व्यक्तित्व को कुँठित न होने दें।आने वाले ज़माने की बेटियाँ अपने पिताओं की दोगली नीतियों की वे अच्छी खबर लेने वाली हैं यह जान लीजिए।अब वे आपकी ही खबर न लें इसके लिए आप उन्हें समझदार न बनने दें,जानकार न होने दें,बरगला कर रखें, तो यह बे ईमानी होगी, धोखा होगा।"

सुजाता जी please dont take it otherwise....आपको ग़लत साबित करने का कोई इरादा नही है, i just want to understand your point of view...

कुदरत ने लड़के लड़कियों को शारीरिक और भावनात्मक तौर पर एक जैसा नही बनाया....ये सही है? अगर हाँ तो आप इसे कुदरत का दोगलापन मानती हैं?

Anonymous said...

कुदरत ने लड़के लड़कियों को शारीरिक और भावनात्मक तौर पर एक जैसा नही बनाया....ये सही है? अगर हाँ तो आप इसे कुदरत का दोगलापन मानती हैं?

this is an age old technique to ask woman to live indoors

the god has created all indviduals with same mind body and soul

because man in general harass woman and because all discussions man try to end with bringing the womans body into forefront shows that man are not willing to accept what is equality

why bring our bodies into discussions discuss with mind and then try to refute what arguments sujata is giving


and if you dont like what i am saying do read
this post because here also another comment is saying the same thing

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2008/12/blog-post_29.html

ss said...

भाई/बहन,,, आप जो भी हों...

"this is an age old technique to ask woman to live indoors

the god has created all indviduals with same mind body and soul"

आप मेरी बात समझ नही पाये/पायीं| मैंने कोई तर्क नही दिया मैं बस सुजाता जी की बात समझना चाहता हूँ| खैर सुजाता जी ये clear कर ही देंगी|

रही बात आपके इस कमेन्ट की.....
"why bring our bodies into discussions discuss with mind and then try to refute what arguments sujata is giving"

मैंने "भावना" का भी उल्लेख किया था,,,,when i tried to refute??
आपने शायद मेरे कमेंट्स को ध्यान से नही पढ़ा|

ghughutibasuti said...

स्त्री होकर गाली देती हो , सिगरेट पीती हो, शराब पीती हो ! यहाँ तक तो यह समझा जा सकता है कि जैसे अपने नन्हें मुन्ने को राजा बेटा बनाए रखना चाहते हैं वैसे ही स्त्री को भी रानी बेटी बनाए रखना चाहते हैं। परन्तु मैंने तो ये ब्रह्म वाक्य भी सुन रखे हैं, 'लड़की होकर कक्षा में बात करती हो, हँसती हो, शैतानी करती हो, जवाब देती हो, जबान लड़ाती हो ! हमारे यहाँ बहुएँ जवाब नहीं देती, जोर से बात नहीं करतीं, हँसती आदि आदि।'
ऊपर वाले, हाँ, वही पुल्लिंग ऊपर वाले से बहुत गलती हो गई जो स्त्री को जबान, मस्तिष्क आदि दे डाला। वैसे अभी हाल में एक स्त्री रोबोट बनाया गया है जिसकी वायरिंग शायद सही है। वह केवल मीठा मीठा बोलेगी़, आज्ञाकारी होगी, शायद हँसेगी नहीं, जोर से तो बिल्कुल नहीं, बुरे शब्द नहीं बोलेगी। समाज से स्त्री वैसे ही गायब होती जा रही है , अब यह सही माप वाली ३४,२४,३३ व सही मानसिकता वाली रोबोट स्त्री बहुत काम आएगी।
घुघूती बासूती

ss said...

@Anonymous
मेरा मानना ये है की कुदरत ने एक रखना होता तो पुरूष महिला २ अलग चीजें होती ही नही| कुछ अलग व्यवस्था होती|
एक जैसा नही बनाया लेकिन ऊपर नीचे भी नही बनाया, दोनों को बराबर ही रखा था| लेकिन आपसे एक बात पूछता हूँ....आज महिलाओं की स्थिति के लिए सिर्फ़ पुरूष ही जिम्मेदार हैं??

अगर दोनों एक जैसी नहीं हैं तो मैं कैसे मान लूँ की दोनों को समान रूप से ट्रीट किया जायेगा? किसी को लड्डू मिलेगा किसी को बर्फी, (हाँ ऐसा न हो की एक को लड्डू मिले दुसरे को डंडा)|

मेरे ख्याल से अधिकतर लोग इसी बात से असहमति जताते हैं की आप ये क्यूँ कह रही हैं की दोनों को लड्डू ही चाहिए? आख़िर लड्डू और बर्फी दोनों एक समान हैं, दोनों के अपने गुन हैं|

Dr. Amar Jyoti said...

'पोस्ट के पीछे की नाराज़गी' को मैनें अनदेखा नहीं किया है अपितु उस नाराज़गी की अभिव्यक्ति के तरीके पर प्रश्न उठाया है। किसी पशु के भौंकने या काटने का उत्तर भौंक या काट कर नहीं दिया जाता।
वैसे भाषा का अपना वर्गीय चरित्र भी होता है परन्तु
उसकी चर्चा यहां करने से विषयान्तर हो जायेगा।

सुजाता said...

मेरा मानना ये है की कुदरत ने एक रखना होता तो पुरूष महिला २ अलग चीजें होती ही नही|
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शाश्वत जी ,
मै नहे समझ पा रही हूँ कि आप क्या जानना चाह रहे हैं? क्या आप यह मान रहे हैं कि गालियाँ देना पुरुष का की प्रकृति है ? तब निश्चित ही ऐसा नही है क्या लड़के बोलना सीखते ही गाली का उच्छारण करते हैं।जो उनके जेंडर रोल के मुताबिक सामाजिक ट्रेनिंग से उन्हें मिलता है वही उनकी भाषा बनती है।निश्चित रूप से किसी समाज मे स्त्री व पुरुष के लिए किस तरह के रोल और स्टेट्स है उसी के हिसाब से उनकी भाषिक विशेषताएँ होंगी।
यहाँ कहीं भी प्रकृति का दोष नही है न दोगलापन है।

ss said...

@सुजाता जी
"मै नहे समझ पा रही हूँ कि आप क्या जानना चाह रहे हैं? क्या आप यह मान रहे हैं कि गालियाँ देना पुरुष का की प्रकृति है ?"

जी नही मेरे कहने का ये मतलब नही था.....गाली मन के उदगार/विकार को निकालने का साधन मात्र है......चाहे पुरूष हो या स्त्री, जिसे जब जी चाहे उलटी कर देता है....हाँ इसपर बहस जरुर हो सकती है पुरूष ज्यादा क्यूँ करते हैं.....और उनकी गन्दगी ज्यादा क्यूँ दिखती है|

सुजाता said...

लेकिन आपसे एक बात पूछता हूँ....आज महिलाओं की स्थिति के लिए सिर्फ़ पुरूष ही जिम्मेदार हैं??
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शाश्वत जी ,
यहाँ दो बातें है -एक ,आप कहना काहते है6 कि स्त्री की दोयम स्थिति के लिए प्रकृति भी ज़िम्मेदार है।
दूसरी,स्त्री की वर्तमान स्थिति के लिए वह खुद भी ज़िम्मेदार है।
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मेरे मन मे एक उदाहरण आ रहा है शायद समझा पाऊँ।एक खानदानी गरीब ,बन्धुआ मज़दूर है और एक खानदानी रईस।मज़दूर को जीवन की आधार्भूत सुविधाएँ भी मयस्सर नहीं और रईस कम मज़दूरी पर लगातार काम लेता है और अधिक रईस होता जाता है।
किस घर मे पैदा होना है आपके वश मे नही। इसे किस्मत या प्रकृति कहा जा सकता है, वह मज़दूर रईस के घर मे भी पैदा हो सकता था।
वह अपनी दशा का खुद भी ज़िम्मेदार है क्योंकि वह भी शोषण करवाता है। रईस का हौंसला उसी की वजह से बढा है।
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मैने वर्ग का उदाहरण लिया , बात हम लैंगिक विभेद की कर रहे हैं।कुछ मदद इससे मिल सकती है।अब अगर आपको ये दोनो कारण सही लगते हैं तो मै आपके मत से सहम्त हो सकती हूँ कि स्त्री की स्थिति के लिए प्रकृति और स्त्री खुद दोनो दोषी हैं सिर्फ पुरुष नही।
मज़दूर की खानदानी गरीबी और सामाजिक रुतबा अवश्य ध्यान मे रखें।

ss said...

सुजाता जी,

प्रकृति के बारे में मेरा ऐसा सोचना नही है......जैसे की मैंने अपनी एक टिप्पणी में लिखा था.....
"एक जैसा नही बनाया लेकिन ऊपर नीचे भी नही बनाया, दोनों को बराबर ही रखा था|"

दोनों को बराबर ही रखा था....लेकिन बाद में कुछ घाल मेल हो गया....इसके लिए पुरूष और स्त्री दोनों जिम्मेदार हैं.....
स्त्री इसलिए की .....अगर हजारों सालों से अन्याय होता आया है...तो आजतक ये अन्याय ख़तम क्यूँ नही हुआ??
ख़तम नही हुआ क्यूंकि १) या तो लडाई नही हुई या फ़िर २) लड़ाई काफ़ी नही थी ....
लड़ाई तो जरूर हुई इसका मतलब कि काफ़ी नही थी......
लड़ाई ठीक से लड़ी नही गई.............क्यूँ..............जबकि आप भी मानेंगी आज कई पुरूष (मेरे जैसे) हैं जो की आपके साथ लड़ने को तैयार हैं.....
इसी कारण से मैंने स्त्री पुरूष दोनों को जिम्मेदार माना है|

ss said...

मेरे ख्याल से...अगर आपके उदाहरण को आगे बढ़ाऊं....बंधुआ मजदूरों में से एक आगे बढ़ा.....कल को मजदूरी कि जरुरत नही पड़ी...लेकिन उसने बाकी मजदूरों के लिए कुछ नही किया.....जमींदार खुश था...कि एक ही तो गया...पीछे से एक और मजदूरों में शामिल हो गया.....मेरा क्या गया!

बात यहाँ यह है कि जो भी आगे बढ़ गया...पीछे का इतिहास भूल जाता है....क्यूंकि एक स्तर के ऊपर कौन मर्द कौन औरत मायने नही रखते|

समाज के सिर्फ़ नीचे वाले खाने में ही स्त्री स्त्री, और पुरूष पुरूष होता है|

Sanjay Grover said...

तो फ़िलहाल नया राग यह छिड़ा है कि प्रकृति ने जैसा स्त्री और पुरुष को बनाया है। वैसा ही उन्हें रहने दिया जाए। याद रखें कि स्त्री पुरुष के कपड़े, सामाजिक मान्यताएं और नियम प्रकृति ने नहीं बनाए। जब सुनामी आती है तो हम सब कुछ प्रकृति पर छोड़कर नहीं बैठ जाते। संभव है कल सुनामी को रोकने के उपाय भी ढूंढ लिए जाए। लब्बो-लुआब यह कि प्रकृति ने सब कुछ सही-सही ही नहीं बनाया। बहुत सी कमियां भी हैं जो मनुष्य को सुधारनी पड़ रही है। सिमाॅन पहले ही कह चुकी हैं कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है’। सारे पुरुषों की भी मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक क्षमताएं एक जैसी नहीं होतीं।
हम तर्क क्या दे रहे हैं ? यह कि लज्जा स्त्री का प्राकृतिक गुण है। सेवा, बलिदान, त्याग, मितभाषी होना उसके स्वाभाविक गुण हैं। स्त्री के गुण क्या हैं ? कौन यह तय करेगा ? अगर लज्जा, शील-संकोच, त्याग, बलिदान आदि उसके स्वभाव के अंग हैं, तो न्यूयार्क से मुंबई, मुंबई से दिल्ली, दिल्ली से अलीगढ़ और अलीगढ़ से हाथरस आते-आते उसके स्वभाव और व्यवहार में इतना अंतर क्यों हो जाता है ? हम भूल जाते हैं कि त्याग, सेवा, ममता, वात्सल्य जैसे शब्दों की आड़ में उसका कितना शोषण हुआ है।

दासता के जिन लक्षणों को लोग औरत का स्वभाव या गुण कहते आए हैं, वैसे ही कई लक्षण बंधुआ, दलित शोषित, पीड़ित व नीग्रो लोगों में भी पाए जाते रहे हैं, जिन्हें छोड़कर आज वे अपनी असली आजादी की ओर बढ़ रहे हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि वे अपने ‘गुणों’ को तजकर, अपने ‘स्वभाव’ के विपरीत जाकर ‘विनाश’ की ओर बढ़ रहे हैं ?

ss said...

संजय भाई
"तो फ़िलहाल नया राग यह छिड़ा है कि प्रकृति ने जैसा स्त्री और पुरुष को बनाया है। वैसा ही उन्हें रहने दिया जाए। "

नाराज न हों....मैंने ऐसा कब कह दिया मेरे भाई? जरूर मेरे समझाने में कोई चूक हुई होगी| क्षमा करें|

हें प्रभु यह तेरापंथ said...

आपकी यह जिद्द है कि लोग आपकि बात को स्वीकारे ? तो शायद आप समाजिक व्यव्स्था का बन्टाधार करने कि ठान कर बैठी हो। आप महान नारी जाति को भ्रमित करने का कार्य कर रही हो। दोगले पन से क्या मतलब है आपका ? सबसे पहली बात मै गालि नही देता हु तो मेरी बैटी से भी यह अपेक्षा रखता हु कि वो भी किसी रुप म असस्कारी ना बने। नारियो के प्रति आप हमदर्दी जाता रही है तो इसकि जरुरत नही है क्यो कि भारत कि ९९% महिलाये, भारतीय सभ्यता, भारतिय सस्कृति का सम्मान करते हुये महान बनी है।

गाली देना और उसके लिये एक दो बिगडैल लडके लड्कियो के समर्थन मे झण्डा लेकर रोड पर आजाना खराब मानसिकता का कारक है। या इस तरह कि बात करना यह दर्शता है कि व्यक्ती विशेष किसी कुण्ठा से ग्रसित है । जो भी आदरणीय महिला दो मुह और तीन मुह कि बात करती है वो यह बाताये आपके परिवार मे आप गाली देती है ? आपकी बेटी या बेटा गाली देती/ देता है ? नही ना ? तो मतलब साफ है आप ओर आपके परिवार कि सभ्यता, मॉ + पिता के साझा सस्कार से बने है। हमको गलत काम इस लिये करना है क्यो कि पुरुषो भी शराब पीते है, सिगरेट पीते है, गाली देते आतकवादि बनते है , हत्यारे बनते, बलात्कारी बनते है तो बराबरी के जमाने मै नारी पीछे क्यो रहे ? क्या कुछ विसगतियो के कारण आप और हम पुरी नारी जगत को कुऐ मे धकेलने का काम नही कर रहे है ?

किसी भी दृष्टी से मै इस बात को अपने मष्तिशक मे नही बैठा सकता कि आप नारी जगत का अच्छा करने जा रही है ।

अगर इसके बावजुद जो भी नर नारी गालि देना चाहता/चाहती है तो फिर यह उनकी व्यक्तीगत शान ओ शोकत समझ लेने मे कोई हर्ज नही। कानुन कि दृष्टी मे भी इस अभद्र व्यवहार के लिये कोई दोगला पन नही है महिला-पुरुष दोनो के लिये समान सजा का प्रावधन रखा हुआ है। जिस तरह से आतकवाद(महिला/पुरुष) का समर्थन नही किया जा सकता उसी तर्ज पर इसका भी समर्थन करना मुमकिन नही है। आप सर्वे करा दिजिये कुछेक को छोडकर आपको महिलाओ का समर्थन नही मिल पायेगा। सर्वे मे यह वैमन्य पैदा ना करे कि पुरुष गाली देते है तो स्त्री क्यो नही? सिर्फ इस बात पर स्वस्थ सर्वे हो कि हमारी बहन , हमारी मॉ, हमारी बेटि, हमारी पत्नी, हमारी बहु, हमारी सॉस, हमारी नणद, हमारि भाभि, और भी भी रिस्ते जो स्त्री से बनते है वो जननी मॉ अब क्या खुले आप सडको पर गालि गलोच कर सकती है क्या ? जय हिन्द॥॥

Sanjay Grover said...

shekhar bhai
yeh maine aapke liye nahiN kaha. ye sari bahas jis disha meN ja rahi thi, us par kaha.
"jeete raho".
(vaise ek insurance company ka yeh vigyapan bhi bahas ka vishaya hai).

ss said...

मुझे जिंदगी की दुआ देने वाले,
हँसी आ रही है तेरी सादगी पर!! :)

सुजाता said...

आप सर्वे करा दिजिये कुछेक को छोडकर आपको महिलाओ का समर्थन नही मिल पायेगा। ... सिर्फ इस बात पर स्वस्थ सर्वे हो कि हमारी बहन , हमारी मॉ, हमारी बेटि, हमारी पत्नी, हमारी बहु, हमारी सॉस, हमारी नणद, हमारि भाभि, और भी भी रिस्ते जो स्त्री से बनते है वो जननी मॉ अब क्या खुले आप सडको पर गालि गलोच कर सकती है क्या ?
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ओह मुझे नही पता था कि समाज मे बदलाव किसी सर्वे के नतीजे जानने के बाद आते हैं।और यह भे अन्ही पता था कि मैं दुनिया भर की लड़कियों को बरगला सकती हूँ।धन्यवाद!पर मेरे सर्वे करा लेने के बाद लड़कियाँ अचानक गाली देना शुरु कर देंगी या बन्द कर देंगी क्या ऐसा है?
मै आपसे कुछ भे नही मनवाना चाह रही ,आप असहमत रहें।आपकी असहमति और मेरी झंडाबरदारी से दुनिया नही बदलेगी। केवल इस टाइम और स्पेस मे मेरा विरोध दर्ज होगा और वह कितना दम रकहता होगा यह इतिहास बन जाने के बाद ही जान पाएंगे।
और शायद कम से कम यह होगा कि किसी स्त्री को ब्लॉगजगत में सभ्यता की तमीज़ सिखाने से पहले cmpershad जैसे लोग खुद के गिरेबान मे झाँक लेंगे।
आज की चिठाचर्चा मे आपको इस बात का सन्दर्भ मिल जाएगा।
मै अभी सिर्फ लिख ही रही हूँ एक ऐसे ब्लॉग पर जिसे दिन में गिने चुने वही-वही लोग रोज़ पढते हैं।हैरान नही होना चाहिए कि कुछ पुरुष साथियों का साहस अभी से जवाब दे गया और वे चोखेर बाली को रेड लाइट एरिया से तुलनीय बता बैठे मानो रेड लाइट एरिया पश्चिमी प्रभाव से बनते हों और उन्हें पुरुष से बराबरी की होड़ करने वाली ,तर्कशील,दबंग ,पढी लिखी महिलाएम बनाती हों।

मुनीश ( munish ) said...

very true!

मुनीश ( munish ) said...

very true!

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...