Sunday, January 4, 2009

स्त्री शिक्षा पर क्षण भर

राजकिशोर


प्रज्ञा पाठक को क्या आप जानते हैं? मैं भी नहीं जानता। पर उनकी तारीफ करना चाहता हूं कि उन्होंने अपने शोध कार्य के सिलसिले में एक ऐसी किताब का पता लगया है जिसे बेजोड़ छोड़ कर कुछ और नहीं कहा जा सकता। इस पुस्तक का नाम है: सरला : एक विधवा की आत्मजीवनी। सरला नाम की किसी महिला ने "एक दु:खिनीबाला के नाम से अपनी रामकहानी "स्त्री दर्पर्ण पत्रिका के जुलाई 1915 से मार्च 1916 तक के अंकों में लिखी थी। इसे पढ़ने और उस पत्रिका में छपी अन्य सामग्री का परिचय पाने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि महिला पत्रकारिता के मामले में हमारा घोर पतन हुआ है। कहां वे वीरांगनाएं जो स्त्री जीवन के विविध मुद्दों को ज्वलंतता के साथ उठाती थीं और कहां आज की वनिताएं जिन्हें सिंगार-पटार और खाने-कपड़े की नवीनताओं से फुरसत नहीं है। यह पतन का प्रमाण नहीं, पतन का परिणाम है।
वैसे तो "एक विधवा की आत्मकथार् के कई सुंदर पहलू हैं, पर मैं यहां सिर्फ दो चीजों का जिक्र करना चाहता हूं। हाल में मैंने अनेक स्त्रीवादी लेख पढ़े हैं जिनमें स्त्री दुर्दशा के बेहद करुण चित्र खींचे गए हैं और पुरुषों को पानी पी-पी कर कोसा गया है। लेकिन कहीं भी वह बात नहीं देखी जो इस दु:खिनीबाला ने अपनी अम्मा के हवाले से बहुत ही सहज ढंग से कह दी है। अम्मा, बाबूजी और भाई मोहन के बीच स्त्रियों की समस्याओं पर चर्चा चल रही है। लेखिका पूछती है- "जो प्रथा (स्यापा) इतनी बुरी है, जिसके सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं उसे लोग तोड़ क्यों नहीं देते? क्या घरवालों में दया नहीं है या समाज की दृष्टि में वह अच्छा हैर्?
इस पर अम्मा कहती हैं- "नहीं-नहीं, बात यह नहीं है, सब लोग जानते हैं, समझते हैं, मन ही मन उसे घृणा की दृष्टि से भी देखते हैं किन्तु मनुष्यों में इतना नैतिक बल नहीं है कि एक बात को सरासर बेजा समझते हुए भी उसे छोड़ दें। साथ ही स्त्रियों में विद्या नहीं, बुद्धि नहीं। स्यापे को भी वे ईख्ारीय आज्ञा, धर्म और वेद समझती हैं। कितनी ही ऐसी हीन प्रथाएं हैं। समाज में तो क्या, तुमसे कहने में भी, जिनका नाम लेने तक में लज्जा में डूब जाती हूं। कितनी ही प्रथाएं तो ऐसी हैं कि यदि स्त्रियां पढ़-लिख जाएं तो उन्हें अपनी बहू-बेटियों से कहने में इतनी लज्जा आए कि उनका अनुसरण आप से आप बंद हो जाए। किसी शिक्षिता स्त्री को अपनी पुत्री या पुत्रवधू से कहने का साहस ही न होर्।
पुस्तक में अन्यत्र भी स्त्री शिक्षा के महत्व पर जोर दिया गया है। नि:संदेह शिक्षा सशक्तीकरण का एक सबल औजार है। इसीलिए अभी हाल तक स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखने की प्रथा थी। सवाल यह नहीं था कि शिक्षा पा कर स्त्री क्या करेगी, जैसा कि कहा जाता था, सवाल यह था कि शिक्षा पा कर स्त्री क्या नहीं करने लग जाएगी। शिक्षा अज्ञान के किले को तोड़ने के लिए सबसे कारगर हथौड़ा है। एक ओर पुरुष का विवाह करते समय इसका ध्यान रखा जाता था (आज भी रखा जाता है) कि स्त्री की उम्र उससे कम हो, ताकि पुरुष शारीरिक तौर पर उस पर हावी हो सके; दूसरी ओर स्त्री को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, ताकि पुरुष मानसिक रूप से उस पर हावी हो सके। इस तरह स्त्री की दशा ऐसी कर दी गई थी कि वह पुरुष के सामने सिर न उठा सके। इसे ही आदर्श जोड़ी कहते थे।
आज उन्हीं स्त्रियों का वास्तविक सशक्तीकरण हो पा रहा है जिन्होंने शिक्षा के माध्यम से अज्ञान के केंचुल को उतार फेंका है। आश्चर्य है कि फिर भी स्त्रीवादियों की ओर से स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए कोई सशक्त आंदोलन नहीं है। राजधानी की औरतें संसद में स्त्रियों के लिए एक-तिहाई आरक्षण के लिए जितना जोर लगा रही हैं, स्त्री शिक्षा के प्रसार की ओर से वे उतनी ही उदासीन हैं। ऐसा लगता है कि जैसे पुरुष स्त्री शिक्षा से डरते थे, वैसे ही आज शिक्षित औरतें और अधिक स्त्रियों के शिक्षित हो जाने से डरती हैं। यह समझ में आना मुश्किल है कि अशिक्षित औरतों की फौज कौन-सी सांस्कृतिक क्रांति ला सकेगी।
दूसरी बात यह है कि जब तक समाज में अमीरी-गरीबी है, तब तक किसी के भी साथ न्याय नहीं हो सकता। सरला जो स्वप्न देखती है, उसमें एक व्याख्यानदाता कहता है- "राजनीति में देखिए, दुनिया प्रजातंत्र का नाम ले पागल हो रही है जबकि वास्तव में सब मनुष्यों के भाग्य का निपटारा एक थोड़े-से मनुष्यों का खेल हो रहा है। संपत्ति के क्षेत्र में देखिए, हजार गरीबों के बीच मुश्किल से एक अमीर होता है। किसी के पास करोड़ों रुपया है और किसी के तन पर एक फटा कपड़ा हैर्। यह धरती की दशा है। सरला द्वारा स्वप्न में देखे गए स्वर्ग की स्थिति क्या है- "यहां दुखी कोई दिखाई ही नहीं देता। गरीबी किस वस्तु का नाम है, वह है भी कुछ या नहीं, इसमें भी संदेह होता है। यहां स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं है, यहां पुरुष सर्व सुखों का अधीख्ार नहीं है और न स्त्री अंत:पुराबद्धा दासी ही है। दोनों बराबर हैं। दोनों ही अपनी इच्छानुसार काम करते हैंर्।
यानी स्त्री मुक्ति के लिए शिक्षा ही नहीं चाहिए, आर्थिक और सामाजिक बराबरी भी चाहिए। स्त्रीवादी महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता की बात तो करती हैं, पर आर्थिक समानता की बात नहीं करतीं। जो वामपंथी महिलाएं आर्थिक बराबरी की बात करती हैं, वे शिक्षा के महत्व पर उतना जोर नहीं देतीं। इस विडंबना के अलावा एक पहेली और है। कायदे से शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वह आर्थिक तथा सामाजिक बराबरी की चेतना पैदा करे। जो शिक्षित आदमी बराबरी की चेतना से वंचित है, वह पढ़ा-लिखा होने के बावजूद अहमक है। आज स्त्री-पुरुषों को जो शिक्षा दी जा रही है, उससे वे शिक्षित तो कहलाते हैं, पर अकसर चेतना-शून्य होते हैं। यही कारण है कि तथाकथित शिक्षित पुरुष भी स्त्रियों को गुलाम बनाए रखते हैं और तथाकथित शिक्षित (तथा कमाऊ) स्त्रियां भी पराधीनता का जीवन बिताती हैं। शिक्षा वह है, जो एक संस्कृत सूक्ति के अनुसार, मुक्त करे। दूसरी ओर, यह मुक्ति तब तक घटित नहीं हो सकती जब तक सबकी आर्थिक हैसियत बराबर न हो। हैरत की बात यह है कि जिस सत्य को एक कम पढ़ी-लिखी "दु:खिनीबालार् ने 1915 में ही समझ लिया था, वह आज की बीए, एमए, पीएचडी स्त्रियों की भी दिखाई नहीं पड़ता। अगर यह विकास है, तो पतन किसे कहते हैं?

8 comments:

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ said...

सार गर्भित आलेख के लिए बधाई.

मसिजीवी said...

आभार

कृपया 'सरला : एक विधवा की आत्मजीवनी' के प्रकाशन या उपलब्‍धता के विषय में और जानकारी दी जाए ताकि इसे पढ़ा जा सके।

Prakash Badal said...

आपका स्वागत है। लेकिन मेरा मानना है कि समानता किसी आरक्षण से नहीं मिलती समानता के लिए मुकाबला करना पड़ता है और वो मुकाबला अपने बौद्धिक स्तर को बढ़ाने से से मिलता है। कोई आरक्षण प्राप्त महिला,पुरुष या फिर दलित कभी भी उस व्यकित से ज़्यादा नहीं हो सकता जो अपने बौद्धिक स्तर से आगे आया हो। किरण बेदी को किस चीज़ का आरक्षण था, कल्पना चावल क्या आरक्षण की वजह से अंतरिक्ष में पहुंची थी, या फिर सानिया मिर्ज़ा आरक्षण की वजह से विश्व टैनिस की खिलाड़ी हैं,मुझे जहां तक जानकारी है कि सुनिता विलियम्स ने वो हौसला ख़ुद जुटाया है जिसके कारण वो अंतरिक्ष की कई यात्राएं कर आईं हैं मगर बहुत सी महिलाएं आज भी आरक्षण की प्रतीक्षा कर रहीं हैं। इस पर हमारे राजनीतीज्ञ अपनी रोटियां सेंक रहे है, वो तो सेकेंगे ही।

बहरहाल ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है और आप भविष्य में भी लिखना जारी रखें।

ss said...

प्रभावी लेख| सच है शिक्षा व्यवस्था में कुछ संसोधन की आवश्यकता है|

डॉ .अनुराग said...

इस दुनिया में कई शोषित है...उनमे से है दो वर्ग है जो हमेशा शोषित रहते है .चाहे कितनी क्रांतिया हो या हम चाँद पर पहुंचे .वे है गरीब..
ओर दूसरी औरत ...
आर्थिक आत्मनिर्भरता ओर शिक्षा ....यही एक औरत दूसरी औरत को देने में मदद कर सकती है.....बहन ,मां ,पडोसन या सास के रूप में .किसी भी रूप में ...सामाजिक निर्णयों में भागीदारी में पहल उसे ही करनी होगी....

Akanksha Yadav said...

कहां वे वीरांगनाएं जो स्त्री जीवन के विविध मुद्दों को ज्वलंतता के साथ उठाती थीं और कहां आज की वनिताएं जिन्हें सिंगार-पटार और खाने-कपड़े की नवीनताओं से फुरसत नहीं है। यह पतन का प्रमाण नहीं,पतन का परिणाम है।....राजकिशोर जी! समाज में हर तरह के लोग होते हैं. आपने जो बात कही है, वह पुरुषों पर भी उतनी ही लागू होती है. बस देखने का नजरिया है सब !!

Anonymous said...

dr anurag kae kament mae sab kuch keh diya gayaa haen
aatam nirbhar baney

balman said...

शिक्षा महत्वपूर्ण है, पर यह महिलाऒ की समस्याऒं का एकमात्र समाधान नहीं है। जरूरत है समाज के रग-रग में बैठे विभेदी संस्कारों में परिवर्तन की जो स्त्री-पुरुष को समान मानने को तैयार ही नही है।

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