Monday, January 12, 2009

आपने अपने लिए क्या चुना है ? शोषित होना या शोषण करना?

सरिता ने शोषित होने का चुनाव किया था , इसलिए अगर वह अपनी जान खो बैठी है तो हमें उससे सहानुभूति तो होनी ही नही चाहिए और न ही इस स्थिति से कोई सवाल खड़ा होना चाहिए , न ही आक्रोश पैदा होना चाहिए।आखिर हम सब जो चुनते है वही तो हम पाते हैं। है न!

पिछली पोस्ट पर गार्गी दीक्षित ने ऐसा ही कमेंट किया कि मुझे सरिता से सहानुभूति नही है क्योंकि उसने शोषित होना ही अपने लिए चुना था।इसी तरह की बातें पहले भी बहुत बार यहाँ बहुत से लोगों ने कहीं हैं।

मेरी सारी की सारी परेशानी केवल इतनी है कि मै समझने मे असमर्थ हूँ कि सीमोन की यह उक्ति कि - स्त्री बनाई जाती है पैदा नही होती का मतलब समझते हुए , लड़कियों की हमारे समाज मे की जाने वाली सोशल ट्रेनिंग और स्थिति को देखते हुए भी हम उनके सन्दर्भ मे "चुनाव" के हक की बात ऐसे करते हैं जैसे हमारे देश मे सभी स्त्रियाँ अनिवार्यत: शिक्षित होती हैं,वे आत्मनिर्भर होती हैं{आर्थिक भावनात्मक सभी तरह},वे सड़क,गली,मोहल्ले,ऑफिस,घर तक मे सभी जगह स्वतंत्र व सुरक्षित होती हैं,उनपर घर की इज़्ज़त का टोकरा नही लदा रहता,उनपर शादी कर अभिभावकों को मुक्ति देने और पुत्र रत्न को जन्म कर सास ससुर को मुक्त करने का ठीकरा भी नही है।

क्या मैं आँकड़े गिनाऊँ कि हमारे देश मे कितनी लड़कियाँ स्कूल का मुँह तक नही देख पातीं, कितनी केवल कुछ कक्षाएँ पढ कर ड्रापॉउट की गिनती बढाती हैं और अपने छोटे भाई बहनो को सम्भालने के लिए घर पर ही रुकती हैं ,कितनी अच्छी पढाई लिखाई से इसलिए वंचित हैं कि माता-पिता गरीब हैं और अपने बुढापे के सहारे को ऊंची शिक्षा दिलाने मे ही अपने सारे सोर्स खर्च करना चाहते हैं, कितनी ऐसी है जो अच्छा पढ लिख कर कमाते हुए भी घर परिवार समाज के जड़ संस्कारों से मुक्त नही हो पायीं क्योंकि वे जानती ही नहीं कि वे दर असल एक षडयंत्र के तहत पाली पोसी गयी हैं और अब भी उसी ट्रेनिंग को आगे की पीढियों तक पहुँचा रही हैं। वे अब भी पूरी निष्ठा से अपनी गुलामी के प्रतीक त्योहारों को जोशोखरोश से मनाती हैं और अपनी बेटियों से मनवाती हैं।

अब अगर मैं "चुनाव" वाला फार्मूला अन्य शोषित तबकों पर लागू करके देखूँ तो मुझे लगता है "पर्सनल चॉयस " के समर्थक सहमत होंगे कि -
1. गरीबों ने गरीब होना चुना है{आखिर सबके पास कमाने के समान अवसर हैं}
2.मजदूर ने ठेकेदार और मालिक की लात सहना चुना है {विद्रोह कर दो,चाहे पुलिस ठेकेदारों से मिली हो और आस पास के ठेकेदार काम देना बन्द कर दें और बच्चे जो रोज़ सत्तू खा लेते हैं वह भी न मिले , और हाँ कमा नही सकते थे तो बच्चे पैदा ही क्यों किए , तुम्हारी चॉयस थी , अब मरो , हमें सहानुभूति नही}
3. कर्ज़ न दे पाने के कारण किसानो ने आत्महत्या करना चुना है
{किसने कहा था कर्ज़ लो, खेती बस की नही थी न करते शहर आकर पियन बन जाते,अब मरो , हमें क्या}
4. आदिवासियों ने शहरी सुविधाओं और तेज़ चाल से अछूता रहना चुना है{हम तो उन्हें आधुनिक बनान चाहते हैं वे ही अपनी जंगल ज़मीन के मोह से बन्धे हुए हैं और हमारे कोयले ,तेल सभी के खदान इस आदिवासियों की ज़मीन के नीचे दबे हैं क्या हम इनके लिए अपना विकास रोक दें}
5. जिसके घर चोरी हुई उसने चोरी करवाना चुना था{अलर्ट सिस्टम क्यों नही लगवाया घर मे , चोरी तो होगी ही, गार्ड रखना चाहिए थी , अब सोसायटी क्या करे , आप ही लापरवाह हो}
6. किसी ने ब्लू लाइन मे बस मे रोज़ाना का पीड़ादायक सफर करना चुना है{गाड़ी लो या ऑटो से जाओ वर्ना सड़ो ब्लू लाइन मे}
7.किसी ने छोटी छोटी ख्वाहिशों को रोज़ जज़्ब करना चुना है{बड़ी ख्वाहिश करो , बड़ा पाने के लिए कुछ भी करो}
8.किसी क्षीण काय ने बलवान आदमी से पिटना चुना है {आपकी गलती, कम क्यों खाया, भरपेट खाओ, दूध पियो , मेवे खाओ फिर देखो कैसे कोई थप्पड़ भी मारता है}
9.किसी ने लाइन मे सबसे पीछे खड़ा होना चुना है{आपकी गलती घर से जल्दी क्यों नही निकले, कोई तो आखिरी होगा ही , वही लूज़र है }
10.बलत्कृत होती युवती ने बलात्कृत होना चुना है {शीला दीक्षित जी के अनुसार भी-रात को अकेली घूमोगी तो यही होगा}
यह बिलकुल वैसा ही तर्क है जैसा नोयडा बलात्कार केस मे बलात्कारी युवकों के गाँव के मुखिया ने कहा कि - हमारे बच्चे निर्दोष हैं उन्होने ने ही उकसाया होगा। या कोई कह उठा कि लड़की के माँ बाप ने इतनी रात गए उसे बाहर रहने ही क्यों दिया था, यह तो होगा ही।
11. आदिम मनुष्य कच्चा माँस खाता था,शिकार करता था,नग्न रहता था तो यह उसकी चॉयस थी उसे किसने रोका था आग का आविष्कार करने से,कपड़ा पहनने से...



तो सिद्ध हुआ कि सारी बातें चूंकि पर्सनल चॉयस से घट रही हैं सो समाज मे कोई दोषी नही , किसी कानून व्यवस्था की ज़रूरत नही ,जो घट रहा है वह सब जायज़ है क्योंकि सभी कुछ सभी के चुनाव के हिसाब से उन्हें मिल रहा है।

इसलिए यह माना जाए कि , चोखेर बाली क्या चीज़ है ..किसी न्याय प्रणाली , सरकार , एन जी ओ , संस्था की हमें कोई ज़रूरत नही है। ZOO के जानवरों ने अपना प्राकृतिक घर छोड़ ताउम्र इस कैद मे तमाशा बन कर रहना खुद चुना है क्योंकि जानवर होना उन्होंने चुना है और इंसान होना हमनें।

मनुष्य अपने इतिहास से निर्मित हुआ है, इस प्रकार के तर्क वही व्यक्ति दे सकता है जो मनुष्य के वजूद मे से उसका सारा मानव इतिहास और सामाजिक विकास प्रक्रिया को काट कर अलग रख देता है।

क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि चॉयस या पसन्द या चुनाव हमेशा सक्षम, बलवान,समर्थ ,प्रतिष्ठित के सन्दर्भ मे ही अर्थवान होती है। जब आपकी जेब मे 1000 रु. हों तभी आपको चुनाव का हक है कि आपको सिनेमा मे सबसे पीछे की सीट लेनी है, कोने की लेनी है या बीच की।
जब जेब मे सिर्फ 100 रु की औकात हो तो चॉयस कोई मायने नही रखती।

15 comments:

Anonymous said...

ये भी तो सोचिये की आपके पास १०० ही क्यूँ हैं १००० क्यूँ नही?? आपके पास १०० हैं इसके लिए पुरूष, समाज दोषी है?? मुझे समझ नही आता इस तरह की सोच से स्त्रियों का क्या भला होगा| स्त्रियों के लिए सबसे ज्यादा दोषी स्त्रियाँ ही हैं, एक स्त्री दुसरे की दुश्मन है, मनोवैज्ञानिक भी प्रमाणित कर चुके हैं, इसीलिए आजतक सदियों से स्त्रियों से सहानुभूति तो सभी रखते हैं लेकिन होता जाता कुछ नही|

ये दोष ये अवगुण बताने कहने का समय गया| उठो कुछ करो, लेकिन करेंगे कैसे हम तो स्त्रियाँ है| और हमारे पास तो १०० ही है भला १००० की टिकेट कैसे लें इसलिए दूसरो की बुराई बताओ| हम ये कोशिश न करें की १०० से १००० बनाये बस इसकी दुहाई देते रहें| सदियों से यही होता आ रहा है, नो वोंडर आज भी हो रहा है|

आर. अनुराधा said...

वाह अनॉनिमस जी,
सुजाता ने समाज में कमंजोर तबकों/ लोगों की स्थिति के खिलाफ लगातार दिए जा रहे कुतर्कों की एक छोटी सी जो फेहरिस्त दी, उसमें आपने एक और जोड़ दिया। धन्यवाद। आप अगर यह ब्लॉग बीच-बीच में देख रहे/रही हैं, (उफ, बहुत असुविधा हो रही है। क्या अनॉनिमस या कोई और, कोई रास्ता नहीं निकाल सकते कि संबोधन में ऐसी रुकावट न आए) बल्कि इसी पोस्ट को ठीक से आपने देखा है, तो ध्यान दिया होगा कि-
“कितनी लड़कियाँ स्कूल का मुँह तक नही देख पातीं, कितनी केवल कुछ कक्षाएँ पढ कर ड्रापॉउट की गिनती बढाती हैं और अपने छोटे भाई बहनो को सम्भालने के लिए घर पर ही रुकती हैं ,कितनी अच्छी पढाई लिखाई से इसलिए वंचित हैं कि माता-पिता गरीब हैं और अपने बुढापे के सहारे को ऊंची शिक्षा दिलाने मे ही अपने सारे सोर्स खर्च करना चाहते हैं, कितनी ऐसी है जो अच्छा पढ लिख कर कमाते हुए भी घर परिवार समाज के जड़ संस्कारों से मुक्त नही हो पायीं क्योंकि वे जानती ही नहीं कि वे दर असल एक षडयंत्र के तहत पाली पोसी गयी हैं और अब भी उसी ट्रेनिंग को आगे की पीढियों तक पहुँचा रही हैं। वे अब भी पूरी निष्ठा से अपनी गुलामी के प्रतीक त्योहारों को जोशोखरोश से मनाती हैं और अपनी बेटियों से मनवाती हैं।“
और यह भी कि ये समस्याओं की जड़ में किसी व्यक्ति या परिवार विशेष की चॉइस से ज्यादा उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि है।

वैसे अनॉनिमस जी, बताने की जरूरत नहीं कि हालात फिर भी बदल रहे हैं, 100 के बाद 1000 नहीं हम लाख और करोड़ से भी खेल रही हैं, अपने बूते पर। और इस तरह का विचार-विमर्ष समाज और आखिरकार उस आखिरी सीढ़ी पर रुकी औरत के लिए रास्ते साफ करने का काम करता है।

Sanjay Grover said...

anuradha maine aapki donoN tippni padhi. fursat meN in par zarur likhna chahuNga.

जितेन्द़ भगत said...

ये वाकई खेदपरक स्‍थि‍ति‍ है-
वे अब भी पूरी निष्ठा से अपनी गुलामी के प्रतीक त्योहारों को जोशोखरोश से मनाती हैं और अपनी बेटियों से मनवाती हैं।

Rachna Singh said...

"क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि चॉयस या पसन्द या चुनाव हमेशा सक्षम, बलवान,समर्थ ,प्रतिष्ठित के सन्दर्भ मे ही अर्थवान होती है।"
sujata

when we know that the right to chose lies with the one who is strong , and capable then instead of crying always that we are week and incapable and deprived we need to make our self strong and we need to prove to man and society that we can do every thing .

the right to chose is always ours but the problem with most woman is that they want to be "protected " and "loved" by man and they want to "equate " them self with man

this will never happen either treat man - woman as independent persons and build your self so strong that you can survive without man as man can survive without you
if you always want to depend on man then you have to learn to do what they want from you .

the mindset of society will change only when the mindset of woman will change

equality is not a choice that we need to make , we are born equals its a right we to excecise

Dr. Amar Jyoti said...

ज़रा अजीब से विकल्प दिये हैं आपने-शोषण करना या शोषित होना। एक तीसरा(और बेहतर)विकल्प भी तो है-सभी तरह के शोषण के विरुद्ध लड़ना-चाहे वो स्त्री का हो या पुरुष का;अपना हो या किसी और का।

कुश said...

i m word by word agree with Rachna Ji..

डॉ .अनुराग said...

इस पोस्ट पर टिप्पणी करने से पहले सरिता की दुखद कहानी पढ़ी....जानता हूँ सरिता जैसी कई लड़किया है जिन्हें बचपन से ऐसे संस्कार घोट घोट कर पिलाए जाते है जहाँ उन्हें चुप रहना सिखाया जाता है..या कुछ लड़किया अपने पिता की आर्थिक ओर घर की दूसरी जिम्मेदारिया देख कर सब कुछ सह लेने की उस अवस्था से गुजरती है ये सोचकर की शायद कल ठीक होगा..या मां भी अपने आंसू पी कर उसे थोड़ा सहने की बात कहती है.....हम ओर आप जिस घर में रह रहे है वहां बचपन से बच्चो को ऐ सी ओर कोम्पुटर मुहय्या है जाहिर है कई लोगो के लिए ऐसे अनुभव इक्का दुक्का की श्रेणी में आयेगे...पर सरिता जैसी खास मानसिक परिवेश में ढली गई लड़किया भी हमारे समाज में है ओर ये हकीक़त है....हाँ बड़े शहरों में या दूसरी कई जगह स्थिति बदल रही है पर उनकी संख्या कम है ओर वहां होने वाले शोषण दूसरे रूप में है.....

हकीक़त है अभी पिछले महीने मै अपने एक दोस्त के पास रात में रुका था जो हरियाणा बॉर्डर पर एक ट्रस्ट होस्पिताल का इंचार्ज है .उसने मुझे बताया गाँव के कई लोग पहले गर्भवती स्त्री को लाते है बड़े जोर शोर से दावे करते है की आप खर्चे की चिंता ना करो बस जच्चा बच्चा ठीक होना चाहिए ....वो बताता है की अगर बच्ची पैदा होती है ओर उसे कोई दिक्कत आती है ओर उसे higher सेंटर रेफेर करने की बात करते है तब यही लोग न नुकुर ओर गरीबी ओर किसानी का वास्ता देने लग जाते है ...ओर बावजूद अम्बुलेंस की सुविधा के केवल ५ से १० प्रतिशत लोग शर्म में जाते है ओर अगले दिन वापस आ जाते है ...वहां से २५ किलोमीटर दूर दिल्ली का आलिशान मॉल है.....३५ किलोमीटर दूर हरियाणा का शानदार रेस्तरा ....बीच में डी पी एस स्कुल की एक शाखा ....तो ये किसी दूर दराज के गाँव का हाल नही है...

यहाँ ये सब सुनाने का उद्देश्य सिर्फ़ एक मानसिकता को उजागर करने का है.....मैंने अच्छे अच्छे खाते पीते घरो के लोगो के मुंह से ये कहते सुना है "बेटे लड़की होगी तब समझोगे "वे क्या समझाना चाहते है की लड़की होने के बाद हमारी जीवन शैली या सोच में बदलाव आ जायेगा ....ये वो लोग है जो समाज के बड़े बड़े खम्बो में गिने जाते है...तो फर्क मानसिकता है....
शोषण कई तरीके का होता है....कामकाजी स्त्री का घर से बाहर निकलते ही शुरू हो जाता है....शायद एक उमरसे वे ही जान जाती है उन घ्रणित नजरो को इग्नोर करना.....लौटते वक़्त कितनी नजरे उनकी पीठ से चिपकी होती है ,जवान ,बूढी ,अधेड़......ओर काम वाली जगह पर......
दरअसल सच तो ये है हम वास्तव में कितनी ऊँची बातें कर ले....... अपनी बेटी के लिए अलग नियम रखते है ओर बहू के लिए अलग.....शुरुआत में हमें घर से करनी होगी......माँ को बेटी को स्वालंबी बनाना होगा ओर बहू के लिए डटकर खड़ा रहना होगा.......अब सवाल उठता है माँ ही क्यों ....सामाज को देखिये उत्तर भी मिल जायेगा ....
@anonymus ji
ओर हाँ किसी मुद्दे को स्वस्थ बहस से हटाकर न मोडे .....क्यूंकि सुजाता जी ने जो प्रशन उठाये है वे शोषित ओर शोषण करने वाले वर्गों में बाँट कर किए है....ये जरूरी नही की मै भी हर बार चोखेर बाली से सहमत रहूँ पर मेर मानना है हमें किसी के प्रति पूर्वाग्रह भी नही रखना चाहिए....लेख ओर लेख में व्याप्त विचार महत्वपूर्ण होने चाहिए.....

सुजाता said...

loved और protected होना ही कोई लड़की क्यों चुनती है ? वापस बात वही की वहीं आ गई। यह फ्री चॉयस मानते हैं तो यह भी मानना होगा कि कि कोई व्यक्ति जो पिट रहा है वह पिटना चुनता है।भई , यह तो हर दुबले आदमी को पता है कि वह किसी अपने से ताकतवर से मार खा जाएगा?फिर भी वह दूध मेवे खाकर बलवान नही होता? इसे फ्री चॉयस कहूँ क्या कमज़ोर रहने की?या सामाजिक विषमता कहूँ?
लड़कियों को क्या करना चाहिए उस पर बात ही नही कर रही इस वक़्त , उस पर तो सारी दुनिया स्वयम को भाषण देने लायक समझती है ....मै सिर्फ हम-आप जैसे "समर्थ, सक्षम,काबिल,मज़बूत" लोगों से विनती करना चाहती हूँ कि कि किसी शोषित के प्रति आप केवल इसलिए हृदयहीन नही हो सकते कि आप सक्षम हैं और यह आपका चुनाव है व किसी अन्य का चुनाव शोषित होना है।

सुजाता said...

मैं सीधा सीधा "फ्री चॉयस" या "पर्सनल चॉयस" की अवधारणा पर सवाल उठा रही हूँ। मुद्दा यही है अन्यत्र क्यों भटकाया जाए?
जैसे शादी करना फ्री चॉयस है, वैसे ही शादी न करना भी फ्री चॉयस होगी, वैसे ही लिविंग रिलेशन मे रहना भी फ्री चॉयस होगी ही ...तो फिर जब आपने ही चुनाव किया है तो सरकार से क्यों आप अपनी सुरक्षा के लिए कानून बनाने की गुहार लगाते हो? इसलिए कि सोशल सेट अप मे एक व्यक्ति फ्री चॉयस का मसला इतना आसान नही है। जो सक्षम है उसे किसी से गुहार नही लगानी पड़ती और शायद सभी जानते हैं कि सक्षम होने मे ताकतवर लोग हर तरह की ताकत का इस्तेमाल करते हैं।वे भी फ्री हैं!दस ताकतवरों द्वारा मिलकर एक उठती आवाज़ दबा देना मुश्किल काम नही है।आप लगाते रहें फ्री चॉयस की गुहार।

कौन ताकतवर नही होना चाहता ? है कोई ऐसा?

अगर आप इस मत से चलें कि जो सबको सक्षम बनना चाहिए , और जो न बन पाए उसे मर जाना चाहिए तो आप जंगल कानून की हिमायत कर रहे हैं ,तब आप कह रहे हैं कि - जो फिट है वही सर्वाइव करेगा , बाकी को खत्म हो जाना चाहिए , क्या ऐसा सोचने का आपको अधिकार इसलिए मिल गया है कि आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि ,शिक्षा ,प्रेरणा, अनुभव या अन्य किसी कारण से एक प्रभावी पोज़ीशन पर पहुँच गए हैं?यह एक प्रकार से - जिसकी लाठी, उसकी भैंस - जैसे सिद्धांत की तरफदारी करना नही है?
इस तर्क से सारा स्त्री विमर्श आज अभी यही समाप्त हो जाना चाहिए।क्योंकि यह तर्क पुरुष के शोषित होने को जस्टीफाई ही कर रहा है।अब तक पितृसत्ता के सभी दाँव पेंचो को जस्टीफाई करता है।

जया निगम said...

Aapke blog ke bare me kafi kuchh pad aur sun rakha tha.Par padne ka avsar aaj mila.Bahut din se ek vishay par soch rahi hoon, aapki ray janne ki ichhuk hoon. Voshay hai- ladkiyan aatmnirbhar hone ke bad bhi kai bar maan baap ko bhagvan hi manti rahti hain ya unki duniya mayke me hi simti hoti hai. Iske peechhe kya unki paradhin mansikya doshi nahi hai?

जया निगम said...

Aapke blog ke bare me kafi kuchh pad aur sun rakha tha.Par padne ka avsar aaj mila.Bahut din se ek vishay par soch rahi hoon, aapki ray janne ki ichhuk hoon. Voshay hai- ladkiyan aatmnirbhar hone ke bad bhi kai bar maan baap ko bhagvan hi manti rahti hain ya unki duniya mayke me hi simti hoti hai. Iske peechhe kya unki paradhin mansikya doshi nahi hai?

जया निगम said...

Aapke blog ke bare me kafi kuchh pad aur sun rakha tha.Par padne ka avsar aaj mila.Bahut din se ek vishay par soch rahi hoon, aapki ray janne ki ichhuk hoon. Voshay hai- ladkiyan aatmnirbhar hone ke bad bhi kai bar maan baap ko bhagvan hi manti rahti hain ya unki duniya mayke me hi simti hoti hai. Iske peechhe kya unki paradhin mansikya doshi nahi hai?

जया निगम said...

Aapke blog ke bare me kafi kuchh pad aur sun rakha tha.Par padne ka avsar aaj mila.Bahut din se ek vishay par soch rahi hoon, aapki ray janne ki ichhuk hoon. Voshay hai- ladkiyan aatmnirbhar hone ke bad bhi kai bar maan baap ko bhagvan hi manti rahti hain ya unki duniya mayke me hi simti hoti hai. Iske peechhe kya unki paradhin mansikya doshi nahi hai?

भारतवासी said...

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
============

उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

अनुप्रिया के रेखांकन

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