Tuesday, January 13, 2009

मै कोसती हूँ आदिम स्त्री के चुनाव को

कोई लड़की अपने लिए दासता क्यों चुनती है आज़ादी क्यों नही ? वह संरक्षण क्यों चुनती है आत्मनिर्भरता क्यों नही ? वापस बात वही की वहीं आ गई। यह फ्री चॉयस मानते हैं तो यह भी मानना होगा कि कि कोई व्यक्ति जो पिट रहा है वह पिटना चुनता है।भई , यह तो हर दुबले आदमी को पता है कि वह किसी अपने से ताकतवर से मार खा जाएगा?फिर भी वह दूध मेवे खाकर बलवान नही होता? इसे फ्री चॉयस कहूँ क्या कमज़ोर रहने की?या सामाजिक विषमता कहूँ?और क्या इसलिए पुलिस को इसमें हस्तक्षेप नही करना चाहिए कि पिटना तो उस अमुक व्यक्ति ने खुद ही चुना है ?

लड़कियों को क्या करना चाहिए इस पोस्ट मे वह मेरा केन्द्रीय बिन्दु नही , उस पर तो सारी दुनिया स्वयम को भाषण देने लायक समझती है ....न ही मै शोषितों की पैरोकार हूँ , सोचने काबिल होने से हम सभी का फर्ज़ है कि आत्मालोचन करें। और मै सिर्फ हम-आप जैसे "समर्थ, सक्षम,काबिल,मज़बूत" लोगों से इतना भर विचार करने को कहती हूँ कि किसी शोषित के प्रति आप केवल इसलिए हृदयहीन नही हो सकते कि आप सक्षम हैं और यह आपका चुनाव है व किसी अन्य का चुनाव शोषित होना है।आपके सक्षम होने या अक्षम होने मे बहुत से दूसरे लोगों की भूमिका अवश्य है।सर उठा{}{ के दम्भ सहित नही कह सकते मै जो हूँ अपनी बदौलत हूँ ...और किसी का नही तो खुद को जन्मते ही मार न देने वाले , जिलाने और खिलाने -पढाने वाले माता पिता की भूमिका तो स्वीकरेंगे ही न !

मैं सीधा सीधा "फ्री चॉयस" या "पर्सनल चॉयस" की अवधारणा पर सवाल उठा रही हूँ। मुद्दा यही है अन्यत्र क्यों भटकाया जाए?

जैसे शादी करना फ्री चॉयस है, वैसे ही शादी न करना भी फ्री चॉयस होगी, वैसे ही लिविंग रिलेशन मे रहना भी फ्री चॉयस होगी ही ...तो फिर जब आपने ही चुनाव किया है तो सरकार से क्यों आप अपनी सुरक्षा के लिए कानून बनाने की गुहार लगाते हो? इसलिए कि सोशल सेट अप मे एक व्यक्ति फ्री चॉयस का मसला इतना आसान नही है। जो सक्षम है उसे किसी से गुहार नही लगानी पड़ती और शायद सभी जानते हैं कि सक्षम होने मे ताकतवर लोग हर तरह की ताकत का इस्तेमाल करते हैं।वे भी फ्री हैं!दस ताकतवरों द्वारा मिलकर एक उठती आवाज़ दबा देना मुश्किल काम नही है।आप लगाते रहें फ्री चॉयस की गुहार।

कौन ताकतवर नही होना चाहता ? है कोई ऐसा?

अगर आप इस मत से चलें कि सबको सक्षम बनना चाहिए , और जो न बन पाए उसे मर जाना चाहिए तो आप जंगल कानून की हिमायत कर रहे हैं ,तब आप कह रहे हैं कि - जो फिट है वही सर्वाइव करेगा , बाकी को खत्म हो जाना चाहिए , क्या ऐसा सोचने का आपको अधिकार इसलिए मिल गया है कि आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि ,शिक्षा ,प्रेरणा, अनुभव या अन्य किसी कारण से एक प्रभावी पोज़ीशन पर पहुँच गए हैं?यह एक प्रकार से - जिसकी लाठी, उसकी भैंस - जैसे सिद्धांत की तरफदारी करना नही है?
इस तर्क से सारा स्त्री विमर्श आज अभी यही समाप्त हो जाना चाहिए।क्योंकि यह तर्क पुरुष के शोषक होने को जस्टीफाई ही कर रहा है।अब तक पितृसत्ता के सभी दाँव पेंचो को जस्टीफाई करता है।समाज संरचना की नींव जिस दिन पड़ी थी उस दिन स्त्री से पूछा नही गया था कि तुम क्या चुनती हो , और अगर तब स्त्री अपने "चुनाव"{?) अगर इसे ही आप चुनाव कहें तो , के नतीजे जानती होती ,अनुमान कर सकती होती तो हमें यह पोस्ट लिखने की ज़रूरत ही न पड़ती।तो मै मानूंगी कि आदिम स्त्री का "बच्चा पैदा करना, घर पर ही रह उसकी देखभाल करना, सामाजिक जीवन और समपत्ति की देखभाल पुरुष के ज़िम्मे दे देना" एक भयानक गलत चुनाव था {फिर से, अगर आप चुनाव कहते हैं इसे} और आज मै उस स्त्री को कोस रही हूँ जिसने हम सब स्त्रियों के चुनाव की नियति को प्यार और संरक्षण तक सीमित कर दिया।

29 comments:

Unknown said...

bilkul sahi kaha aapne!

Anonymous said...

सुजाता जी हम सब एक समाज मे रहते हैं . कुछ लोग समाज का हर नियम मानते हैं . कुछ लोग समाज के नियम ना मान कर समाज से लड़ते हैं और अपने लिये रास्ते बनाते हैं . ये रास्ते केवल उनके लिये ही नहीं होते हैं जो उनको बनाते हैं . और लोग भी इन पर चलते हैं लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी उसको होती हैं जो रास्ता बनाता हैं लेकिन उस परेशानी मे एक खुशी होती हैं की हमने कुछ नया किया . अब इस को कुछ लोग "आँख की किरकरी " कहते हैं तो कुछ लोग इसको "घुटन से आज़ादी कहते हैं " बात अगर केवल चुनने की होती तो वो पहली औरत शायद फिर भी वही चुनती जो उसने चुना क्युकी "उसका चुनना " उस समय की "उसकी ज़रूरत " से बंधा था . समय बदलता रहता हैं . और बदलते समय के साथ जरूरते भी बदलती हैं . स्त्री का शोषण पुरूष नहीं करता हैं स्त्री का शोषण समाज की परिस्थितियों से होता हैं . और समाज की परिस्थितियों से पुरूष का भी शोषण होता हैं बस सवाल होता हैं कौन ताकतवर हैं . ज्यादा स्त्री का होता हैं क्युकी स्त्री अपने को ताकतवर मानना ही नहीं चाहती . स्त्री इन मुद्दों इन विषयों पर बात ही नहीं करना चाहती जिन मे उसको पुरूष की प्रतिस्पर्धी समझा जाए .

दिनेशराय द्विवेदी said...

स्त्री विमर्श नाम में ही त्रुटि है। असल बात है शोषण। शोषण की समाप्ति होगी तो स्त्री उस से बची नहीं रह सकती। स्त्री शोषण, दलित शोषण, मजदूर शोषण अलग अलग नामों से शोषितों को बांट दिया जाता है और शोषक तमाशा देखते हैं। उन की चक्की चलती रहती है।
बात हर तरह के शोषण की समाप्ति की हो। भगत सिंह की तरह।

हें प्रभु यह तेरापंथ said...

मै रचना जी की बात से सहमत हु। रचनाजी कि टीप्प्णी ने सही वास्तु का जो ज्ञान कराया उसे ही मै न्याय पुर्वक मानता हु। सामाजिक नियम लोगो को जोडने कि कडी है। किसी को बन्धन लगता है तो बहुत से लोग अपने आप को इस बन्धन मे सुरक्षित महसुस करते है। हम जिस समाज मे रहते है इसलिये मेरा निर्णय तुम्हे और तुम्हारा निर्णय मुझे प्रभावित करता है। इसमे स्त्री कि चॉयस का कोई विरोध नही है। बहुत से उदारहण है जब स्त्रीयो ने अपने निर्णय लेकर जिवन-पथ को आगे बढाने का कार्य किया है। कही सफल हुई तो कही असफल। असफल होने पर पिता को दुख होना लाजमी है। इस पर यह कहना कि "यह तर्क पुरुष के शोषक होने को जस्टीफाई ही कर रहा है।अब तक पितृसत्ता के सभी दाँव पेंचो को जस्टीफाई करता है।" कहॉ तक उचित है?

"सामाजिक जीवन और समपत्ति की देखभाल पुरुष के ज़िम्मे दे देना" एक भयानक गलत चुनाव था"- सुजाताजी, आपके इस कथन से ऐसा लगता है आप तो हम पुरुषो से बहुत ज्यादा ही नाराज है ? सामजिक व्यवस्था अगर नारी कि पासहोती तो क्या होता, सुजाताजी ?

क्या नारियॉ शादी नही करती ? क्या बच्चो को जन्म नही देती स्त्री ? आप भरोसा रखे सभी पुरुष खराब नही होते। अधिकतर पुरुष नारी कि सहमति से ही निर्णय लेते है। आप मेरी बात को अन्यथा न ले। मै आपकि भावानाओ कि कदर करता हु , मेरी शुभकामना आपके साथ है आप अपने मकसद मे सफल हो।

जय हिन्द॥॥॥

स्वप्नदर्शी said...

"आपके सक्षम होने या अक्षम होने मे बहुत से दूसरे लोगों की भूमिका अवश्य है।सर उठा{}{ के दम्भ सहित नही कह सकते मै जो हूँ अपनी बदौलत हूँ"

yes the concept of a given personal choice only exists in a very narrow frame of historical and social plateform.

आर. अनुराधा said...

"क्युकी स्त्री अपने को ताकतवर मानना ही नहीं चाहती . स्त्री इन मुद्दों इन विषयों पर बात ही नहीं करना चाहती जिन मे उसको पुरूष की प्रतिस्पर्धी समझा जाए ."
रचना की टिप्पणी से मैं सहमत नहीं हूं।
फिर वही बात, आज भी किसी स्त्री का चाहना उसके लक्ष्य को पा लेने का विचार भर है। उसे लक्ष्य तक पहुंचने के पहले जितनी रुकावटें पार करनी पड़ती हैं, वे वहां हों ही नहीं अगर स्त्री-पुरुष समानता का जमाना आ जाए। और ये कुतर्क है कि रुकावटें पुरुष के सामने भी आती हैं। जरूर आती हैं, पर दोनों में फर्क है। स्त्री की रुकावटें बेवजह हैं, create की हुई हैं, प्राकृतिक, सहज नहीं।

और अगर स्त्री-पुरुष प्रतिस्पर्धा की बात करें, (जो मैं नहीं मानती कि प्राकृतिक, सहज है) तो ये वैसा ही है, जैसे आप किसी परीक्षा में गांव के टाट-पट्टी स्कूल के बच्चे और ला-मार्ट्ज के बच्चे से इंटरनेट, कार, मॉल, पांच सितारा होटलों के खाने आदि पर एक ही सवाल नहीं कर सकते, और अगर करें तो एक से जवाब की उम्मीद न करें, और अगर करें तो सही मूल्यांकन के लिए जवाबों को एक ही पैमाने से नहीं नाप सकते। ठीक वैसे ही, जैसे गांव के जीवन, खेत, मशरूम चुनने, दूध दुहने की तकनीक, बैलों के झुंड को हांकने जैसे व्यावहारिक सवालों के वैसे अच्छे जवाब किसी ल- मार्टियन से नहीं पा सकते।
इस मामले में आप नहीं कह सकते कि उस गांव के बच्चे या उसके गंवई मां-बाप ने उसके लिए टाट-पट्टी क्यों चुना, ल-मार्ट्ज क्यों नहीं। यह उनकी फ्री टॉइस का मामला है!!किसी और की कोई भूमिका नहीं!!!

Anonymous said...

"क्युकी "उसका चुनना " उस समय की "उसकी ज़रूरत " से बंधा था "
अनुराधा मेरे कमेन्ट मे दिया हुआ ये वाक्य वही कह रहा हैं जो आप कह रही हैं . चुनाव परिस्थिति से लड़ सकने की ताकत से होता हैं . आप तो जीती जागती मिसाल हैं इस बात की . अगर आप अपनी परिस्थिति से ना लड़ सकने की ताकत अपने अंदर जगाती तो आप जिंदिगी को नहीं चुन सकती थी { और मुझे क्षमा कर दे अगर व्यक्तिगत बात को एक उदहारण की तरह मेने दिया हैं इस का आप को बुरा लगे पर मेरे लिये आप एक मिसाल से कम नहीं हैं जिसने चुनाव किया और लड़ाई लडी}
हर लड़ाई व्यक्तिगत होती हैं और जो भी आगे आना चाहते हैं उनको ये लड़ाई लड़नी ही पड़ती हैं .
every desicion is right at the point we take it but its the repurcussions that after a long time tell us if we took a right desicion .
what we are discussing today woman {out mothers} discussed when they were our age , the differnce we openly retailate and hit back if we dont like where as they fought a silent battle .
my contention always is that maariage is never forced and even if it is then one should have the courage to fight the injustice rather then scumb to it

Anonymous said...

I think nobody can understand this fellow called Rachna. Who so ever contradicts her, at the she agrees with that fellow as in this case she is claiming to agree with Anuradha, and I am quite sure Anuradha will never agree with her at least on this issue. Ms. Rachna , there is a tradition and I think its a commonsenese also if you are giving some argument then you should also be able to defend it (this has also been said by some great personality, I don't remember the name). Even if you have to agree to some others view point it should be only after through discussion not just like that. It is very clear from the above two comments of Anuradha and yours that they are diametrically opposite, then how you can agree with her and that too at the cost of her own personal example, What you have done is like first hit out intentionally and then say sorry. For ur kind information I think the issue which is being raised in this post is not related to individual examples, What I understand is it goes beyond individual examples, it relates to the larger picture and not the exceptions.As far my anonymity is concerned I am doing it intentionally, if the need be I will reveal it.

आर. अनुराधा said...

रचना, मैं अनाम से सहमत हूं। आपने मेरा उदाहरण दिया, लेकिन उसका मूल तर्क ही गलत था। आपने कहा-" अगर आप अपनी परिस्थिति से ना लड़ सकने की ताकत अपने अंदर जगाती तो आप जिंदिगी को नहीं चुन सकती थी { और मुझे क्षमा कर दे अगर व्यक्तिगत बात को एक उदहारण की तरह मेने दिया हैं इस का आप को बुरा लगे पर मेरे लिये आप एक मिसाल से कम नहीं हैं जिसने चुनाव किया और लड़ाई लडी}
हर लड़ाई व्यक्तिगत होती हैं और जो भी आगे आना चाहते हैं उनको ये लड़ाई लड़नी ही पड़ती हैं .
"

लेकिन रचना, मैं बार-बार और हमेशा कहती हूं कि कैंसर के किलाफ या ऐसी कोई भी लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती। मेरे ही उदाहरण में (मुझे यह सब चर्चाएं कतई बुरी नहीं लगती बल्कि अगर इससे किसी के जीवन में कुछ भी भला होता है, तो मुझे अच्छा ही लगता है):
1. अगर मैं दिल्ली में नहीं, किसी छोटे शहर, गांव में रह रही होती,
2. मेरी आर्थिक स्थिति इससे बुरी होती
3. मैं सरकारी नहीं, प्राइवेट नौकरी में रही होती
4. मुझे इंटरनेट की सुविधा न मिली होती/उस समय तक इंटरनेट और विज्ञान पर देसी-विदेशी पत्रिकाएं देश में, मेरी पहुंच के भीतर न होती/मैं पढ़ी-लिखी न होती
5.परिवार और मित्रजनों से इतना सपोर्ट न मिला होता
6. मैं कम-उम्र न होती
7. मेरी पृष्ठभूमि विज्ञान की न होती.....
ऐसे अनगिनत कारक हैं जिन्होंने मुझे यह सोचने का माद्दा और विश्वास दिया कि मैं इलाज कराऊं और उसे पूरा करवा पाऊं और 7-8 साल बाद दोबारा भी उन्हीं सबसे उसी सहजता से गुजर कर निकल पाऊं।

और इन कारकों की प़ष्ठभूमि में भी उन्हें सपोर्ट करने वाले अनगिनत कारक हैं..
यानी कुछ भी आइसोलेशन में नहीं घटता। मेरा सोचना भी मेरे माहोल, पृष्ठभूमि वगैरह से ही तय होता है, हां, थोड़ा मेरे जीन्स और सरीर की रासायमिक संरचना और बदलावों का भी हाथ होता है, इस सबमें।
उम्मीद है रचना, मैं अपनी बात समझा पाई।

Anonymous said...

aur agar itna sab milnae kae baad bhi aap mae ladnae ki taakat naa hotee to aap kahin bhi hotee aap ladaaii naa jeet paatee .

agar sansaar mae sab ko sab kuch ek sa mil jaata to shyaad har vimarsh khatam ho jaata par esa nahin hota haen

aur jo miltaa haen rehna usmae hota haen aur usko hi behtar bananaa hota haen

ek gaav mae ek
"lal munni devi "
mushroom ki kheti karkae { bina zameen kae }apne liyae hi nahin auro kae liyae bhi aajivikaa kae saadhna khojtee haen

usne chuna ki usko nahin bhukhae rehna aur usnae bhukh sae bachnae kaa rastaa banayaa

meraa maannaa hae ki bajaaye iskae ki ham kaarn dundhey ki ham kyun shoshit haen ham ko aapne apane jagah raastey banaaney hogey

aur shyaad yahii ham kar bhi rahey haen

shelley said...

aapka kahana sahi hai. is vishay k or v paksh hain. stri ko chunav shabd k tah me jakar vichar karna chahiye

आर. अनुराधा said...

"aur agar itna sab milnae kae baad bhi aap mae ladnae ki taakat naa hotee to aap kahin bhi hotee aap ladaaii naa jeet paatee . " -
Rachna again, this is only a speculation that if I hadn't had all these fecilities/ circumstances.... Rather it would have been surprising if in such favourable conditions one would not have taken the treatment.

Further- "usne chuna ki usko nahin bhukhae rehna aur usnae bhukh sae bachnae kaa rastaa banayaa"
Ye to adi-manav ne bhi kiya. Bhookh, thand, garmee, barish, kasht... sabhee ka upay insaan aur janwar tak karte hi hain. Survival is the biggest desire of a living thing.

Rachna, agar ham kisi baat ka karan naheen dhundenge, to sahee rasta kaise chun payenge? Sirf isliye ki kisi ek vyakti ka sochna hai ki yah rasta sahee hai, vah sabhee ke liye sahi aur manya ho jayega? naheen na! Uske liye vichar-vimarsh kar ek common rasta dhoondhana hoga jo zyadatar logon (SAB naheen kahaa kyonki vah adarsh sthiti hogi, jo ki vyavhaar me sambhav nahin lagtee) ke liye sahee ho. Tukadon me samadhan naheen mil sakta, khas taur par is sarvabhaumic issue ka.

Sanjay Grover said...

मुझे लगता है सबसे ज़्यादा तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात को अनुराधा ने रखा है। अगर सभी साधन-सम्पन्न, धन-सम्पन्न, शिक्षा-सम्पन्न और ‘‘परिस्थिति-सम्पन्न’’ लोग अनुराधा की तरह समझदार और संवेदनशील हों जाएं तो बहुत सी समस्याएं सुलझ जाएं। इंस नए शब्द या ‘‘टर्म’’ ‘‘परिस्थिति-सम्पन्न’’ को समझने की कोशिश करें। भंवरीदेवी,फूलनदेवी या खैरलौंजी की विक्टिम की तुलना में नीलम कटारा, अनुराधा या रचना निश्चय ही परिस्थिति-सम्पन्न हैं। परिस्थिति-सम्पन्नता में हम परिवार, ट्रेनिंग, पैदाइश का गाँव, शहर, देश फिर वर्ण और जाति यानि सामाजिक स्थिति तत्पश्चात आर्थिक स्थिति को शामिल कर सकते हैं। शायद बौद्धिक सम्पन्नता भी उसमें शामिल की जानी चाहिए क्योंकि वह भी लगभग प्रकृति प्रदत्त है। सामाजिक और आर्थिक सम्पन्नता से हमें जो संबंध हासिल होते हैं वे भी हमारे संघर्ष को सरल बनाते हैं। नीलम कटारा और जैसिकालाल के लिए मोमबत्तियां जलाने वाले हमारे प्रिय चैनल भी भंवरी देवी और खैरलौंजी के लिए कुछ जलाते नहीं देखे जाते।
किन्हीं दो व्यक्तियों और उससे भी ज़्यादा किन्हीं दो ‘‘संघर्षों’’ के बीच तुलना मुझे तो अन्याय ही लगता है। आज देखिए पाकिस्तान से लड़ने के लिए देश किस तरह एकजुट हो गया। क्या किसी सामाजिक बदलाव के लिए भी देश को इतनी जल्दी एकजुट किया जा सकता है। इंस अर्थ में मुझे बी.आर.अम्बेडकर, वी. पी.सिंह, ओशो रजनीश या तसलीमा नसरीन का संघर्ष गांधीजी के संघर्ष से भी बड़ा लगने लगता है। जिस देश को गांधीजी ने आज़ाद कराया उसी के समाज को वे आज़ादी के बाद संभाल नहीं पाए और किस तरह मजबूर हो गए थे।
जहाँ तक ‘‘च्वाइस’’ की बात है, सुजाता, अनुराधा और रचना तीनों की ही दलीलें आंशिक रुप से दमदार हैं।

Anonymous said...

Hats off to Rachna's argument that Munni Devi chose to feed herself and thats why she was able to achieve what she did. As Anuradha says nobody wants to die of hunger. I or anybody else will not choose hunger destitution or exploitation. Its not so simple, a person (whether men or women) lives in a particular time and space frame and person does not live in a vaccum. When s/he is not living in a vaccum then definitely the external conditions play an important role in his/her decision making. Otherwise if I accept your argument then there is absolutely it makes no difference if Munni Devi is living in 21st century or in 20th or 19th century, she would have chosen the same path. Actually this question of 'we are free to make choices or not' is important not only to gender issue but it percolates to other issues also. Actually this concept of 'rational choice , freedom to choose, meritocracy and so on, was given in a particular socio-economic and temporal framework. The question that why Munni Devi found herself in that situation is not less important, why she did not had all those facilities which enjoy or I enjoy and have taken for granted.So try to widen your horizon , it does not mean that I already know everything, but I am always open to receive others views with positive attitude, not just saying that only I am correct.!

Atul Sharma said...

नारी और पुरुष की बहसें लगातार पढने में आ रही हैं और बहस के मायने और कैनवास बडा होता जा रहा है । वस्‍तुत: जिस विषय पर समवाद होना चाहिए वहां argument होने लगते हैं। और कई बार तो लोग केवल अपना पक्षा ऊपर रखने के लिए, कई बार वाहवाही के लिए तो कई बार केवल दिखावे के लिए कमेंट करते हुए प्रतीत होते हैं । असल मुददा वहीं का वहीं रहता है । मैं तो सिर्फ यह मानता हूं कि प्रत्‍येक सही नारी, पुरुष, युवा, बुजुर्ग, बच्‍चे को दुलार, अपनापन, सहमति दीजिए और गलत को नकार दीजिए । जहां हम हर एक को नारी अथवा पुरुष में बांटने या इंगित करने का काम शुरु कर देते हैं समस्‍या वहीं शुरु हो जाती है और इसमें बांटने का या इंगित करने का काम जो सबसे पहले शुरू करता है असली दोषी वही है ।

सादर सहित
........... अतुल

सुजाता said...

अनुराधा , संजय ग्रोवर , अनाम की टिप्पणियों से मेरा मंतव्य अधिक साफ स्पष्ट हो गया है ,इसके लिए धन्यवाद !
अतुल जी ,
आपकी टिप्पणी मुझे सोचने को विवश करती है कि यहाँ हो रहा विमर्श और उठाया जा रहा मुद्दा क्या बेमानी है?
"शूट एट साइट" वाला व्यवहार बहसों और विमर्शों के साथ नही किया जाना चाहिए,इसलिए हम सब धीरे धीरे जुगाली कर रहे हैं :-)

Anonymous said...

आपकी टिप्पणी मुझे सोचने को विवश करती है कि यहाँ हो रहा विमर्श और उठाया जा रहा मुद्दा क्या बेमानी है?



jitney log yahaan kament kartey haen sujata unmae sae kitne alag alag blog par jaa kar naari kae prati likhae huae apshabdo kaa virodh kartey haen ??


kitne sahas kartey haen galt ko khul kar galat kehnae kaa aaj kae parvivesh mae

samajik shoshan hota haen kehana aasan haen ek blog par kaemnt kar kae par uskae liyae koi prayaas karna ??

jo prayaas kartaa haen wahii aagey bhi jaata haen
atul ki baat mae dam haen

सुजाता said...

रचना जी ,
इस मुद्दे पर आप और हम सहमत हो ही नही सकते कि "जो प्रयास करता है आगे जाता है या जो चुनाव हम करते है वही पाते हैं, या हर व्यक्ति चुनने के लिए फ्री है "आपका यह तर्क एक पूंजीवादी{कैपटलिस्टिक } तर्क है जो सर्वहारा की सिरे से उपेक्षा करता है, बहुत सम्भव है कि आप बिज़नेस वूमेन हैं इसलिए आपका सोचने का कोण ऐसा है।
मुझे नही लगता कि इतने भिन्न प्लैटफॉर्म्स पर खड़े होकर आप और मै इस बहस को सार्थक बहस बना पाएंगे।हालाँकि अनुराधा और संजय ग्रोवर , व अनाम की टिप्पणियों व उदाहरणों के बाद भी आप को पूरा हक है कि अपने मत पर कायम रहें,लेकिन ब्लॉग के अलावा भी आप इस फ्री चॉयस की अवधारणा पर विचार कीजिएगा अपने निजी जीवन की फ्री चॉयसेज़ पर भी कि वे कितनी फ्री थीं ? उम्मीद करती हूँ कि हम भविष्य़ मे इसपर ज़्यादा सार्थक तरीके से बात कर पाएंगे।

Anonymous said...

सुजाता के निर्देश पर मसले पर स्फुट विचार :
गुलामी में एक सुरक्षा का भाव रहता है । गुलामी की पराकाष्ठा हो जाने पर गुलाम को गुलामी दिखनी बन्द हो जाती है ।
कानून की एक परिभाषा 'सार्वजनिक इच्छा'है इसलिए कानून की बात होगी।
मैं अंग्रेजी न जाने के कारण शोषित हूं।जिस रूप में शोषक हूं-मर्द ,सवर्ण वहां शोषण नहीं दिखता ।
छुआछूत को व्यक्तिगत मामला बता कर उसका पक्ष लिया जाता था जबकि यह सामाजिक मामला है/था।

Sanjay Grover said...

मैं रचना के सामने तीन उदाहरण रखता हँू। दिल्ली प्रेस (सरिता, मुक्ता) के मालिक विश्वनाथ, धीरुभाई अंबानी और दाऊद इब्राहीम, तीनों ग़रीब से अमीर बने। विश्वनाथ ने यथासंभव ईमानदारी का निर्वाह करते हुए अंधविश्वासों और कुप्रथाओं को हटाने के उद्देश्य को अपने कार्य/संधर्ष के साथ जोड़ा। जबकि अंबानी और दाऊद ने अपने-अपने तरीके की सफलताओं को पाने के लिए अपनी-अपनी तरह से किसी भी तरह के ‘‘प्रयत्नों’’ से गुरेज़ नही किया। इन तीनों के उद्देश्यों की भिन्नता और संघर्ष के साधनों की पवित्रता/अपवित्रता को बिलकुल नज़र-अंदाज़्ा करते हुए क्या आप तीनों के संघर्षों और सफलताओं को एक ही तराजू़ में तोल देंगी !? यहाँ तो कैंसर और एड्स् की लड़ाई लड़ने वालों के अनुभव भी बिलकुल अलग-अलग होते हैं। और चीज़ों की बात तो आप जाने दीजिए। कैंसर रोगी की मदद करने के लिए आपको ज़्यादा से ज़्यादा पैसे और खून का बलिदान करना पड़ सकता है और उसके एवज में आपको समाज और रोगी के परिवार से सम्मान और अन्य उपलब्धियां हासिल हो सकती हैं। जबकि एड्स् रोगी की मदद करने पर आपको सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ सकता है। इसलिए कृपया संघर्षों/मुद्दों को इस तरह गड्ड-मड्ड न करें तो अच्छा है।
सुजाता, अनुराधा और रचना आदि से मैं विनम्र निवेदन करना चाहूंगा कि किसी और ब्लाॅग/प्लेटफाॅर्म पर अगर कोई ढंग का स्त्री-विमर्श चल रहा है तो ईगोज़ को परे फेंककर वहाँ भी अपनी बातें रखें अन्यथा आम लोग/स्त्रियां कभी भी इन मुद्वों/बारीकियों/चालाकियों/षड्यंत्रों से परिचित तक नहीं हो पाएंगे।

Anonymous said...

i think we need to first define the question that we are talking on

i feel that the psot was on the choice that woman can make in the limitations that the society offers
where as on sujatas last comment is talking about "non business vs business attitude " and sanjay grovers point of view is simple that we need to visit his blog to discus issues there also

when ever ther is a discussion we need to bring it to the main topic

my being a business woman and sujata being a lecturer makes no differnce because we both talk on woman oriented issues , yes our handling them may be different so there is the question og choice how i solve the problem and how sujata solves the problem

but to deflect the whole issue in some other direction from the poblems faced by woman in making a choice is like nullifying the whole discussion

Sanjay Grover said...

rachna se baatkarna waqai mushkil hai fir chahe jagah koi bhi ho CHOKHER BALI ya SAMVADGHAR. kis khubi se unhoneN saari bahas ko yahaN lakar demaara hai ki
******sanjay grovers point of view is simple that we need to visit his blog to discus issues there also*******.....aur paasa badalte hue Sujata ke saath ja kharhi huyiN haiN. is tarah ke paNtroN se rajniti to chal saktiN haiN bauddhik bahaseN nahiN.
MaiN kahuNga ki we meri panktiyaN ko isi blog par dobara padheN:-
मैं रचना के सामने तीन उदाहरण रखता हँू। दिल्ली प्रेस (सरिता, मुक्ता) के मालिक विश्वनाथ, धीरुभाई अंबानी और दाऊद इब्राहीम, तीनों ग़रीब से अमीर बने। विश्वनाथ ने यथासंभव ईमानदारी का निर्वाह करते हुए अंधविश्वासों और कुप्रथाओं को हटाने के उद्देश्य को अपने कार्य/संधर्ष के साथ जोड़ा। जबकि अंबानी और दाऊद ने अपने-अपने तरीके की सफलताओं को पाने के लिए अपनी-अपनी तरह से किसी भी तरह के ‘‘प्रयत्नों’’ से गुरेज़ नही किया। इन तीनों के उद्देश्यों की भिन्नता और संघर्ष के साधनों की पवित्रता/अपवित्रता को बिलकुल नज़र-अंदाज़्ा करते हुए क्या आप तीनों के संघर्षों और सफलताओं को एक ही तराजू़ में तोल देंगी !? यहाँ तो कैंसर और एड्स् की लड़ाई लड़ने वालों के अनुभव भी बिलकुल अलग-अलग होते हैं। और चीज़ों की बात तो आप जाने दीजिए। कैंसर रोगी की मदद करने के लिए आपको ज़्यादा से ज़्यादा पैसे और खून का बलिदान करना पड़ सकता है और उसके एवज में आपको समाज और रोगी के परिवार से सम्मान और अन्य उपलब्धियां हासिल हो सकती हैं। जबकि एड्स् रोगी की मदद करने पर आपको सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ सकता है। इसलिए कृपया संघर्षों/मुद्दों को इस तरह गड्ड-मड्ड न करें तो अच्छा है।

Anonymous said...

sanjay grover ji
rachna sujata kae saath us samy bhi hotee haen jab koi sujata ko abshabd kehtaa haen , kabhie issi blog ki purani post bhi daekhae

aur mae kaii baar keh chukii hun mujeh budhiijeevi ki tarah behas karni nahin aatee haen kyuki mae budheejevii hu hee nahin

mae ek saadharn middle class ki mahila hun jo sangharsh kar kae apna jeevan yaapn akartee haen aur chahtee haen aur mahilaa bhi deen heen naa rahey apni ladaaii ladaey aur jindgi mae aatma nirbhar baney

Sanjay Grover said...

MaiN aapke sangharsh ko salaam karta huN. Aur agar pichhli kisi post meN sujata ko kisi ne apshabd kahe to usmeN MaiN kahaN fit hota huN. main to sirf is bahas ke sandarbh meN baat kar raha tha. aap donoN ki dosti ko kisiki nazar na lage. meri bhi nahiN. kya ab aap santusht haiN?

Anonymous said...

sanjay grover ji
in a debate or discussion we agree on some points and disagree on others so on the points we agree we say we agree and where we dont agree we say we dont agree . also its not necessary that we may answer every ones questions { that is where the "choice " "right to chose " comes in } . its my perrogative to answer or continue the discussions on points raised and its again my perrogative to ignore the onces that i dont want to answer .
now if some one can understand me or not is not in my hands . right to chose is with every one but very few excercise it . if on some points i agree with anuradha/sujata i wil say yes i agree on others i will say i dont so my stand is clear but its "issue" based
and as mr aflaatoon ji has said that slavery is always more acceptable because it gives a sense of protection . its like a job where we get a secured monthly salary . whether we like the job profile or not but since we have to survive we will do the job . but then there are freelancers and consutants who dont have a secured paypacket but they can plan their work as they want
its up to us to chose { given in the situation that life offers us }

Sanjay Grover said...

RachnaJI
Aap kisi ki baat ka jawab nahiN dena chahtiN.
Aapki baat koi samajh nahiN paata to aap kya kar sakti haiN?
MaiN aapki donoN batoN se sahmat huN. Magar aisa aapko pahli hi baar meN saaf-saaf kah dena chahiye.
Baharhal maiN do baateN kahkar aapke saath 'bahas' ka samapan karunga.
1.Sujata ne "choise" ke mudde par 100/- aur 1000/- vala jo tark diya, "Sangharh" ka mera udaharan usi ka vistaar tha, vishyantar nahin tha.
2.aapne bataya ki Sujata Lecturer hai. vaise we lecturer na bhi hoti to bhi unke vichaaroN aur saahas ki vajah se maiN unka utna hi samman karta, kar hi raha tha. KABIR DAS to na padhe-likhe the na unki koi samajik haisiyat thi, phir bhi, unki tarksheelta aur saahas ki vajah se, Sur,Tulsi aur aajke kai "padhe-likhe" vidwaano se zyada unke liye mere man meN samman hai.
mushkil ye hai ki jis tarah ke tark aap de rahi haiN wo khud aapke aur "stri-mukti" ke khilaaf hi jaate haiN.

राजकिशोर said...

ना मानूं ना मानूं ना मानूं रे
सखियो तुम्हारी बात ना मानूं रे

स्वप्नदर्शी said...

"जो प्रयास करता है आगे जाता है या जो चुनाव हम करते है वही पाते हैं, या हर व्यक्ति चुनने के लिए फ्री है "आपका यह तर्क एक पूंजीवादी{कैपटलिस्टिक } तर्क है जो सर्वहारा की सिरे से उपेक्षा करता है".

Dear friends,

I feel that here is some confusion here,
I feel Sujata is correct from her point of view and have expressed her thoughts in an academic manner.

Rachna on the other hand has a different exposure, and is a very independent women but probably is not familiar with some of the terms being used here.

I may be wrong, and in that case, would like to seek apology from rachna. But in case it helps.....


Rachna,
The "sarvhaaraa" word has a specific historical context.

It means a 'class of people, who work very hard but hardly able to sustain themselves or can hardly fulfill the basic needs of shelter, food and clothe; Like labors. virtually they survive on day to day basis and do not have any accumulation of wealth in any sense.

This class of people originated after the industrial revolution, where ordinary farmer or the farm based workers started to work in factories and emigrated to distant location and got uprooted from their traditional surroundings and support systems, as well.
Virtually people on the borderline of survival. the other class the "capitalist=poonjivaadee" is also originated after industrial revolution. These two often have different interest and this is reflected in various forms and norms.


after industrial revolution and came the struggle of working class and led to the communist revolution in some parts of the world, with a alternative world view, vision and advocacy.

you should see the word "poonjivaadee" and "sarvahaara" in that context, and also the two world views, which developed representing the interests of respective classes in the wider society.

It may be a good idea to read philosophically, about the origin of word, and world views, otherwise, word loose value in generalization!!!
I hope that helps to put things in right context.

The concept of free choice is also linked to the "resourcefulness".
and people on the brink have no or little choice.

There is a popular saying that "beggars have no choice"

there is also the matter of choice has a historical context.
And again it is linked to the existing knowledge and the support system. If Lalmuni devi was born 200 years ago, there was no concept of mushroom cultivation!!!.

But I agree that within the given circumstances, people act and achieve differently, and as a conscious being, we must try to test our limits. and people who do that, open new avenues for themselves and for others too.

Anonymous said...

swapandarshi i think there is no confusion in my mind regarding the word sarvhara . My simple question is how long do we want to remain in history . today i read in a news paper that a lady who was a red light area worker , educated her son and he is settled in australia now . he has called his mother there to live with him .

now do you call this woamn part of "sarvhara" deprivved of "choice" if yes then what will you do to mmorrow whn she is settled in australia and starts talking on issues telling others to work hard and open avenues . make right choices in similar circumstances .
will you tell her that no you are not in "sarvhara" any more so we cant agree with you .


secondly by nullyfying someones viewpoint on the basis of wealth { as you may call pujivadi " } we dont try to find solutions for the problems we are discussing rather we are creating another divide on the basis of wealth


a person who is in job will like to remain a slave life long of his employer because he has a secured job and security is salary , similarly woman for the sake of security remain chained to worng custom of society even though they can always chose to .


each one of us is part of "sarvhara " and those who work hard creat a niche for themselfs
its not long ago shobha de hit back on the same issue when the terrorist activity took place in mumbai

i feel its high time { we got independce 60 years back } that we revise the definitions of words so that we live in 21st centuary . sarvhara of 60s according to you all have become elite now which includes many of us and in that case if we talk on issues then lets not deivate the issues and lets not fail in accepting the follies of sarvhara who waste time and resources .

sujata should not have deviated the issue to "sarvhara " because all those who are elite now have worked hard to rise from sarvhara { though for me this is an redundent term and its usage gives a scape goat to genral public from hard work } .

i hope this clarifies that i am not ignorant but rather i want people to become aggressive , assertive and hard working and especially woman

अनुप्रिया के रेखांकन

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