Thursday, January 22, 2009

शादी के लिए बाध्य की जाती है आज भी लड़कियाँ

"जो कुछ हुआ मै उससे बहुत आहत हुई,लेकिन मै फिर भी नही चाहती कि मेरे माता पिता इसके लिए कोई सज़ा भुगतें।मै ही उनकी इकलौती संतान हूँ और वो अब भी मेरे माता पिता हैं" हुमायरा अबेदिन कोई नासमझ बच्ची नही थी, अनपढ भी नही,अक्षम भी नही...लन्दन मे रहने वाली डॉक़्टर थी जिसे बांग्लादेश निवासी अभिभावकों ने बीमारी के बहाने से घर बुलाया और वहीं नज़रबन्द कर लिया,दबाव डाला एक मुस्लिम लड़के से शादी करने के लिए।अबेदिन किसी तरह लन्दन किसी मित्र को सन्देश भेजने मे सफल हुई और लड़की को माता पिता की कैद से लन्दन हाइइकोर्ट ने छुड़ाया।

ऐसा नही है कि लड़के तो हमारे समाज मे अपनी पसन्द से शादियाँ करते हैं ,कर पाते हैं। लेकिन चॉयस के अवसर उनके पास अपेक्षाकृत अधिक रहते हैं। बिलकुल इस फार्मूले के तहत कि वह पुरुष होने के कारण एक पोज़ीशन पर है। इसके अलावा वे जिस मानसिकता के साथ बड़े होते हैं उसमें वे मानने लग जाते हैं कि "गर्लफ्रेंड पत्नी नही हो सकती क्योंकि जो लड़की गर्लफ्रेंड बनने को तैयार हो गयी वह दृढ चरित्र की नही है" यह सोच लड़कियों को भी घोट कर पिलाई जाती है और आज भी शादी के बाद लड़कियाँ पति से अपने पिछले मित्र की बात छिपाती हैं।इसलिए "पसन्द" की शादी भी कितनी पसन्द की है यह एक अलग सवाल बनता है क्योंकि पसन्द के पैरामीटर्स तो बाहरी ताकते ही तय कर रही हैं न!दूसरी तरफ लड़कों के पालन पोषण मे उन्हें माचो मैन के आदर्श दिए जाते हैं और मज़बूती, दृढता को ही उनके पुरुषत्व का मापदण्ड माना जाता है इसलिए उनकी पसन्द एक दो तीन चार पाँच जितनी भी हों यह गौरव की बात है उनके लिए।वे परिवार के आगे नही झुकेंगे क्योंकि उन्हें ऐसा ही बनाया गया है। खैर,

बात उन समुदायों की हो रही है जहाँ शादियाँ दो व्यक्तियों की नही दो संस्कृतियों, दो समाजों, दो परिवारों की शादी होती है और आमतौर पर उसे स्वीकृति नही मिल पाती ,विरोध के अलावा ज़ोर ज़बरदस्ती या मत्युदण्ड भी सहना होता है।हिदू ब्वायफ्रेंड होने के कारण ही शायद अबेदिन को माता पिता की यह नज़रबन्दी और यातना सहनी पड़ी।अभिभावक अपने शासक और नियंत्रक वाली भूमिका के वशीभूत होकर यह भूल गए कि वे जिस पर इतनी ज़बरदस्ती कर रहे हैं वह 33 साल की स्त्री है जो आत्मनिर्भर है ,समझदार है। हुमायरा की बायो डेटा किसी तरह उसे हर तरह से सक्षम समर्थ सिद्ध करता है। मै सोचती हूँ ऐसे मे कम पढी लिखी , हमेशा सरपरस्ती मे रही पलीं, बाज़ार तक अम्मी या खाला के साए के बिना न गयी वह कैसे उस गलत बात का विरोध कर पाती होगी , जिसे मालूम ही नही कि उसके घर के दायरे से बाहर एक विशाल दुनिया है जिसमे मानव बसते हैं जिसमें मानवाधिकार , कानून , राज्य, मूलाधिकार जैसी बातें होती हैं आन्दोलन चलते हैं।
अबेदिन भी किसी तरह कमरे की नज़रबन्दी मे तकनीक के सहारे सन्देश भेजने मे सफल हो गयी।किसी छोटे कस्बे की मामूली डरी सहमी लड़की इस कैद मे से किसे पुकारती जहाँ उसका आस पड़ोस तक उसकी नज़रबन्दी में हिमायती रहा हो।

इस तरह की बाध्य करने वाली शादियाँ अब भी एशियाई समाजों मे प्रचलन मे हैं।भारत के गाँवों के किस्से अलग नही है।पालन पोषण मे पहले ही लड़कियों को कमज़ोर सेक्स बना दिया जाता है और अपनी मर्ज़ी करने पर वे धीरे धीरे मार पीट यातना के ज़रिए "ठीक" की जाती हैं या पागल ही बना दी जाती हैं और कुछ न हो पाए तो दरिया में डुबा दी जाती हैं इससे पहले के वे परिवार की इज़्ज़त ही डुबा दें ।

Margarette Driscoll लिखती हैं कि
Izzat – honour – is central to many Asian families’ sense of self-worth. A key element is modesty and obedience in their daughters.he Abedin case is interesting, she says, “because it shows that this does not just happen to the 15-year-old daughters of ignorant farmers – professional, middle-class thirty-somethings are vulnerable, too.
Daughters of Shame की लेखिका जसविन्दर संघेरा की कहानी भी इससे कुछ अलग नही है।हैरानी हुई कि विकिपीडिया तक के पास डॉटर्स ऑफ शेम या जसविन्दर के बारे मे कोई जानकारी नही है।यह पुस्तक ऐसी ही लड़कियों की कहानी कहती है जैसी अबेदिन के साथ घटित हुई।

मै महसूस करती हूँ कि लड़के और लड़कियाँ जब तक विवाह के बारे मे किसी बाहरी दबाव से प्रभावित हुए बिना अपनी समझ के अनुसार चलने की हिम्मत नही जुटाएंगे ज़रा भी बदलाव आने वाला नही हालांकि यह बात एक और पोस्ट की दरकार रखती है कि शादी चाहे पसन्द की हो या बाय फोर्स या अरेंज्ड , उसकी नियति अधिकांशत: उसी परिवार संरचना मे फँस जाना होती है जिसमें लोग एक हायरार्की मे रहते हैं और किसी एक का शोषण , एक को विशेषाधिकार मिलते है।

7 comments:

निर्मला कपिला said...

gahri jadhen itni aasani se nahi ukhaadi jaa sakti samay ke saath badlaav jarur aayega aap jese logon kaa pryaas rang laayega

Dr. Amar Jyoti said...

आज़ादी कभी भी ख़ैरात में नहीं मिलती। उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ती है। लगभग ऐसी ही एक
कहानी 'ख़ुदा के लिये' फ़िल्म में चित्रित हुई है। इस ब्लॉग पर उसकी चर्चा न देख कर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ।

आलोक साहिल said...

jyoti ji ki bat se puri tarah ittefak rakhta hun..
ALOK SINGH "SAHIL"

दिनेशराय द्विवेदी said...

हम कह सकते हैं कि दुनिया में कहीं कहीं स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं। लेकिन क्या वास्तव में हैं। मुझे नहीं लगता है कि स्त्री कहीं भी पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। वह हर जगह दोयम दर्जे की नागरिक है, किसी न किसी रूप में। उसे समानता के स्तर पर आने के लिए अभी बहुत कुछ करना है।

रोज पाकिस्तान में तालिबानों द्वारा बच्चियों के साथ किये जा रहे अत्याचार सामने आ रहे हैं। उन की पढ़ाई बंद करने के फरमान जारी हो चुके हैं। नाबालिग बच्चियों को उठाया जा रहा है। स्त्री की वैश्विक स्तर पर समानता केवल तभी संभव है जब शोषण के तमाम रूपों का खात्मा हो जाए।

इस के लिए स्त्रियों की आजादी और समानता के संघर्षों को शोषण के तमाम रूपों के खात्मे के लिए चल रहे संघर्षों से जुड़ना होगा।

आर. अनुराधा said...

अगर विकीपीडिया के पास डॉटर्स ऑफ शेम के बारे में कुछ नहीं है, तो क्यों नहीं हममें से कोई पहल करे? आप खुद भी उसमें अपनी जानकारी डाल सकती हैं, मय लिंक्स के।

अनिल कान्त said...

द्रण संकल्प ....और मजबूत इच्छाशक्ति ही इन सब पर काबू पा सकती है .... तभी जीत सम्भव है .....रुकावट ... जाती बंधन बहुत बड़ी बाधा हैं ....पता है लोग बहुत कट्टर हैं ......

livetvonlineblogspot.com said...

aap bohat achha likhte hian aap ji ki post prhi bohat kuchh ptaa chla aap ji bas aise hi likhte rhiey

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