Monday, January 26, 2009

ओढनी


ओढ़नी

मैट्रिक के इम्तिहान के बाद 
सीखी थी दुल्हन ने फुलकारी ! 
दहेज की चादरों पर 
मां ने कढ़वाये थे 
तरह तरह के बेल बूटे,
तकिए के खोलों पर ÷गुडलक' कढ़वाया था! 
कौन मां नहीं जानती, जी, जरूरत 
दुनिया में ÷गुडलक' की ! 
और उसके बाद? 
एक था राजा, एक थी रानी 
और एक थी ओढ़नी
लाल ओढ़नी फूलदार! 

और उसके बाद?
एक था राजा, एक थी रानी 
और एक खतम कहानी ! 
दुल्हन की कटी फटी पेशानी 
और ओढ़नी खूनमखून !
अपने वजूद की माटी से 
धोती थी रोज इसे दुल्हन 
और गोदी में बिछा कर सुखाती थी
सोचती सी यह चुपचाप
तार तार इस ओढ़नी से 
क्या वह कभी पोंछ पायेगी
खूंखार चेहरों की खूंखारिता 
और मैल दिलों का?
घर का न घाट का
उसका दुपट्टा 
लहराता था आसमानों पर 
÷गगन में गैब निसान उडै+' की धुन पर
आहिस्ता आहिस्ता !

कविता: अनामिका की
प्रेषिका : लावण्या 

6 comments:

Anonymous said...

एक था राजा, एक थी रानी
और एक खतम कहानी !
ह्रिदय को छू लेने वाली कविता है. आभार.

Dr. Amar Jyoti said...

मर्मस्पर्शी!

Udan Tashtari said...

अति भावपूर्ण रचना.

रंजना said...

वाह ! अतिसुन्दर भावपूर्ण यथार्थ चित्रित करती मर्मस्पर्शी रचना...

अजित वडनेरकर said...

संवेदनशील कविता....
शुक्रिया ...

चैताली आहेर. said...

waah......!!!!

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...