Wednesday, January 28, 2009

क्योंकि औरत हो जाना कोई महान काम नहीं है...

हम अभी-अभी गणतंत्र दिवस मना के चुके हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि एक महिला ने हमारे गणतंत्र दिवस परेड की सलामी ली। स्वाभाविक ही था, क्योंकि हमारे देश को महिला राष्ट्रपति पहली बार ही मिली हैं। इस घटना से प्रेरित विवेक आसरी ने ये कविता भेजी है। इस पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है।


दिल्ली के राजपथ पर
उस बड़ी सी तोप का मुंह
जब एक महिला प्रेज़िडंट की ओर झुका
तो वक्त रुका
और इतिहास तुरंत ले आया
अपनी पोथी
एक और नाम दर्ज करने के लिए।

कितना आसान है
एक महिला का नाम
इतिहास में दर्ज करना,
हर काम जिसे महान करार दिया गया है
औरत पहली बार ही तो करती है।
क्योंकि रोटी को हर बार गोल बना देना
कोई महान काम नहीं है
रोज सुबह
परिवार में सबसे पहले जगकर
नहाना, धोना, सफाई, बर्तन करने के बाद
सबके लिए नाश्ता बना देना
कोई महान काम नहीं है

बड़ी-बड़ी मशीनें चलाना
और चांद पर हो आना
महान काम हो सकता है
लेकिन
सबके कपड़े धोना, आयरन करना
बच्चों को स्कूल से लाना
सबकी पसंद का खाना बनाना
और सबके नखरे उठाते हुए
अलग-अलग खिलाना
कोई महान काम नहीं है।

मंत्री, प्रधानमंत्री, प्रेज़िडंट बनना
हवाई जहाज उड़ाना
बड़े-बड़े बैंकों को चलाना
औरत को महान बना सकता है,
लेकिन पाई-पाई जोड़कर घर बनाना
महान काम नहीं है।

एक औरत
जब दुनिया की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर
भाषण देती है
नारे लगाती है
और मोर्चे चलाती है
तो महान हो जाती है
लेकिन पति की कड़वी से कड़वी बात को
चुपचाप सह जाना
अपनी इच्छाओं को दबा लेना
घर और बच्चों की खातिर
मुस्कुराते हुए
अंदर ही अंदर सुबकते जाना
कोई महान काम नहीं है।

जो लोग ऐश्वर्या को विश्वसुंदरी कहकर पुकारते हैं
वही लोग
जरा सा दुपट्टा खिसक जाने पर
अपनी बेटियों को जब दुत्कारते हैं
तो बताते हैं
कि महानता की परिभाषा
पुरुष अपनी खुशी के लिए रचता है
और इसमें
हर उस औरत को शामिल करने से बचता है
जो उसकी निजी संपत्ति है।

प्रेज़िडंट पाटिल
जब आप
एक औरत की तरह
सिर पर पल्ला लिए
गली-मोहल्लों में सबका दर्द बांटती
घूमती नजर आती हैं
तब इतिहास आपको पूछता तक नहीं

जब आप पुरुष की तरह
राजपथ पर सलामी उठाती हैं
तो महान हो जाती है?

यहां अच्छी मां,
अच्छी बेटी
अच्छी पत्नी
अच्छी बहन बनना
कोई बड़ी बात नहीं है
जब किसी वजह से
औरत सिर्फ औरत रह जाती है
तो बड़ी नहीं कहलाती है
हां, वही औरत
अगर पुरुष बन जाती है
तो महान कहलाती है।
क्योंकि
इस आदिम समाज में
पुरुष बनना महानता की पहचान है
सिर्फ औरत रह जाना
कोई महान काम नहीं है।
विवेक आसरी

12 comments:

सुजाता said...

इस आदिम समाज में
पुरुष बनना महानता की पहचान है
सिर्फ औरत रह जाना
कोई महान काम नहीं है।
----
बहुत खूब कविता !
इससे तुरंत मुझे रोज़्लिन वॉलेच की पुस्तक प्रेम और महानता की याद आ गयी। महानता पुरुष के हिस्से है और प्रेम स्त्री के हिस्से।वह घर से बाहर निकलता है और गली मुहल्ले की प्रधानगिरी करता है,राज्य देह की पॉलिटिक्स मे सारा सारा दिन गँवाता है,दुनिया जीतता है युद्ध करता है अशोका दि ग्रेट ..और फिर महात्मा बन प्रवचन भी देता है धम्म की शरण मे आने को ...वहीं स्त्री चुपचाप उसका छोटा सा घरोंदा प्रेम से सींचती है साधारण ख्वाहिशों मे डूबी साधारण काम करती हुईं विलीन हो जाती है।ऐसे मे कोई महिला राष्ट्रपति राजपथ पर सलामी लेते हुए महान दिखाई ही देगी।

स्वप्नदर्शी said...

If women like men had a free choice to choose between becoming a house maid and becoming President, then your point of view is appreciated.

But in the society where women have to face at every step to get educated, respect as an individual, and are second citizen.

Having a women president and chief minister or anybody who has a social and political role, is important beyond doing thankless and imposed jobs of motherhood and cooking and cleaning.

Pratibha, as a person may not be most suited or great for this post, but is equally suitable as were her various predecessors.


But women is being accepted a head of the state, and political parties, reflects continuous change in the collective consciousness of India or need that has arisen for political parties to play women card.

Its one of the first step, but there is a long way to go....

Anonymous said...

yahaN apne hi blog ke log zyda tippnia karte rahte ha.aisa ku ha.

KK Yadav said...

Nice Post...!!
गाँधी जी की पुण्य-तिथि पर मेरी कविता "हे राम" का "शब्द सृजन की ओर" पर अवलोकन करें !आपके दो शब्द मुझे शक्ति देंगे !!!

Sanjay Grover said...

Sushant Singhal said...
संवादघर
( www.samwaadghar.blogspot.com) में नारी की दैहिक स्वतंत्रता व सामाजिक उपयोगिता पर जो बहस चल रही है वह रोचक तो है ही, बहुत महत्वपूर्ण भी है । एक ऐसा एंगिल जिससे अभी तक किसी ने इस विषय पर बात नहीं की है, मैं सुधी पाठकों के सम्मुख रख रहा हूं ! बहस को और उलझाने के लिये नहीं बल्कि सुलझाने में मदद हो सके इसलिये !

नारी देह के डि-सैक्सुअलाइज़ेशन (de-sexualization) की दो स्थिति हो सकती हैं । पहली स्थिति है - जहरीला फल चखने से पहले वाले आदम और हव्वा की - जो यौन भावना से पूर्णतः अपरिचित थे और शिशुओं की सी पवित्रता से ईडन गार्डन में रहते थे। ऐसा एक ही स्थिति में संभव है - जो भी शिशु इस दुनिया में आये उसे ऐसे लोक में छोड़ दिया जाये जो ईडन गार्डन के ही समकक्ष हो । वहां यौनभावना का नामो-निशां भी न हो । "धीरे धीरे इस दुनिया से भी यौनभावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना है" - यह भी लक्ष्य हमें अपने सामने रखना होगा ।

यदि यह संभव नहीं है या हम इसके लिये तैयार नहीं हैं तो दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि हम न्यूडिस्ट समाज की ओर बढ़ें और ठीक वैसे ही रहें जैसे पशु पक्षी रहते हैं । सुना है, कुछ देशों में - जहां न्यूडिस्ट समाज के निर्माण के प्रयोग चल रहे हैं, वहां लोगों का अनुभव यही है कि जब सब पूर्ण निर्वस्त्र होकर घूमते रहते हैं तो एक दूसरे को देख कर उनमें यौन भावना पनपती ही नहीं । "सेक्स नग्नता में नहीं, अपितु कपड़ों में है" - यही अनुभव वहां आया है । इस अर्थ में वे पशु-पक्षियों की सेक्स प्रणाली के अत्यंत निकट पहुंच गये हैं । प्रकृति की कालगणना के अनुसार, मादा पशु-पक्षी जब संतानोत्पत्ति के लिये शारीरिक रूप से तैयार होती हैं तो यौनक्रिया हेतु नर पशु का आह्वान करती हैं और गर्भाधान हो जाने के पश्चात वे यौनक्रिया की ओर झांकती भी नहीं । पूर्णतः डि-सैक्सुअलाइज़ेशन की स्थिति वहां पाई जाती है । पशु पक्षी जगत में मादा का कोई शोषण नहीं होता, कोई बलात्कार का भी जिक्र सुनने में नहीं आता । मादा या पुरुष के लिये विवाह करने का या केवल एक से ही यौन संबंध रखने का भी कोई विधान नहीं है। उनकी ज़िंदगी मज़े से चल रही है । ये बात दूसरी है कि पशु - पक्षी समाज आज से दस बीस हज़ार साल पहले जिस अवस्था में रहा होगा आज भी वहीं का वहीं है । कोई विकास नहीं, कोइ गतिशीलता नहीं - भविष्य को लेकर कोई चिंतन भी नहीं ।

हमारे समाज के संदर्भ में देखें तो कुछ प्राचीन विचारकों, समाजशास्त्रियों का मत है कि यौनभावना का केवल एक उपयोग है और वह है - 'संतानोत्पत्ति' । उनका कहना है कि प्रकृति ने सेक्स-क्रिया में आनन्द की अनुभूति केवल इसलिये जोड़ी है कि जिससे काम के वशीभूत नर-नारी एक दूसरे के संसर्ग में आते रहें और सृष्टि आगे चलती चली जाये । विशेषकर स्त्री को मां बनने के मार्ग में जिस कष्टकर अनुभव से गुज़रना पड़ता है, उसे देखते हुए प्रकृति को यह बहुत आवश्यक लगा कि यौनक्रिया अत्यंत आनंदपूर्ण हो जिसके लालच में स्त्री भी फंस जाये । एक कष्टकर प्रक्रिया से बच्चे को जन्म देने के बाद मां अपने बच्चे से कहीं विरक्ति अनुभव न करने लगे इसके लिये प्रकृति ने पुनः व्यवस्था की - बच्चे को अपना दूध पिलाना मां के लिये ऐसा सुख बना दिया कि मां अपने सब शारीरिक कष्ट भूल जाये । विचारकों का मानना है कि मां की विरक्ति के चलते बच्चा कहीं भूखा न रह जाये, इसी लिये प्रकृति ने ये इंतज़ाम किया है ।

सच तो ये है कि सृष्टि को आगे बढ़ाये रखने के लिये जो-जो भी क्रियायें आवश्यक हैं उन सभी में प्रकृति ने आनन्द का तत्व जोड़ दिया है। भूख लगने पर शरीर को कष्ट की अनुभूति होने लगती है व भोजन करने पर हमारी जिह्वा को व पेट को सुख मिलता है। अगर भूख कष्टकर न होती तो क्या कोई प्राणी काम-धाम किया करता ! क्या शेर कभी अपनी मांद से बाहर निकलता, क्या कोई पुरुष घर-बार छोड़ कर नौकरी करने दूसरे शहर जाता ?

पर लगता है कि हमें न तो ईडन गार्डन की पवित्रता चाहिये और न ही पशु-पक्षियों के जैसा न्यूडिस्ट समाज का आदर्श ही हमें रुचिकर है । कुछ लोगों की इच्छा एक ऐसा समाज बनाने की है जिसमे यौन संबंध को एक कप चाय से अधिक महत्व न दिया जाये । जब भी, जहां पर भी, जिससे भी यौन संबंध बनाने की इच्छा हो, यह करने की हमें पूर्ण स्वतंत्रता हो, समाज उसमे कोई रोक-टोक, अड़ंगेबाजी न करे । यदि ऐसा है तो हमें यह जानना लाभदायक होगा कि ये सारी रोक-टोक, अड़ंगे बाजी नारी के हितों को ध्यान में रख कर ही लगाई गई हैं । आइये देखें कैसे ?

पहली बात तो हमें यह समझना चाहिये कि समाज को किसी व्यक्ति के यौन संबंध में आपत्ति नहीं है, निर्बाध यौन संबंध में आपत्ति है और इसके पीछे वैध कारण हैं ! हमारे समाजशास्त्रियों ने दीर्घ कालीन अनुभव के बाद ये व्यवस्था दी कि यौन संबंध हर मानव की जैविक आवश्यकता है अतः हर स्त्री - पुरुष को अनुकूल आयु होने पर यौन संसर्ग का अवसर मिलना चाहिये । चूंकि सेक्स का स्वाभाविक परिणाम संतानोत्पत्ति है, इसलिये दूसरी महत्वपूर्ण व्यवस्था यह की गयी कि संतान के लालन पालन का उत्तरदायित्व अकेली मां का न होकर माता - पिता का संयुक्त रूप से हो । यह व्यवस्था केवल मानव समाज में ही है । बच्चे का लालन पालन करना, उसे पढ़ाना लिखाना, योग्य बनाना क्योंकि बहुत बड़ी और दीर्घकालिक जिम्मेदारी है जिसमें माता और पिता को मिल जुल कर अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करना होता है, इसलिये विवाह संस्था का प्रादुर्भाव हुआ ताकि स्त्री पुरुष के संबंध को स्थायित्व मिल सके, समाज उनके परस्पर संबंध को पहचाने और इस संबंध के परिणाम स्वरूप जन्म लेने वाली संतानों को स्वीकार्यता दे। स्त्री-पुरुष को लालच दिया गया कि बच्चे का लालन-पालन करके पितृ‌ऋण से मुक्ति मिलेगी, बच्चे को योग्य बना दोगे तो गुरु ‌ऋण से मुक्ति मिलेगी, ऐसी अवधारणायें जन मानस में बैठा दी गयीं। विवाह विच्छेद को बुरा माना गया क्योंकि ऐसा करने से बच्चों का भविष्य दांव पर लग जाता है । जो स्त्री-पुरुष इस दीर्घकालिक जिम्मेदारी को उठाने का संकल्प लेते हुए, एक दूसरे के साथ जीवन भर साथ रहने का वचन देते हुए विवाह के बंधन में बंधते हैं, उनको समाज बहुत मान-सम्मान देता है, उनके विवाह पर लोग नाचते कूदते हैं, खुशियां मनाते हैं, उनके प्रथम शारीरिक संबंध की रात्रि को भी बहुत उल्लासपूर्ण अवसर माना जाता है । उनको शुभकामनायें दी जाती हैं, भेंट दी जाती हैं । उनके गृहस्थ जीवन की सफलता की हर कोई कामना करता है ।

दूसरी ओर, जो बिना जिम्मेदारी ओढ़े, केवल मज़े लेने के लिये, अपने शारीरिक संबंध को आधिकारिक रूप से घोषित किये बिना, क्षणिक काम संतुष्टि चाहते हैं उनको समाज बुरा कहता है, उनको सज़ा देना चाहता है क्योंकि ऐसे लोग सामाजिक व्यवस्था को छिन्न विच्छिन्न करने का अपराध कर रहे हैं ।

अब प्रश्न यह है कि ये व्यवस्था व्यक्ति व समाज की उन्नति में, विकास में सहयोगी है अथवा व्यक्ति का शोषण करती है ? दूसरा प्रश्न ये है कि कोई पुरुष बच्चों के लालन-पालन का उत्तरदायित्व उठाने के लिये किन परिस्थितियों में सहर्ष तत्पर होगा ? कोई स्त्री-पुरुष जीवन भर साथ साथ कैसे रह पाते हैं ? जो स्थायित्व और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी की, वात्सल्य की भावना पशु-पक्षी जगत में कभी देखने को नहीं मिलती, वह मानव समाज में क्यों कर दृष्टव्य होती है?

जब कोई स्त्री पुरुष एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हुए, एक दूसरे के साथ सहयोग करते हुए, साथ साथ रहने लगते हैं तो उनके बीच एक ऐसा प्रेम संबंध पनपने लगता है जो उस प्यार मोहब्बत से बिल्कुल अलग है - जिसका ढिंढोरा फिल्मों में, किस्से-कहानियों में, उपन्यासों में पीटा जाता है। एक दूसरे के साथ मिल कर घर का तिनका-तिनका जोड़ते हुए, एक दूसरे के सुख-दुःख में काम आते हुए, बीमारी और कष्ट में एक दूसरे की सेवा-सुश्रुषा करते हुए, स्त्री-पुरुष एक दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं । वे एक दूसरे को "आई लव यू" कहते भले ही न हों पर उनका प्यार अंधे को भी दिखाई दे सकता है । यह प्यार किसी स्त्री की कोमल कमनीय त्वचा, सुगठित देहयष्टि, झील सी आंखों को देख कर होने वाले प्यार से (जो जितनी तेज़ी से आता है, उतनी ही तेज़ी से गायब भी हो सकता है) बिल्कुल जुदा किस्म का होता है। इसमे रंग रूप, शारीरिक गुण-दोष कहीं आड़े नहीं आते। इंसान का व्यवहार, उसकी बोलचाल, उसकी कर्तव्य-परायणता, सेवाभाव, समर्पण, निश्छलता, दया-ममता ही प्यार की भावना को जन्म देते हैं। ये प्रेम भावना पहले स्त्री-पुरुष के गृहस्थ जीवन को स्थायित्व देती है, फिर यही प्रेम माता-पिता को अपने बच्चों से भी हो जाता है। यह प्यार बदले में कुछ नहीं मांगता बल्कि अपना सर्वस्व दूसरे को सौंपने की भावना मन में जगाता है।

ये सामाजिक व्यवस्था तब तक सफलतापूर्वक कार्य करती रहती है जब तक स्त्री-पुरुष में से कोई एक दूसरे को धोखा न दे । पुरुष को ये विश्वास हो कि जिस स्त्री पर उसने अपने मन की समस्त कोमल भावनायें केन्द्रित की हैं, जिसे सुख देने के लिये वह दिन रात परिश्रम करता है, वह उसके अलावा अन्य किसी भी व्यक्ति की ओर मुंह उठा कर देखती तक नहीं है। स्त्री को भी ये विश्वास हो कि जिस पुरुष के लिये उसने अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया है, वह कल उसे तिरस्कृत करके किसी और का नहीं हो जायेगा । बच्चों का अपने माता - पिता के प्रति स्नेह व आदर भी माता-पिता के मन में अपनी वृद्धावस्था के प्रति सुरक्षा की भावना जगाता है ।

"पुरुष भी स्त्री के साथ बच्चे के लालन-पालन में बराबर का सहयोग दे" -इस परिकल्पना, व इस हेतु बनाई गई व्यवस्था की सफलता, इस बात पर निर्भर मानी गयी कि पुरुष को यह विश्वास हो कि जिस शिशु के लालन-पालन का दायित्व वह वहन कर रहा है, वह उसका ही है, किसी अन्य पुरुष का नहीं है। इसके लिये यह व्यवस्था जरूरी लगी कि स्त्री केवल एक ही पुरुष से संबंध रखे । कोई स्त्री एक ही पुरुष की हो कर रहने का वचन देती है तो पुरुष न केवल उसके बच्चों का पूर्ण दायित्व वहन करने को सहर्ष तत्पर होता है, बल्कि उस स्त्री को व उसके बच्चों को भी अपनी संपत्ति में पूर्ण अधिकार देता है। इस व्यवस्था के चलते, यदि कोई पुरुष अपने दायित्व से भागता है तो ये समाज उस स्त्री को उसका हक दिलवाता है ।

स्त्री ने जब एक ही पुरुष की होकर रहना स्वीकार किया तो बदले में पुरुष से भी यह अपेक्षा की कि पुरुष भी उस के अधिकारों में किसी प्रकार की कोई कटौती न करे । दूसरे शब्दों में स्त्री ने यह चाहा कि पुरुष भी केवल उसका ही होकर रहे । पुरुष की संपत्ति में हक मांगने वाली न तो कोई दूसरी स्त्री हो न ही किसी अन्य महिला से उसके बच्चे हों ।

शायद आप यह स्वीकार करेंगे कि यह सामाजिक व्यवस्था न हो तो बच्चों के लालन पालन की जिम्मेदारी ठीक उसी तरह से अकेली स्त्री पर ही आ जायेगी जिस तरह से पशुओं में केवल मादा पर यह जिम्मेदारी होती है । चिड़िया अंडे देने से पहले एक घोंसले का निर्माण करती है, अंडों को सेती है, बच्चों के लिये भोजन का प्रबंध भी करती है और तब तक उनकी देख भाल करती है जब तक वह इस योग्य नहीं हो जाते कि स्वयं उड़ सकें और अपना पेट भर सकें । बच्चों को योग्य व आत्म निर्भर बना देने के बाद बच्चों व उनकी मां का नाता टूट जाता है । पिता का तो बच्चों से वहां कोई नाता होता ही नहीं ।

इसके विपरीत, मानवेतर पशुओं से ऊपर उठ कर जब हम मानव जगत में देखते हैं तो नज़र आता है कि न केवल यहां माता और पिता - दोनो का संबंध अपनी संतान से है, बल्कि संतान भी अपनी जन्मदात्री मां को व पिता को पहचानती है । भारत जैसे देशों में तो बच्चा और भी अनेकानेक संबंधियों को पहचानना सीखता है - भाई, बहिन, ताऊ, ताई, चाचा - चाची, बुआ - फूफा, मामा - मामी, मौसा - मौसी, दादा - दादी, नाना - नानी से अपने संबंध को बच्चा समझता है और उनकी सेवा करना, उनका आदर करना अपना धर्म मानता है । ये सब भी बच्चे से अपना स्नेह संबंध जोड़ते हैं और उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आर्थिक विकास में अपने अपने ढंग से सहयोग करते हैं ।

बात के सूत्र समेटते हुए कहा जा सकता है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष सेक्स को "महज़ चाय के एक कप" जैसी महत्ता देना चाहते हैं; उन्मुक्त सेक्स व्यवहार के मार्ग में समाज द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाओं को वह समाज की अनधिकार चेष्टा मानते हैं; यदि उन्हें लगता है कि उनको सड़क पर, कैमरे के सामने, मंच पर नग्न या अर्धनग्न आने का अधिकार है, और उनका ये व्यवहार समाज की चिंता का विषय नहीं हो सकता तो इसका सीधा सा अर्थ है कि वह इस सामाजिक व्यवस्था से सहमत नहीं हैं, इसे शोषण की जनक मानते हैं और इस व्यवस्था से मिलने वाले लाभों में भी उनको कोई दिलचस्पी नहीं है । यदि स्त्री यह विकल्प चाहती है कि वह गर्भाधान, बच्चे के जन्म, फिर उसके लालन-पालन की समस्त जिम्मेदारी अकेले ही उठाए और बच्चे का बीजारोपण करने वाले नर पशु से न तो उसे सहयोग की दरकार है, न ही बच्चे के लिये किसी अधिकार की कोई अपेक्षा है तो स्त्री ऐसा करने के लिये स्वतंत्र है । बस, उसे समाज द्वारा दी जाने वाली समस्त सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देनी होगी । वह समाज की व्यवस्था को भंग करने के बाद समाज से किसी भी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा भी क्यों रखे ? अस्पताल, डॉक्टर, नर्स, दवायें, कपड़े, कॉपी-किताब, स्कूल, अध्यापक, नौकरी, व्यापार आदि सभी सुविधायें समाज ही तो देता है । वह जंगल में रहे, अपना और अपने बच्चे का नीड़ खुद बनाये, उसक पेट भरने का प्रबंध स्वयं करे। क्या आज की नारी इस विकल्प के लिये तैयार है?

यदि समाज द्वारा दी जा रही सेवाओं व सुविधाओं का उपयोग करना है तो उस व्यवस्था को सम्मान भी देना होगा जिस व्यवस्था के चलते ये सारी सुविधायें व सेवायें संभव हो पा रही हैं । सच तो ये है कि शोषण से मुक्ति के नाम पर यदि हम अराजकता चाहते हैं तो समाज में क्यों रहें, समाज से, समाज की सुविधाओं से दूर जंगल में जाकर रहें न ! वहां न तो कोई शोषणकर्ता होगा न ही शोषित होगा ! वहां जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना करने आ रहा है ?

- सुशान्त सिंहल

www.sushantsinghal.blogspot.com

January 28, 2009 12:42 AM

Anonymous said...

baap re..yahaan to tippaniya lekh se lambi ho chali.. waise kavita ke tark mein dam hai.. par sach to sach hai jaisa 'swapnadarhi' ne bataaya, kisi mukaam ko haasil karna to rojmarra se alag ho jata hai..

नटखट बच्चा said...

कविता अर्थपूर्ण है बस ये कविता अगर सोनिया गांधी के लिए होती तो ठीक था. क्यूंकि हमारी राष्टपति तो वैसे भी रबर की स्टेम्प है ओर उन्हें कलाम अंकल से ज्यादा वोट राजनीतक कारणों से दिए गए थे .
मायावती आंटी ,रेंनु नटराजन ,सिंधिया ,ओर हमारी बड़ी बिंदी वाली आंटी उनका नाम याद नही आ रहा उनके लिए ये कविता ठीक है.

Asha Joglekar said...

बहुत ही सशक्त कविता ।

अविनाश वाचस्पति said...

पुरुष के बनने के पीछे
उसके उस होने के पीछे
कह सकता है कि सबके पीछे
और इसे विस्‍तार दूं तो
सबसे पीछे
औरत ही है
क्‍यूं है, इसे औरत बताती है
सबको समझाती है, पर
क्‍या किसी को समझ आती है
या समझ में आने नहीं दी जाती
इस‍ीलिए औरत महान बन जाती है
उसे महान बनाया जाता है
विवेक ने सही कहा है
रोजमर्रा की जिंदगी के कामों के लिए
ढर्रा बनते कामों के लिए
उसे महानता पुरुष अगर दे देगा
तो अपने लिए क्‍या बचाकर रखेगा ?

आर. अनुराधा said...

कविता पढ़ने पर मुझे समझ में आया कि
"क्योंकि रोटी को हर बार गोल बना देना
कोई महान काम नहीं है...."
जैसी बातें लक्षणा में कही गई हैं। यानी औरत जब राष्ट्रपति बने तभी महान मानी जाती है जबकि गोल रोटियां बनाना, पति की कड़वी से कड़वी बात को
चुपचाप सह जाना, अपनी इच्छाओं को दबा लेना
घर और बच्चों की खातिर मुस्कुराते हुए अंदर ही अंदर सुबकते जाना भी उसे महान बनाता है जबकि ऐसा माना नहीं जाता।

कविता का यह अर्थ भी लगाया जा सकता है कि औरत को दुनिया की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर भाषण देने,नारे लगाने,और मोर्चे चलाने जैसे काम करने की जरूरत नहीं है, वह घर संभाल कर ही महान बनी हुई है।

यानी औरत को यह सब नहीं करना चाहिए।?! पूरी कविता विरोधाभासी लगती है। एक तरफ आप उसके पीड़ित होने का गुणगान करते हैं, दूसरी तरफ दुपट्टा सरकने के मसले पर उसे सपोर्ट करते हैं। फिर आगे सिर पर पल्ला लिए दर्द बांटती औरत को "इतिहास पूछता नहीं" जैसी बात कहते हैं, जो कितना सही है, कहा नहीं जा सकता।

और एक तरह से सोचें तो यह तो आम आदमी के साथ भी होता है, फिर आप उन्हीं हालात में औरत को महान बताते हैं, पुरुष का जिक्र तक नहीं।

ईमानदारी से, कुल अर्थ समझ ही नहीं पाई।

Sanjay Grover said...

"""ईमानदारी से, कुल अर्थ समझ ही नहीं पाई।"""
अनुराधा की ईमानदारी प्रंशसनीय है।

Anonymous said...

मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि एक सामान्य औरत इंसान से थोड़ी सी कम क्यों है? हमारे समाज के विकास के चरणों में औरत के जिम्मे घर आया (या दिया गया) और यह एक सामान्य काम मान लिया गया। जितने भी काम पुरुष के हिस्से गए, वे महान हो गए। अगर काम का बंटवारा न होता, बराबर के मौके होते तब और बात होती। यहां तो औरत को मौके ही कम हैं। पहले उसे बराबरी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, चाहे वह शिक्षा के लिए हो या अन्य सुविधाओं के लिए। बराबर आने के बाद वह पुरुष के क्षेत्र में जाकर खुद को साबित करती है, तब जाकर पुरुष उसे महान मानता है। और जो काम वह घर में कर रही है, उनकी कोई अहमियत नहीं है क्योंकि ‘यह तो औरत का धर्म हैं’। अगर ऐसा न होता और उसके वजूद की अहमियत होती, तब पुरुष उसके औरत होने का सम्मान करता। तब उसे घर में भी उतना ही सम्मान मिलता, जितना वह बाहर जाकर अर्जित करती है। तब न घरेलू हिंसा होती, न दहेज के लिए उसे जलाया जाता, न जींस पहनने पर पीटा जाता। इस कविता का गणित बस इतना है कि औरत = मर्द नहीं है। औरत < मर्द है। औरत + मर्दाना गुण = मर्द।

अनुप्रिया के रेखांकन

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