Friday, January 30, 2009

कल्चर के नाम पर गुण्डागर्दी ही तो है


परसों विनीत ने मैंगलोर मे हुई बदतमीज़ी पर लेख लिखा "जिनके लिए स्त्री सिर्फ देवी है" । आज ही यूनिवर्सिटी मे आइसा (All India Students' Association) की ओर से इसके खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाज़ी की गयी। कविता कृष्णन ने प्रखर वक्तव्य देते हुए कहा कि इस तरह के रवैये का विरोध हम सबको करना चाहिए । प्लैकार्ड्स पर लिखा था पितृसत्ता का विरोध और स्त्री अधिकारों की रक्षा ।मै हैरान थी कि सुनने के लिए भीड़ की तरह जुटे उन लड़कों -लड़कियों में कितने इन मुद्दों के प्रति सम्वेदनशील रहे होंगे ,जिन्हे मालूम होगा कि पितृसत्ता कहाँ कहाँ उनके भीतर तक बसी हुई है , समाज की अवचेतना मे है। जो भी हो , वे नारे लगा रहे थे, वे उत्साहित थे ,वे आक्रोश मे थे।वे शायद समझ पा रहे थे कि कल्चर के नाम पर यह सीधा सीधा गुंडागर्दी ही है जिसे बर्दाश्त नही किया जाना चाहिए।
बैजेज़ बेचकर फंड इकट्ठा करते घूमते प्यारे प्यारे से लड़के लड़कियाँ जो दिल्ली हाट जैसे स्थानों पर जागरूकता फैलाने के अभियान मे जुटे हैं वे निश्चित ही आश्वस्त करते हैं भले ही एन जी ओज़ एक नया पनप रहा व्यवसाय ही क्यों न हो पर ये बच्चे समाजिक सरोकारों को पहचानने रहे हैं यह संतोष है।
क्या हम समझ रहे हैं कि यह जो हुआ वह "छोटी सी घटना"(जैसाकि मुतालिख कह रहे हैं) नही थी एक भयानक बात थी। राम की सेना लड़कियों पर हाथ उठाते अपने संस्कृति भूल ही गयी थी।अगर आप अभिभावक होने के नाते अपनी संतानों को बान्ध कर नही रख सकते तो यह काम रामसेना करेगी इसमे तालिबान से तुलना की क्या बात है ? यह तो बहुत मामूली बात है।उन लड़कियों के साथ यही होना चाहिए था।


8 comments:

के सी said...

नहीं ये सिर्फ़ गुंडागर्दी नहीं है, एक विकासशील राष्ट्र को रुढियों और पतन की आदिम बेड़ियों से बांधने की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है, ये एक अभियान है कुंठित और बहकाए हुए खाली दिमाग लोगों का।

Jayram Viplav said...

मीडिया में बहुत होहल्ला इस बात पर हो रहा है कि कुछ लोग जो भगवा ब्रिगेड के सदस्य हैं, जिन्होंने लड़कियों केसाथ मारपीट की, वह बिल्कुल नाजायज है और किसी को हक़ नहीं है कि इस तरह से मार-पीट की जाए। मैं भी सहमत हूँ कि यह बिल्कुल नाजायज है, लेकिन इस पर मुझे मीडिया का रवैया अखरता है। यह मीडिया तब कहाँ थी जब जम्मू-कश्मीर में कुछ लड़कियों के चेहरे पर इसलिए तेजाब डाल दिया जाता है कि वे बुरका नहीं पहनतीं। इस मीडिया को उस समय कुछ दिखाई क्यों नहीं देता जब तसलीमा के ऊपर दो मुस्लिम विधायक हमला कर देतेहैं, तब मीडिया को हरा रंग और हरी ब्रिगेड नजर क्यों नहीं आती। कैसा दोहरा चरित्र है यह, अगर चार-छ: हिन्दू नासमझी में इस तरह की घटना अंजाम दे देते हैं तो भगवा गुंडे, भगवा कहर, भगवा ब्रिगेड और मुस्लिम विधायक संगठित ढंग से जो कुछ करें वह नजर-अंदाज कर दिया जाता है। इन घटनाओं को लेकर तो मीडिया घंटों बहस-मुबाहिसे करती रहती है, लेकिन दूसरे तबके वाले जो कुछ भी कहें-करें, उसके लिए इनके पास समय नहीं है, उसके लिए कोई लाइव बहस का कोई स्कोप नहीं। प्रश्न यह है कि ऐसा करने के लिए क्या इन्हें विशेष तौर पर कहा जाता है, या हिन्दुओं को मानसिक प्रताड़ना पहुँचने में इन्हें मजा आता है या यह फिर कोई षड़यंत्र है, क्या है यह सब। जहाँ तक मार-पीट की बात है, यह निंदनीय है और इसके जिम्मेदार लोगों को इसके लिए सजा भी मिलनी चाहिए लेकिन इसकी आड़ में हिन्दुओं को प्रताडित करना कहाँ तक सही है।

कल की पोस्ट के सिलसिले में एक बात और वह यह कि यह मामला पकड़ में आ गया तो इतना तूल पकड़ गया लेकिन सत्य यही है कि डुमरियागंज में नकली नोट जहां पकड़े गये थे वहां जांच अधिकारी की बैंक पासबुक में आठ लाख रुपये पाये गये. कितने माल की बरामदगी होती है और कितना दिखाया जाता है, हर किसी को पता है. रेलवे में लूट की जितनी घटनायें होती हैं, उनमें न जाने कितनी बार रेलवे की पुलिस के लोग लिप्त पाये गये. कौन सी ऐसी जगह है, जहां चौराहों पर वसूली नहीं होती और कौन सा ऐसा अधिकारी है जिसे यह पता नहीं होता. कौन सा ऐसा मन्त्री, विधायक, सांसद है जो इन सब से अवगत नहीं है, लेकिन जो पकड़ गया वो चोर, जो नहीं पकड़ा गया वो साहूकार. एक्सेप्शन्स की जो बात कार्तिकेय ने कही मैं उससे सहमत हूं लेकिन अच्छे और ईमानदार काम करने वाले एक्सेप्शनल हैं, कामन तो अपने पद का दुरुपयोग करने वाले हैं.

Sanjay Grover said...

मुझे यह समझ में नहीं आता कि ये कौन होते हैं यह तय करने वाले कि कौन क्या पहने क्या न पहने ? क्या ये अपनी वो धोती हमसे पूछ कर पहनते हैं जिसकी लांग भर खींच दी जाए तो सारी उतर कर नीचे आ पड़े। पहने-पहने भी जिसमें से आधी टांगे नंगी दिखती रहती हैं। स्त्रियों के लिए भी ऐसी ही कई अनसिली-अधखुली पोशाकों का प्रबंध हमारी संस्कृति में है। जब दूसरा कोई इन पोशाकों पर आपत्ति नहीं करता तो इन्हें क्या अधिकार है कि सारे देश के लोगों के लिए खाने-पहनने-नाचने का मैन्यू बनाएं। हम सबके बाप-दादा देश का पट्टा क्या इन्हीं सब उजबकों के नाम लिख गए थे !? गाँवों में चुड़ैल बताकर मार डाली जाने वाली औरतें, मानसिक रोगों से ग्रस्त,मातों-जागरातों में सिर पटककर झूलने वाली औरतें, वृंदावन में आलुओं की तरह ठुंसी विधवाएं, दंगों-पंगों में रोज़ाना बलत्कृत होती दलित औरतें, इन सबको देखकर इन्हें अपनी संस्कृति पर ज़रा भी शर्म नहीं आती !?

Anonymous said...

inme se do-char ko pakad kar sare aam goli mar do, tab saari inki wali hindugiri nikal jayegi.

Dr. Manish Kumar Mishra said...

sahi baat hai. isay rokna bahut jaroori hai.

ss said...

यहाँ बड़ी बड़ी बातें लिखने से कुछ नही होगा| हमारे सामने लड़की छेडी जाती है और हम "मर्द" और "औरत" तमाशा देखते हैं| दरअसल हम जो रोज करते हैं, उसी को मीडिया ने टीवी पर दिखा दिया, मिल गया बकरा| हम निर्दोष हो गए| पाप धुल गया| दो भर पेट गाली|

मीडिया.....हाथ में कैमरा क्यूँ था? अपनी बहन पिट रही होती तो कैमरा होता? टीआरपी जादा जरुरी थी न, ब्रेकिंग न्यूज़ न मिस हो जाए| और हाँ जनता को एक बकरा भी चाहिए था|

makrand said...

sahi kaha aapne

ghughutibasuti said...

जो गलत हुआ वह गलत ही रहेगा चाहे लाल, हरे, पीले, नीले कोई भी रंग वाले करें। रंगों की आड़ में, या रंगों के नाम पर गलत सही नहीं हो जाएगा। हाँ, टी वी वालों ने कभी अन्य रंगों की बात नहीं की वह एक अलग मुद्दा है। उस पर अलग से बात होनी चाहिए। मुद्दा केवल स्त्री का भी नहीं है, मुद्दा है कि कौन तय करेगा कि इस देश के नागरिक क्या करेंगे और क्या नहीं ? क्या वे स्वयं ऐसा करेंगे या कोई अन्य ? स्त्री को डराना सरल होता है तो पहले आक्रमण उसपर हुआ फिर सबकी बारी आएगी ही।
घुघूती बासूती

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